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Sunday, July 24, 2016

अनुभव प्रमाण



जीवन में दसों क्रियाओं के क्रियाशील हुए बिना "प्रमाण" नहीं होगा।

न्याय-अन्याय से अध्ययन शुरू करते हैं.  जीव चेतना में (जीते हुए मानव को) अन्याय स्वीकार हुआ रहता है.  मानव चेतना में (जीता हुआ मानव) न्याय को स्पष्ट कर सकता है.  तुलनात्मक विधि से न्याय-अन्याय को स्पष्ट करते हुए न्याय में विश्वास दिलाता है. 

संबंधों का संबोधन जो हमारे पास पहले से है ही, उन संबंधों में प्रयोजन की पहचान और स्वीकृति कराते हैं.  नियम, नियंत्रण, संतुलन, न्याय, धर्म और सत्य के स्वरूप का हर सम्बन्ध में अध्ययन करा देते हैं.  संबंधों में ही जीना है.   यदि जीवन शरीर के साथ भी नहीं है तो भी उन्हीं संबंधों  में प्रेरणा देना होता है. 

(जीव चेतना में) शरीर मूलक विधि से संबोधनों के आधार पर परस्पर प्रेरणा देना होता है.  (मानव चेतना में) अनुभव मूलक विधि में संबंधों के प्रयोजनों के आधार पर परस्पर प्रेरणा देना होता है.  इस ढंग से जीने के कार्यक्रम में जीवन की दसों क्रियायें क्रियाशील हो जाती हैं. 

अध्ययन क्रम में साक्षात्कार होना एक क्रिया है.  साक्षात्कार के अनुसार बोध होना एक क्रिया है.  बोध के अनुसार अनुभव होना एक क्रिया है.  अनुभव के अनुसार (आत्मा में) प्रमाण होना एक क्रिया है.  बुद्धि में प्रमाण बोध होना एक क्रिया है.  प्रमाण बोध के अनुसार संकल्प होना एक क्रिया है.  यह साढ़े पाँच क्रिया हुई.  ऐसा होने पर चित्त में चिंतन के आधार पर चित्रण होना शुरू होता है.  उस चित्रण को दर्शन, वाद, शास्त्र स्वरूप में मैंने प्रस्तुत किया है. 

सारा वांग्मय चित्रण है, सूचना है.  अनुभव प्रमाण को चिंतन में लाकर चित्रण करने का काम मैंने पूरा कर दिया है.  तुलन में पहले (जीव चेतना में) जो हम न्याय-धर्म-सत्य को तौल नहीं पाते थे उसको तौलने योग्य हम हो गए. 

पठन साक्षात्कार की पृष्ठभूमि है.  साक्षात्कार होते तक अध्ययन है.  जीवन में तदाकार होने का गुण है - इसलिए साक्षात्कार होने पर वस्तु से जीवन तदाकार होना शुरू कर देता है.  तद्रूप-तदाकार विधि से जीवन में साढ़े चार क्रिया से साढ़े पाँच क्रिया जुड़ जाने पर पूरा जीवन अनुभव से भर जाता है. 

- दिसंबर २००८, अमरकंटक 

जीवन मूलक जीने का प्रस्ताव



मानव ने अपने इतिहास में आज तक शरीर मूलक जी कर देख लिया है.  यह जीवन मूलक जीने का प्रस्ताव है.  इसके लिए अनुभव मूलक विधि को मानव परंपरा में प्रमाणित होने की आवश्यकता है.  अनुभव मूलक विधि से मानव में न्याय प्रकट होता है, समाधान प्रकट होता है, नियम प्रकट होता है, नियंत्रण प्रकट होता है, संतुलन प्रकट होता है.  परम सत्य अनुभव में रहता है, जिसके आधार पर यह सब प्रकट होता है.  अनुभव से बड़ा "कामधेनु" क्या होता होगा? 

यह कार्यक्रम अनुभव मूलक विधि से जो समझदारी है उसको अनुभवगामी पद्दति से दूसरे को समझदार बनाने का है.  समझ पूर्वक ही अनुभव होता है. 

अध्ययन विधि से सत्य बोध हो जाता है.  सत्य बोध होने के बाद ही अनुभव होगा।  उसके पहले कभी अनुभव नहीं होगा।  सत्य बोध के अलावा सारा भड़ास ही है.  अनौचित्यता को बुद्धि नकारता है, वह अनुभव में जाता नहीं है. 

पदार्थ का नाश नहीं होता है, व्यापक वस्तु में परिवर्तन नहीं होता है.  व्यापक वस्तु अपने में कोई मात्रा नहीं है, उसके गुणों में कोई परिवर्तन नहीं होता।  व्यापक वस्तु के तीन आयाम हैं - व्यापकता, पारगामीयता और पारदर्शीयता। 

प्रश्न: समाधि में आपको कैसा लगता रहा?

उत्तर: गहरे पानी में डूब के आँखें खोलने पर जैसा लगता है, वैसा लगता रहा.  उसको मैंने 'आकाश' नाम दिया।  आकाश की पहले हम व्याख्या नहीं कर पाते थे.  संयम में स्पष्ट हुआ कि "अवकाश ही आकाश है".  इकाइयों के परस्परता में जो अवकाश है, वही आकाश है. सब जगह यही है.

समाधि काल में यह स्वीकृति थी कि "मैं हूँ" और "मेरी आशा, विचार, इच्छा चुप हो गयी हैं, उसका मैं दृष्टा हूँ". 

प्रश्न:  समाधि के बाद शरीर अध्यास होने पर क्या हुआ?

उत्तर: मैंने पाया मेरा वर्तमान से कोई विरोध नहीं रहा, और मुझे भूतकाल की कोई पीड़ा और भविष्य की कोई चिंता नहीं रही.  समाधि से मैं यहाँ तक पहुंचा, संयम में बाकी सब दर्शन का स्वरूप आ गया.

प्रश्न:  संयम के दौरान क्या होता था?

उत्तर:  इन्तजार करना, निरीक्षण करना और जो निरीक्षण किया उसके प्रति तीव्र संकल्पित होना।  यह निरीक्षण समाधि  और मेरी तीव्र जिज्ञासा के आधार पर हुआ. 

मैंने जो समाधि-संयम से इस ज्ञान को पाया, वह अँधेरे में हाथ मारने जैसा रहा.  अध्ययन विधि में वैसा नहीं है.  अर्थ साक्षात्कार होने तक तर्क-संगत विधि से अध्ययन है.  अर्थ साक्षात्कार होने के बाद बोध होना और अनुभव होना स्वाभाविक है.  इसमें तर्क नहीं पहुँचता।  अनुभव के बाद अनुभव बोध होने पर हम सब बातों को तर्क संगत विधि से व्यक्त करने योग्य हो गए.  तर्क का पहुँच अस्तित्व में वस्तु साक्षात्कार होने तक है. 

