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Tuesday, August 25, 2009

मानव का होना और रहना

अनंत प्रकृति और असीम व्यापक के साथ मानव सोचने, समझने, और जीने योग्य इकाई है। ईश्वर-वाद ने बताया था - "ईश्वर ही दृष्टा है।" यहाँ कह रहे हैं - जीवन ही दृष्टा है। व्यापक वस्तु को समझने वाला भी जीवन ही है। और कोई उसे समझेगा नहीं... मानव ही समझेगा। मानव ही सम्पूर्ण अस्तित्व को समझेगा और स्वयं को समझेगा। फलस्वरूप ही मानव का अस्तित्व में व्यवस्था में जीने का बात हो पाता है। अभी हम न स्वयं को समझे हैं, न अस्तित्व को समझे हैं - इसलिए हमारा व्यवस्था में जीने का रास्ता ही बंद हो गया था। जब से मानव धरती पर प्रकट हुआ है, वह न स्वयं को समझा है, न अस्तित्व को समझा है।

मानव ने अपनी कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता के आधार पर मानव-परम्परा के "होने" को स्वीकार लिया है। उसी आधार पर शिक्षा, संविधान, व्यवस्था के नाम पर कुछ न कुछ मनुष्य करता ही है। लेकिन मानव-परम्परा को कैसे "रहना" है - यह अभी तक स्वीकारना नहीं बना है। मानव-परम्परा के "रहने" के स्वरूप को मानव द्वारा स्वीकारने के लिए ही मध्यस्थ-दर्शन के अध्ययन का प्रस्ताव है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक)

मानव जाति में मनः स्वस्थता की रिक्तता को भरने के लिए यह विकल्प प्रस्तुत हुआ है.

समझने के बारे में मुख्य मुद्दा यह है - "पढ़ना समझना नहीं है।" पढने पर "सूचना" होता है। अर्थ की सूचना जब आता है तो उस अर्थ के मूल में अस्तित्व में वस्तु होता है। अस्तित्व में वस्तु पहचान में आया तो समझ में आया। जैसे - "पानी" एक शब्द है। पानी अस्तित्व में एक वस्तु है। "पानी" शब्द से प्यास बुझता नहीं है। पानी वस्तु से ही प्यास बुझता है। इसी प्रकार हर शब्द का अर्थ है। उस अर्थ के मूल में अस्तित्व में वस्तु है। वस्तु समझ में आने से हम समझे।

अभी तक मनुष्य के इतिहास में मनुष्य कैसा है, क्यों है - इसका अध्ययन नहीं हुआ था। दूसरे समग्र अस्तित्व कैसा है, क्यों है - इसका अध्ययन नहीं हुआ था। समग्र अस्तित्व और मानव का अध्ययन न होने से समग्र अस्तित्व में मानव की क्या भागीदारी हो, यह समझ में नहीं आया था। यह न भौतिकवादी विधि से समझ में आया था, न ईश्वर-वादी विधि से समझ आया था। मध्यस्थ-दर्शन दो इन दोनों के विकल्प स्वरूप में आया - उससे मानव का अध्ययन और अस्तित्व का अध्ययन दोनों सम्भव हो गया।

मानव और अस्तित्व क्यों है, और कैसा है? - इसका पूरा ज्ञान मैंने प्राप्त कर लिया। क्यों है? - इससे "रहने" का उत्तर आता है। कैसे है? - इससे "होने" का उत्तर आता है। मानव कैसे है? - इसका उत्तर है, अस्तित्व में प्रकटन विधि पूर्वक मानव धरती पर प्रकट "होना" हुआ। मानव क्यों है? - इसका उत्तर है, मानव के "रहने" का प्रयोजन है - समाधान, समृद्धि, अभय, और सह-अस्तित्व पूर्वक "रहना"। "होना" और "रहना" समझ में आने के लिए ही अध्ययन है। अध्ययन से समझ, और समझ से जीना।

इस पर प्रश्न बनता है - अभी तक मनुष्य क्या जीता नहीं रहा क्या? इसका उत्तर है - अभी तक मनुष्य जीव-चेतना में जिया है। मानव-चेतना में जिया नहीं है। जीव-चेतना में होते हुए भी मनुष्य जीवों से अच्छा जीने का सोचा, क्योंकि मानव को कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता बिरासत में मिला ही था। कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता के चलते मनुष्य ने सामन्याकान्क्षा और महत्त्वाकांक्षा संबन्धी सभी वस्तुओं को प्राप्त कर लिया। इस तरह मानव अपने परिभाषा के अनुरूप मनाकार को साकार करने के चौखट में आ गया। मनः स्वस्थता का चौखट टटोला तो पता चला - वीरान पड़ा है! मनः स्वस्थता के पक्ष में मानव-जाती bankrupt है। मनाकार को साकार करने के पक्ष में हम समृद्ध हैं। यह कुल मिला कर अभी तक के मानव के जिए होने की समीक्षा हुई। मनुष्य जाति द्वारा बिना मनः स्वस्थता को प्रमाणित किए मनाकार को साकार करने के क्रम में ही धरती बीमार हुई। धरती के बीमार होने से जो प्रश्न-चिन्ह मानव-जाति के सम्मुख लग गया है - उसी के उत्तर में मध्यस्थ-दर्शन का विकल्प है। यह विकल्प मानव-जाति के मनः स्वस्थता की रिक्तता को भरने के लिए ही प्रकट हुआ है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक)

स्वीकारना, समझना, और जीना अलग-अलग नहीं हैं.

आपकी पूरी बात एक बार मेरे view में तो आ गयी है - लेकिन "आत्म-सात" नहीं हुई है। आपका कहना है - "समझ के करो!" मैं कहता हूँ - "मैं समझूंगा तभी करूंगा!" इस तरह मेरी गाड़ी फंस सी गयी है!

समझेंगे तो जीना ही पड़ेगा! आपकी प्राथमिकता "समझना" है, "जीना" नहीं है - आप यह कह रहे हो! आपने जो मुझे पत्र लिखा था - उसका सार भी कुछ वैसे ही है।

हाँ

ठीक है! आप जो कह रहे हो, उसे ही रखो... समझ के ही जीने की बात करेंगे।

क्या मेरा स्वयं को जागृत-परम्परा में मानना सही होगा? आप अपने "जागृत" होने का सत्यापन करते हैं, मैं जागृत होना चाहता हूँ।

हाँ। मानव जागृत-परम्परा में ही वैभव-शील है।

आपके प्रस्ताव को लेकर अब कोई "प्रश्न" तो नहीं है। प्रश्न नहीं है - पर आपसे बात करते हैं तो लगता है जैसे हम प्रश्न कर रहे हैं। इस तरह प्रश्न है भी, और नहीं भी है ...

इस बात पर "प्रश्न" तो किया नहीं जा सकता। इसको आप समझे हैं, या नहीं समझे हैं? इसको आप जिए हैं, या नहीं जिए हैं? इन दो जगह में आप से बात हो सकता है - यहाँ आ गए हम!

इस बात का "श्रवण" आपमें करीब-करीब पूरा हुआ है। इसको समझने की इच्छा आपमें बलवती हुई है - क्या मैं ऐसा मानू?

हाँ!

हर वस्तु को "जीने" के अर्थ में समझना होगा; और बीच में "अनुभव" नाम का एक pulse होता ही है। जीने के अर्थ में सुनने पर अनुभव होता ही है। तर्क की आवश्यकता अब कम हो गयी, जीने के अर्थ में ही हर बात को अब समझेंगे। स्वीकारना, समझना, और जीना अलग-अलग नहीं हैं।

स्वीकारने के बारे में लोक-मानस में चार स्तर हैं।
(१) शब्द जो सुना, वह सुनने में अच्छा लगता है - यह पहले स्तर की स्वीकृति है।
(२) ये अच्छी बात कह रहे हैं, यह हमको चाहिए - यह दूसरे स्तर की स्वीकृति है।
(३) ये अच्छी बात कह रहे हैं, यह हमको चाहिए, हम इसको समझना चाहते हैं - यह तीसरे स्तर की स्वीकृति है।
(४) चौथे स्तर की स्वीकृति है - हमें इसी को "जीना" है। यही परम है।

इन चार स्तरों पर स्वीकृतियां होती हैं। आपके अनुसार आप किस स्तर पर पहुंचे हैं?

तीसरे स्तर पर मैं अपने को मानता हूँ।

समझने को लेकर - क्या हम समझ गए हैं, और क्या समझना अभी शेष है, इस पर चला जाए। समझने के मुद्दे पाँच ही हैं - (१) सह-अस्तित्व क्यों है, कैसा है को समझना। (२) सह-अस्तित्व में विकास-क्रम क्यों है, कैसा है को समझना। (३) सह-अस्तित्व में विकास क्यों है, कैसा है को समझना। (४) सह-अस्तित्व में जागृति-क्रम क्यों है, कैसा है को समझना। (५) सह-अस्तित्व में जागृति क्यों है, कैसा है को समझना।

रचना-क्रम में विकास की सर्वोपरि स्थिति में है - मानव-शरीर। परमाणु में विकास की सर्वोपरि स्थिति है - जीवन। मानव-शरीर के घटित होने के लिए पीछे की सभी रचनाएँ हैं। पदार्थ-अवस्था की रचनाएँ (मृद, पाषाण, मणि, धातु) भी उसी क्रम में हैं।

अस्तित्व में प्रकटन क्रम में चार अवस्थाओं का प्रकटन हुआ। हर अवस्था की परम्परा बनने की विधि रही। इसी क्रम में मनुष्य का प्रकटन धरती पर हुआ। "मानव-शरीर एक परम्परा के स्वरूप में बने रहने के लिए धरती पर प्रकट हुआ है।" यदि यह बात आप को मूल रूप में समझ आता है तो आप में "जीने की इच्छा" बन जाती है। "मुझे जीना चाहिए!" - यह आप में निश्चयन हो जाता है। फ़िर मानव-परम्परा के "जीने" के लिए जो "समझ" की आवश्यकता है - उसको "स्वीकार" करने के लिए आप प्रयास-रत होते हो।

स्वीकारना, समझना, और जीना अलग-अलग नहीं हैं।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक)

Wednesday, August 19, 2009

समझने के पहले स्वावलंबन का डिजाईन होता नहीं है.

समझने के पहले स्वावलंबन का डिजाईन होता नहीं है। "मैं समझ गया हूँ, प्रमाणित होना है" - इस जगह में स्वावलंबन का डिजाईन जीवन से स्वयं-स्फूर्त निकलता है। "मैं समझ गया हूँ" - जब तक आप मान नहीं लेते, तब तक आप अपने स्वावलंबन का डिजाईन बना नहीं सकते। "मैं समझ गया हूँ" - जब इस जगह में आपका "मान्यता" आता है तो आप अपने स्वावलंबन का डिजाईन बना दोगे।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)

अनुभव-मूलक विधि से मनुष्य जीने में प्रमाणित होता है.

