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Wednesday, October 31, 2012

उपयोगिता

उपयोगिता आचरण के रूप में पहचान में आती है।  हर इकाई अपनी उपयोगिता  को अपने आचरण द्वारा प्रकट करती है।  पानी अपनी प्यास बुझाने की उपयोगिता को अपने आचरण द्वारा प्रकट करता है।  जीव-जानवर अपनी उपयोगिता को अपने वंश के अनुरूप आचरण करके प्रकट करते हैं।  उसी प्रकार मानव अपनी उपयोगिता को ज्ञान के अनुरूप आचरण द्वारा प्रकट कर सकता है।  जैसे - मैं मानव-चेतना के ज्ञान के अनुरूप आचरण कर रहा हूँ और आप उसे अपनाने का प्रयास कर रहे हैं।  इससे मेरी उपयोगिता सिद्ध हुई या नहीं?

जागृति पूर्वक मानव मानव के लिए उपकार विधि से उपयोगी है और मनुष्येत्तर प्रकृति के लिए संरक्षण और नियंत्रण विधि से पूरक है।


- श्री ए नागराज के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी 2007, अमरकंटक)

प्रमाण का आवंटन

कल्पनाशीलता द्वारा वस्तु की पहचान होने पर शब्द और कल्पना दोनों पीछे छूट जाते हैं, वस्तु रह जाती है।  वस्तु का अनुभव होना स्वाभाविक हो जाता है।  वस्तु का अनुभव होने पर हम प्रमाणित हो जाते हैं।  प्रमाण संपन्न होने पर मानव प्रमाण का ही आवंटन करता है।  जिसके पास जो होता है, उसी को वह आवंटित करता है।

- श्री ए नागराज के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी 2007, अमरकंटक)

इन्द्रियगोचर और ज्ञानगोचर का संयुक्त स्वरूप

मानव इन्द्रियगोचर और ज्ञानगोचर का संयुक्त स्वरूप है।  ज्ञान स्थिति में रहता है, इन्द्रियगोचर विधि से प्रमाण होता है।  ज्ञान मानव परंपरा में इन्द्रियगोचर विधि से ही प्रमाणित होता है।  इन्द्रियां न हो और ज्ञान एक से दूसरे व्यक्ति को संप्रेषित हो जाए, अभिव्यक्त हो जाए, प्रकाशित हो जाए - ऐसा होता नहीं है।   इन्द्रियों के माध्यम से ही ज्ञान प्रकाशित होता है।  हर मानव में जीवन क्रियाशील रहता है।  इन्द्रियों के माध्यम से ज्ञान जो झलकता है, उसके मूल में जाने की व्यवस्था जीवन में बनी हुई है - कल्पनाशीलता के रूप में।  ज्ञान वस्तु के रूप में साक्षात्कार होता है, फलतः बोध और अनुभव होता है और प्रमाणित होने की योग्यता आती है।

चैतन्य इकाई (जीवन) की महिमा इसमें मूल मुद्दा है।  इसी के आधार पर जीवन को पहचानने की कोशिश है, सह-अस्तित्व को पहचानने की कोशिश है, मानव को  पहचानने की कोशिश है, चारों अवस्थाओं को पहचानने की कोशिश है और इन सबके साथ जीने की कोशिश है।

- श्री ए नागराज के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी 2007, अमरकंटक)

Friday, October 12, 2012

एक संवाद



मानव कल्पनाशीलता और कर्म स्वतंत्रता के चलते सच्चाई को तो चाहता ही है.  “सच्चाई” नाम तो पता है, साथ ही कहीं न कहीं सच्चाई का भास-आभास होना भी मानव के लिए सहज है.  इस आधार पर अध्ययन करने की प्रवृत्ति बनती है.

अध्ययन के लिए सूचना है – “सत्य है.  समाधान है.  न्याय है.”  यही तीन मुद्दे हैं अस्तित्व में.  इन प्रधान मुद्दों के आधार पर सारी सूचनाएं हैं. इन सूचनाओं से सत्य, समाधान और न्याय को लेकर भास-आभास होकर अनुमान बनता है. यहाँ प्रतिपादित कर रहे हैं – “सह-अस्तित्व ही परम सत्य है.”  सह-अस्तित्व होने के आधार पर मानव द्वारा उसके अध्ययन करने की संभावना बन गयी.