जैसे - पानी एक शब्द है.  पानी अस्तित्व में एक वस्तु है.  पानी को हम तर्कसंगत विधि से मानव को संबोधित करते हैं - इससे प्यास बुझती है, कपडा धुलता है, शरीर धुलता है, आदि.  आगे अध्ययन में तात्विक रूप में पानी एक जलने वाली वस्तु और एक जलाने वाली वस्तु के योग पूर्वक है - यह स्पष्ट करते हैं.  इसमें क्या तकलीफ है?  यदि तकलीफ नहीं है तो इसको स्वीकारो!  जिसमें तकलीफ नहीं है, वह स्वीकार होता ही है.  जिसमें तकलीफ है, वह स्वीकार होता नहीं है.  यहाँ प्रस्ताव में तकलीफ है - जीव चेतना से मानव चेतना में अंतरित होना।  जीवचेतना में जीने को सुविधाजनक मान लिया है, उसको गौण मानना तकलीफ देता है. 


- श्री ए नागराज के साथ संवाद पर आधारित - दिसंबर २००८, अमरकंटक

न्याय की अपेक्षा



जीव चेतना में जीते तक न्याय की अपेक्षा तक बनता है, पर न्याय होता नहीं है.

- दिसंबर २००८, अमरकंटक


Tuesday, July 19, 2016

वैदिक विचार पर प्रश्न चिन्ह




आदर्शवाद के अनुसार मानव का अध्ययन नहीं है, न भौतिकवाद के अनुसार है.  भौतिकवाद ने मानव के स्वरूप की व्याख्या कामोन्मादी मनोविज्ञान, भोगोन्मादी समाजशास्त्र और लाभोन्मादी अर्थशास्त्र के रूप में किया।  आदर्शवाद ने मानव के कल्याण को रहस्य मूलक विधि से मोक्ष और स्वर्ग में बता दिया।  इसके बाद किससे बात करना शेष है, आप ही बताओ।  यह निष्कर्ष मैं २४ वर्ष की आयु में निकाल चुका था.  ऐसे में मैं किससे बात करता?

उस समय रमण महृषि के शिष्य काव्यकंठ गणपति शास्त्री मेरे पिताजी के काफी निकटवर्ती थे.  इस आधार पर हमारे परिवार में रमण महर्षि का बहुत सम्मान करते थे.  इसीलिए मैंने रमण महृषि से यह पूछा नहीं कि आपको समाधि हुआ है या नहीं?  जबकि मेरे पास यह पूछने का पूरा अधिकार था.   यह नहीं पूछना मेरे लिए वरदान हो गया.  यदि मेरा आस्था टूटता तो मैं यहाँ साधना करने के लिए नहीं आ पाता।  शास्त्रों में समाधि के लिए कहा है, और महापुरुषों का उसमें सहमति है -  इतनी आस्था को ले करके अब जो परिणाम होगा, सो होगा, यह सोच के मैं यहाँ आया.  ज्यादा से  ज्यादा क्या होगा - शरीर पात होगा!  दूसरा शरीर मिल जाएगा, क्या आपत्ति है?  इस दृढ़ निश्चय से मेरे जीवन में एक बहुत भारी उद्देश्य बन गया, उसमें निष्ठा बन गयी, उसके अनुसार साधना करना भी बन गया, और साधना का फल भी मिल गया.  साधना का फल मानव जाति के लिए उपकार का आधार बन गया.  यहाँ साधना के लिए आने से पहले मैंने थोड़े ही सोचा था कि मैं मानव जाति के लिए संविधान लिखूंगा या मुझे कोई दर्शन मिलेगा!  आप ही बताओ - मुझको उस समय कहाँ पता था?

जब वेद विचार ही प्रश्न चिन्ह में आ गया - जिसमे इतने बड़े भारी समर्पण के साथ लोग लगे हैं, उसके बाद क्या बचता है?  वेद तीन खण्ड में है - कर्म, उपासना और ज्ञान।  वेद का सार बात है - उपनिषद।  १०८ उपनिषद हैं।  उनका सार बात है - वेदान्त।  वेदान्त जब प्रश्न चिन्ह में आ गया, तीनों वेद जब प्रश्न चिन्ह में आ गया - तो फिर क्या बात करना है?  प्रश्न बना - सत्य से मिथ्या कैसे पैदा हो गया?  मैंने अपने परिवार जनों से पूछा - "बकरी से बकरी पैदा होता है, नीम के बीज से नीम ही उगता है.  ये कैसा ब्रह्म है, जो मिथ्या को पैदा किया?  मिले तो उसको जूता मारा जाए!"  मुझसे ज्यादा बागी कोई होगा?  ऐसे भद्दे तरीके से उस समय मेरे बोलने पर मेरी हत्या भी हो सकती थी.  मेरी हत्या इसी लिए नहीं हुई - मेरे मामा के कारण!  मेरे मामा ऐसे प्रचण्ड विद्वान थे, जिनके सामने सभी नतमस्तक थे.  उन्हीं से मैंने वेदान्त पढ़ा था.  वेदान्त को पूरा पढ़ने के बाद मेरे परीक्षण में उन्होंने कहा - "तुम वेदांत को ठीक समझे हो".  मैंने उनसे तीन बार यह बुलवाया।  फिर मैंने उनसे पूछा - तुम्हारा गुरु दक्षिणा क्या देना है.  उन्होंने कहा - तुम समझ गए, यही मेरा दक्षिणा है.  ऐसे उऋण होने के बाद मैंने उनसे अपनी बात बताने की अनुमति माँगी।  उन्होंने अनुमति दी तो मैंने उनको कहा - "ये जो तुम्हारा वेदान्त है - निरर्थक है, जूते के नीचे रखने के योग्य भी नहीं है!  सत्यम् ज्ञानम् अनन्तम् ब्रह्मम् से उत्पन्न जीव जगत मिथ्या कैसे है?  - तुम बताओगे?"  मेरे ऐसे वचन सुन के वे रोने लगे.  ऐसे भट्टी से मैं निकल के आया हूँ.  सेंतमेंत का मंथन नहीं है ये!  कुछ चुका कर ही यह मंथन हुआ है.  कोई मुझे पैसा चाहिए था, कोई ख्याति चाहिए था, कोई सम्मान चाहिए था - ऐसा कुछ भी आरोप नहीं लगा सकते।  स्वयं को चुकाया है, तब यह मंथन हुआ है.

उस समय यदि भारत के संविधान में राष्ट्रीय चरित्र का स्वरूप उद्घाटित हो जाता तो मैं यहाँ साधना करने नहीं आता!  राष्ट्र के हित में मैं कुछ काम करता।  मेरा माद्दा ऐसा ही रहा था.  पर जब राष्ट्र का चरित्र ही स्पष्ट न हो तो किस के लिए काम करें?  इसलिए उस प्रसंग को तिलांजलि दे दिया।  चींटी भी जी ही लेता है, हाथी भी जी ही लेता है - मैं भी जी लूँगा कैसे भी.  यहाँ अमरकंटक आ करके पत्ते आदि को खाके साधना करने लगा.  यहाँ के लोग मुझे ऐसे जीने नहीं दिए.  तो कृषि करके अपनी रोटी की व्यवस्था कर दिया, कुछ बचा तो कन्या-भोजन करा दिया।  ऐसे मैं चला हूँ.

