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Friday, December 21, 2012

भ्रम पर्यन्त जीवन की शरीर यात्राओं का स्वरूप


शरीर यात्रा में "सीमित सुख" और "सीमित दुःख" को भोगा जा सकता है।  शरीर यात्रा में जितना भोगा जा सके, उससे ज्यादा "सुख" या "दुःख" का कारण मानव तैयार किया हो सकता है।  दो शरीर यात्राओं के बीच की अवधि का उपयोग जीवन उस शेष "सुख" या "दुःख" को भोगने के लिए करता है।  अपनी "प्रवृत्ति" के अनुकूल परिस्थिति को पहचानने की बात हर जीवन में रहती है, उसके अनुसार वह अगली शरीर-यात्रा शुरू करता है।

जागृति की ओर प्रवृत्ति होने के बाद पीढी से पीढी और अच्छा होने का क्रम बन जाता है।  अंततोगत्वा चेतना-विकास के दरवाजे में आ जाते हैं।  एक बार चेतना विकास की स्वीकृति होने पर अगली शरीर-यात्रा में वह और  पुष्ट होता है।

- श्री ए नागराज के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त 2006, अमरकंटक)

अनुभव शिविर 2007 - भाग 3


विगत के अध्ययन से जो सार्थक मिला है, उसको परंपरा में लाया जाए।  विगत की जो निरर्थकता है, उसकी कड़ी भाषा से समीक्षा हो।  

अनुभव शिविर 2007 - भाग 1


Friday, December 14, 2012

जीवन विद्या एक परिचय (ऑडियो)



"जीवन विद्या एक परिचय" (ऑडियो) प्रस्तुत है।  1997 में की गई यह रिकॉर्डिंग एक पुस्तक के स्वरूप में भी उपलब्ध है।

English Translation of "Jeevan Vidya - Ek Parichaya" is at the following link

Wednesday, December 12, 2012

पुनः अनुसन्धान की आवश्यकता क्यों ? (Important)



श्री नागराज के साथ जीवन विद्या राष्ट्रीय सम्मलेन, बांदा (अक्टूबर 2010) में आये लोगों के साथ संवाद।

Friday, December 7, 2012

Wednesday, December 5, 2012

अनुभव तभी होता है, जब बोध सही हो!


श्री नागराज के साथ प्रवीण और आतिशी का संवाद (दिसम्बर 2008, अमरकंटक)

Saturday, December 1, 2012

संयम काल में अध्ययन - (very important)



- श्री ए नागराज के साथ प्रवीण और आतिशी के संवाद पर आधारित (जुलाई 2010, अमरकंटक)

कारण गुण गणित


- श्री ए नागराज के साथ प्रवीण और आतिशी के संवाद पर आधारित (जुलाई 2010, अमरकंटक)