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Tuesday, December 23, 2008

सुविधा-संग्रह या समाधान-समृद्धि

मध्यस्थ-दर्शन का प्रस्ताव सुनना, सुनने में सहमत होना - यह पहली बात है।

समझने की कोशिश करना - यह दूसरी बात है।

समझ में आने के क्रम में जीने की इच्छा - यह तीसरी बात है।

इस प्रस्ताव को जीने की इच्छा के क्रम में आप पाते हैं - जो आपने पहले से design बनाया है जीने का, उसमें यह समाता नहीं है। आप जो पहले से design बना कर रखे हैं, वह सुविधा-संग्रह के खाके में ही किए हैं। अब आपको समाधान-समृद्धि के खाके में शिफ्ट होना है। इतना ही key point है। और इसमें कुछ भी नही है। मैंने इसको खूब छू-छू कर देख लिया है। इसमें और कोई पुराण-पंचांग नहीं है।

समाधान-समृद्धि चाहिए? या सुविधा-संग्रह चाहिए? यह हमको निर्णय करना होगा। दोनों का डिजाईन अलग-अलग है। दोनों का कोई मेल नहीं है।

समाधान-समृद्धि पूर्वक जिए बिना न्याय करना तो सम्भव नहीं है।

आज की स्थिति में, हम अपने साथ में रहने वाले लोगों की अपेक्षाओं को ध्यान में रखते हुए, सुविधा संग्रह के लक्ष्य से क्या कर सकते हैं - वह डिजाईन हम बना कर रखते हैं। उसी पर चल रहे हैं। यह स्थिति आज सब के साथ है। इस डिजाईन के साथ संतुष्टि-असंतुष्टि दोनों रहती है। स्वयं में कुछ भाग से संतुष्टि रहती है, कुछ भाग से असंतुष्टि रहती है। इस ढंग से जीव-चेतना में जीता हुआ मनुष्य ५१% फ़िर भी सही रहता है। बिना कुछ पढ़े, अध्ययन किए - यह बात रहता है। स्वयं में ५१% से कम सही-पन को स्वीकार बिना आदमी में जीने की कोई तमन्ना ही नहीं रहती। मनोविज्ञान का यह एक fulcrum point है। जीने की आशा बने रहना जीवन की अनूस्युत क्रिया है। जब जीवन स्वयं में सहीपन को ५१% से कम होना स्वीकार लेता है, तब जीने की आशा के विपरीत कार्य करना बन जाता है।

सही-पन को लेकर जो खाका भरना है - उसके लिए मध्यस्थ-दर्शन का प्रस्ताव है। सही-पन का स्वागत जीवन में बना ही है। हम जो गलती को सही मान कर उसे भरते हैं, वह temporary ही होता है। हर दिन के लिए वह भरता नहीं है। सही-पन की स्वयं में रिक्तता सही-पन से ही भरने पर वह शाश्वत हो जाता है।

प्रश्न: सही-पन को सोचने का आधार क्या है?

उत्तर: सह-अस्तित्व ही सही-पन को सोचने का आधार है। दूसरा कोई आधार नहीं है। सह-अस्तित्व समझ आने से शनै-शनै पिछला उखड़ता है। समझदारी आने पर हम संकट और संकट-मुक्ति के दृष्टा बन जाते हैं। दूसरे शब्दों में भ्रान्ति और जागृति के दृष्टा बन जाते हैं। यही भ्रांत-अभ्रांत अवस्था है। क्योंकि चाहत हमारी जागृति की ही है - इसलिए समझने के बाद जागृति का ही वरण होता है।

सहीपन की गरिमा गलती को सदा-सदा के लिए उन्मूलन करने के रूप में है। गलती से घबराने के रूप में नहीं है। समझदारी आने पर भ्रम-उन्मूलन होता ही है। इसके साथ अपने-पराये का दीवार समाप्त हो जाता है। मानव के साथ हम सर्व-शुभ के लिए सोचने योग्य हो जाते हैं। सर्व-शुभ के साथ जीने की आशा जब पैदा हो जाता है, तब हमारा उस सही-पन को लेकर हर कार्य फलवती होने लगता है। इससे हमारे समाधान-समृद्धि पूर्वक जीने में मदद हो जाती है। हम सही-पन को लेकर जो प्रयास करते हैं, वे फलवती होते हैं - उससे हमारा उत्साह बनता है। उत्साह भी होना बहुत ज़रूरी है।

हमें सच्चाई चाहिए - यह चाहत समझ में आने के साथ जितना उत्साह होना है, होता ही है।
हमें सही पन समझ में आने के बाद प्रमाणित होने के लिए उत्साहित होना होता ही है।
सहीपन के प्रमाणित होने के क्रम में फलवती होने के आधार पर उत्साहित रहना होता ही है।

यह एक से एक जुडी हुई प्रभाव-शाली परिनितियाँ हैं। यह जो उत्साह है - वह नकारात्मक फलों से मनायी जाने वाली खुशियों से बिल्कुल भिन्न है। वह उत्साह सदा रहता नहीं है। ठंडा पड़ जाता है। गलती करके होने वाला उत्साह ईर्ष्या-द्वेष के साथ ही होता है - फलतः वह हमेशा रहता नहीं है।

सकारात्मक उत्सव निरंतरता को प्राप्त कर लेते हैं। सदा-सदा के लिए उत्सव! सदा-सदा हम सहीपन का काम कर पाते हैं - जिसका सही फल-परिणाम मिलता रहता है। स्वाभाविक रूप में!

हर मानव सहीपन को समझने योग्य है।
हर मानव सहीपन को प्रयोग करने योग्य है।
हर मानव सहीपन को प्रमाणित करने योग्य है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक)

मानवीयता पूर्ण आचरण

प्रश्न: मानवीयता पूर्ण आचरण क्यों नहीं कर पाते हैं?