सम्पूर्ण वस्तु अस्तित्व में हैं। सम्पूर्ण अस्तित्व सह-अस्तित्व स्वरूप में है। सह-अस्तित्व ही चार अवस्थाओं के रूप में प्रकट है। सह-अस्तित्व में जो वस्तुएं हैं, उनका "नामकरण" मनुष्य ही करता है। नाम को हम परस्पर सुनते हैं। नाम सुनकर अस्तित्व में वस्तु को पहचानते हैं। यह प्रक्रिया हर व्यक्ति में निहित है। मानव ने संवेदनशीलता के लिए इस प्रक्रिया का प्रयोग किया और सफल हुआ। अब संज्ञानीयता के लिए इसका प्रयोग करना है, और सफल होना है। इतना ही बात है।

संवेदनशीलता से हम सफल होंगे, या संज्ञानीयता से सफल होंगे - पहले इसको निर्णय कर लो! जितना आपको तर्क करना है, वह कर लो! संवेदनशीलता से सफल नहीं हो सकते हैं - यदि यह निष्कर्ष आपमें निकलता है, तो संज्ञानीयता के लिए आपकी झकमारी है!

संवेदनशीलता की सीमा में अपराध-मुक्त होना बनता नहीं है। संवेदनशीलता की सीमा में अपने-पराये की दीवारों से मुक्त होना बनता नहीं है।

संवेदनशीलता पूर्वक जीवन में (मन में ) आस्वादन होता है, (वृत्ति में) विचार होता है, और (चित्त में) इच्छाएं होती हैं। इस प्रकार मन में जो आस्वादन होता है, उसमें संवेदनाओं से सुख "भासने" की बात होती है - लेकिन उसमें सुख की निरंतरता नहीं बन पाती। बारम्बार आस्वादन करने के लिए संवेदनाओं में मन टिका रहता है। इस प्रकार वृत्ति में जो विचार होते हैं - वे प्रिय-अप्रिय, हित-अहित, लाभ-अलाभ दृष्टियों से ही होते हैं। इस प्रकार चित्त में जो चित्रण होता है, वह सुविधा-संग्रह के अर्थ में ही होता है।

संवेदनशीलता से यदि हम छूटते हैं तो सीधे अनुभव में ही पहुँचते हैं। बीच में कहीं रुकते नहीं हैं। मध्यस्थ-दर्शन के प्रस्ताव से पहले तपस्या पूर्वक अनुभव में पहुँचने की बात कही गयी थी। यहाँ मैं कह रहा हूँ - अध्ययन पूर्वक हम अनुभव तक पहुँच सकते हैं। अध्ययन पूर्वक संज्ञानीयता बोध होता है। संज्ञानीयता बोध होने के बाद अनुभव होता ही है। संज्ञानीयता है - अस्तित्व में वस्तु का बोध। शब्द को हम व्यक्ति से सुनते हैं। शब्द के अर्थ के रूप में अस्तित्व में वस्तु है। अर्थ का बोध होता है। शब्द का स्मरण रहता है। चित्रण में स्मरण है। शब्द का स्मरण अर्थ का बोध होते तक आवश्यक है।

संवेदनशीलता पूर्वक हम विचार करते हैं, या अनुभव पूर्वक (संज्ञानीयता पूर्वक) विचार करते हैं। ये दो ही स्थितियां होती हैं। तीसरी कोई स्थिति नहीं है। अनुभव मूलक विधि से मनुष्य जीने में प्रमाणित होता है। संवेदनशीलता पूर्वक मनुष्य जीने में प्रमाणित होता नहीं है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)

जीवन और सह-अस्तित्व के जुड़ने की विधि अनुभव ही है.

सुनना भाषा है। समझना अर्थ है। अर्थ अस्तित्व में वस्तु है। वस्तु समझ में आता है, तो हम अर्थ समझे। अर्थ जो समझे - वही अनुभव है। अर्थ ही अनुभव है। शब्द अनुभव नहीं है। हमारे बुजुर्गों ने शब्द को ही अनुभव मान लिया। मानव-इतिहास में कई जगह हम छूट-छूट कर निकल गए हैं। उन सबके जुड़ने की विधि अनुभव ही है।

जीवन और सह-अस्तित्व के जुड़ने की विधि अनुभव ही है। दूसरा कुछ भी नहीं है। वह विधि है - अस्तित्व में वस्तु के रूप में अनुभव करना, और प्रमाणित करना। इतना ही है। इससे मानवीयता पूर्ण आचरण आता है। मानवीयता पूर्ण आचरण आने से व्यवस्था में जीने का सूत्र बनता है। हम अभी जितना जीते हैं, उससे आगे का सूत्र अपने-आप जीवन से निकलता ही चला जाता है। जैसे- अभी कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता पूर्वक मनाकार को साकार करने का सूत्र अपने आप से जीवन से निकलता गया, तभी मानव अपने इतिहास में जंगल-युग से आज के युग में पहुँच गया। वैसे ही अनुभव पूर्वक मनः स्वस्थता को प्रमाणित करने का सूत्र अपने आप से जीवन से निकलता ही चला जाता है।

सर्वतोमुखी समाधान को मनः स्वस्थता के रूप में मैंने अनुभव किया है, समझा है, जिया है।

मनः स्वस्थता आप में होने के लिए तीन ही बात है -
(1) शब्द को सुनना
(२) अर्थ को समझना
(३) समझ को प्रमाणित करना

इतना सरल है यह। अभी मैं जो कर रहा हूँ, इतना ही कर रहा हूँ।

प्रश्न: साक्षात्कार, बोध, और अनुभव मुझे हुआ है या नहीं - यह मुझे कैसे पता चलेगा?

उत्तर: यह आपको ही पता चलेगा। दूसरे को तो केवल आपके जीने में प्रमाणों से पता चलेगा। जीवन में स्वयं से कुछ भी "छुपा" नहीं है। जब तक हम शरीर को जीवन माने रहते हैं, जीवन छुपा ही रहता है। जीवन को "मान" कर देखना शुरू करते हैं तो शनै शनै जीवन को प्रमाणित करने की जगह में पहुँच जाते हैं।

हम में आशा होती ही है - उस आशा की "तुष्टि" हमको चाहिए। यह तुष्टि कैसे होगी, इसका उत्तर है - समाधान पूर्वक ही होगी। मन में समाधान हो जाए। हर विचार में समाधान प्रकट हो जाए। हर इच्छा में समाधान समा जाए। इस तरह जब हम अपने सोच-विचार को पूरा इसमें लगा देते हैं तो अनुभव होने की सम्भावना बन जाती है।

अनुभव होने पर, अनुभव का प्रमाण हर स्थिति में बना रहता है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)

अनुभव-प्रमाण ही परम है.

अनुभव के बिना प्रमाण नहीं है। अनुभव की अपेक्षा (रोशनी) जीवन में सदा रहता ही है। जीव-चेतना में शरीर-मूलक क्रिया-कलाप होता है। उसमें अनुभव तक पहुँचने का कोई वस्तु रहता नहीं है। हर व्यक्ति प्रिय-हित-लाभ पूर्वक तुलन करता ही है। "यह ठीक हुआ, यह ठीक नहीं हुआ", "यह चाहिए, यह नहीं चाहिए" - यह सब हम तुलन करते ही हैं। यह तुलन करते हैं, इसीलिये हमको "मान्यता" के रूप में यह स्वीकार होता है - न्याय, धर्म, सत्य पूर्वक भी तुलन किया जा सकता है। न्याय, धर्म, सत्य में विश्वास तभी होता है, जब हम इनको प्रमाणित करने लगें।

शब्द के द्वारा "मान्यता" के रूप में जो हम स्वीकारे, उसका स्वयं में परिशीलन (निरीक्षण, परीक्षण) होने पर चित्त में साक्षात्कार होता है। साक्षात्कार के फलन में बोध, बोध के फलन में अनुभव, अनुभव के फलन में अनुभव-प्रमाण बोध, जिसके फलन में चिंतन पूर्वक, तुलन पूर्वक हम प्रमाणित करने योग्य हो जाते हैं।

सह-अस्तित्व का प्रस्ताव स्मरण में आने के बाद इसको समझना और प्रमाणित करना शेष रहता है। प्रमाण के साथ ही समझ पूरा होता है। अनुभव के बिना समझ पूरा होता नहीं है। अनुभव के बिना प्रमाण नहीं है।

चित्त के पहले शब्द है। चित्त के बाद अर्थ है। अर्थ के साथ तैनात होने पर हमको तुंरत बोध होता है। बोध होने पर तत्काल चित्त में हुए साक्षात्कार की तुष्टि हो जाती है। फल-स्वरूप अनुभव हो जाता है। अनुभव के बाद हम कहीं रुकने वाले नहीं हैं। अनुभव दूसरे किसी permutation-combination से होता नहीं है।

आस्था या "मानने" के रूप में हम शुरू करते हैं, अनुभव-प्रमाण के आधार पर हम प्रमाणित हो जाते हैं। यह जीवन में होने वाली प्रक्रिया है। यह शरीर में होने वाली प्रक्रिया नहीं है। जीवन में ही संज्ञानशीलता की प्रक्रिया होती है। जीवन और शरीर के संयोग में संवेदनशीलता की प्रक्रिया होती है। सभी ७०० करोड़ मनुष्य इसी में गण्य हैं। संज्ञानशीलता पूर्वक ही जीवन तृप्त होता है। तृप्त होने का प्रमाण ही अनुभव है।

अनुभव-प्रमाण ही "परम" है। परम का मतलब - यह न ज्यादा होता है, न कम होता है। अनुभव के आधार पर हर व्यक्ति के दूसरे व्यक्ति से हर विधा में (कार्य में, व्यवहार में, व्यवस्था में, आचरण में) संतुष्ट होने की विधि बनी। इस तरह "मानवीय परम्परा" बनती है। मानवीय परम्परा के धारक-वाहक हैं - शिक्षा, संविधान, आचरण, और व्यवस्था।

अनुभव-ज्ञान में मानवीयता पूर्ण आचरण ज्ञान समाहित है। सह-अस्तित्व दर्शन ज्ञान, जीवन-ज्ञान, मानवीयता पूर्ण आचरण ज्ञान - इन तीनो के संयुक्त स्वरूप में "ज्ञान" है। आचरण जब प्रमाणित होता है तब फल-परिणाम ज्ञान के अनुकूल हुआ। आचरण के अनुरूप जब व्यवस्था हुई, तब वह ज्ञान के अनुरूप हुई। इस तरह मानव का मानवत्व सहित व्यवस्था में होना, और समग्र व्यवस्था में भागीदारी करना हुआ।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)

ज्ञानार्जन में कोई bargain नहीं है

प्रश्न: आपने पूरा दर्शन हमारे सम्मुख प्रस्तुत किया, पर मेरा मन तो अभी तक नहीं भरा...

उत्तर: भाषा के अर्थ में पहुंचना हर व्यक्ति में स्वयं स्फूर्त होता है। ज्ञानार्जन में कोई bargain नहीं है। यह अस्तित्व-सहज है। अस्तित्व में सम्पूर्ण वस्तु निहित है। वस्तु के रूप में हमें वस्तु बोध होने पर ही मन भरता है। उसके लिए प्रयत्न करना चाहिए। सहअस्तित्व कैसे है, क्यों है - इन दोनों प्रश्नों का उत्तर बारम्बार अपने मन में पहुंचना चाहिए। फलतः अनुभव में आकर स्वयं को प्रमाणित करने की अर्हता स्थापित होना चाहिए। फलस्वरूप मन भरेगा, नहीं तो काहे को भरेगा?