-दिसंबर २००८, अमरकंटक 

Sunday, July 17, 2016

अनुभव काल




अनुभव के बाद, अनुभव प्रमाण के आधार पर बुद्धि में बोध होने के बाद विवेचना होती है कि -
सहअस्तित्व ही दृश्य है,
सहअस्तित्व का दृष्टा जीवन है,
मानवीयता पूर्ण आचरण का दृष्टा जीवन है
व्यापक वस्तु ही ज्ञान है,
ज्ञाता जीवन है.

अध्ययन से जीवन का शरीर से भिन्न होने का बोध होता है, अनुभव मूलक विधि से इसका प्रमाण होता है.  अनुभव अध्ययन के बाद है.  अनुभव मूलक विधि से प्रयोजन बोध होता है.  प्रयोजन बोध होने से कार्यक्रम बनता है.

शरीर और जीवन अलग अलग विधि से प्रकटन क्रम में सिद्ध हुआ है.   जड़ प्रकृति में विकास क्रम में मात्रात्मक परिवर्तन के साथ गुणात्मक परिवर्तन का एक परिणाम है - मानव शरीर.   जीवन मात्रात्मक परिवर्तन से मुक्त होने के बाद गुणात्मक परिवर्तन में प्रवृत्त वस्तु है.  शरीर और जीवन का यह भेद अध्ययन से स्पष्ट हो जाता है.  इसका प्रयोजन अनुभव मूलक विधि से प्रमाणित होता है.

प्रश्न:  साधना पूर्वक संयम काल में जो कुछ आपने देखा, वैसा ही हम भी अध्ययन पूर्वक देखेंगे।  क्या यह सही है?

उत्तर: हाँ.  उसी के लिए अध्ययन कराते हैं.  स्वयं का निरीक्षण में वही होता है.  स्वयं का निरीक्षण जब तक नहीं करेंगे, तब तक अनुभव होगा भी नहीं।

प्रश्न: क्या जिस प्रकार आप जीवन परमाणु के अंशों को भी गिन पाये, क्या मैं अध्ययन पूर्वक वैसा ही कर पाऊँगा?

उत्तर: यदि आपका परमाणु को देखने का उद्देश्य हो तो अनुभव काल में आपको परमाणु दिखेगा (समझ आएगा).  आपका उद्देश्य यदि वह नहीं है तो वह नहीं दिखेगा।  मेरे लिए सब वस्तुओं को विस्तार में देखने का उद्देश्य बना था, इसी लिए मैं सब देख पाया।  वैसे ही आप भी देख सकते हो.

शब्दों में कोई उद्देश्य नहीं होता है, शब्दों में केवल अहंकार होता है.  मैं हज़ारों वैदिक ऋचाओं को पढ़ने, याद करके सुनाने के बाद इस निर्णय पर पहुंचा हूँ.

आपको जो मैं बोध करा रहा हूँ वह समाधि नहीं है.  यह संयम का फल है.  समाधि के बाद प्राप्त होने वाला ज्ञान आपको प्रदान किया जा रहा है.  उसके लिए आप में आना-कानी कितना है, उसका भी ख्याल हो!  तब उससे मुक्ति पाने की विधि आप में आएगी।  मेरे समझाने में क्या आना-कानी हुई और आपके समझने में क्या आनाकानी हुई उसको भी ध्यान में रखा जाए.  समझने और समझाने में आनाकानी न हो तो समय का बचत होगा।

जिज्ञासा गलत नहीं है.  जिज्ञासा को पूरा करने के लिए जो प्रेरणा है, उसको नहीं स्वीकारना ही आना-कानी है.




अभी हम इस निर्णय पर पहुंचे कि जैसे एक व्यक्ति देख पाया, वैसे हम भी देख सकते हैं.  इसमें मुख्य बात है - देखने का उद्देश्य है "जीना".   जीने के लिए मैंने सब कुछ को देखा।  मानव के ऐसे जीने का स्वरूप इस वांग्मय के स्वरूप में मानव को दे दिया।  वैसे जीना अनुभव मूलक विधि से पूरा होता है.

अनुभव यदि होता है तो हम जो देखने का उद्देश्य बनाते हैं, तो अनुभव काल में वह सब दिखता है.  अनुभव आकाश में न दिखे, ऐसा कोई वस्तु ही नहीं है अस्तित्व में.

प्रश्न: "अनुभव काल" से क्या आशय है?

उत्तर:  (अध्ययन पूर्वक बोध होने के बाद)  जितने भी समय तक आप अनुभव की स्थिति में रहते हों, वह "अनुभव काल" है.  चाहे वह एक क्षण हो, कुछ घंटे लगातार  हो, या कुछ दिन लगातार हो.  अनुभव होना कुछ समय अवधि में ही होता है - चाहे वह एक क्षण हो, एक दिन हो, दस दिन हो.

(साधना काल में) मैंने दिन में १२  से १८ घंटे तक अनुभव कर के देखा।  (साधना से उठने पर) शरीर का अध्यास होने के बाद पता चलता है, (कि इतने समय अनुभव काल में थे).

कितना समय उस स्थिति में रहे - यह महत्त्वपूर्ण नहीं है.  अनुभव काल में (अध्ययन में बनने वाले) उद्देश्य का उत्तर मिलता है.

प्रश्न:  "अनुभव आकाश" से क्या आशय है?

उत्तर: अनुभव किसी अवकाश में ही होगा।  आपको बताया - समाधि में जैसे पानी में डूब कर, जहाँ ऊपर बढ़िया धूप हो, वहाँ आँखें खोलने पर जैसा दिखता है, वैसा मुझे दिखता रहा.  उसी को "अनुभव आकाश" मैंने नाम दिया।  यह हर व्यक्ति में (अध्ययन पूर्वक) होगा।  अनुभव आकाश में सब दिखता ही है. यथार्थता में अनुभव आकाश "साम्य ऊर्जा" ही है.   साम्य ऊर्जा पारदर्शी, पारगामी और व्यापक है.  साम्य ऊर्जा के पारदर्शी होने से सब दिखता है.

मैंने आप लोग जिस विधि से अध्ययन कर रहे हो, वैसे देखा नहीं है.  आप लोगों ने कैसा देखा - उसको आप से सुनेंगे!  मैंने समाधि-संयम पूर्वक पूरी बात को अनुभव आकाश में देखा है.

अनुभव के बाद विवेचना हुई, विगत में ऐसा कहा है जबकि सच्चाई यह है.  इसलिए इस बात को विकल्प स्वरूप में प्रस्तुत कर दिया।   इसको आपको अनुभव ही करना पड़ेगा।  अनुभव मूलक विधि से ही आदमी मानव बनेगा, नहीं तो जानवर ही रहेगा।  अभी शिक्षा में जो प्रचलित कामोन्मादी मनोविज्ञान, भोगोंमादी समाजशास्त्र, लाभोन्मादी अर्थशास्त्र है - उसके अंदर ही फंसा रहेगा।  मानव बन के ही आदमी व्यवस्था में जी सकता है, जानवर बनके (जीव चेतना में) व्यवस्था में जी नहीं सकता, अव्यवस्था ही करेगा।

प्रश्न:  तो क्या पहले "अध्ययन काल" है, फिर "अनुभव काल" है?