सह-अस्तित्व सत्ता में संपृक्त प्रकृति के रूप में है.  सत्ता स्थितिपूर्ण है. स्थितिपूर्ण सत्ता में स्थितिशील प्रकृति संपृक्त है.  पूर्णता के अर्थ में संपृक्त है.  भौतिक-रासायनिक वस्तुएं अपनी स्थिति में “एक” होती हैं.  चाहे परमाणु अंश हो, परमाणु हो, अणु हो, अणु रचित रचना हो, प्राणकोषा हो, प्राण सूत्र हो – ये सभी “एक” की संज्ञा में आते हैं.  प्रत्येक “एक” अपने वातावरण सहित “सम्पूर्ण” है. इसका प्रमाण है – त्व सहित व्यवस्था होना और समग्र व्यवस्था में भागीदारी करना.  प्रत्येक एक अपनी स्थिति में सम्पूर्णता सहित ही होता है.  कार्य और कारण अविभाज्य है, और फल-परिणाम निश्चित है. 

पदार्थावस्था से ही प्राणावस्था प्रकट होता है, प्राणावस्था से ही जीवावस्था प्रकट होता है, जीवावस्था से ही ज्ञानावस्था प्रकट होता है. पदार्थावस्था में ही प्राणावस्था का भ्रूण तैयार हुआ.  प्राणावस्था में जीवावस्था का भ्रूण तैयार हुआ.  जीवावस्था में ज्ञानावस्था का भ्रूण तैयार हुआ.  पिछली स्थिति में अगली स्थिति के लिए जो तैयारी होती है, उसको हम “भ्रूण” कह रहे हैं.  मानव प्रकट होने के बाद उसने चारों अवस्थाओं के साथ संतुलित स्वरूप में जीने के लिए प्रयास नहीं किया, उसके विपरीत चारों अवस्थाओं को अपने भोग की वस्तु मान लिया.  भोगने के लिए संघर्ष भावी हो गया.  इस तरह संघर्ष के चलते हम सत्य को समझने में असमर्थ रहे. 

इस प्रस्ताव के आधार पर पता चला, मानव के इस प्रकार संघर्ष करने का मूल कारण उसका जीव-चेतना में जीना रहा.  साथ ही यह पता चला – मानव चेतना में मानव भ्रम मुक्त हो सकता है, अपराध मुक्त हो सकता है, अपना-पराये की दीवारों से मुक्त हो सकता है.  इस तरह मानव जाति अच्छी तरह सब बातों को समझने की जगह में आ गए, जो एक सौभाग्य है. 

यह जो हम समझते जा रहे हैं, उसे न भौतिकवादी विधि से समझा जा सकता था, न ईश्वरवादी विधि से समझा जा सकता था.  व्यापक सत्ता में संपृक्त प्रकृति बताने से न भौतिक तत्व की अवहेलना हुई, न ईश्वरीय तत्व की अवहेलना हुई.  इस तरह इस प्रस्ताव के आधार पर भौतिकवादी जो भूल किये, उसका सुधार हो सकता है.  ईश्वरवादी जिस बात को भुलावा दे कर चले, उससे होने वाला अनर्थ भी सुधर सकता है.  ईश्वरवाद एकांत या भक्ति-विरक्ति के लिए उपदेश दिया.  अध्ययन नहीं करा पाए.  उपदेश का मतलब है – “हम जो कहते हैं, उसको सुनो और करो!”  दूसरे शब्दों में – “करके समझो!”  भौतिकवादी भी “करके समझो” वाली जगह में ही हैं.  सह-अस्तित्ववादी विधि से हम “समझ के करने” वाली जगह में आ सकते हैं. 