संज्ञानशीलता की अर्हता हम कितनी जल्दी हासिल कर सकते हैं, वह हमारी "तीव्रता" के आधार पर है। हमारी साँस लेने की एक गति है, सोचने की एक गति है, निर्णय लेने के लिए प्राथमिकता बनने की एक गति है। संज्ञानशीलता की प्राथमिकता जब स्वयं में बन जाती है, तो काम हो जाएगा! अपने आप पर भरोसा तो करना पड़ेगा। अपने पर भरोसा छोड़ कर जीना तो बनेगा नहीं। या तो हम किसी को हांकते रहेंगे, या दूसरा कोई हमको हांकता रहेगा! अर्हता हासिल करने के लिए अध्ययन ही एक मात्र आसरा है। धीरे-धीरे अपने में विश्वास अर्जन करने की बात है। अर्हता बढ़ते-बढ़ते एक दिन पूर्णता तक भी पहुँचती है। फ़िर बोध होना, और अनुभव होना होता है। उसके बाद हम मानवीयता पूर्ण तरीके से जीने "योग्य" हो जाते हैं।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)

Tuesday, August 18, 2009

छोड़ने-पकड़ने के झंझट से मुक्ति

भ्रमित-मनुष्य में भी वृत्ति में न्याय, धर्म, और सत्य की "सहज-अपेक्षा" रहती है।

न्याय, धर्म, और सत्य का मध्यस्थ-दर्शन का प्रस्ताव शब्द के रूप में विचार में पहुँचता है। इससे वृत्ति में जो पहले से "अपेक्षा" थी उसकी पुष्टि हुई।

सह-अस्तित्व के प्रस्ताव की सूचना का परिशीलन करने के लिए चित्त में गए। चित्त में परिशीलन करने से सह-अस्तित्व साक्षात्कार हुआ।

चित्त में सह-अस्तित्व साक्षात्कार होने पर तुंरत ही बुद्धि में न्याय, धर्म, और सत्य का बोध होता है।

बुद्धि में जब बोध होता है तो स्वतः आत्मा में अनुभव हो जाता है।

आत्मा में अनुभव होने पर बुद्धि में अनुभव-प्रमाण बोध होता है। इससे अनुभव को प्रमाणित करने का संकल्प बनता है। अनुभव-प्रमाण बोध के आधार पर चिंतन हुआ। फल-स्वरूप अनुभव-मूलक चित्रण हुआ। वृत्ति अनुभव-प्रमाण विधि से संतुष्ट हो गयी। फल-स्वरूप अनुभव-मूलक विश्लेषण हुआ। इस विश्लेषण के अनुरूप मन में मूल्यों का आस्वादन हुआ - जिसके लिए आदि-काल से मनुष्य प्यासा रहा। मन तृप्त हुआ, फलस्वरूप अपनी तृप्ति को प्रमाणित करने के लिए चयन शुरू किया - जिसमें समाधान निहित हुआ, सत्य निहित हुआ, न्याय निहित हुआ। इस तरह न्याय, धर्म, और सत्य तीनो प्रमाणित होने लगे!

बुद्धि में अनुभव-मूलक संकल्प और मन में अनुभव-मूलक चयन - इन दोनों के योगफल में प्रमाण मानव-परम्परा में प्रवाहित होता है। अनुभव होने के बाद प्रमाणित होने का हमारा जो प्रवृत्ति बनता है, उसके अनुसार हमारा आचरण मानवीयता पूर्ण बनता है। मानवीयता पूर्ण आचरण बनता है, तो उसके आधार पर मानवीय संविधान बनता है। मानवीय संविधान बनता है तो मानवीय शिक्षा का स्वरूप निकलता है। मानवीय शिक्षा का स्वरूप निकलता है तो मानवीय व्यवस्था का स्वरूप निकलता है। इस तरह अनुभव फैलता चला जाता है।

अनुभव होने के बाद आचरण बनेगा या नहीं? अनुभव होने के बाद में आचरण में न आए - ऐसा कोई बाँध नहीं है। अनुभव आचरण में आना ही है!

यह यदि हमको समझ में आता है, इसके प्रति निष्ठां होता है, तो इसको अनुभव करने में क्या तकलीफ है? इसमें आपका क्या नुक्सान होता है? क्या आपका घट जाता है, आप ही सोच लो!

इतने को अच्छे से आप अपने में सुदृढ़ बनाओ, यह यदि आपने प्रमाणित करना शुरू कर दिया तो जो होना है, वह हो ही जाएगा। स्वयं में प्रमाणित करना शुरू करते हैं तो उससे जो आगे की प्रक्रिया है वह होगा ही आगे। उसके लिए हमको अलग से कुछ सोचने की ज़रूरत नहीं है। इस तरह छोड़ने-पकड़ने का झंझट ही ख़त्म हो गया! अभी "करो! नहीं करो!" वाले तरीके में "इसको छोडो, उसको पकडो!" वाला झंझट बना ही था। वह झंझट ही ख़त्म हो गया अब!

समझ के करने जाते हैं तो प्रमाण प्रवाहित होता ही है!

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)

अनुभव ही प्रमाण है.

तुलन या तौलने की बात वृत्ति में रखा हुआ है। भ्रमित-स्थिति में न्याय, धर्म, और सत्य दृष्टियों से तौलने का "वस्तु" वृत्ति में नहीं रहता। शरीर मूलक दृष्टियों (प्रिय, हित, लाभ) से तौलने पर यह "वस्तु" वृत्ति में आता नहीं है।

सह-अस्तित्व प्रस्ताव शब्दों में सुनने से इतना भारी उपकार हो जाता है - सह-अस्तित्व "होने" के रूप में स्वीकार हो जाता है। न्याय, धर्म, सत्य "कुछ है" - यह स्वीकार हो जाता है। इस आधार पर स्वयं को जीने में यह जाँचना शुरू करते हैं - कहाँ तक न्याय है? कहाँ तक समाधान है? कहाँ तक सत्य है? इस तरह जब जाँचना शुरू करते हैं, तो शब्द पर्याप्त नहीं होता।

जिज्ञासा पूर्वक "सत्य" शब्द से सह-अस्तित्व जो इंगित है - वहाँ हम पहुँच जाते हैं। इस तरह सह-अस्तित्व चित्त में चिंतन-क्षेत्र में साक्षात्कार होता है। साक्षात्कार होने पर बुद्धि में बोध होता ही है। अनुभव होने पर बुद्धि में पुनः अनुभव-प्रमाण बोध होता है। अनुभव-प्रमाण बोध होने पर बुद्धि चिंतन के लिए "खुराक" प्रस्तुत कर दिया। जिससे अनुभव-मूलक विधि से चित्रण होने लगा। जैसे - मैं अभी आपके संयोग में आपकी जिज्ञासा के आधार पर कर रहा हूँ! ऐसे अनुभव-मूलक चित्रण करने का प्रयोजन है - सामने व्यक्ति को बोध कराना।

जैसे- मैंने अनुभव-मूलक विधि से चित्रण करते हुए आपके सम्मुख कुछ शब्दों को प्रस्तुत किया। उन शब्दों के अर्थ में जाने की आपकी आवश्यकता या जिज्ञासा बन गयी। जैसे - "पानी" एक शब्द है, जिससे मैं कहता हूँ - प्यास बुझती है। यह सुन कर पानी वस्तु को पहचानने की आपमें जिज्ञासा बन गयी। अब आप पानी वस्तु को अस्तित्व में पहचान सकते हैं, अपनी प्यास बुझा सकते हैं। उसी तरह से - "सत्य" एक शब्द है जो सह-अस्तित्व स्वरूप में वस्तु है। सह-अस्तित्व क्या है? व्यापक में संपृक्त प्रकृति है। सत्ता व्यापक है। प्रकृति एक-एक अनंत इकाइयाँ हैं। अनंत स्वरूप में प्रकृति और व्यापक स्वरूप में सत्ता साक्षात्कार होने पर बोध, और बोध होने पर अनुभव सिद्ध हो जाता है।

अनुभव ही प्रमाण है।

बुद्धि में संकल्प स्वयं (जीवन) को प्रमाणित करने की "दवाई" है। बुद्धि में संकल्प ही प्रमाणित करने की "पुडिया" है। अनुभव-प्रमाण बोध बुद्धि में होने पर चित्त में चिंतन शुरू होता है। चिंतन ही अनुभव-मूलक चित्रण का पृष्ठ-भूमि है। चित्त में चिंतन क्रिया आवश्यक रहा ताकि वृत्ति संतुष्ट हो सके - "यही न्याय है!", "यही धर्म है!", "यही सत्य है!" इस तरह वृत्ति के संतुष्ट होने के लिए आत्मा में अनुभव आवश्यक रहा। इस तरह अनुभव-मूलक विधि से वृत्ति में सत्य घंटी बजाने लगा। धर्म घंटी बजाने लगा। न्याय घंटी बजाने लगा। फलस्वरूप - संवेदनशीलता से जो क्रियाकलाप होता रहा, वह सब "नियंत्रित" हो गया। संवेदनाओं का यह नियंत्रण स्वयं-स्फूर्त हुआ। इसके लिए कोई बाहरी बल नहीं लगाना पड़ा। कोई कायदा-क़ानून नहीं लगाना पड़ा। प्राकृतिक रूप में संवेदनाएं अनुभव-मूलक विधि से नियंत्रित हो जाती हैं। न्याय, धर्म, और सत्य मूलक इन विचारों से जो मूल्य स्पष्ट हुए, उनका आस्वादन मन में हो गया। मन में हुए मूल्यों के आस्वादन के अनुसार हम चयन करने लगे। इस तरह स्वयं को प्रमाणित करने के लिए एक तरफ़ बुद्धि में अनुभव-मूलक "संकल्प" रहता है, दूसरी ओर मन में अनुभव-मूलक "चयन" रहता है। ये दोनों मिल कर अनुभव-प्रमाण की परम्परा बनती है।

इस तरह -

शिक्षा विधि से अध्ययन, अध्ययन विधि से बोध, बोध विधि से अनुभव, अनुभव विधि से प्रमाण, अनुभव-प्रमाण विधि से बोध व संकल्प, बोध व संकल्प विधि से चिंतन व चित्रण, चिंतन व चित्रण विधि से तुलन व विश्लेषण, अनुभव-मूलक तुलन व विश्लेषण के आधार पर आस्वादन और चयन।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)

कल्पनाशीलता का तृप्ति बिन्दु

भ्रमित अवस्था में भी मनुष्य में न्याय, धर्म, और सत्य "सहज-अपेक्षा" है। "न्याय", "धर्म", और "सत्य" शब्द हमारे विचार में हैं। पर "न्याय" क्या है? "धर्म" क्या है? "सत्य" क्या है? - इसका उत्तर मिलता नहीं है। फलतः प्रिय-हित-लाभ में हम लोटते रहते हैं। वृत्ति को "स्मरण पूर्वक" यह सूचना मिलती है - "सह-अस्तित्व स्वरूप में सत्य है", "समाधान स्वरूप में धर्म है", "मूल्यों के निर्वाह के स्वरूप में न्याय है"। इस सूचना का वृत्ति में परिशीलन (निरीक्षण-परीक्षण) करने पर वृत्ति "उत्सवित" होती है, फलन में चित्त में साक्षात्कार होता है। चित्त के इस प्रकार "उत्सवित" होने पर बुद्धि में बोध हो जाता है। अध्ययन विधि में ऐसे ही होता है।

मनुष्य की कल्पनाशीलता का तृप्ति-बिन्दु सह-अस्तित्व में अनुभव ही है।

कल्पनाशीलता की रोशनी के प्रयोग से हम साक्षात्कार पूर्वक बोध-संपन्न होने तक पहुँच जाते हैं। बोध-संपन्न होने पर अनुभव की रोशनी प्रभावशील हो जाती है। कल्पनाशीलता की रोशनी अनुभव की रोशनी में विलय हो जाती है।

इसको आप अच्छी तरह से पचाइये! इस जगह में जल्दीबाजी नहीं करिए। इसको समझने के लिए आपको "ध्यान" देना होगा।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)

Monday, August 17, 2009

अनुभव को बताया जा सकता है.