उत्तर:  हाँ.  अध्ययन काल में क्रमिक रूप से सभी सच्चाइयों का बोध होता है (अवधारणा बनती है).  अध्ययन काल में "उद्देश्य" बनता है.  इसके बाद "अनुभव काल" है - जब मनुष्य "दृष्टा पद" संपन्न होता है.  अनुभव काल में जो उद्देश्य बना रहता है, वह सब दिख जाता है.  अध्ययन काल में उद्देश्य बनता है, जो अनुभव काल में स्पष्ट होता है.  मैंने क्या देखा - उसको मैंने लिख के दे दिया है.  उसमें से आपको क्या देखना है, क्या नहीं देखना है - आप ही सोच लो!  यह एक बहुत साधारण बात है.

 - दिसंबर २००८, अमरकंटक 

Sunday, July 10, 2016

एक महत्त्वपूर्ण संवाद



विज्ञान विधि से नापने और तौलने की विधियों को विकसित किया गया.  स्थूल और सूक्ष्म स्तर पर कितने भी नापने-तौलने के मापदण्ड निकाले, उससे जो कुछ भी निकला वह मानव को छोड़ के निकला।  नापने और तौलने की विधियों से मानव का अध्ययन नहीं हुआ.  यह हम निष्कर्ष निकाल लिए.

दूसरे, आदर्शवादी भक्ति-विरक्ति विधि से भी मानव का अध्ययन नहीं हुआ.  मानव ही मानव को समझ में न आने से मानव आवारा पशु जैसा हो गया.  पशुओं में जैसे एक सींग मारने वाला होता है और एक भागने वाला होता है - वैसा ही मानवों में भी हो गया.  उसको नाम दिया - "राक्षस मानव" और "पशु मानव".  उसके बाद पशु मानव और राक्षस मानव को एक खाते में डाला - जिसका नाम दिया "अमानव".  अमानव की प्रवृत्ति बताया, अमानव का गुण बताया, स्वभाव बताया और धर्म बताया।  साथ ही बताया कि अमानव में भी सुख की कामना है.  यह आधार है, जहाँ अभी मानव है.  यह आधार स्पष्ट करते हुए बताया कि अमानवीयता में जीते तक मानव में अपराध प्रवृत्ति से मुक्ति नहीं होगी।  न विज्ञान के नाप-तौल विधि से होगी, न आदर्शवाद के भक्ति-विरक्ति विधि से होगी।  अपराध प्रवृत्ति का स्त्रोत अमानवीयता ही है.  अमानवीयता का ही दूसरा नाम है - "जीव चेतना में जीना".

जो Concept है - उसके अनुसार उसकी भाषा होती है.  जैसे - विज्ञान में एक निश्चित अम्ल को इंगित करने के "H2SO4" भाषा का प्रयोग किया।  यह अगर आपको मुश्किल लगता है तो आप इस भाषा को बदल के देखो।  बदलोगे को तो अर्थ विहीन ही होगा।  उससे कोई प्रयोजन नहीं निकलेगा।  प्रयोजन विहीन विधि से भाषा का प्रयोग करना, कार्य करना, विचार प्रकट करना क्या सार्थक होगा?  इसी तरह मध्यस्थ दर्शन का जो Concept है, उसके अनुसार उसकी भाषा है.

इससे पहले वेद-विचार में एक भाषा का प्रयोग किया है - "सत्यम ब्रूयात प्रियं ब्रूयात, न ब्रूयात सत्यम अप्रियं".  मतलब - सत्य को बोलो, जो प्रिय लगे ऐसे सत्य को बोलो।  जो सत्य अप्रिय लगे ऐसे सत्य को नहीं बताना।  मेरे हिसाब से प्रियाप्रिय, हिताहित, लाभालाभ अमानव की प्रवृत्ति है.  तो मेरे हिसाब से वहाँ लिखा है - अमानव को जो अप्रिय हो, वह सत्य को मत बताओ।  इसका मतलब हुआ - अमानवीयता या अपराध के लिए सहमति देना!   विगत में जो लिखा है उसके अर्थ में जाओगे तो आप पाओगे उसमें बहुत अंतर्विरोध है.  इसलिए मैंने उनका पिंड ही छोड़ दिया।  जबकि मैं वेदों में ५०० ऐसी ऋचाओं को पहचानने की योग्यता रखता हूँ, जिसमें मध्यस्थ दर्शन की पूरी बात को सम्प्रेषित किया जा सकता है.  लेकिन व्यर्थ के वाद विवाद में न पड़ें, इसलिए मैंने "परिभाषा विधि" से अपनी बात को "विकल्प" स्वरूप में प्रस्तुत किया।

परिभाषा सहित मैंने जब भाषा का प्रयोग करना शुरू किया तो लोग मुझे कहे - तुम्हारा भाषा कठिन है!  मेरा उनको उत्तर है - तुमको भाषा कठिन लगती है, क्योंकि तुमको समझना नहीं है.  जो हमको समझना नहीं है, वह हमको कठिन लगता ही है.  जो समझना है, वह सब सुलभ है.


- श्री ए नागराज के साथ संवाद पर आधारित,
अगस्त २००६, अमरकंटक


Sunday, July 3, 2016

जीवन शरीर सत्ता - भाग 3




तो इस ढंग से भ्रम और जागृति की दूरी कितना है आपको पता लग गया.  जागृति होती है - अस्तित्व को सहअस्तित्व स्वरूप में समझने सेसहअस्तित्व में विकास क्रम, विकास, जागृतिक्रम, जागृति को सटीक समझने से.

प्रश्न:  व्यापक वस्तु में तदाकार होने के लिए क्या करें?

उत्तर-  व्यापक वस्तु की महिमा समझ में आने पर ही उसमें तदाकार होना बनता है.  "व्यापक" शब्द सुनने मात्र से तदाकार नहीं होगा।  उसका महिमा ज्ञान होना आवश्यक है.  क्या महिमा?  साम्य ऊर्जा की व्यापकता, पारगामीयिता और पारदर्शीयता स्पष्ट होना।  

स्वयं में ज्ञान और ऊर्जा संपन्नता के आधार पर व्यापक वस्तु का पारगामी होना समझ में आता है.  हर वस्तु ऊर्जा सम्पन्न है, इसलिए ऊर्जा का पारगामी होना समझ में आता है.   इसको अपने में ही ज्ञान करना पड़ता है.  विवेचना करना पड़ेगा, उसको अनुभव करना पड़ेगा।  यहीं से अनुभव शुरू होता है. 

"सत्ता में सम्पृक्तता" के आधार को स्वीकारने के बाद अभी जो शरीर को जीवन मान कर जीते थे, उससे हम एक कदम आगे हो गए.  उसके बाद आगे अध्ययन  क्रम में ये चारों भाग आ गए - विकास क्रम, विकास, जागृति क्रम, जागृति। 

इस तरह इन चारों अवस्थाओं के संबंध में हम निर्भ्रम हो गए. जागृति के बारे में निर्भ्रम हो गए.  इसका नाम है ज्ञान संपन्नता। ऐसे ज्ञान संपन्न होने के बाद हम साम्य ऊर्जा (व्यापक वस्तु) में तदाकार होते हैं.  