उत्तर: सुविधा-संग्रह और भक्ति-विरक्ति लक्ष्य के साथ मानवीयता पूर्ण आचरण प्रमाणित नहीं हो सकता। सुविधा-संग्रह को आप लक्ष्य में रखें, और ज्ञान-विवेक-विज्ञान प्रमाणित हो जाए - ऐसा हो नहीं सकता। सुविधा-संग्रह के स्थान पर समाधान-समृद्धि लक्ष्य बना कर प्रयत्न करने से मानवीयता पूर्ण आचरण प्रमाणित हो जायेगा।

समाधान-समृद्धि लक्ष्य में से समाधान वरीय है। समाधान लक्ष्य के लिए ज्ञान-विवेक-विज्ञान को लेकर स्पष्ट होना है। ये तीनो भाग जब स्पष्टतः अध्ययन होता है - तब मानवीयता पूर्ण आचरण के प्रति विश्वास होने लगता है। आचरण के प्रति विश्वास होता है - तो हम आचरण करते ही हैं। आचरण करने लगते हैं - तो समाधान-समृद्धि की तरफ़ ही जायेंगे। मानव के अध्ययन और अस्तित्व के इस प्रस्ताव के अध्ययन पूर्वक समझ आने पर आप जीने जाते हैं तो मानवीयता पूर्ण आचरण ही होगा, समाधान-समृद्धि ही प्रमाणित होगी। समझने के बाद यही होता है।

पहले मैं भक्ति-विरक्ति के पक्ष में ही था। भक्ति-विरक्ति विधि से ही मैंने साधना किया। साधना के फल-स्वरूप जीवन समझ में आया, मानव समझ में आया, अस्तित्व सह-अस्तित्व स्वरूप में समझ में आया - इस सब के अनुसार मानव के अनुरूप जीने की बात सोची - तो मानवीयता पूर्ण आचरण का ही स्वरूप निकला। अनुभव पूर्वक मैं समाधान-संपन्न तो हो चुका था - उसमें श्रम पूर्वक मैंने समृद्धि को जोड़ लिया। समाधान-संपन्न होने के बाद समृद्धि को जोड़ने के लिए मुझे बहुत दिन बरबाद नहीं करना पड़ा। इस तरह बहुत अच्छी तरह जीने की सभी परिकल्पनाएं पूरी हो गयी।

"अच्छी तरह जीने" की परिकल्पनाएं बहुत रही हैं - भक्तिवादी विधि से भी, और भौतिकवादी विधि से भी। पर "अच्छा आदमी" क्या है? - यह न भौतिकवादी विधि से तय हुआ, न भक्तिवादी विधि से हुआ। न भक्ति से, न विरक्ति से, न सुविधा से, न संग्रह से। खूब सुविधा का जुगाड़ कर लें - तो हम अच्छे हो जायेंगे, यह नहीं प्रमाणित हुआ। हम इतना संग्रह कर लें तो अच्छे आदमी हो जायेंगे - यह भी नहीं निकला। जब भक्ति-विरक्ति से नहीं निकला, तो सुविधा-संग्रह से क्या निकलना है? इन दोनों आधारों से जब कुछ उपलब्धि नहीं निकला तो मानव अपने मनमानी रास्ते बनाता रहा। मनमानी विधि से भक्ति-विरक्ति और सुविधा-संग्रह लक्ष्यों को लेकर चलता रहा। वह सार्थक नहीं हुआ। फ़िर "न्यूनतम सुविधा" और "प्राथमिक आवश्यकता" (minimum facilities, primary needs) जैसी भाषाएँ लगाने लगे। इनका कोई निश्चित आकार-प्रकार नहीं बनता। सुविधा-संग्रह का न्यूनतम और अधिकतम का कोई मतलब नहीं निकलता। जितनी सीमा बनाते हैं, उससे अधिक ही चाहिए। इस ढंग से हम भटक गए हैं।

भटके हुए को मार्ग पर लाने की विधि यही है - हम प्रयत्न करके अपनी समझदारी को पूरा करें। अध्ययन करने पर, अनुभव होने पर - समझदारी पूरा हो जाता है। अध्ययन से अनुभव का रास्ता बनता ही है। अनुभव मूलक विधि से जब हम सोचते हैं तो सर्वतोमुखी समाधान आ ही जाता है। उसके आधार पर समृद्धि को प्रमाणित करना बनता ही है। समृद्धि पूर्णतया उपकारी है। अपने बलबूते पर जब समृद्धि को पा लेते हैं - तो उपकार के अलावा कुछ और करना बनता ही नहीं है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक)

Thursday, December 18, 2008

अध्ययन का महत्त्व और अध्ययन की वस्तु - सम्मलेन २००५, मसूरी


अध्ययन के मुद्दे पर जो मैंने अनुभव किया है - अक्षर, शब्दों, वाक्यों को पढ़ना अध्ययन नहीं है। यह पूरा का पूरा "पठन" ही कहलाया। मैंने ऐसे परिवार में शरीर यात्रा शुरू की, जिसमें लाखों वैदिक ऋचाओं को मुखस्थ कर, वापस बोल कर दिखाए हैं। लाखों ऋचाओं को! इससे ज्यादा कुछ कहा नहीं जा सकता। ये सब करने के बावजूद इससे हम सर्व-मानव के शुभ के लिए एक सूत्र भी प्रस्तुत नहीं कर पाये। इसी कष्ट को मिटाने के लिए मैंने ५० वर्ष अपना सारा प्रयत्न किया। थोड़ा समय इसमें जरूर लगाए - ५० वर्ष मैंने इसमें लगाया! इन ५० वर्ष का जो अनुभव है, वह मैं आप के सामने रखने जा रहा हूँ।

हर शब्द का अर्थ होता है - किसी भी भाषा में हो! संसार में अनेक भाषाएँ तैयार हुआ है। संसार की सभी भाषाओँ के मूल में अर्थ निकालने जाएँ तो यही है कि - "सत्य भासना चाहिए"। सच्चाई दूसरों तक पहुंचना चाहिए। दूसरों के अन्तःकरण में सच्चाई प्रवेश होना चाहिए। यह बात "भाषा" के अर्थ में हमको इंगित होता है। यह अपेक्षा सब में है। कोई भाषा मैं आपसे सुनूंगा तो कोई सच्चाई मुझे मालूम होगा - ऐसा मेरी अपेक्षा है। मुझसे कोई दूसरा भाषा सुनेगा तो उसकी भी यही अपेक्षा होगी कि कोई सच्चाई मुझसे उसको सुनने को मिलेगा। यह बात सबमें समान है। इसी आधार पर सारे वेदों की रचना हुई। तीनो वेद सच्चाई को बताने के लिए प्रतिज्ञा लिया। सच्चाई के बारे में अंत में बताया कि सच्चाई अव्यक्त है, अनिर्वचनीय है। अनिर्वचनीय मतलब - शब्दों से जिसको बताया नहीं जा सकता। यह मेरे कष्ट का कारण हुआ। और सबके लिए यह कष्ट का कारण हुआ या नहीं - यह मैं नहीं कह सकता। मेरे लिए यह तकलीफ का कारण हुआ। सत्य भी हो, सच्चाई भी हो - पर अव्यक्त भी हो, अनिर्वचनीय भी हो - तो बाकी वचनीय क्या हुआ? इस तरह - वचनीय सब मिथ्या हो गया? इसी तकलीफ को दूर करने के लिए मैंने प्रयत्न किया।