अध्ययन विधि में - "सत्ता में संपृक्त प्रकृति" का बोध बुद्धि में ही होता है। अध्ययन करने वाले के चित्त में यह चित्रित नहीं हो पाता। यह बुद्धि में बोध ही हो पाता है।

प्रश्न: चित्रण और बोध में क्या फर्क है?

उत्तर: बुद्धि में जो बोध होता है उसका अनुभव-मूलक विधि से प्रमाण प्रस्तुत होता है। चित्त में चित्रण जो होता है वह प्रमाणित नहीं होता। संवेदना के रूप में व्यक्त हो जाता है। चित्रण और बोध में यही फर्क है।

अध्ययन-विधि में "सत्ता में संपृक्त प्रकृति" का तुलन से सीधा साक्षात्कार, फ़िर बोध ही होता है। चित्रण नहीं होता।

चित्त में सह-अस्तित्व साक्षात्कार होने पर बुद्धि में बोध ही होता है। बोध होने के बाद अनुभव-मूलक विधि से पुनः "प्रमाण-बोध" बुद्धि में होता है। प्रमाण-बोध को प्रमाणित करने का "संकल्प" होता है। संकल्प होने से उसका चित्त में चिंतन होता है - जो फ़िर चित्रित होता है। इस तरह जब अनुभव-संपन्न व्यक्ति में चित्रण होता है तो वह जीने में अनुभव को प्रमाणित करने का आधार बनता है, तथा दूसरे व्यक्ति में बोध कराने का स्त्रोत बनता है। इस तरह "सत्ता में संपृक्त प्रकृति" को अनुभव-संपन्न व्यक्ति चित्रित करता है। यदि यह चित्रण करना सम्भव नहीं होता तो अनुभव को जीने में प्रमाणित करने का, और दूसरे व्यक्ति को अध्ययन-विधि से बोध कराने का कोई तरीका ही नहीं होता।

विगत में कहा गया था - "अनुभव को बताया नहीं जा सकता।" मैं यहाँ कह रहा हूँ - अनुभव को ठोक-बजाऊ विधि से बताया जा सकता है। यदि शानदारी से बताने की कोई चीज है तो वह अनुभव ही है। इन दोनों में कितना दूरी है, आप ही सोच लो!

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)

जिज्ञासा पूर्वक हम सीधे सत्य-बोध होने की जगह में चले जाते हैं.

भ्रमित-अवस्था में भी बुद्धि चित्त में होने वाले चित्रणों का दृष्टा बना रहता है। मध्यस्थ-दर्शन का अस्तित्व-सहज प्रस्ताव का चित्रण जब चित्त में होता है, तो बुद्धि उससे "सहमत" होती है। यही कारण है - इस प्रस्ताव को सुनने से "रोमांचकता" होती है। रोमांचकता का मतलब यह नहीं है - "कुछ बोध हो गया!" इस रोमांचकता से "तृप्ति" नहीं है।

प्रश्न: तृप्ति के लिए फ़िर क्या किया जाए?

उत्तर: प्रिय-हित-लाभ पूर्वक जो हम तुलन करते हैं, वहाँ न्याय-धर्म-सत्य को प्रधान "माना" जाए। न्याय-धर्म-सत्य की "चाहत" भ्रमित-मनुष्य में भी बनी ही है। एक भी क्षण ऐसा नहीं है जब हम न्याय, धर्म, सत्य को नहीं चाहते हों! हर व्यक्ति के मानस-पटल पर न्याय-धर्म-सत्य की चाहत है। इस प्रस्ताव को सुनने के बाद, उसके आधार पर हम "जिज्ञासा" शुरू करते हैं, यह कहाँ तक न्याय है? कहाँ तक समाधान है? कितना हम सच्चाई को समझे है, और प्रमाणित कर रहे हैं। "न्याय", "धर्म", "सत्य" शब्दों से हम में सहमति है। न्याय क्या है? धर्म क्या है? सत्य क्या है? - यह जिज्ञासा है। यह जिज्ञासा स्वयं में शुरू होने पर अंततोगत्वा हमारी प्राथमिकता न्याय, धर्म, और सत्य के लिए स्थिर हो जाती है।

प्रश्न: यह जिज्ञासा कैसे काम करती है?

उत्तर: हम जहाँ भी रहते हैं, वहाँ सोचते हैं ही। वहीं हम "स्वयं की जांच" शुरू कर देते हैं - न्याय सोच रहे हैं या अन्याय सोच रहे हैं। यह जांच होने पर न्याय, धर्म, और सत्य की प्राथमिकता को हम स्वयं में स्वीकार लेते हैं। यह प्राथमिकता स्वीकार लेने के बाद हम न्याय क्या है - अन्याय क्या है? धर्म क्या है - अधर्म क्या है? सत्य क्या है - असत्य क्या है? इस "शोध" में लगते हैं।

इस शोध के फल-स्वरूप हम इन निष्कर्षों पर पहुँचते हैं।
(१) सह-अस्तित्व स्वरूपी अस्तित्व ही "परम-सत्य" है।
(२) सर्वतोमुखी समाधान ही "धर्म" है।
(३) मूल्यों का निर्वाह ही "न्याय" है।

इन तीन निष्कर्ष पर आने पर तत्काल साक्षात्कार हो कर बुद्धि में बोध होता है। बुद्धि में जब यह स्वीकार हो जाता है तो यह तुंरत अनुभव में आ जाता है। सह-अस्तित्व में अनुभव हो जाता है।

बोध तक अध्ययन है। उसके बाद अनुभव स्वतः होता है।

इसके बाद अनुभव-मूलक विधि से बुद्धि में अनुभव-प्रमाण बोध होने लगता है। प्रमाण-बोध जब बुद्धि में आता है तो हमारा आचरण "मानवीयता पूर्ण" होने लगता है। आप ही बताओ - इसको मैं ज्ञान मानू या और किसी चीज को मानू?

विगत में कहा गया था - सत्य समाधि में समझ में आता है। मध्यस्थ-दर्शन के अनुसंधान से निकला - "जिज्ञासा पूर्वक हम सत्य-बोध होने की जगह में सीधे चले जाते हैं।"

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)

जीव-चेतना में भय-प्रलोभन का कार्य-रूप

जीव-चेतना में जीता हुआ मनुष्य भय और प्रलोभन से चालित रहता है। भय-प्रलोभन वश हम जो करते हैं, उसमें से कुछ "सही" हो जाता है, कुछ "ग़लत" हो जाता है। जीव-चेतना में शरीर-मूलक दृष्टियों से ही विचार होता है, और उसी के अर्थ में "करना" भी होता है। प्रिय-हित-लाभ दृष्टियों की सीमा में जो "सही" होता है, वह शरीर के साथ ही "सही" होता है। इस तरह "ग़लत" जो होता है - वह चारों अवस्थाओं के साथ होता है। इस तरह जीव-चेतना में जीते हुए मनुष्य के "सहीपन का दायरा" शरीर तक ही सीमित हो जाता है। "गलती का दायरा" बढ़ जाता है। गलती का दायरा बढ़ जाने से गलती करने की आदत बढ़ती जाती है। दूसरे कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता रहने से और मनाकार को साकार करने की प्रवृत्ति रहने से - हमने हर अपराध को वैध मान लिया। मनुष्य के साथ अपराध और धरती के साथ अपराध। इस अपराध श्रृंख्ला के चलते धरती बीमार हो गयी।

समझदारी पूर्वक मनुष्य भ्रम-मुक्त होता है, फलतः अपराध-मुक्त होता है। समझदारी के लिए मध्यस्थ-दर्शन के अध्ययन का प्रस्ताव है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)

Sunday, August 16, 2009

संकट मुक्ति

जीवन अपने स्वरूप में एक गठन-पूर्ण परमाणु है। इसके पाँच स्तर हैं - मन, वृत्ति, चित्त, बुद्धि, और आत्मा। जीवन इन पाँचों का अविभाज्य स्वरूप है। भ्रमित-मनुष्य में जीवन की ४.५ क्रियाएं ही क्रियाशील रहती हैं, शेष क्रियाएं सुप्त रहती हैं। ४.५ क्रियाएं जो क्रियाशील रहती हैं - उसी से मनुष्य में कल्पनाशीलता प्रकट है। आशा, विचार, और इच्छा का संयुक्त स्वरूप कल्पनाशीलता है। भ्रमित-जीवन में विचार (वृत्ति) प्रिय-हित-लाभ दृष्टियों से कार्य करता है। भ्रमित-जीवन में इच्छा (चित्त) में चित्रण क्रियाशील रहता है, चिंतन सुप्त रहता है।

चिंतन भाग जीवन में तब तक सुप्त रहता है जब तक अनुभव-प्रमाण आत्मा में न हो! अनुभव-प्रमाण के बिना चिंतन की "खुराक" ही नहीं है।

वृत्ति में जब हम प्रिय-हित-लाभ दृष्टियों से ही तुलन करते हैं तो वह चिंतन में जाता नहीं है। प्रिय-हित-लाभ पूर्वक तुलन करके हम शरीर-मूलक चित्रण तक ही पहुँचते हैं। शरीर-मूलक बात को चित्रण से आगे बढाया नहीं जा सकता। उसमें चिंतन की कोई वस्तु नहीं है। उसमें केवल संवेदना है, और संवेदना को राजी रखने की प्रवृत्ति है। इसी को "संवेदनशीलता" कहा है। इसको "वेदना" इसलिए कहा - क्योंकि संवेदनाओं में सुख "भासता" है ("सुख जैसा लगता है") पर उसकी निरंतरता नहीं बनती। यह "कष्ट" भ्रमित-जीवन में बना रहता है।

भामित-मनुष्य का यह "कष्ट" उसके जीवन में अतृप्ति के कारण है। भ्रमित-जीवन में अतृप्ति की रेखा चिंतन और चित्रण के बीच बनी है। भ्रमित-जीवन जब जीता है, तो उसको समस्याएं ही समस्याएं आती हैं। भ्रमित-जीवन को जीने में समाधान नहीं मिलता। समस्याओं के बिगाड़ का संकेत चित्रण में आता ही है। वही मानव के लिए "संकट" है। जैसे- धरती बीमार हो गयी, बिगाड़ का यह संकेत मनुष्य के चित्रण में आता ही है। इस संकट से मुक्ति और भ्रमित कार्य करने से तो नहीं मिल सकती।

इस संकट से मुक्ति तभी सम्भव है जब मनुष्य ४.५ क्रिया के स्थान पर १० क्रिया पूर्वक जिए। उसके लिए ही मध्यस्थ-दर्शन सह-अस्तित्व-वाद के अध्ययन का प्रस्ताव है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)

गणित आंखों से अधिक, और समझ से कम होता है.