पहले ऊर्जा में तदाकार होगा, ऐसा होगा नहीं है.  विकास-क्रम, विकास, जागृति-क्रम और जागृति का समझ अध्ययन से आता है.  आकर के इसमें हम यदि जागृति को प्रमाणित करना शुरू किए तो "ज्ञान व्यापक है" ये पता लगता है.  तब मानव को अनुभव होता है कि ऊर्जा में, ज्ञान में हम तदाकार हैं ही!  मानव को साम्य ऊर्जा ज्ञान स्वरूप में प्राप्त है.  साम्य ऊर्जा में ही सब कुछ है, ज्ञान में ही सब कुछ है.  मानव को स्पष्ट होता है कि उसका सब कुछ ज्ञान के अंतर्गत है.

अध्ययन पूर्वक तीनों अवस्थाओं का दृष्टा होना, और जागृति में तद्रूप होना।

ज्ञान में तदाकार हो गए तो फलस्वरूप ज्ञान के बारे में सोचा, ज्ञान व्यापक है और ऊर्जा भी व्यापक है.  इसलिए ऊर्जा ही ज्ञान रूप में प्राप्त है.  "ज्ञान व्यापक है" ये समझ में आया. "ऊर्जा व्यापक है" ये समझ में आया. 
ये दोनों एक ही वस्तु है या अलग अलग है, इसका विवेचना होती है.  विवेचना होकर निष्कर्ष निकलता है - व्यापक वस्तु ही मानव को ज्ञान रूप में प्राप्त है.

प्रश्न- यह विवेचना जीवन के किस स्तर पर होती है?  विवेचना क्या बुद्धि की क्रिया है?

उत्तर- अनुभव के अनुरूप सोच-विचार करके निर्णय करना  = विवेचना।  अनुभव के बाद बुद्धि, चित्त, वृत्ति ये तीनों के योग में होता है विवेचना।  अनुभव के बाद होती है विवेचना।  यही विवेक है.  

तीन अवस्थाओं का दृष्टा होना अध्ययन से आता है.  तदाकार विधि से पदार्थावस्था, प्राणावस्था, जीवावस्था क्या स्वरूप में है उसका हम दृष्टा हो जाते हैं.  तदाकार का मतलब उनमें जो क्रिया हो रही है उसका ज्ञाता हो जाना।
उनके रूप, गुण, स्वभाव और धर्म के साथ में अपने मन को लगाने पर उनका दृष्टा बन जाते हैं - उसके बाद आता है अनुभव।  अनुभव के साथ जागृति।  जागृति में जीवन के साथ और ज्ञान के साथ तद्रूप होने वाला बात आ गया.  

प्रश्न- जीवन और ज्ञान के साथ तद्रूप होने का मतलब क्या हुआ?

उत्तर- जीवन के साथ जो ज्ञान संबंध रखता है उसके साथ तद्रूप होने वाली बात आ गई.  ज्ञान जो है, वह सर्वत्र फैला हुआ है - इसका हम तद्रूप अवस्था में पाते हैं.  ज्ञान जो है, वह एक जगह में नहीं है.  अभी मानव जो ज्ञान का भाग-विभाग करना चाह रहे हैं, वह बर्बादी का काम है.  

सार रूप में - हम चारों अवस्थाओं का तदाकार विधि से दृष्टा  हुए, जिसके फलन में अनुभव की जगह में आ गए. 
शरीर के दृष्टा हो गए और अनुभव में जीवन आ गया.  अनुभव पूर्वक ज्ञान जीवन के साथ जुड़ गया.  ज्ञान को विवेचना किए तो पता चला ज्ञान व्यापक है.  

प्रश्न- ज्ञान जीवन के साथ जुड़ गया - इसका मतलब क्या हुआ?

उत्तर- जीवन ज्ञान सम्पन्न हो गया.  जीवन ज्ञान होना ही ज्ञान है.  अस्तित्व दर्शन ज्ञान लिखा है.  अस्तित्व को दृश्य रूप में हम प्रतिपादित किया है.  जीवन को जीवन ही समझता है इसका नाम है ज्ञान।  सहअस्तित्व और जीवन ज्ञान के फलस्वरूप में मानवीयतापूर्ण आचरण ज्ञान।  इतना ही तो काम है.


- दिसंबर २००८, अमरकंटक

जीवन शरीर सत्ता - भाग 2




प्रश्न- अशारीरिक स्थिति में जीवन एक स्थान से दूसरे स्थान पर कैसे पहुँचता है?

उत्तर- जीवन जिस ओर जाता है उसको पहचानने में उसको देर नहीं लगती।  ये वैसे ही है - जैसे मनुष्य एक के बाद दूसरा पैर बढ़ाता है तो अगला पैर जमीन पर ही रखता है.  वैसे ही जीवन को अपने रास्ता को पहचानने में कोई तकलीफ नहीं है.  और हर व्यक्ति के साथ जीवन रहता ही है.  दूसरा जीवन कहाँ पहुँचा है उसके आधार पर जीवन दूसरे स्थान पर जाता है.  जीवन की गति को जीवन जानता है.  जीवन की भाषा को जीवन जानता है. जीवन जीवन से बात करता भी है.  

किन्तु मानव परंपरा में जीवन-ज्ञान के बिना यह सफल नहीं हो पाता.  जबकि सम्मान आदि मूल्यों को प्रमाणित होने की आवश्यकता मानव परंपरा में ही है.

प्रश्न- तो जीवन अशारीरिक अवस्था में भी आपस बात कर सकते हैं - किन्तु मानव परंपरा में शरीर के साथ आने पर में भ्रम में आ जाते हैं, क्या ऐसा है?
उत्तर- यह भ्रम और जागृति का बात है.  भ्रम और जागृति मानव परंपरा में ही प्रमाणित होता है और कहीं प्रमाणित होता नहीं।  जैसा दिव्य आत्मा को शरीर की जरूरत न होते हुए भी, यदि उनको प्रमाणित होना है तो मानव शरीर को चलाते हुए ही होंगे। 

मानव शरीर का केवल प्रयोजन है - जागृति प्रमाणित होना।  जीवन अपने जागृति को प्रमाणित करे, उस जगह में मानव जाति इस धरती पर अब तक आया नहीं है.  शरीर को ही सजाने धजने में ही यह पूरता नहीं है.  

जैसा - मैं शरीर छोड़ देता हूँ,  मुझे तीनों चेतना (मानव चेतना, देव चेतना, दिव्य चेतना) का ज्ञान है, किन्तु यदि  मुझे प्रमाणित होना है तो वह शरीर के द्वारा ही होगा। मुझे (जीवन स्वरूप में) अपने में संतुष्ट रहना हैतो मैं चुप रह सकता हूँ.  जीवन को काल की बाधा नहीं, दूरी की बाधा नहीं।   भौतिक वस्तु की बाधा है ही नहीं जीवन को.  शरीर छोड़ने के बाद जीवन को भौतिक वस्तु की जरूरत है ही नहीं।  यदि जीवन को प्रमाणित होना है तो उसको शरीर लेना आवश्यक है.  