उस प्रयत्न में मैं अपने को सफल मानता हूँ।

मेरे सफल हो जाने मात्र से यह सबके लिए सफल होगा या नहीं होगा - इस बात को मैं आज नहीं कह सकता। मैं जो अनुभव किया हूँ उसको मैं विनय ही कर सकता हूँ। उसको समझना हर व्यक्ति की जिम्मेवारी है। और उस जिम्मेवारी के साथ रखी है - स्वतंत्रता। चाहे समझें, या न समझें। किंतु इस बात की मुझ में स्वीकृति है - मैंने जो पता लगाया है उसमें सच्चाई को बांस पे चढ़ कर, चिल्ला कर बोला जा सकता है - अच्छे से! और सच्चाई एक से दूसरे को समझ में आयेगी! ऐसा मेरा विश्वास है। यहाँ से मैं शुरू किया हूँ।

इसी आधार पर अध्ययन के मुद्दे पर आपको इंगित करना चाहा - "हर शब्द का अर्थ होता है।" वह अर्थ शब्द नहीं है। अर्थ मनुष्य को समझ में आता है। दूसरे किसी को समझ में आएगा नहीं। पत्थर को हम बोलेंगे - वह समझेगा नहीं। शब्द का प्रभाव पत्थर पर भी होता है। वनस्पतियों पर भी होता है। जानवरों पर भी होता है। मनुष्य पर भी होता है। मनुष्य पर होने के बाद उसका अर्थ खोजने की इच्छा मनुष्य में बनी हुई है। हर मनुष्य में कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता प्रभावशील है। आज पैदा हुए बच्चे में भी, और कल मर जाने वाले बुड्ढे में भी यह प्रभावशील है। कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता - इसी के आधार पर हर मनुष्य में कहे गए शब्द के अर्थ तक पहुँचने की इच्छा बनी हुई है। यही एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को अध्ययन कराने का स्त्रोत है। सर्वप्रथम मनुष्य में अध्ययन करने का स्त्रोत बना है कि नहीं यह सोचना मेरा दायित्व था। उसमें पता लगा - हर व्यक्ति में यह पूंजी रखी हुई है। क्या पूंजी? कुछ भी सुनेगा तो पूछेगा - इसका मतलब क्या है? इस ओर जाने का अधिकार सबमें रखा है। सर्व-मानव में रखी हुई इस कल्पनाशीलता कर्म-स्वतंत्रता की पूंजी को समझ करके ही मैंने अध्ययन होने पर विश्वास किया।

"सह-अस्तित्व परम सत्य है।" - जैसे यह अध्ययन का एक मुद्दा है। "परम सत्य" का मतलब क्या होता है? सत्य वही है जो निरंतर और एक सा बना रहता है। होने के रूप में व्यापक है और अनंत एक-एक वस्तुएं हैं। कभी भी व्यापक वस्तु से एक-एक वस्तुएं अलग-अलग हो नहीं सकते। अलग होने की सम्भावना नहीं है। अलग होने का तौर-तरीका अस्तित्व में नहीं है। प्राकृतिक रूप में भी नहीं है, और अप्राकृतिक रूप में जो मनुष्य प्रयत्न करता है, वैसे भी नहीं है। न हों सकता है, न अभी तक हुआ है। इस तरह मनुष्य सह-अस्तित्व को परम-सत्य के स्वरूप में समझ कर, सह-अस्तित्व में व्यवस्था को पहचानता है। मनुष्य ने जितनी भी सह-अस्तित्व विरोधी कार्य किया, स्वयं समस्या में फंस गया।

समस्या में फँसना मनुष्य के दुःख का कारण हुआ। इसके लिए अध्ययन के लिए सूत्र दिया:

समस्या = दुःख
समाधान = सुख = मानव धर्म

दुःख से पीड़ा होता है। पीड़ित व्यक्ति स्वयं में स्वस्थ रहता नहीं है, दूसरों का उपकार तो स्वप्न में भी नहीं। पीड़ित आदमी केवल दूसरों के लिए परेशानी पैदा करेगा। और कुछ नहीं करेगा। यह आप को भी समझ में आता है, मुझ को भी समझ में आता है।

यह समझने के बाद हम अनुमान कर सकते हैं - "स्वस्थ आदमी स्वयम भी स्वस्थ रहता है, दूसरों को स्वस्थता देने का प्रयत्न भी करता है।" भले ही यह आज संसार में प्रचलित न हों, हम इस बात को अनुमान रूप में तो स्वीकार कर ही सकते हैं। स्वस्थ आदमी स्वयं स्वस्थ रहता है, और संसार को स्वस्थ करने के लिए हाथ-पैर मारता ही है - चाहे सफल हों, या असफल हों! आज तक के "अच्छे" आदमीयों के हाथ-पैर मारने को मैंने इस रूप में निकाल लिया। बहुत अच्छे आदमी संसार को उपकार करने के लिए कहीं न कहीं कोशिश किया है। इन कोशिशों में कोई कमी नहीं, उन पर कोई शंका नहीं, कोई कृपणता नहीं - पर सफलता का आंकलन करने जाते हैं, तो हमको पता लगता है - ये सफल नहीं हों पाये। क्यों सफल नहीं हों पाये, यह पूछने पर पता चलता है - "उपकार क्या है?" यह ध्रुवीकृत नहीं हुआ।

अभी हम जो अध्ययन करते हैं - उसमें पहले यह ध्रुवीकृत होता है कि उपकार क्या है? समझे हुए को समझाना है - पहला उपकार। सीखे हुए को सिखाना है - दूसरा उपकार। किए हुए को कराना है - तीसरा उपकार। इसमें से सीखने-सिखाने और करने-कराने के बारे में आदमी बहुत कुछ किया है। पर समझने-समझाने का भाग अधूरा रह गया। इसका कारण यह रहा - वैदिक विचार से लेकर भौतिकवादी विचार तक हम यह मान कर चले हैं कि "करके समझो!" इस बात को अच्छी तरह से ह्रदय में बैठाने की बात है - क्योंकि यह मूल मुद्दा है। मनुष्य-जाति आदि काल से "करके समझो" विधि से चला है। जबकि मानव-जाति में करके समझना नहीं होता। जीव-जानवरों में करके चलने की बात होती है। करके जीव-जानवर समझते नहीं हैं, केवल चलते हैं। हर काम को पीछे जीव (वंश) में जैसे किया था, वैसे ही करके चलता है। मनुष्य को जब "करके समझो" कहा गया - तो उससे करके करना ही बना, समझना नहीं बना। सीखे हुए से केवल सीखा हुआ ही रहा - समझ कोई उससे पैदा हुई नहीं। किए हुए से करता ही रहा - समझ उससे कोई पैदा हुई नहीं।