मनुष्य किसी भी इकाई को सम्पूर्णता के स्वरूप में समझ सकता है।

समझना आवश्यक है या नहीं? पहले इस बात को तय करना आवश्यक है। इसका उत्तर हर व्यक्ति - चाहे ज्ञानी हो, अज्ञानी हो, विज्ञानी हो - के साथ यही आता है, "समझना आवश्यक है।" समझने की आवश्यकता अस्तित्व में केवल मनुष्य को ही है। पत्थर, पेड़-पौधे, जीव-जानवर को अस्तित्व के स्वरूप को समझने की आवश्यकता नहीं है। "मनुष्य के लिए अस्तित्व को समझना आवश्यक है" - इस सूत्र के आधार पर हम आगे बात करेंगे।

कैसे समझते हैं? इस पर चलते हैं। आंखों से हमको दिखाई देता है। आंखों के सामने जो १८० अंश तक की परिधि में आता है - उसको "दृष्टि-पाट" कहते हैं। कुल ३६० अंश में से अधिकतम १८० अंश ही दृष्टि-पाट में आता है। इस तरह आधा दृश्य ही आँखों पर प्रतिबिंबित होता है। इस दृष्टि-पाट में हर दृग-बिन्दु आकार और आयतन के रूप में आंखों पर प्रतिबिंबित होता है।

"घन" आंखों द्वारा समझ में आता नहीं है। तब हम गणित का सहारा लेते हैं। गणितीय भाषा द्वारा हम घन को भी जान लेते हैं, आकार-आयतन की सम्पूर्णता को भी जान लेते हैं। आकार-आयतन की सम्पूर्णता घन में ही समझ आती है। घन के आधार पर वस्तुओं को पहचानने के तरीके हम अपना चुके हैं, कार्य-व्यवहार में ला चुके हैं। आकार-आयतन-घन को समझने में मनुष्य समर्थ हुआ है, और परम्परा के रूप में स्वीकारा है।

गणित आँखों से अधिक, समझ से कम होता है। गणित सम और विषम गतियों को आंकलित करता है। मध्यस्थ गति को गणित छू भी नहीं पाता। जिस तरह आँख से घन को नहीं समझा जा सकता, उसी तरह गणित से मध्यस्थ-गति को नहीं समझा जा सकता। मध्यस्थ गणित की सीमा से बाहर की बात है। वस्तु का "होना" और "व्यवस्था में बने रहना" उसका मध्यस्थ-गुण है - जो गणित के वश के बाहर की बात है।

कारणात्मक भाषा के प्रयोग से अध्ययन पूर्वक "मध्यस्थ" मनुष्य को समझ में आता है। पूरा दर्शन "मध्यस्थ-दर्शन" है। मध्यस्थ-दर्शन का मतलब है - वर्तमान को समझना = अस्तित्व सहज व्यवस्था को समझना। अस्तित्व में तीन तरह की गतियां हैं - सम, विषम, और मध्यस्थ। जैसे - पैदा होना (सम), मर जाना (विषम), और इन दोनों के बीच में "जीना" - यह मध्यस्थ है। हर अवस्था में सम, विषम, और मध्यस्थ गतियों को पहचाना जा सकता है। किसी अवस्था की मध्यस्थ-गति उस अवस्था के "नित्य बने रहने" या "व्यवस्था में रहने" का स्वरूप है। यह मनुष्य को समझ में आता है तो मनुष्य को अपने स्वयं के व्यवस्था में रहने का स्वरूप भी स्पष्ट होता है, बाकी अवस्थाओं के बने रहने का स्वरूप भी स्पष्ट होता है।

यही वह "समझदारी" है, जिसकी सभी मनुष्यों को आवश्यकता है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)

रहन-सहन का तरीका बदलना मानवीयता की परम्परा बनाने में सहायक सिद्ध नहीं होता.

रहन-सहन के तरीकों को बदलना मानवीयता की परम्परा बनाने में सहायक सिद्ध नहीं हो पाता। रहन-सहन का तरीका एक रूढी ही है। इसको बदल कर हम दूसरी तरह से रहने लगें - तो वह दूसरी रूढी हो जाती है।

जीव-चेतना में हम आशा, विचार, और इच्छा के सीमा में ही प्रकट हो पाते हैं। प्रमाण के रूप में हम किसी भी बात में प्रकट नहीं हो पाते हैं। इस संकट-वश हम जो भी "करते" हैं उसी को "प्रमाण" मान लेते हैं। "करने" की सीमा भौतिक-रासायनिक वस्तुओं तक ही है।

अध्ययनं पूर्वक जब मनुष्य के सोच-विचार का तरीका मानवीयता के अर्थ में बदलता है, वही मानवीयता की परम्परा बनाने का आधार बनता है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)

भ्रमित-जीवन में बुद्धि बोध की अपेक्षा में रहती है.

भ्रमित-मनुष्य के जीवन में जो बुद्धि है - वह "भ्रमित" नहीं होती। भ्रमित-जीवन में बुद्धि बोध की "अपेक्षा" में रहती है।

भ्रमित-अवस्था में भी बुद्धि चित्त में होने वाले चित्रण का दृष्टा बना रहता है। जीव-चेतना में होने वाले सभी चित्रणों को बुद्धि देखता रहता है। लेकिन इस "भ्रमित-चित्रण" को बुद्धि स्वीकारता नहीं है। बुद्धि जो भ्रमित-चित्रणों को स्वीकारता नहीं है - वही "पीड़ा" है। सर्व-मानव में जो "पीड़ा" है - उसका मूल यही है।

जीव-चेतना में जीने वाले मनुष्य के जीवन में कल्पनाशीलता प्रिय-हित-लाभ के अर्थ में क्रियाशील रहता है। प्रिय-हित-लाभ पूर्वक जो चित्रण होते हैं, उनको बुद्धि स्वीकारता नहीं है। इस अस्वीकृति से इतना ही निकलता है - "यह ठीक नहीं है!" पर "ठीक क्या है?" - इसका उत्तर नहीं मिलता, क्योंकि बुद्धि में बोध नहीं रहता। मनुष्य प्रिय-हित-लाभ की सीमा में जो भी करता है, वह चित्रण से आगे जाता नहीं है। बुद्धि ऐसे भ्रमित-चित्रणों का दृष्टा बना रहता है।

भ्रमित-अवस्था में बुद्धि का दृष्टि चित्रण की तरफ़ रहता है, और आत्मा से प्रामाणिकता की अपेक्षा में रहता है। प्रमाणिकता न होने से जीवन में रिक्तता या अतृप्ति बना ही रहता है।

प्रश्न: तो इसका मतलब भ्रमित-अवस्था में मेरी बुद्धि संकेत तो करती है - यह ठीक नहीं है! लेकिन वह मेरी तृप्ति के लिए पर्याप्त नहीं है, क्योंकि "ठीक क्या है?" इसका उत्तर मेरे पास नहीं रहता। क्या यह सही है?

उत्तर: हाँ, यह सही है। "यह ठीक नहीं है!" - ऐसा अनेक लोगों को लगता है। लेकिन ठीक क्या है, असलीयत क्या है? - यह स्वयं में "अधिकार" नहीं रहता है। उसके लिए क्यों प्रयास नहीं करते? जब आपको लगता है, यह ठीक नहीं है तो सहीपन के लिए आप क्यों प्रयास नहीं करते? इस जगह में सभी को प्राण-संकट है।

बुद्धि द्वारा चित्त में होने वाले चित्रणों को देखने का काम सदा रहता है, सबके पास रहता है। बुद्धि के इस दृष्टा बने रहने से हम यह तो निर्णय ले पाते हैं, कि हम किसी "मान्यता" को लेकर चल रहे हैं। लेकिन असलीयत का अधिकार स्वयं में न होने के कारण हम परम्परा को निभते रहते हैं। यही "हठ-धर्मीयता" है।

भ्रमित-जीवन में बुद्धि जो बोध की अपेक्षा में रहती है, उसकी तृप्ति सह-अस्तित्व में अध्ययन पूर्वक ही सम्भव है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)

Thursday, August 13, 2009

आचरण और संविधान

पहले धर्म-शास्त्रों को ही संविधान माना जाता था। धर्म सम्प्रदायों द्वारा प्रतिपादित आचार संहिताओं को ही संविधान मान लिया जाता था। इन आचार-संहिताओं के आधार पर ही राज्य होता था। धीरे-धीरे राज्य-संविधान और धर्म-संविधान अलग-अलग हो गए। राज्य-संविधान में मूलतः कहा गया - गलती को गलती से रोको, अपराध को अपराध से रोको, युद्ध को युद्ध से रोको! ये तीनो बात अपराध ही हैं। इस तरह पूरा राज्य-संविधान "अपराध-संहिता" ही है। सभी देशों के राज्य-संविधान का मूल रूप यही है। अपराध-संहिता को हम "न्याय-संहिता" कहते हैं!

अस्तित्व में हर परमाणु, हर अणु, हर पेड़-पौधे, हर पशु-पक्षी सभी अपने त्व-सहित व्यवस्था में होने से ही समग्र व्यवस्था में भागीदारी करते हैं। उनका समग्र व्यवस्था में भागीदारी करना उनके "निश्चित आचरण" का स्वरूप है। मनुष्य के निश्चित आचरण से ही उसके समग्र व्यवस्था में भागीदारी करने का स्वरूप निकल सकता है। अभी तक मानव जाति जीवचेतना में ही जिया है। जीवचेतना में जीते हुए मानव का आचरण अनिश्चित होता है। मानव आचरण निश्चित नहीं होने के कारण हम मानवीय व्यवस्था के स्वरूप को पहचान नहीं पाये। मानवचेतना में ही मानव का आचरण निश्चित होता है। सहअस्तित्ववादी विधि से मानव के निश्चित आचरण के स्वरूप को पहचानने की विधि निकल गयी।

सहअस्तित्व में अध्ययन के पूर्ण होने पर मानव समझदार होता है, फलन में मानवीयतापूर्ण आचरण करने में समर्थ हो पाता है। समझदारी के साथ ही मानव अपने त्व सहित व्यवस्था में होता है, फलतः समग्र व्यवस्था में भागीदारी कर पाता है। समझदारी के बिना मानवीयतापूर्ण आचरण कर पाना सम्भव ही नहीं है। विचार शैली जब बदल जाती है, तो आचरण अपने आप बदल जाता है। आचरण बदल कर विचारशैली नहीं बदलती। विचारशैली को मानवीयता के पक्ष में बदलने के लिए ही मध्यस्थ दर्शन के अध्ययन का प्रस्ताव है।

"मूल्य", "चरित्र", और "नैतिकता" के संयुक्त स्वरूप में मानवीयता पूर्ण आचरण को पहचाना जा सकता है।