उपकार प्रवृत्ति विकसित चेतना में होता ही है.  उपकार करने की उत्कंठा आ गई वो शरीर के द्वारा प्रकट होगा ही.  अपने स्वयं की तृप्ति को प्रकट करने के लिए.  

अभी हम जो कर रहे हैं किस बात के लिए कर रहे हैं? हमारे साथ जितने भी लोग प्राण दे रहे हैं, किसके लिए? स्वयं की तृप्ति के लिए.  अभी जो आप अपना अमूल्य समय लेकर आए हो, किसलिए? अपनी तृप्ति के लिए, संसार के साथ उपकार के लिए.  आपका इतना यात्रा  इसी दो शब्द में आता है.  गलत हो तो बताओ?
इसके अलावा कोई उद्देश्य ही नहीं बनता है.  अपने साथ अभी जितने भी हैं  - सभी इसी उद्देश्य से हैं.  कोई ज्यादा करते हैं कोई कम करते हैं.  

उपकार निरामय है.  किसी पर कोई भी एहसान नहीं है.   निरामय...आमय का मतलब है पाप, निरामय का मतलब है निष्पाप।  

प्रश्न: प्रकटन क्रम में परिवर्तन किस प्रकार होता गया है?

उत्तर:  जड़ संसार में  मात्रात्मक परिवर्तन के साथ गुणात्मक परिवर्तन।  जीवनी क्रम में  शरीर में मात्रात्मक परिवर्तन के साथ गुणात्मक परिवर्तन।  ऐसा होते होते मानव शरीर तक हम पहुँचते हैं.  

मानव शरीर को चलाते हुए जीवन शरीर के साथ तदाकार होकर रह गया, जीवन को अपने प्रमाणित करने की जगह आना चाहिए था - वह नहीं हुआ.  जीवन अपने जागृति के बारे में विस्मृत होता गया.  इसी का नाम है भ्रम। 
शरीर को जीवन समझ लिया।  शरीर के आकार में अपने आप को ढाल लिया और वहीं फँस गया.  इतना ही बात है.  

प्रश्न- तो जीवन जागृति में तदाकार-तद्रूप होने से रह गया?

उत्तर:  तदाकार-तद्रूप प्रक्रिया जीवन में ही होती है. शरीर के किसी अंग में यह प्रक्रिया नहीं होती।   इसी आधार पर जीवन ज्ञान होना बहुत जरूरी है.   विकास क्रम में ही शरीर रचना बनी है.   जीवन अपने जागृति को प्रमाणित करने योग्य शरीर बनते तक रचना क्रम है. जीवन भ्रमवश शरीर को जीवन मानना शुरू कर दिया है, वहीं से गिर पड़ा है.

जीवन और शरीर का स्पष्ट ज्ञान होना चाहिए।  शरीर विकास क्रम में है और जीवन जागृति क्रम से जागृति के लिए है.  जीवन या तो जागृत है या जागृति क्रम में है.  ये ज्ञान होना चाहिए।  

जागृति क्रम से  जागृति तक शिक्षा एक मात्र विधि है.  

जीवन के ज्ञान स्वरूपी साम्य ऊर्जा से तदाकार होने से, अपने आप से, उसमें शरीर से तदाकार होने वाली प्रवृत्ति खत्म हो जाती है.

ज्ञान को नापा-तौला या संख्याकरण नहीं किया जा सकता।  ज्ञान को टुकड़े करके तराजू में तोलेंगे - ऐसा व्यवस्था नहीं है.  ज्ञान का टुकड़ा होता नहीं, ज्ञान को बेचा नहीं जा सकता।  हर व्यक्ति के साथ ज्ञान प्रमाणित होता है.  इसलिए ज्ञान लोकव्यापीकरण करने के लिए वस्तु है.  धर्म (धर्म= सुखपूर्वक जीने की आशा) लोकव्यापीकरण करने के लिए वस्तु है.  इसलिए धर्म को रोज जीने का बात होता है ज्ञान पूर्वक रोज जीना होता है.  धर्मपूर्वक जीते हैं तो ज्ञान पूर्वक जीना होता है.  ज्ञान और धर्म अलग अलग हो ही नहीं सकता। 

ज्ञान में तदाकार होने पर जो शरीर की सीमा समझ में आ गई - उस मर्यादा का पालन करना होता है.  ज्ञान के अर्थ में शरीर का उपयोग करना होता है.  अभी भ्रम वश शरीर के अर्थ में जीवन का उपयोग हो रहा है.  कितना बड़ी भारी पूँजी कितना छोटा काम में लगकर के अपव्यय हो रहा है, आप सोच लो.  यदि ज्ञान में अनुभव होता है तो अपने आप से संवेदना नियंत्रित होगा कि नहीं होगा? अपने आप से होगा।  झकमारी है वो!  आराम से होने वाली बात है.

यदि व्यापक वस्तु समझ में आ गया, तो व्यापक वस्तु में हम तदाकार हो गए.  मनुष्य में व्यापक वस्तु ज्ञान कहलाया।  विकास क्रम, विकास, जागृति क्रम, जागृति...इसका ज्ञान हो गया.  ज्ञान होने से मानव स्वरूप में जीने का अधिकार बना.  इस ज्ञान के बिना मानव स्वरूप में कोई जीता नहीं है.  कल्पना की शक्ति जितना है उतना मानव जी लिया, लेकिन उतना पर्याप्त नहीं हुआ.  मानव की कल्पना में अभी सारा भ्रम बसा हुआ है. 

मानव में कल्पना शक्ति, कर्म स्वतन्त्रता की मदद किया।  इससे शरीर की अनुकूलता को डिज़ाइन किया।  उसमें विवश रहा.  इतना ही बात हुआ.  चार विषय, और पाँच संवेदनाएँ - इतने के अंदर ही वो रह गया.  इतने के अंदर द्वेष, अपना-पराया दूर होता नहीं है.  इन दोनों नियंत्रित होने के बाद ही मनुष्य एषणात्रय में काम करता है.  उपकार कर पाता है. पुत्तेष्णा, वित्तेष्णा, लोकेषणा सहित मानव संसार में उपकार करना शुरुआत करता है.  देव मानव में पुत्तेष्णा और वित्तेषणा शिथिल होता है और लोकेषणा प्रधान होता है.  तीनों एषणाएँ शिथिल होते हुए उपकार प्रबल हो जाता है- दिव्य मानव में.  इतना ही बात है.  

- दिसंबर २००८, अमरकंटक

जीवन शरीर सत्ता - भाग १




विकास क्रम में प्रत्येक परमाणु अंश भी दूसरे परमाणु अंश को पहचान करके वो व्यवस्था में भागीदारी करते हैं.

जैसे - दो अंश के परमाणु में,मध्य में एक अंश रहता है उसके चारों तरफ दूसरा अंश चक्कर लगाता रहता है. उस परमाणु का आचरण निश्चित होता है. उसी प्रकार से सभी परमाणुओं का आचरण निश्चित है.  ये सब परमाणु विकास क्रम में पाये जाते हैं.

यही परमाणुएँ निश्चित गठन पूर्वक समर्थ होने के बाद रासायनिक क्रिया को शुरू करते हैं. वो अपने आप में स्वयं स्फूर्त विधि से रासायनिक क्रियाओं में उद्यत होते हैं. फलस्वरूप  रसायन बनता है.  