"समझ" क्या चीज है - यह अभी तक (मध्यस्थ-दर्शन के अनुसंधान से पहले) ध्रुवीकृत नहीं हुआ।

"समझ" क्या चीज है? - इसका उत्तर मध्यस्थ-दर्शन से ६ बिन्दुओं में है।

नियम, नियंत्रण, संतुलन, न्याय, धर्म, और सत्य।

पूरा समझ इन ६ बिन्दुओं से इंगित है। इससे अधिक समझ हो नहीं सकती, इससे कम में आदमी उपकारी तो नहीं होगा। इसको मैंने अच्छी तरह से जाँचा है, जी कर देखा है। आदमी को इन ६ मुद्दों में पारंगत होने की आवश्यकता है। इसी का नाम है - अध्ययन।

नियम एक वास्तविकता है। नियंत्रण एक वास्तविकता है। संतुलन एक वास्तविकता है। न्याय एक वास्तविकता है। धर्म एक वास्तविकता है। सत्य एक वास्तविकता है।

इन वास्तविकताओं के बारे में हमें पूरा अध्ययन होना, उसमें पारंगत होना, और प्रमाणित होना - ये तीन स्थितियां हैं। मानव जाति जब कभी भी इस को समझने तक पहुंचेगा, हम समुदाय चेतना में जियेंगे नहीं! मानव चेतना में ही जियेंगे। समुदाय चेतना जीव-चेतना को इंगित करता है। मानव-चेतना सार्वभौम-चेतना को इंगित करता है। इस तरह - जब कभी भी ये ६ बातें हमको समझ में आ जाती हैं, हम सार्वभौम चेतना में जीने लायक हो जाते हैं। इन्ही ६ बातों को समझाने के लिए मेरा सारा प्रयत्न है।

इन ६ बातों को समझाने के लिए ५ सूत्र दिए।

(१) सहअस्तित्व
(२) सहअस्तित्व में विकास-क्रम
(३) सहअस्तित्व में विकास
(४) सहअस्तित्व में जागृति-क्रम
(५) सहअस्तित्व में जागृति

जब मैं इन पाँच सूत्रों को समझाने गया तो मेरे मित्र लोगों ने कहा - यह किसी को समझ नहीं आएगा, इसका विस्तृत रूप में व्याख्या करना होगा। सूत्रित करना होगा। तब उसको दर्शन, विचार (वाद), और शास्त्र रूप में व्यक्त किए।

तो कुल मिला कर ६ बिन्दुओं को समझना है। समझ गए हैं - इसका क्या प्रमाण होगा?

समझा पाना ही समझे होने का प्रमाण है। यदि समझा नहीं पाते हैं, तो आपके समझे होने का कोई प्रमाण नहीं है।

अध्ययन की महिमा है - वास्तविकता को समझना, सत्यता को समझना, यथार्थता को समझना।

कोई भी वस्तु जिसे इकाई के रूप में आदमी पहचान सकता है - उसमें चार बातें निहित हैं। रूप, गुण, स्वभाव, और धर्म। इकाइयों के बीच में खाली स्थली को हम व्यापक रूप में पहचानते हैं। व्यापकता उसकी महिमा है ही, उसके साथ पारगामियता और पारदर्शिता महिमा को मैंने देखा। जैसे - आप और हम यहाँ बैठे हैं, यह व्यापक वस्तु का स्थली है। इसमें हम घिरे भी हैं, डूबे भी हैं। इसमें भीगे भी हैं - इसका प्रमाण है, हमारे में ऊर्जा-सम्पन्नता बनी हुई है। मैं बात कर रहा हूँ, यह मेरे ऊर्जा-संपन्न होने का प्रमाण है। मैं जीवित दीखता हूँ - यह मेरे ऊर्जा-सम्पन्नता का प्रमाण है। इस तरह हम सभी ऊर्जा-संपन्न हैं - इस बात को हम स्वीकार सकते हैं।

यह ऊर्जा (व्यापक) ही मनुष्य के द्वारा ज्ञान है। समझ है। समझ के साथ ही मनुष्य ऊर्जा-संपन्न है। मनुष्य का अपने आकार में होना भर पर्याप्त नहीं है। मनुष्य का ज्ञान से संपन्न होने पर ही उसके ऊर्जा संपन्न होने का प्रमाण है। सह-अस्तित्व स्वरूपी अस्तित्व दर्शन ज्ञान में जब हम पारंगत हो जाते हैं - तब हम ज्ञान-संपन्न हैं। उसी का एक भाग है - जीवन। जीवन-ज्ञान में जब हम पारंगत हो जाते हैं - तब हम ज्ञान-संपन्न हैं। उसी का एक भाग है - मानवीयता पूर्ण आचरण। मानवीयता पूर्ण आचरण ज्ञान में जब हम पारंगत हो जाते हैं - तब हम ज्ञान संपन्न हुए। इस प्रकार ज्ञान स्थिति से लेकर व्यवहार तक छू गया। ज्ञान के ये तीन आयाम हैं। तीनो आयामों में जब हम पारंगत हो जाते हैं, प्रमाण हो जाते हैं - तब हम ज्ञान-संपन्न हुए। इन तीनो चीजों में पारंगत होने तक हम अभ्यास करेंगे। अभ्यास करने का अधिकार हर व्यक्ति के पास है। हर छोटे, बड़े, बूढे के पास अभ्यास करने का अधिकार रखा है। कोई भी अभ्यास कर सकता है। ज्ञान-संपन्न होना ही मानव की महिमा है।

अध्ययन की महिमा है - ज्ञान-संपन्न होने के क्रियाकलाप में प्रमाणित होना।

समग्र अस्तित्व को पहचानना है, मनुष्य को पहचानना है - और अध्ययन करना है। समग्र अस्तित्व कैसा है - इसका अध्ययन पूरा होना। और मानव का अध्ययन पूरा होना।