मूल्य - समझदारी पूर्वक मनुष्य अपने संबंधों को पहचान सकता है, मूल्यों का निर्वाह कर सकता है, मूल्यांकन कर सकता है, उभय-तृप्ति पा सकता है। मूल्यों में जीना मानवीयता पूर्ण आचरण का एक आयाम है।

चरित्र - स्वधन, स्वनारी/स्वपुरूष, और दया पूर्ण कार्य-व्यवहार - यह मानवीयता पूर्ण चरित्र है। चरित्रता पूर्वक जीना मानवीयता पूर्ण आचरण का दूसरा आयाम है।

नैतिकता - तन-मन-धन का सदुपयोग और सुरक्षा - यह मानवीयता पूर्ण नैतिकता है। नैतिकता पूर्वक जीना मानवीयता पूर्ण आचरण का तीसरा आयाम है।

इन तीनो के संयुक्त स्वरूप में मानवीयता पूर्ण आचरण है।

जीवचेतना में जीते हुए मनुष्य में भी न्याय, समाधान, और सत्य (व्यवस्था) की सहज-अपेक्षा है।

अध्ययन क्रम में : -
न्याय सहज अपेक्षा के आधार पर "मूल्य" स्पष्ट हो जाता है।
समाधान सहज अपेक्षा के आधार पर "चरित्र" स्पष्ट हो जाता है।
सत्य (व्यवस्था) सहज अपेक्षा के आधार पर "नैतिकता" स्पष्ट हो जाता है।

मानव में "चाहत" ग़लत नहीं है। "चाहत" के अनुरूप "घटना" घटित नहीं हुआ। उसके विपरीत अपराधिक घटनाएं घटता चला गया। अपराधिक घटनाओं के फलन में ही धरती बीमार हो गयी। इसलिए "पुनर्विचार" की आवश्यकता आ गयी। धरती पर आदमी को बने रहना है तो पुनर्विचार करेगा, नहीं रहना है तो नहीं करेगा।

मानव परम्परा जो ईश्वरवादी और भौतिकवादी तरीकों से सोचा है, उनका इस ओर ध्यान ही नहीं गया। या अनुसंधान नहीं किया। इसी को यहाँ मध्यस्थ दर्शन में प्रस्तावित किया जा रहा है।

- बाबा श्री ए नागराज के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)

भ्रम का स्वरूप

अपराध भ्रम-वश ही होता है।

मानव ही भ्रमित होकर अपराध करता है, और समस्याओं को जनित करता है।

समस्या यदि मानव-जाति तक ही सीमित रहता तो कोई परेशानी नहीं था। मानव जाति द्वारा जनित समस्याएं जब धरती को ही बीमार कर दिया - तो हम सोच रहे हैं। धरती बीमार होने के कारण मानव-जाति में भ्रम-मुक्ति "आवश्यक" हो गयी है। इस "आवश्यकता" को इंगित कराने का हम प्रयास कर रहे हैं। यदि मानव-परम्परा को निरंतर बने रहने की आवश्यकता समझ में आती है तो उसका भ्रम-मुक्त होने के लिए प्रयास करना भावी हो जाता है। यदि मिटने का ही मन बना लिया है तो मिट कर ही रहे ! उसके लिए तो पूरी तैय्यारी हो चुकी है।

जीव-चेतना में संवेदनाओं को राजी करने के क्रम में "अच्छा लगना" और "बुरा लगना" ये दो बात रहती है। "अच्छा लगना" प्रलोभन के रूप में होता है। "बुरा लगना" भय के रूप में होता है। प्रलोभन और भय भ्रम-वश ही हैं।

"भय और प्रलोभन भ्रम-वश हैं।" - यह आदर्शवाद ने भी बताया था। पर भय और प्रलोभन से मुक्ति क्या है - यह वे उस सोच से नहीं निकाल पाये। भय और प्रलोभन से मुक्ति के लिए उन्होंने वही "अस्तित्व विहीन मोक्ष" को इंगित कराया। उसके समर्थन में स्वर्ग, नर्क, पाप, पुण्य, कर्म-काण्ड, साधना-अभ्यास विधियां - ये सब बताया। उससे काम नहीं चला।

मध्यस्थ-दर्शन के अनुसंधान पूर्वक निकला - अति-व्याप्ति, अनाव्याप्ति, और अव्याप्ति दोष वश ही भय और प्रलोभन है। अतिव्याप्ति दोष वश ही अधिमूल्यन है - जिससे "प्रलोभन" है। अनाव्याप्ति और अव्याप्ति दोष वश ही अवमूल्यन और निर्मूल्यन है - जिससे "भय" है।

भय और प्रलोभन पर आधारित सोच-विचार के चलते लाभोन्माद, कामोन्माद, भोगोन्माद के तीन प्रबंध शिक्षा में आ गए। इस तरह अनेक अपराधों को वैध मान लिया गया, और भी अपराधों को वैध मानने के लिए विचार कर रहे हैं।

सह-अस्तित्व में अध्ययन पूर्वक मनुष्य भ्रम-मुक्त हो सकता है, और जागृति को प्रमाणित कर सकता है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)

Wednesday, August 12, 2009

अभ्युदय और निःश्रेयस

सर्वतोमुखी समाधान ही अभ्युदय है।

विगत में (मनु-धर्म शास्त्र में) बताया गया था - चार वर्ण, चार आश्रम के अनुसार आचरण-कर्म करने से अभ्युदय है। "अभ्युदय आचरण-कर्म ही है" - यह बताया गया था। ऐसे आचरण-कर्मो से "पुण्य" होता है - यह बताया गया था। इसके साथ "स्व-धर्म" और "पर-धर्म" को बताया। स्व-धर्म के अनुसार जो कर्म होता है - उसको "अभ्युदय" बताया गया था।

समाधान अभ्युदय होगा या आचरण-कर्म अभ्युदय होगा? - आप ही बताओ!

निःश्रेयस को विगत में "अद्वैत-मोक्ष" बताया - जो है, आत्मा का परमात्मा में विलय होना और जीव का प्रकृति में विलय होना। इस तरह "अस्तित्व-विहीन मोक्ष" की बात किया। इसको "जीवन-मुक्ति" कहा। "ब्रह्म सत्य, जगत मिथ्या" - यही अद्वैत-वाद है।

सह-अस्तित्व-वाद में कहा - "भ्रम-मुक्ति ही मोक्ष है"। अपने-पराये से मुक्ति ही मोक्ष है। अपराध-मुक्ति ही मोक्ष है। मानव-परम्परा भ्रम-मुक्त होने से मोक्ष हुआ। मानव-परम्परा अपने-पराये की दीवारों से मुक्त होने से ही मोक्ष हुआ। मानव-परम्परा अपराध-मुक्त होने से ही मोक्ष हुआ।

भ्रम-मुक्ति ही निःश्रेयस है।

शरीर-यात्रा में अभ्युदय और निःश्रेयस को प्रमाणित होने की ज़रूरत है। इस प्रकार "मोक्ष" या "निःश्रेयस" शब्द की परिभाषा मैं दे पाया। भाषा जो विगत से मिली है, उसके प्रति मेरी कृतज्ञता है। भाषा नहीं होती तो कौनसी परिभाषा दे लेते? भाषा को पहले गढ़ना पड़ता! विगत से जो भाषा मिली, उसकी सार्थकता इस विधि से बनी।

मनाकार को साकार करना भौतिकवादियों और ईश्वर-वादियों ने मिल कर कर दिया। ईश्वर-वादी समय में भी आदमी खाना खाता ही रहा, कपड़ा पहनता ही रहा, मकान बनाता ही रहा। पर उसमें विज्ञान बनाम भौतिकवाद के आने से वृद्धि हुई।

अब सह-अस्तित्व-वाद के साथ हम मनः स्वस्थता को अभ्युदय और निःश्रेयस के रूप में प्रमाणित कर सकते हैं।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)

अस्तित्व में स्वयं-स्फूर्तता

अस्तित्व में चारों अवस्थाएं स्वयं-स्फूर्त विधि से प्रकट हैं।

स्थिति-पूर्ण सत्ता में स्थिति-शील प्रकृति संपृक्त है। पूर्णता के अर्थ में प्रकृति सत्ता में संपृक्त है।

भौतिक-रासायनिक वस्तुओं की गणना की जा सकती है। हर वस्तु अपनी स्थिति में "एक" होता है। जैसे- एक परमाणु अंश, एक परमाणु, एक अणु, एक प्राण-सूत्र, एक प्राण-कोषा, एक धरती। ये सब एक-एक की संज्ञा में आते हैं।

प्रत्येक "एक" अपने वातावरण सहित "सम्पूर्ण" है। इसके प्रमाण में ही - "त्व सहित व्यवस्था और समग्र व्यवस्था में भागीदारी" गवाहित होती है। हरेक "एक" अपनी स्थिति में "सम्पूर्णता" में ही होता है। किसी "बाहरी" शक्ति की अनुकम्पा से इकाइयाँ चालित नहीं हैं। सत्ता में सम्पृक्तता वश इकाइयाँ "ऊर्जा-संपन्न" हैं। ऊर्जा-संपन्न होने से वे "बल-संपन्न" हैं। बल-संपन्न होने से वे "क्रियाशील" हैं। इस तरह - अस्तित्व में "कार्य" और "कारण" अविभाज्य है। और "फल-परिणाम" निश्चित है। अस्तित्व में नियम है। नियम पूर्वक ही अस्तित्व में "विकास" है, नियम पूर्वक ही अस्तित्व में "ह्रास" है, नियम पूर्वक ही अस्तित्व में "परम्परा" है।

अस्तित्व में स्वयं-स्फूर्त प्रकटन है। पदार्थावस्था से प्राण-अवस्था स्वयं-स्फूर्त प्रकट होता है। प्राण-अवस्था से जीव-अवस्था स्वयं-स्फूर्त प्रकट होता है। जीव-अवस्था से ज्ञान-अवस्था स्वयं-स्फूर्त प्रकट होता है। मूलतः सभी प्रकटन पदार्थ-अवस्था से ही है। पदार्थ-अवस्था में प्राण-अवस्था का भ्रूण तैयार हुआ। प्राण-अवस्था में जीव-अवस्था का भ्रूण तैयार हुआ। जीव-अवस्था में ज्ञान-अवस्था (मानव) का भ्रूण तैयार हुआ। पिछली स्थिति में जो अगली स्थिति के लिए जो तैय्यारी होती है - उसी को हम "भ्रूण" कह रहे हैं। इसी क्रम में चारों अवस्थाएं इस धरती पर स्थापित हुई। मनुष्य के प्रकटन के बाद मनुष्य का भी चारों अवस्थाओं के साथ संतुलित रहने का बात हुआ। अस्तित्व में चारों अवस्थाएं स्वयं-स्फूर्त विधि से प्रकट हैं, क्रियाशील हैं।

प्रश्न: पदार्थ-अवस्था जब स्वयं-स्फूर्त विधि से काम कर सकता है, तो आदमी को स्वयं-स्फूर्त होने में क्या तकलीफ है?