रसायन के बाद प्राणकोशा इसी स्वयं स्फूर्त विधि से बनता है.  प्राणकोषाएं जब साँस लेना शुरू करते हैं तब उनमें अपने आप रचना विधि आ जाता है. कोई इंजीनियर के डिज़ाइन की जरूरत नहीं है, इसके लिए - यह अपने आप आता है.  फिर रचना विधि में स्वयं स्फूर्त उत्तरोत्तर विकास होता जाता है.  यह वैसे ही है - जैसे एक आदमी ने खोली (कमरा) बनाया।  उसको सफलता पूर्वक बनाने के बाद उसे उससे अच्छा बनाना अपने आप से आ गया. इस क्रम से चलते चलते 275 मंजिल कीअट्टालिका उससे बनाना बन गया.  

इस तरह भौतिक-रासायनिक संसार पूरा "विकास क्रम" में है.  

जीवन एक गठन पूर्ण परमाणु है - जो "विकास" की स्थिति है.   "जागृति क्रम" में एक जीवनी क्रम होता है, जहाँ जीवों में, शरीर रचना (वंश) के अनुसार जीवन शरीर को चलाता है.  यह गरीबी है जीव-संसार में.  क्योंकि यहाँ अक्षय और अमर जीवन शक्तियाँ क्षयशील और मरणशील शरीर के अनुसार काम करती हैं.  मानव भी समझदारी से पहले इसी गरीबी में है - और भ्रमवश मनुष्येत्तर संसार पर शासन करने गया, इनके साथ जीना सीखा नहीं।  इतना ही बात है|

मानव में जीवों की तुलना में कर्म स्वतन्त्रता और कल्पनाशीलता  की बात जुड़ गया.  मन:स्वस्थता के बिना कल्पनाशीलता की तृप्ति बिन्दु मिलती नहीं।  कल्पनाशीलता के सहारे मानव ने कर्मस्वतन्त्रता का प्रयोग किया।  किन्तु कल्पनाशीलता का तृप्ति बिंदु को नहीं पहचाना।  कल्पनाशीलता की तृप्ति बिंदु है समाधान।  समाधान समझदारी से होता है.  समझदारी है - सह अस्तित्व रूपी अस्तित्व दर्शन ज्ञान - विकास क्रम, विकास, जागृति क्रम जागृति - ये चारों भाग समझ में आना. किसमें? व्यापक वस्तु में. व्यापक वस्तु आधार है - उसको भुलवा नहीं देना।

प्रश्न- जीवनी क्रम में जीवन का क्या कार्यरूप होता है? 

उत्तर- हर जीवन अपने में एक पुँजाकार बनाता है - वो एक आकार है, उस आकार का एक शरीर मिलता है जिसको वो चलाता है.  इतना ही सिद्धान्त है.  हर जीवन एक ही आकार में पुँजाकार बनाना है, ऐसा कोई विधा नहीं। जीवन का जो आकार बनाने का जो कार्य है वो जीने के आशा के आधार पर होता है.  गठन पूर्णता के साथ ही जीवन में जीने की आशा, और जीने की आशा के अनुरूप पूँजाकार। बस इतना ही है.

प्रश्न- अगर मान लो जीवन के पुँजाकार के अनुसार शरीर रचना धरती पर तब तक तैयार नहीं हुई हो तो?

उत्तर-  उसके तैयार होने तक जीवन इंतजार करता रहता है.  जीवन के लिए समय का बाधा नहीं। दूरी की बाधा नहीं है. शरीर के लिए दूरी की बाधा है, समय की बाधा है. 

प्रश्न- जीवन के लिए कोई समय की बाधा नहीं है, इसका मतलब क्या हुआ?

उत्तर-  समय जो हम गिनते हैं,  एक दो सेकंड, मिनट, घंटा, दिन, महीने...  जीवन के लिए वह कोई बाधा नहीं है - क्योंकि जीवन अमर है और अक्षय है.   समय का मानव जीवन और शरीर के संयुक्त रूप में उपयोग जो करता है, वो ठीक है.  लेकिन भ्रम में मानव इस बारे में अज्ञात रहता है कि जीवन ही इसको उपयोग कर रहा है. भ्रम पर्यन्त जीवन स्वयं को शरीर माना रहता है.   जबकि शरीर केवल चमड़े का खोल मात्र है.  शरीर जीवन नहीं है.  शरीर जीवन का साधन है.  

- दिसंबर २००८, अमरकंटक

नित्य वर्तमानता



जीवन विद्या राष्ट्रीय सम्मलेन २००६, कानपुर


Saturday, July 2, 2016

यथास्थिति से अनुभव तक


"तृप्ति बिंदु तक पहुंचे नहीं हैं, तृप्ति बिंदु के लिए कोई रास्ता चाहिए" - यहाँ से हम शुरू करते है.  "तृप्ति कहाँ है?" - ढूँढ़ते हुए यह प्रस्ताव सामने आता है, उसको हम जांचना शुरू करते हैं.  इसको जांचने के क्रम में वरीयता (प्राथमिकता) समाधान-समृद्धि के पक्ष में हो जाती है, बाकी सब secondary हो जाता है.  वरीयता को बनाये रखने के लिए फिर हम मे प्रयत्न शुरू हो जाता है.  यह प्रयत्न एक दिन पूर्णता तक पहुँच जाता है.  

प्रौढ़अवस्था में पहुँचने के बाद वरीयता को लेकर निष्कर्ष निकालना स्व-निरीक्षण विधि से ही होता है.  बाल्यकाल में मार्गदर्शन विधि से होता है.  

प्रश्न: प्रौढ़ अवस्था में क्या परेशानी है? 

प्रौढ़ व्यक्ति पहले से अपने को समझदार माना रहता है - यह उसकी परेशानी है. 

प्रश्न: स्वनिरीक्षण कैसे होता है?

अभी तक हम जैसे जी रहे हैं उससे हमको तृप्ति हो रहा है या नहीं इसका निरीक्षण।  यदि तृप्ति मिल गया है, तो उसी को किया जाए.  यदि तृप्ति नहीं मिला है तो हमको और कुछ समझने की ज़रुरत है, यह निष्कर्ष निकलता है.  तब यह प्रस्ताव सामने आता है. 

स्वनिरीक्षण ही आधार है, मानव में समझ के लिए प्रयास उदय होने के लिए.  दबाव या आरोप से यह नहीं निकलता।

इस क्रम में - चर्चा में, सूचना में और तर्क में यह आता है - "अभी हम सुविधा-संग्रह के लिए काम कर रहे हैं, जिसका  कोई तृप्ति-बिंदु ही नहीं है."  सूचना के आधार पर स्व निरीक्षण पूर्वक यह निष्कर्ष निकल जाता है.  फिर समझदारी को परिपूर्ण करने की प्रवृत्ति होती है. "तृप्ति बिंदु कहाँ है?" - वहाँ पहुँचने के लिए सोच शुरू हो जाती है. हम यहाँ से कैसे निकलें - यह सोच शुरू हो जाती है.  तृप्ति को लेकर समझ की सूचना प्रस्ताव के रूप में फिर मिलती है.