ईश्वरवादी विधि में “जीवन मुक्ति” को लेकर जो लिखा है, वह गलत सिद्ध हो गया है.  जीवन का समाप्ति होता नहीं है.  आत्मा के रूप में ईश्वर जीवन में बंधक नहीं है.  ईश्वर (व्यापक वस्तु) में संपृक्त होने के आधार पर ऊर्जा-सम्पन्नता है और ज्ञान-सम्पन्नता है.  इस समझ के आधार पर “भ्रम मुक्त” होने की बात है.  भ्रम मुक्त होने की पहचान है – अपराध मुक्ति और अपने-पराये से मुक्ति.  भ्रम मुक्ति ही “मोक्ष” है.  इस समझ के साथ हम न्याय पूर्वक जीने में संलग्न हो सकते हैं.  स्वयं स्फूर्त विधि से!  जब पदार्थावस्था स्वयं-स्फूर्त विधि से काम कर सकता है, तो मानव को स्वयं-स्फूर्त विधि से काम करने में क्या तकलीफ है?  तकलीफ का कारण खोजने जाते हैं तो पता चलता है – मानव अपराध में फंस गया है.  अपराध में फंसाया है – भौतिकवाद और आदर्शवाद ने. 

प्रश्न: “स्वयं-स्फूर्तता” को कैसे समझें?

उत्तर:  जैसे आपने मोबाइल का एक डिजाईन बनाया.  उसके बाद मोबाइल बनाने का दूसरा डिजाईन आप में से अपने-आप उभर आता है.  मनाकार को साकार करने के पक्ष में मानव ने स्वयं-स्फूर्तता को प्रमाणित किया है.  मनःस्वस्थता के पक्ष में स्वयं-स्फूर्तता को प्रमाणित नहीं कर पाया है, जिससे अपराध में फंस गया है.

प्रश्न: मनाकार को साकार करना क्या “अपराध” है?

उत्तर: नहीं!  मनाकार को साकार करना कोई अपराध नहीं है.  मनाकार को साकार करना मानव का स्वयंस्फूर्त वैभव है.  मनाकार को साकार करने पर प्राप्त वस्तुओं के साथ व्यापार करने में अपराध है.  दूसरे, मनाकार को साकार करने के लिए जो कच्चामाल प्राप्त करते हैं, उसको प्राप्त करने में अपराध प्रवृत्ति है. 

प्रश्न: मनः स्वस्थता क्या है?

उत्तर: समझदारी से समाधान होता है.  सर्वतोमुखी समाधान (अभ्युदय) ही मनः स्वस्थता का प्रमाण है.
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-  श्री ए. नागराज के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)

Thursday, October 11, 2012

सच्चाई का शोध करने का स्त्रोत

भ्रमित जीवन में अन्तर्निहित अतृप्ति है।  इस कारण से किसी भी आवेश को भ्रमित मानव सतही मानसिकता में स्वीकार नहीं कर पाता है।  जैसे - लाभोंमादी आवेश, किसी जगह में इस आवेश के साथ चलते हुए, यह "सही" है - हम मान नहीं सकते।  कामोंमादी और भोगोंमादी आवेशों के साथ भी ऐसा ही है।  यह हमारे जीवन में छिपा हुआ सच्चाई का शोध करने का स्त्रोत बना हुआ है।  इस स्त्रोत के आधार पर अध्ययन पूर्वक हम इन प्रचलित उन्मादों से बच कर निकल सकते  हैं।

बुद्धि जीव चेतना के चित्रणों का दृष्टा बना रहता है, किन्तु उसको स्वीकारता नहीं है।  बुद्धि जो स्वीकारता नहीं है, वही पीड़ा है।  सर्व-मानव में पीड़ा वही है।

आदमी अपने में जो करता है, उसे कहीं न कहीं देखता ही रहता है।  क्या देखता है, क्या नहीं देखता है - उसे पता नहीं रहता किन्तु उसमे "उचित"/"अनुचित" को कहीं न कहीं ठहराता ही रहता है।  उसी में भ्रमवश हठ-धर्मियता शुरू होती है।  उसमे मानव फंस जाता है।

बुद्धि भ्रमित नहीं होती।  बुद्धि बोध की अपेक्षा में रहती है।  बुद्धि की दृष्टि चित्रण की ओर रहता है और आत्मा से प्रामाणिकता की अपेक्षा में रहता है।  प्रामाणिकता न होने से स्वयं में रिक्तता या अतृप्ति बना ही रहता है।  जीव-चेतना की सीमा में कल्पनाशीलता में जो प्रिय-हित-लाभ दृष्टियों से जीना होता है, उससे बुद्धि में बोध की वस्तु कुछ जाता ही नहीं है।  शरीर संवेदना से सम्बंधित बातें बोध की वस्तु नहीं है, इसलिए वह चित्रण से ऊपर जाता नहीं है।  उसमे चिंतन की कोई वस्तु नहीं है।  उसमे संवेदना है और  संवेदनाओं को राजी रखने की प्रवृत्ति है।