उत्तर: मनुष्य ने उस ओर प्रयत्न ही नहीं किया। उल्टे चारों अवस्थाओं को अपने भोग की वस्तु मान लिया। भोगने के लिए संघर्ष भावी हो गया। आदमी अपराध में फंस गया। इस तरह संघर्ष में लगने से, अपराध में लगने से - मनुष्य "सत्य को समझने" में असमर्थ रहे। यही आदमी के लिए स्वयं-स्फूर्त जी पाने में तकलीफ है। सत्य को समझे बिना मनुष्य का चारों अवस्थाओं के साथ संतुलित और स्वयं-स्फूर्त जी पाना सम्भव नहीं है।

प्रश्न: आदमी को अपराध में फंसाया किसने?

उत्तर: ईश्वर-वाद और भौतिकवाद ने। दोनों मिल कर आदमी-जात को अपराध में फंसाया। सह-अस्तित्व-वाद इन दोनों के विकल्प में मनुष्य-जाति के लिए अपराध-मुक्ति के लिए एक अध्ययन-गम्य प्रस्ताव है।

प्रश्न: अस्तित्व में स्वयं-स्फूर्तता को मैं स्वयं में कैसे देख सकताहूँ?

उत्तर: मनाकार को साकार करना मनुष्य का स्वयं-स्फूर्त वैभव है। आप कोई डिजाईन बनाते हो, उससे अच्छा डिजाईन आप में अपने-आप से उभर आता है। चाहे वह कपड़ा बनाने का डिजाईन हो, चाहे सड़क-मकान बनाने का डिजाईन हो, या कोई यंत्र बनाने का डिजाईन हो। यह आपके चित्रण और विचार के योगफल में होता है। इस स्वयं-स्फूर्तता को आप स्वयं में अभी जांच सकते हैं। मनाकार को साकार करने के भाग में मनुष्य अपने इतिहास में स्वयं-स्फूर्त आगे बढ़ता आया। लेकिन मनः-स्वस्थता न होने के कारण "अपराध" में फंस गया।

मनाकार को साकार करना कोई अपराध नहीं है। मनाकार को साकार करना मनुष्य का स्वयं-स्फूर्त वैभव है। मनाकार को साकार करने से बनी वस्तुओं के व्यापार करने में अपराध है। दूसरे, मनाकार को साकार करने के लिए कच्चा माल प्राप्त करने के लिए प्रकृति का जो शोषण है - उसमें अपराध है। मनः स्वस्थता पूर्वक मनुष्य अपराध-प्रवृत्ति से मुक्त होता है। समाधान ही मनः स्वस्थता का प्रमाण है। समझदारी से समाधान होता है। समाधान पूर्वक मनुष्य का स्वयं-स्फूर्त जीना बन जाता है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)

ईश्वर और मुक्ति

ईश्वर को मैंने व्यापक स्वरूप में देखा। उसी को "परमात्मा" नाम दिया जा सकता है - यदि इच्छा हो तो! ऐसे "व्यापक वस्तु में संपृक्त प्रकृति" के रूप में अस्तित्व की व्याख्या करने में न भौतिक वस्तु की अवहेलना हुई, न ईश्वरीय-तत्व की अवहेलना हुई। भौतिकवाद ईश्वरीय-तत्व को भुलावा देकर शुरुआत किए - और "अनर्थ" की ओर ले गए। ईश्वरवाद भौतिकता को भुलावा दे कर शुरू किए - और वे भी "अनर्थ" की ओर ले गए। अस्तित्व को "व्यापक में संपृक्त प्रकृति" के रूप में पहचानने से भौतिकवादी सोच और ईश्वरवादी सोच दोनों का सुधार हो सकता है।

ईश्वरवाद एकांत के लिए, भक्ति के लिए, विरक्ति के लिए "उपदेश" दिया। ईश्वरवाद अस्तित्व का अध्ययन नहीं करा पाया। "उपदेश" का मतलब है - हम जो कहते हैं, उसको सुनो और करो! करके समझो!

भौतिकवाद भी उसी तरह "करके समझो!" वाली जगह में ही है!

सह-अस्तित्व-वाद में इन दोनों के विकल्प में कहा है - "समझ के करो!"

समझे हुए को समझाना ही "उपकार" है। यदि समझ में आता है, तो "मुक्ति" की बात होती है। मुक्ति का मतलब है - भ्रम मुक्ति। भ्रम-मुक्ति का प्रमाण जीने में आता है, उसका स्वरूप है - "अपने-पराये से मुक्ति" और "अपराध-मुक्ति"। अपराध-मुक्त होने पर, और अपने-पराये की दीवारों से मुक्त होने पर हम "न्याय" पूर्वक जीने में संलग्न हो सकते हैं।

भ्रम-मुक्ति ही "मोक्ष" है।

ईश्वर-वाद ने कहा - "जीवन-मुक्ति ही मोक्ष है"। वह ग़लत हो गया। जीवन का समाप्ति होता नहीं है। आत्मा "ईश्वर के अंश" के रूप में जीवन में "बंदी" नहीं है। ईश्वर व्यापक वस्तु है। जीवन गठन-पूर्ण परमाणु है। आत्मा जीवन-परमाणु का मध्यांश है। जीवन व्यापक में संपृक्त है - इसलिए, ऊर्जा-संपन्न है। इसी के आधार पर जीवन के भ्रम-मुक्त होने की बात है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)

Tuesday, August 11, 2009

सत्य को समझना

आदर्शवादियों ने "सत्य" को लेकर कुछ बताया। उसको लेकर बहुत सारे लोग आदर्शवादी मार्ग पर चलने के लिए न्योछावर हुए। उनको उससे कुछ सत्य भासा होगा - तभी वे न्योछावर हुए होंगे। आदर्शवाद में "ब्रह्म सत्य, जगत मिथ्या" बताया गया था। मनुष्य को भी मिथ्या बता दिया। मिथ्या सत्य को कैसे अध्ययन कर सकता है? सत्य को प्राप्त करने के लिए तप और अभ्यास विधियां बतायी। "समाधि में सत्य का ज्ञान होता है" - यह बताया।

आदर्शवादी मार्ग पर अंत तक चलके देखा गया और पाया गया - समाधि में कोई ज्ञान नहीं होता

समाधि में ज्ञान नहीं हुआ तो मैंने अपने समाधि हुए का सत्यापन करने के उद्देश्य से संयम किया। संयम के लिए जो विभूतिपाद में लिखा था - वह मुझे "अप्राप्त को प्राप्त करने" अथवा सिद्धि प्राप्त करने के उद्देश्य से लिखा हुआ समझ में आया। इसलिए मैंने "धारणा", "ध्यान", और "समाधि" तीन स्थितियों के क्रम को उलटाया - और फ़िर संयम किया। ऐसा करने पर सम्पूर्ण अस्तित्व सह-अस्तित्व स्वरूप में मेरे अध्ययन में आया। "सह-अस्तित्व ही परम सत्य है" - यह समझ में आया। "व्यापक में संपृक्त प्रकृति ही सह-अस्तित्व है" - यह समझ में आया। "मनुष्य सह-अस्तित्व स्वरूपी सत्य को समझ सकता है" - यह समझ में आया।

मुझे जो यह समझ में आया - वह न भौतिकवादी विधि से समझा जा सकता था, न आदर्शवादी विधि से समझा सकता था। इसीलिये मैंने मध्यस्थ-दर्शन सह-अस्तित्व-वाद को आदर्शवाद और भौतिकवाद के "विकल्प" के स्वरूप में प्रस्तुत किया है।

हर मनुष्य के पास कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता "अधिकार" रूप में है। इस कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता के रहते मनुष्य "परम-सत्य" को भी चाहता है। सच्चाई की "चाहत" मनुष्य में सदा से है। सच्चाई का भास-आभास होना भी मानव के लिए सहज है। मनुष्य को सच्चाई का जो भास-आभास होता है, उसी आधार पर मनुष्य में पठन के बाद अध्ययन की प्रवृत्ति बनती है।

"सत्य है", "समाधान है", "न्याय है" - यही सार रूप में मध्यस्थ-दर्शन की सूचनाएं हैं। यही तीन प्रधान मुद्दे हैं - अस्तित्व में अध्ययन के लिए। इन प्रधान मुद्दों के आधार पर ही सारी सूचनाएं होती हैं। इन सूचनाओं को सुनने पर हमको लगता है - "सत्य कोई चीज है।" इसमें और आगे अध्ययन में जाते हैं, तो हमको लगने लगता है - "सत्य ऐसा ही है"। इसी क्रम में - सह-अस्तित्व स्वरूपी सत्य में "अनुभव करने" की जगह हम पहुँच जाते हैं। सह-अस्तित्व स्वरूपी सत्य को समझने पर मनुष्य स्वयं को अपने जीने में "प्रमाणित करने" के योग्य हो जाता है।

मध्यस्थ-दर्शन के अध्ययन पूर्वक मनुष्य के लिए सत्य को समझना सुगम हो गया है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)

अध्ययन मनुष्य का मनुष्य के साथ ही होता है.

अध्ययन मनुष्य का मनुष्य के साथ ही होता है।

मनुष्य एक संवेदनशील और संज्ञानशील इकाई है। संवेदनशीलता और संज्ञानशीलता के प्रमाण के लिए एक से अधिक मनुष्यों का होना आवश्यक है।

दो मनुष्यों के बीच ही संज्ञानीयता प्रमाणित होने की स्थिति बनती है। समझाने वाले के समझा देने पर और समझने वाले के समझ लेने पर स्वाभाविक रूप में संज्ञानीयता प्रमाणित होती है।

समझने के बाद समझ को प्रमाणित करने में कहीं भी अड़चन नहीं है। जैसे - मुझे अपनी समझ को प्रमाणित करने में अभी तक तो कोई अड़चन नहीं आया। "हम सुनेंगे नहीं" और "हम करेंगे नहीं" इन दो कालम में संसार अभी खड़ा है। किंतु इस बात का विरोध करना बनेगा नहीं।

भाषा अध्ययन का आरंभिक भाग है। भाषा का प्रयोजन है - सूचना तक देना। किताब से सूचना है। सुनने पर सूचना होता है। देखने पर सूचना होता है। सुनने से सर्वाधिक सूचना होता है, देखने से उससे कम, और दूसरी संवेदनाओं से उससे कम सूचना संप्रेषित होता है। श्रवण से ही सर्वाधिक सूचना एक मनुष्य से दूसरे तक पहुँचती है।

सूचना सुन लेने, पढ़ लेने मात्र से अध्ययन नहीं है। सूचना से इंगित अर्थ को स्वीकारना अध्ययन है। सभी "सीखने" वाला ज्ञान कर्म-अभ्यास पूर्वक एक से दूसरे व्यक्ति में स्थापित होता है। "समझने" वाला ज्ञान अध्ययन पूर्वक ही एक से दूसरे व्यक्ति में स्थापित होता है।

प्रामाणिकता की स्वीकृति के साथ ही हम अध्ययन कर पाते हैं। अध्ययन कराने वाला प्रमाणित है - यह स्वीकार होने के बाद ही अध्ययन होता है। अध्ययन एकांत में नहीं है। अध्ययन प्रमाणित व्यक्ति के साथ में ही है। इसको highlite करने की ज़रूरत है। आज की दुनिया के लिए यह एक बहुत vigorous point है।

"मैं प्रमाणित हूँ" - यह आप में स्वीकृत होने पर ही आप मुझसे "प्रभावित" होते हैं। यदि यह आप में स्वीकृत नहीं होता - तो आप प्रभावित नहीं होते। प्रभावित होने से पहले आप "जिज्ञासु" बने रहते हैं। प्रभावित होने से पहले आप अध्ययन की "इच्छा" प्रकट करने तक आ जाते हैं।

अध्ययन कराने वाले की प्रामाणिकता की स्वीकृति के साथ ही आप अध्ययन कर पाते हैं।

"व्यक्ति प्रमाण" का यही आधार है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)

Monday, August 10, 2009

हिम्मत करने वालों की हार नहीं होती!