मानव का अध्ययन करने पर मैं शरीर और जीवन को समझा।

मानव-शरीर रासायनिक द्रव्यों से रचित एक रचना है। रासायनिक द्रव्यों से मानव-शरीर कैसे बन गया? इसका इतिहास ऐसे बना है। सर्वप्रथम पानी एक रासायनिक वस्तु का प्रकटन हुआ। पानी में जो मूल वस्तु है - एक जलने वाला, एक जलाने वाला। ये दोनों मिल कर प्यास बुझाने वाले वस्तु हो गए। जबकि मूल दोनों वस्तुओं में यह गुण नहीं था। यह तीसरा गुण आ गया। इस तरह यह समझ में आता है - यौगिक विधि से नया गुण पैदा हो सकता है। इस प्रकार आगे अनुमान कर सकते हैं - हर योग-संयोग से किस प्रकार अनेक नयी रचनाएँ, आचरण, और गुण पैदा हो गए। इसी क्रम में उत्तरोत्तर गुणात्मक विकास होते होते मानव-शरीर का प्रकटन धरती पर हुआ।

दूसरा - जीवन। जीवन अपने स्वरूप में एक गठन-पूर्ण परमाणु है। यह निरंतर एक सा ही बना रहता है। इस तृप्त परमाणु के सदा एक सा बने रहने के कारण हम जीवन को "अमर" कह सकते हैं। यही चैतन्य इकाई है। जीवन शरीर को चलाता है। जीवन के अमरत्व को पहचानना मानव-तृप्ति का स्त्रोत है।
मनुष्य को "जीव" की संज्ञा में ईश्वर-वाद भी qualify किया, और भौतिकवाद तो किया ही है। अब मनुष्य जीव है, या मनुष्य मनुष्य ही है - यह पहचानने का प्रयत्न पहली बार मैंने प्रयत्न किया। उसमें मुझे पता चला - मनुष्य ज्ञान-अवस्था की इकाई है। ज्ञान-अवस्था के मूल में क्या है? इसका उत्तर है - कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता। यह सब मनुष्यों के पास है। आज पैदा हुए शिशु के भी पास है, कल मरने वाले वृद्ध के भी पास है। कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता सभी मनुष्यों के पास होने के कारण - मनुष्य को मैंने ज्ञान-अवस्था की इकाई के रूप में पहचाना।

इसी कल्पनाशीलता के आधार पर मनुष्य सह-अस्तित्व को समझ पाता है। सह-अस्तित्व में मनुष्य को समझ पाता है। मनुष्य को जीवन और शरीर के संयुक्त स्वरूप में समझ पाता है। जीवन को गठन-पूर्ण परमाणु के स्वरूप में समझ पाता है। परमाणु में भी अनेक परमाणु-अंशों से गठित होना समझ पाता है। यह जो समझ आने लगता है - इसका नाम है अध्ययन।

समझदारी के लिए पहले सह-अस्तित्व को समझना है। सहअस्तित्व है - सत्ता में संपृक्त प्रकृति। प्रकृति दो भाग में है - जड़ और चैतन्य। जड़ प्रकृति है - पदार्थावस्था और प्राण-अवस्था। पदार्थावस्था में खनिज होते हैं, प्राण-अवस्था में वनस्पति होते हैं। ये दोनों मिल के जड़ संसार है। जीव-संसार और मनुष्य-संसार मिल कर चैतन्य संसार है। यह जड़-चैतन्य प्रकृति सत्ता में संपृक्त है।

सत्ता में संपृक्त जड़-चैतन्य प्रकृति सह-अस्तित्व स्वरूप में नित्य-वर्तमान है। सदा-सदा के लिए वर्तमान है। सदा-सदा के लिए कार्यशील है, स्थितिशील है। स्थितिशील हो और गतिशील भी है - उसका नाम है "वर्तमान"। यह एक बहुत प्रमुख बात है - स्थिति में भी हो, गति में भी हो, जिसकी निरंतरता हो। उसका नाम है - सह-अस्तित्व। यह पूरा सह-अस्तित्व नित्य-वर्तमान है। अध्ययन की मूल वस्तु सहअस्तित्व ही है।

"सत्ता में संपृक्त प्रकृति" आपने सुना। सुनने पर ऐसा लगता है - समझ में आ गया! लेकिन उसके मूल में चले जाते हैं - वह समझने का मुद्दा है। जैसे, लोहा - लोहे के बारे में हम सोचने जाते हैं, उसमें रूप, गुण, स्वभाव, और धर्म बना ही रहता है। इन चारों भागों को समझना - यह अध्ययन है। बेल वृक्ष आपको आँखों से दीखता है। बेल वृक्ष को देख कर उसका आप चित्र बना दिया - वह बेल वृक्ष का समझ नहीं है। बेल वृक्ष के रूप, गुण, स्वभाव, और धर्म को समझना अध्ययन है। इसी ढंग से हर जड़-चैतन्य वस्तु के रूप, गुण, स्वभाव, और धर्म को हम यदि समझते हैं - तो हम समझदार हुए!

इतना सब कैसे समझा जाए? यह तो बड़ी भारी जटिल बात हो जायेगी? ऐसा भी एक प्रश्न बनता है। इसके लिए सिद्धांत दिया - "सिन्धु बिन्दु न्याय"। सिन्धु-बिन्दु न्याय का मतलब है - बहुत बड़ा एक समुद्र है, पर पूरे समुद्र का पानी कैसा है - वह उसके एक बिन्दु के परीक्षण करने से हम समझ सकते हैं। पदार्थ-अवस्था के एक लोहे के टुकड़े का परीक्षण करने मात्र से हम सम्पूर्ण लोहे-संसार को समझ जाते हैं। मिट्टी के एक भाग को परीक्षण करने मात्र से हम मिट्टी संसार को समझ जाते हैं। पत्थर के साथ, और मणि के साथ भी ऐसा ही है। उसी प्रकार वनस्पति संसार में भी एक पौधे का परीक्षण करने से उस पूरे संसार का परीक्षण हो गया। इसी क्रम में हम मनुष्य के अध्ययन तक पहुँचते हैं। इस ढंग से हम अपने अध्ययन को पूरा कर पाते हैं।

मेरे अनुसार - पत्थर का अध्ययन कैसे करना है, यह सब तो करीब-करीब हो चुका है। मनुष्य का अध्ययन कैसे किया जाए - वहाँ रुका हुआ है। उसके बारे में अध्ययन की वस्तु के रूप में मनुष्य है ही। बिना मनुष्य को समझे, अध्ययन किए - हम चल नहीं पायेंगे। चल नहीं पा रहे हैं। आगे नहीं चल पाने की स्थिति में हम आ चुके हैं।


