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Wednesday, August 9, 2017

कोष गठन


- श्री सुरेंद्र पाठक द्वारा 

Monday, August 7, 2017

जाँचने का मतलब

अध्ययन कराने वाला "प्रवर्तनशील" होता है.  प्रवर्तनशीलता = मनुष्य की प्रवृत्ति को ध्यानाकर्षण करना।  अध्ययन जो करा रहा है उसको सही "मान" करके आप अध्ययन शुरू करते हैं.  वह ज्ञान, विवेक, विज्ञान को लेकर जो प्रस्तावित करता है, उसको जाँचा जाए.  जाँचने के क्रम में कुछ समझ नहीं आता है तो उसको प्रवर्तनशील व्यक्ति समझाने की ताकत रखता है.  उसको स्पष्ट कर लिया जाए.  जाँचने के बाद यदि कुछ गलत निकलता है तो उस पर चर्चा या परामर्श हो सकता है.

 "सत्य यही है" - आपको मेरा ऐसा कहना अजीब लग सकता है, क्योंकि आपका अब तक ऐसा सुनने का अभ्यास  नहीं है.

प्रश्न: ज्ञान को जाँचने से आपका क्या आशय है?

उत्तर:  ज्ञान से प्रयोजन पूरा होता है या नहीं - जाँचने का मतलब यही है.  प्रयोजन है - अखंड समाज, सार्वभौम व्यवस्था।  पहले यह सोचिये कि अखंड समाज - सार्वभौम व्यवस्था चाहिए या नहीं चाहिए?  फिर यह सोचिये कि उसके लिए यह प्रस्ताव पूरा पड़ता है या नहीं?  अध्ययन पूर्वक हम इस जगह पर आ जाते हैं कि यह प्रस्ताव पूरा पड़ता है.  यदि इस जगह नहीं आ पाते हैं तो इस प्रस्ताव के अनुसार कोई नहीं चलेगा।  हम बात करते ही रह जाएंगे युगों तक!  अध्ययन में पूर्णतया तत्पर होना ही होगा।

मूल से फल और फल से मूल तक जाँचा जाए.  मूल ज्ञान है.  फल व्यवस्था है.  इन दोनों के साथ तालमेल बनता है या नहीं - इसको जाँचा जाए.  जाँचने का अधिकार हर मानव में कल्पनाशीलता स्वरूप में रखा है.  मूल तक जाने के लिए अध्ययन है.  फल तक जाने के लिए व्यवहाराभ्यास और कर्माभ्यास है.

- श्री ए. नागराज के साथ संवाद पर आधारित (मई २००७, अछोटी)