कैसे निकलें - यह लोगों की अलग-अलग परिस्थिति अनुसार उनका अलग-अलग फॉर्मेट होगा, लेकिन सभी में साम्य बात होगी - अध्ययन विधि।

अध्ययन का स्त्रोत (प्रमाणित व्यक्ति) और अध्ययन की इच्छा (जिज्ञासु विद्यार्थी) - ये दोनों मिलने से स्पष्ट हो जाता है कि मानव के जीने का लक्ष्य क्या है, मानव के जीने का सही तौर तरीका क्या है, वैसे जीने के फल-परिणाम क्या है.  इस तरह स्वयं में वरीयता (प्राथमिकता) बन जाती है कि हमको समाधान-समृद्धि पूर्वक जीना है.

प्रश्न: आज की स्थिति में मैं नौकरी कर रहा हूँ, इस प्रस्ताव को सुनने पर वह मुझे "गलत" लगता है.  क्योंकि मुझे लगता है - मैं अव्यवस्था में भागीदार हूँ... 

उत्तर:  उसको अभी "गलत" या "सही" मत ठहराओ।  यह पूरा नहीं पड़ रहा है - इतना रखो.  तृप्ति के लिए क्या हो सकता है, इसके लिए आपके पास सूचना आया - समाधान-समृद्धि पूर्वक तृप्ति हो सकती है, जिसके लिए दर्शन का अध्ययन पूर्वक ज्ञान-विवेक-विज्ञान संपन्न होना आवश्यक है.

अध्ययन से अनुभव पूर्वक ज्ञान-विवेक-विज्ञान स्पष्ट हो जाता है. ज्ञान-विवेक-विज्ञान को जीने का डिज़ाइन समाधान-समृद्धि स्वरूप में  मानवीयता पूर्ण आचरण स्पष्ट हो जाता है.  उसको प्रमाणित करने के लिए अखण्ड समाज और सार्वभौम व्यवस्था का स्वरूप स्पष्ट हो जाता है.  उसको लोकव्यापीकरण करने के लिए शिक्षा विधि स्पष्ट हो जाती है.  इसको आचरण करने पर तृप्त रहना बन जाता है, समाधानित रहना बन जाता है, समृद्ध रहना बन जाता है.

प्रश्न:  आप कहते हैं अनुभव से पहले मानव में सही जीने का डिज़ाइन ही नहीं बनता।  तो क्या आप यह कह रहे हैं कि मैं नौकरी करते-करते अध्ययन करता रहूँ और फिर अनुभव करूँ और फिर जीने का डिज़ाइन बनाऊं?

नहीं।  इसमें थोड़ा और सोचने की ज़रूरत है.  आप जहाँ हैं वहाँ रहते हुए इस बात का पठन तो कर ही सकते हैं.  फिर उसके बाद समझने की बात आती है.  अध्ययन विधि से आप वहाँ रहते हुए साक्षात्कार-बोध तक पहुँच सकते हैं, पर अनुभव बिंदु छुटा रहेगा।  अनुभव हुआ तो वह नौकरी वाला स्वरूप रहेगा नहीं।

प्रश्न:  अनुभव बिंदु कब तक छुटा रहेगा?

जब तक आपमें अनुभव की आवश्यकता सबसे प्राथमिक न हो जाए, और जब तक जिन साधनों को जोड़ने के लिए आप नौकरी करने निकले थे - वह पूरी न हो जाए तब तक.  नौकरी छूटने पर आप अनुभव करने के योग्य हो गए क्योंकि नौकरी में रहते हुए अध्ययन पूर्वक आप अनुभव के दरवाजे पर आ चुके होंगे।  अनुभव होने के बाद प्रमाणित होना ही बनता है.

अनुभव के लिए हममे अपेक्षा और साधनों को लेकर हमारी अपेक्षा इन दोनों के बीच में दूरी समाप्त हो जाने पर (यानि अध्ययन को पूरा कर लेने के बाद और साधनों को प्राप्त कर लेने के बाद) अनुभव होता है.  इसका कारण है - हम अभी तक जैसा जीने के तरीके को अच्छा मान लिए हैं, जब उसके लिए आवश्यक साधनों के निकटवर्ती स्थिति तक हम पहुँच जाएँ, तभी उसको लेकर जो हम नौकरी आदि उपक्रम किये, उससे हम मुक्त हो सकते हैं.





अभी जो बताया इस ओर चलने से अनुभव प्रमाण की वरीयता और आवश्यकता हम में बलवती होती जाती है.  बोध होते तक अनुभव प्रमाण की वरीयता सर्वोपरि होकर स्थिर हो जाती है.  तब तक साधनों को जमा करने को लेकर ९०% तक हमको वह अजीर्ण (जरूरत से ज्यादा) हो गया है, ऐसा लगने लगता है.  हमारा ही मन है, साधनों को 'ज्यादा है' मानना - हमारा ही मन है उनको 'कम है' मानना।  फिर अनुभव होने के बाद जो साहस बन जाता है उससे फिर हम रुक ही नहीं सकते।

प्रश्न:  यह एक शरीर यात्रा की बात है या अनेक शरीर यात्राओं की?  

एक ही शरीर यात्रा में समझ, एक ही शरीर यात्रा में समृद्धि, एक ही शरीर यात्रा में प्रमाण।

इन सब बातों को सोच करके हमको इस रास्ते पर चलने के लिए अपनी तैयारी बनाने की ज़रूरत है.  यह भी बात सही है - यह बात स्वयं में प्रवेश होने पर, या साक्षात्कार होने पर यह एक दिन अनुभव तक पहुँचता ही है.   अनुभव होने के बाद उससे पहले जो हम भ्रम-वश वरीयता क्रम बनाये थे - वह ध्वस्त होता ही है.  इस सब को ध्यान में रखते हुए आप निर्णय लो.  ताकि "हम ऐसा नहीं समझे थे, तैसा नहीं समझे थे" - इस प्रकार के आरोप-प्रत्यारोप न हों.  अच्छी तरह से सोच के, अच्छी तरह से समझ के, अच्छी तरह से निर्धारित करके, अनुभव करके अपनी प्रतिबद्धता को स्थिर बनाया जाए.

समाधान से यदि हम भली प्रकार से संपन्न हो जाते हैं तो समृद्धि अपने-आप भावी हो जाती है.   समृद्धि के लिए हज़ार रास्ते रखे हैं.

समझदारी हासिल करने में समय लगता है.  साक्षात्कार होने तक.  दस तरह की चीजों में हमारा ध्यान बंटा रहता है, इसके लिए पूरा समय दे नहीं पाते हैं.  इसलिए धीरे-धीरे होगा, कोई आपत्ति नहीं है.  किन्तु साक्षात्कार के बाद यह रुकेगा नहीं।  साक्षात्कार होगा तो बोध होगा ही, अनुभव होगा ही, अनुभव प्रमाण होगा ही.  दूसरा कुछ होता ही नहीं है.


- जनवरी २००७, अमरकंटक (श्री ए नागराज के साथ संवाद पर आधारित)