गठन पूर्ण परमाणु को जीवन नाम दिया है। ऐसा जीवन जीव-शरीर को भी चलाता है, मनुष्य शरीर को भी चलाता है। मनुष्य शरीर और जीव शरीर में मौलिक अन्तर यह है - जीव-शरीर में जीवन की कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता प्रकट होने की व्यवस्था नहीं है। मानव शरीर में कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता प्रकट होने की व्यवस्था है। यह प्रकृति प्रदत्त है। नियति प्रदत्त है। नियति का मतलब है - सह-अस्तित्व, सह-अस्तित्व में विकास-क्रम, सह-अस्तित्व में विकास, सह-अस्तित्व में जागृति-क्रम, और सह-अस्तित्व में जागृति। मनुष्य में कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता का प्रकट होना इस विधि से आया है। इसको कोई करने वाला नहीं है। ईश्वर-वादी विधि से जो बताया गया है कि "ईश्वर के करने से होता है" - वह झूठ हो गया।

ईश्वर-वादियों ने ईश्वर को ही दृष्टा, कर्ता, और भोक्ता बताया है। जबकि - ईश्वर न करता है, न भोगता है, न दृष्टा है।


व्यापक वस्तु में अनुभव करने पर मानव दृष्टा पद में आता है। मानव ही अनुभव करेगा - और कोई करने वाला है नहीं। मनुष्य के अतिरिक्त इस अस्तित्व में और कोई वस्तु नहीं है जो अनुभव करे। इसी लिए मैंने मनुष्य को ज्ञान-अवस्था में पहचाना।

समाधि की स्थिति को मैंने देखा, संयम किया, संयम काल में अध्ययन किया - अध्ययन में जड़-चैतन्य प्रकृति को व्यापक वस्तु में डूबे-भीगे-घिरे हुए देखा। अध्ययन की वस्तु सह-अस्तित्व ही है। सह-अस्तित्व में ही जीवन है, शरीर है। जड़ प्रकृति है, चैतन्य प्रकृति है। हर व्यक्ति इसमें पारंगत हो सकता है। उसके लिए मध्यस्थ-दर्शन सह-अस्तित्व वाद वांग्मय (literature) तैयार किया।

पहले सोचा था - वांग्मय तैयार न किया जाए। व्यक्ति से व्यक्ति तक ही यह जाए। फ़िर कुछ विद्वानों से परामर्श करने पर यह निकला - इस तरह, तुम्हारे रहते यह हो पायेगा - तुम्हारे शरीर के न रहने के बाद यह नहीं चलेगा। तब सूचना के रूप में सारे वांग्मय को मैंने तैयार किया। सारे वांग्मय को मैं "सूचना" ही मानता हूँ। सूचना से अधिक कोई वांग्मय नहीं है अस्तित्व में।

विगत में ऐसी कल्पना दिया है - "ईश्वर-वाणी, आकाश-वाणी, देवता-वाणी, सरस्वती जी की वीणा की वाणी, या महापुरुषों की वाणी।" ऐसा कुछ करके बहुत कुछ लिखे हैं। उनको हम "पावन ग्रन्थ" कहते हैं। वह "पावन-ग्रन्थ" स्वयं ईश्वर-वाणी होते हुए - एक ग्रन्थ में कुछ हो गया, दूसरे ग्रन्थ में कुछ और हो गया। ईश्वर इसमें अपराधी हो गया, या ग्रन्थ अपराधी हो गया - यह सोचने का मुद्दा रखा हुआ है। इसका अपने आप में बहुत बड़ा कथा है।

यदि मेरे अनुसंधान से मानव आप-हम को पहचान में आता है, तो हम एक अच्छा काम कर सकते हैं - किस परम्परा का कौनसा ग्रन्थ मानव को पहचानने के लिए कितना काम किया? इस मुद्दे पर शोध कर सकते हैं। यह आदि-काल से अभी तक के इतिहास का एक अच्छा अध्याय बन सकता है। इसमें आगे विद्वान स्वयं सोचेंगे। इसमें मेरा कोई प्रयत्न नहीं रहेगा। मेरा कथन इतना है - सभी पावन-ग्रन्थ शुभ को चाहते हुए शुरू किया, पर शुभ को व्यक्त करना नहीं बना। शुभ को व्यक्त करने के लिए व्यक्ति को संतुष्टि देने के लिए कुछ कहा भी होगा, समुदाय की आशा भी पैदा किया होगा। अभी तक इतना ही है। सारे पावन ग्रंथों का काम इतना ही है। उसमें से कुछ ग्रन्थ आक्रोश वाली बात भी करते हैं, तो कुछ अहिंसक और सहनशील होने की बात भी करते हैं। यह दोनों बातें हैं। इन दोनों तरह की बातों को लेकर आदमी चला है। उस तरह जहाँ जो पहुंचना है, पहुँचा है। ये दोनों विधियां आपको धरती पर दिखता ही है। पावन ग्रंथों के बारे में कहना इतना ही है।

इन सब पावन ग्रंथों से मुझ को क्या प्रेरणा मिली? "ईश्वर, परमात्मा, ब्रह्म" - इन सब नामो से जो कुछ भी कहा। "व्यापक है" - इस बात को हमको दिया। एक शब्द है यह। व्यापक वस्तु कैसा है, क्यों है? - इसको मैंने अनुसंधान किया। अनुसंधान करने पर पता चला - सर्वत्र विद्यमानता के आधार पर है व्यापक। सारी प्रकृति इस में डूबे, भीगे, घिरे रहने के कारण से यह ब्रह्म है। ब्रह्म का मतलब है - फैलने वाला। व्यापक सदा फैला जैसा दीखता है।

प्रकृति ही ब्रह्म को पहचानता है। विगत में बताये थे - ब्रह्म ही दृष्टा, कर्ता, ज्ञाता, भोक्ता है। इसमें उलटा हुआ - मनुष्य ही ज्ञाता है, कर्ता है, दृष्टा है, भोक्ता है।

एक महत्त्वपूर्ण सिद्धांत है - "सह-अस्तित्व नित्य प्रभावी है।" सह-अस्तित्व को छोड़ कर हम कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर पायेंगे।