Our daughter Gunjan was practicing this Hindi poem-recitation, and I found it so inspiring that I would like to share here with all students of Jeevan Vidya.

Best, Rakesh

अस्तित्व में उत्सव

साम्य-ऊर्जा (व्यापक) के पारगामी होने के कारण परमाणु-अंश ऊर्जा-संपन्न हैं। ऊर्जा-सम्पन्नता के आधार पर ही परमाणु-अंशों में एक दूसरे को पहचानने की ताकत आयी। फलस्वरूप वे एक दूसरे को पहचान भी लिए। परमाणु-अंश एक दूसरे को पहचानते हैं, उसी आधार पर एक परमाणु का गठन होता है। परमाणु-अंश में भी व्यवस्था में भागीदारी करने की प्रवृत्ति है।

परमाणु-गठन का प्रमाण है - परमाणु का निश्चित आचरण। दो अंश का परमाणु भी निश्चित आचरण करता है। दो सौ अंश का परमाणु भी निश्चित-आचरण करता है। परमाणु अपने गठन के उपरांत एक निश्चित आचरण करता है - यह गठन होने की सफलता की स्वीकृति है। उत्सव का मतलब है - सफलता की स्वीकृति। सफलता के अर्थ में उत्सव है। असफलता के अर्थ में ही मातम है।

परमाणु-गठन से ही "अस्तित्व में उत्सव" की शुरुआत है।

परमाणु के निश्चित आचरण का फलन है - उसकी उपयोगिता और पूरकता। इस प्रकार विभिन्न संख्या में परमाणु-अंशो के गठित होने से अनेक प्रजातियों के परमाणु गठित हो गए।

सभी आवश्यक परमाणुओं के गठन होने के उपरांत - एक जलने वाला पदार्थ और एक जलाने वाला पदार्थ जब निश्चित अनुपात में यौगिक विधि से मिलते हैं तो पानी का प्रकटन होता है। पानी पहला यौगिक है। यौगिक विधि से जो पानी बना - उस "खुशहाली" या "उत्सव" के फलन में रचना-तत्व और पुष्टि-तत्व के संयोग से प्राण-सूत्र "बन जाते हैं"।

प्राण-सूत्रों में जब साँस लेने का या सप्राणित होने का जब मुहूर्त आता है - तब वे उत्सवित होते हैं। प्राण-सूत्रों के उत्सवित होने के फलस्वरूप उनमें रचना-विधि आ जाती है। उस रचना-विधि के अनुरूप वे प्राण-सूत्र रचना-कार्य में संलग्न हो जाते हैं।

जब वह रचना बीज-वृक्ष परम्परा के रूप में स्थापित हो जाती है तो पुनः प्राण-सूत्रों में उत्सव होता है, जिससे उनमें "नयी" रचना-विधि आ जाती है। इस तरह हर उत्सव के बाद प्राण-सूत्रों में नयी रचना-विधि उभर आती है। इस तरह असंख्य रचनाओं की परम्पराएं स्थापित हो गयी।

जीव-अवस्था के शरीर प्राण-अवस्था की रचनायें ही हैं। जीव-अवस्था की विभिन्न शरीर परम्पराएं प्राण-सूत्रों में निहित रचना-विधि में उत्तरोत्तर गुणात्मक विकास से है। जीव-अवस्था में जीवन और शरीर का संयुक्त प्रकाशन होता है।

मनुष्य शरीर-परम्परा भी प्राण-सूत्रों में गुणात्मक विकास के इस क्रम में ही स्थापित हुई है। मनुष्य शरीर की विशेषता है कि जीवन अपनी कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता को मनुष्य के जीने में प्रकाशित कर सकता है।

मनुष्य जीवन में सफलता की शुरुआत समझदारी से ही है। मनुष्य जीवन में उत्सव की शुरुआत समझदारी से ही है।

समझदारी पूर्वक मनुष्य जीवन एक उत्सव ही है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)

मेधस और जीवन

प्रश्न: जब ज्यादा सोचते हैं तो सिर में भारीपन, दर्द वगैरह होता है। आप कहते हैं, जीवन ही है जो सोचता है - उससे मेरी कल्पना जाती है, जीवन सिर में है!

उत्तर: जीवन में विचार के अनुसार सिर में हलचल होता रहता है। जैसे- कभी भारी लगना, कभी हल्का लगना। मानसिकता के अनुसार जीवन मेधस पर संकेत प्रसारित करता है। उन संकेतों के अनुसार मेधस में हलचल होता है। जब तक हम इस हलचल प्रक्रिया के प्रति अनजान रहते हैं, तब तक कभी गरम, कभी नरम, कभी थकान, कभी हल्कापन, कभी भारीपन - यह सब होता रहता है। जब मेधस-तंत्र के क्रियाकलाप को लेकर हम पारंगत हो जाते हैं, तो यह सब कुछ नहीं होता। जीवन ही दृष्टा है। जीवन शरीर में मेधस क्रिया-कलाप का भी दृष्टा बन जाता है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)

Thursday, August 6, 2009

अध्ययन और पहचान-निर्वाह

अर्थ समझ में आया तो अध्ययन हुआ।
अर्थ समझ में नहीं आया तो पठन ही हुआ।

अर्थ समझ में आता है तो वस्तु को पहचानना बन जाता है। अर्थ समझ में नहीं आता है तो वस्तु को पहचानना नहीं बन पाता है।

यदि मैं वस्तु को पहचानता हूँ तो (मुझे पता चलता है कि) वस्तु भी मुझको पहचानता है - नियति-क्रम में अपने स्तर के अनुसार।

इस तरह सही पहचान होने पर सही निर्वाह होना स्वाभाविक हो जाता है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)

समझ वही है, जो जीने में प्रमाणित हो!

यहाँ अमरकंटक में साधना करने आने से पहले, मैं बनारस में एक वर्ष साधना के लिए गया था। तब मुझे हर दिन ऐसा लगता रहा जैसे मैं देव-सभा में ही बैठा हूँ। वह क्या चीज थी? मेरे मन का ही खेल था! प्रमाण कहाँ हुआ उसका? कल्पना में हम जो बसा लेते हैं, वह हमको सामने असली जैसा भी दिखने लगता है। ऐसी कोरी-कल्पनाएँ जीने में प्रमाणित नहीं होती।

समाधि-संयम पूर्वक मुझे समझ हासिल हुई, जिससे मुझे यह स्वीकार हुआ - "मैं मानव-स्वरूप में जी सकता हूँ।", "मैं देव-मानव स्वरूप में जी सकता हूँ", और "मैं दिव्य-मानव स्वरूप में जी सकता हूँ"। यह समझ मेरे जीने में प्रमाणित होती है।

जीने में समझ ही प्रमाणित होती है।

(मध्यस्थ-दर्शन के) अध्ययन विधि में - परिभाषा से आप शब्द के अर्थ को अपनी कल्पना में लाते हैं। परिभाषा आपकी कल्पनाशीलता के लिए रास्ता है। उस कल्पना के आधार पर अस्तित्व में वस्तु को आप पहचानने जाते हैं। आपकी कल्पनाशीलता वस्तु को छू सकता है। अस्तित्व में वस्तु को पहचानने पर वस्तु साक्षात्कार हुआ। वस्तु के रूप में वस्तु साक्षात्कार होता है - शब्द के रूप में नहीं होता है। साक्षात्कार की वस्तु सह-अस्तित्व स्वरूपी अस्तित्व ही है। सह-अस्तित्व साक्षात्कार होना ही मनुष्य में कल्पनाशीलता का प्रयोजन है। साक्षात्कार होने पर बोध और अनुभव तत्काल होता है। सारी देरी जब तक कल्पना में हैं, तभी तक है। अनुभव में कल्पनाशीलता पूर्वक किया गया अनुमान विलय हो जाता है। अनुभव ही फ़िर प्रभावी हो जाता है। पूरा जीवन अनुभव-मूलक हो जाता है।

इस तरह अध्ययन विधि से जीवन में "समझ" हासिल होती है। यह समझ जीने में प्रमाणित होती है।

समझ वही है, जो जीने में प्रमाणित हो!

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६- अमरकंटक)

समझ के करो!

हमारे पूर्वजों ने - ऋषि, मह्रिषी, सिद्ध, महापुरुषों ने - अनेक तरह की "अभ्यास विधियां" सुझाई जिसमें "करके समझो!" वाली बात को प्रस्तावित किया गया। इन अभ्यास-विधियों को "तप" माना। "तप" के लोकसुलभ होने का कोई रास्ता वे निकाल नहीं पाये।

अब उनके विकल्प में यहाँ मेरा प्रस्ताव है - "समझ के करो!"

इससे trial and error की कथा समाप्त हो गयी। trial and error वाला मार्ग uneconomical भी हो सकता है। "समझ के करो" का मार्ग economical है।

"समझ के करो" वाले मार्ग में "छोड़ने-पकड़ने", "त्याग-वैराग्य" का कोई झंझट ही नहीं है। पहले समझ लो, फ़िर decide करो - क्या छोड़ना है, क्या पकड़ना है। समझने के बाद क्या आवश्यक है, क्या अनावश्यक है - यह स्वयं में विश्लेषित हो जाता है। आवश्यक को पकड़ना, या पकड़े रहना होता है। अनावश्यकता को छोड़ना होता है। "त्याग" की परिभाषा ही है - "अनावश्यकता का विसर्जन"।

तर्क विधि से यह प्रस्ताव पूरा पड़ता है। व्यवहारिक विधि से इसके पूरा पड़ने के लिए आपको इसे समझना ही पड़ेगा। और दूसरा कोई रास्ता नहीं है। यदि समझ में आ गया तो आपसे छूटने वाली कोई बात नहीं है। यदि समझ में आ गया है - तो आपसे कुछ miss क्यों होगा?

"समझ" शब्द स्वयं (जीवन) में जागृति हो जाने को ही इंगित करता है। उससे पहले "सुनी हुई बात" ही है।

समझ "ज्यादा" और "कम" की उपाधियों से मुक्त है। "समझे हैं" या "नहीं समझे हैं" - इतना ही है।


सह-अस्तित्व स्वरूपी अस्तित्व को समझना, और जीवन को समझना। ये दोनों यदि समझ में आता है, तो बाकी सब उससे अपने आप निकल आता है।

दृष्टा समझ में आने पर दृश्य स्पष्ट होता है। जीवन ही दृष्टा है। जीवन ४.५ क्रिया में कितने भाग का दृष्टा है, और १० क्रिया में कितने भाग का दृष्टा है - यह मध्यस्थ-दर्शन में स्पष्ट किया गया है। ४.५ क्रियाओं द्वारा जीवन संवेदनाओं का दृष्टा रहता है। १० क्रिया के साथ जीवन सह-अस्तित्व में दृष्टा है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)