- श्री नागराज के साथ संवाद (अगस्त 2006, अमरकंटक)

गठन-पूर्णता

परमाणु विकसित होकर अविकसित परमाणुओं को पहचानने की योग्यता से संपन्न होता है।  ऐसे परमाणु चैतन्य पद में होते हैं।  यही विकास की महिमा है। इसी क्रम में चैतन्य प्रकृति अर्थात गठनपूर्णता प्राप्त परमाणु में पाँचों बल अक्षय रूप में समाहित रहते हैं।  उसकी जागृति पूर्ण अभिव्यक्ति पर्यंत गुणात्मक विकास के लिए चैतन्य इकाई प्रवृत्त है।

नियंत्रण जड़-चैतन्यात्मक प्रकृति के लिए समान रूप में वर्तमान है।  वर्तमान का तात्पर्य अस्तित्व सहित स्थिति और प्रभाव से है।

गठनपूर्णता प्राप्त परमाणु में ये विशेषताएं हैं कि वह अक्षय बल और अक्षय शक्ति संपन्न होता है।  अक्षय बल और शक्ति सम्पन्नता का तात्पर्य यह है कि गठनपूर्णता के अनंतर परमाणु में अमरत्व सिद्ध होने के फलस्वरूप उसमे श्रम और गति दोनों अक्षय हो जाते हैं।  यही स्वाभाविक स्थिति है।  इसी सत्यता वश गठनपूर्ण परमाणु में अभिव्यक्त होने वाले पाँचों बल, पाँचों शक्तियां अक्षय होती हैं।  अक्षयता का मतलब है - क्षय न होना, अर्थात अक्षुण्ण होना।  

Wednesday, October 10, 2012

आवर्तनशीलता: अनिवार्यता और उसका स्वरूप


  • संग्रह का तृप्ति बिंदु किसी भी देश काल में किसी एक व्यक्ति को भी नहीं मिल पाया।
  • समृद्धि सामान्य आकांक्षा और महत्त्वाकांक्षा संबंधी वस्तुओं  के आधार पर ही हो पाता है, न कि प्रतीक मुद्रा के आधार पर।
  • आवर्तनशील व्यवस्था में मानव सहज अपेक्षा रूपी समृद्धि सभी परिवारों के लिए सुलभ हो जाता है।
  • अर्थशास्त्र विधा में आवर्तनशीलता स्वयं में श्रम नियोजन और श्रम विनिमय प्रणाली, पद्दति, नीति है। 
  • समृद्धि का भाव परिवार में ही होता है।  एक परिवार समृद्ध होने के लिए एक से अधिक परिवार समृद्ध रहना अनिवार्य है।  इस क्रम में अकेले में समृद्ध होने की कल्पना और संग्रह विधि से समृद्धि की कल्पना  दोनों भ्रम सिद्ध हुआ।
  • अभाव का अभाव ही समृद्धि है।
- आवर्तनशील अर्थशास्त्र (अध्याय 4) 

Monday, October 8, 2012

आवर्तनशील अर्थशास्त्र : दार्शनिक आधार

मनुष्य ही सर्वशुभ की अपेक्षा करता है। अर्थशास्त्र का अध्ययन समाधान, समृद्धि, अभय और सह-अस्तित्व क्रम में है। समृद्धि का धारक-वाहक एक परिवार होता है। परंपरा में लाभ के बाद लाभ और भोग के बाद भोग का सम्मोहन बढ़ता आया है। इस सम्मोहन को समीक्षित करने योग्य जागृति को सुलभ करना ही इस आवर्तनशील अर्थचिंतन विचार और शास्त्र की महिमा है। आवर्तनशील अर्थव्यवस्था की क्रियाप्रणाली मनुष्य संबंधों में संतुलन के उपरान्त ही सार्थक हो पाता है। जहां-जहां तक सम्बन्ध में संतुलन नहीं है, वहां-वहां तक भ्रमवश लाभोन्माद छाया ही रहता है।

- आवर्तनशील अर्थशास्त्र