जीवन जीवन के साथ बात चीत करता है। यह सच्चाई है। जीवन अकेले में कोई बात नहीं कर सकता। जीवन जीवन के साथ ही बात कर सकता है। यह भी सह-अस्तित्व के नित्य प्रभावी होने के आधार पर है।

जीवन का जागृत होना शरीर के साथ मानव परम्परा में ही हो सकता है। जीवन मानव-शरीर के बिना अपने आप को जागृत नहीं कर सकता। मानव-शरीर के लिए प्रकृति में व्यवस्था है। यह भी सह-अस्तित्व के नित्य प्रभावी होने के आधार पर है।

मानव-परम्परा के जागृत होने के लिए शिक्षा में सह-अस्तित्व को समझाने की व्यवस्था आवश्यक है। अभी के शिक्षा के स्वरूप में सह-अस्तित्व को समझाने की कोई व्यवस्था नहीं दिया गया है। इसको अच्छी तरह से सोच के निर्णय लेने की आवश्यकता है।

सह-अस्तित्व में चार अवस्थाओं को मैं समझा। पदार्थ-अवस्था, प्राण-अवस्था, जीव-अवस्था, और ज्ञान-अवस्था।

परिणाम-अनुषंगी विधि से सब पदार्थों का आचरण निश्चित और व्यवस्थित है। पत्थर , लोहा, मिटटी, मणि - इनका आचरण निश्चित है। इन चार वर्गों में पदार्थ-अवस्था को पूरा देखा जा सकता है। परिणाम के अनुसार आचरण करता हुआ पदार्थ-अवस्था "निर्दोष" है।

वनस्पति-संसार में अनेक प्रजातियाँ होती हैं। उनका आचरण निश्चित है। आम का आचरण निश्चित है। बेल का आचरण निश्चित है। धतूरे का आचरण निश्चित है। कोई ऐसा वनस्पति नहीं है - जिसके आचरण में स्खलन हो, सविप्रीत हो, वाद-विवाद हो, अव्यवस्था हो। ऐसा कुछ नहीं है - सबका आचरण निश्चित है। बीज-अनुशंगियता विधि से आचरण करता हुआ प्राण-अवस्था "निर्दोष" है।

उसी प्रकार जीवों में भी सभी आचरण निश्चित हैं। जीव-संसार वंश के अनुसार आचरण करता हुआ "निर्दोष" है।

मनुष्य में अभी आचरण निश्चित होना शेष है। सह-अस्तित्व सहज समझदारी पूर्वक ही मनुष्य का आचरण निश्चित हो सकता है।

मानवीयता पूर्ण आचरण क्या है?

मानवीयता पूर्ण आचरण मूल्य, चरित्र, और नैतिकता का संयुक्त स्वरूप है। संयुक्त अभिव्यक्ति। संयुक्त प्रकटन। संयुक्त प्रस्तुति। संयुक्त प्रमाणीकरण। इतना चीज एक साथ है।

मूल्य, चरित्र, नैतिकता को कैसे समझा जाए?

मूल्य का प्रमाण संबंधों में होता है। मनुष्य में कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता के रहते संबंधों को पहचानने की क्षमता, संबंधों को पहचानने की व्यवस्था राखी है। इस व्यवस्था के आधार पर ही हम संबंधों को पहचानते हैं। इसी क्रम में मनुष्य के सम्बन्ध को पत्थर से, लोहे से, वनस्पतियों से, और जीवों से पहचानते हैं। मनुष्य के साथ संबंधों के अलग-अलग नाम हो गए। मनुष्यों का सम्बन्ध एक ही स्वरूप में नहीं है। अनेक स्वरूप में है - जैसे, माता-पिता के रूप में, भाई-बहन के रूप में, गुरु-शिष्य के रूप में, पुत्र-पुत्री के रूप में। संबंधों के नाम to हम पा गए हैं। इन संबंधों के नाम के अनुसार प्रयोजनों को नहीं पहचाने। जैसे - माता-पिता के साथ सम्बन्ध का प्रयोजन है: पुष्टि -संरक्षण सहित व्यवस्था का प्रमाण। शरीर में शरीर पुष्टि, और जीवन में ज्ञान पुष्टि, विवेक पुष्टि। दोनों तरह से पुष्टि मिले, उसके बाद व्यवस्था में जीना। व्यवस्था में जीना तब हुआ - जब संबंधों को पहचाना, और मूल्यों का निर्वाह किया।

मूल्य क्या है? साम्य मूल्य है - विशवास। संबंधों की निरंतरता हम बना कर रखते हैं - तो विश्वास का हम निर्वाह किए। संबंधों को हम निरंतरता नहीं दे पाते हैं - तो विश्वास का हम निर्वाह नहीं कर पाये। अब इसका आप अपने-अपने में शोध कर सकते हैं। जिसको हमने मित्र रूप में पहचाना, क्या वह सदा-सदा मित्र रूप में रहा? जो हम माता-पिता को पहचाना - क्या सदा-सदा उसकी निरंतरता रही? भाई को जो पहचाना - क्या सदा हम भाई के साथ भाई के रूप में जी पाये? इसको निरीक्षण कर सकते हैं, परीक्षण कर सकते हैं, शोध कर सकते हैं। मध्यस्थ -दर्शन पर आधारित शिक्षा की पहली देन यही है।

संबंधों की पहचान
मूल्यों का निर्वाह
मूल्यांकन
उभय तृप्ति

इससे किसको objection है - बताइये ? ७०० करोड़ आदमी के सामने इस बात का objection होना बहुत मुश्किल है।

इसके बाद आता है - "चरित्र"। चरित्र के बारे में मैंने यह देखा है - स्व-धन, स्वनारी/स्व-पुरूष, और दया पूर्ण कार्य-व्यवहार करने से ही मानव-चरित्र है। मूल्य हैं - परिवार में जीने के लिए। चरित्र है - समाज में जीने के लिए। नैतिकता - राज्य (व्यवस्था) में जीने के लिए है।

मूल्य परिवार में जीने से सुख देता है। चरित्र समाज में जीने से सुख देता है। नैतिकता व्यवस्था में जीने से सुख देता है। जीने में समाधान होता है - इसलिए सुख होता है। मूल्य, चरित्र, नैतिकता - इन तीन चीजों को पहचानने पर हम इन तीन जगह व्यापक हो जाते हैं। विशाल हो जाते हैं। परिवार में हम सामाधानित हो जाते हैं - फलस्वरूप सुखी होते हैं। समाज में हम अखंड-समाज पूर्वक सामाधानित होते हैं - फलस्वरूप सुखी होते हैं। सार्वभौम व्यवस्था में हम समाधानित होते हैं - फलस्वरूप सुखी होते हैं।

मानवीयता पूर्ण आचरण ही क्यों? ऐसे ही क्यों जीना है? - परिवार में जीना ही है। ये सब सम्बन्ध का निर्वाह करना ही है। क्योंकि इनको छोड़ कर सुखी होने का कोई प्रमाण नहीं है। परिवार के बाद, akhand-समाज में जीना ही है। इसी क्रम में व्यवस्था में जीना ही है।

इस शिक्षा से अभी तक मनुष्य-जाती वंचित रहा। भौतिकवादी विधि से भी मनुष्य का अध्ययन वंचित रहा। ईश्वर-वादी विधि से भी मनुष्य का अध्ययन लुप्त रहा, या सुप्त रहा।

शिक्षा की मूल वस्तु तीन हैं :
(१) सह-अस्तित्व रुपी अस्तित्व दर्शन ज्ञान का अध्ययन
(२) जीवन के स्वरूप का अध्ययन
(३) जीवन और शरीर के संयुक्त रूप में मानव, और मानव के मानवीयता पूर्ण आचरण का अध्ययन

अभी के समय में हम जिसको व्यवस्था माने जा रहे हैं - उसका स्वरूप कैसा है? इस बारे में आप को कुछ कहना चाहते हैं। अभी की पूरे विश्व में जितने भी राज्य और धर्म कहलाये जा रहे हैं - वे "शक्ति केंद्रित शासन" विधि से शासन-संविधान है। धर्म-संविधान भी शासन के ही पक्ष में है। क्या यह समझ में आता है? यह सबको समझ में आना चाहिए।

शासन के पक्ष में संविधान लिखा गया है। संविधान में शासन की मंशा के अनुसार चलने वालों को हम सुप्रजा कहते हैं। शासन की मंशा के विरुद्ध व्यक्ति को हम अपराधी मानते हैं। संविधान में अपराधियों को दंड देने का प्रावधान है। धर्म-संविधान में गलती करने वालों के लिए प्रायश्चित्त करने का प्रावधान है। इस तरह से संविधान लिखे गए हैं। इन संविधानों पर आधारित होती है - शक्ति केंद्रित शासन व्यवस्था।

"शक्ति केंद्रित" का क्या मतलब है? डंडा बजा कर अपनी बात मनवाना। उसके लिए - गलती को गलती से रोकने का प्रयास, अपराध को अपराध से रोकने का प्रयास, और युद्ध को युद्ध से रोकने का प्रयास। एक व्यक्ति अपराध करता है - उसको रोकने के लिए १० लोगों को अपराध में पारंगत बनाना होता है। हर देश में ऐसी ही व्यवस्था रखा है। अब आप बताओ - इस तरह आदमी अपराध-प्रवृत्ति के लिए तैय्यार हुआ, या न्याय के लिए? इस तरह हम फंस चुके हैं। आदमी फंसा है। आदमी को चलाने वाला आदमी भी फंसा है। यही अमानवीय कार्यक्रम है। दूसरे शब्दों में - जीव-चेतना में जीते हुए विवशता पूर्वक किया हुआ कार्यक्रम। इसमें एक चलाने वाला होता है, उसको नाम दिया "राक्षस मानव"। दूसरा चलने वाला होता है, उसको नाम दिया "पशु मानव"। राक्षस मानव चलाता है, पशु मानव चलता है। यह मेरे द्वारा लिखे हुए दर्शन का एक भाग है।

जीव चेतना से मानव-चेतना में परिवर्तित होने पर ही हम मानवीय व्यवस्था को पाते हैं। मानवीय व्यवस्था है - (१) परिवार, (२) अखंड समाज, (३) सार्वभौम व्यवस्था।

हम भय-वश ही सर्वाधिक नमन किए हैं, पूजा किए हैं, प्रार्थना किए हैं। हमारी प्रार्थनाओं में यह झलकता है। "हमारी और हमारे मित्रों की रक्षा करो, हमारे शत्रुओं का नाश करो!" - यह सब ही हमारी प्रार्थनाओं में दीखता है। इसको मैंने बहुत कुछ पढ़ कर देखा है। उससे मैं राजी नहीं हो पाया। चाहे उसका आप कोई भी कारण बता दीजिये - भय पर आधारित पूजा, नमन, पत्री मुझ को पटा नहीं! यही मूल मुद्दे के रूप में पुनर्विचार करने के लिए तत्परता, इच्छा, प्रयत्न, और प्रयत्न का सफल होना, और उसी क्रम में आज आपके सम्मुख मैं पहुँच गया।
अब आपके सम्मुख सह-अस्तित्व के अध्ययन का प्रस्ताव है।

कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता हर मनुष्य में सह-अस्तित्व स्वरूप से तदाकार करने की व्यवस्था है। जो प्रस्ताव से इंगित है उसमें तदाकार होने के अधिकार का जब प्रयोग होता है, तब मनुष्य समझ पाता है। अध्ययन में मन तदाकार होता है, तब हम समझ पाते हैं।

अध्ययन अनुक्रम का होता है। पदार्थ-अवस्था से प्राण-अवस्था का प्रकट होना अनुक्रम है। प्राण-अवस्था का बीज रूप पदार्थ-अवस्था में था, इसी लिए प्राण-अवस्था प्रकट हुई। उसी क्रम में जीव-अवस्था और ज्ञान-अवस्था प्रकट हुई। एक कड़ी से दूसरी कड़ी जुडी होने का क्रम अनुक्रम है।

इससे निम्न सिद्धांत निकला:

अग्रिम अवस्था का बीज रूप पिछली अवस्था में रहता ही है।

यही सिद्धांत अनुक्रम का आधार है। मानव का प्रकट होने का बीज जीव-अवस्था में था, इसी लिए मानव का प्रकटन हुआ। अब मानव के प्रकट होने के बाद मानव में अनुभव होना भी अनुक्रम से ही होता है।

अनुक्रम से प्रकटन, फ़िर अनुक्रम का अनुभव।

अनुक्रम से होने वाले परम प्रमाण को अनुभव कहा है। अनुभव परम प्रमाण है।

अनुभव प्रमाण ही व्यवहार में, अनुभव प्रमाण ही प्रयोग में प्रायोजित होता है। फलस्वरूप हम समाधान पाते हैं, समृद्धि पाते हैं, और अनुभव-प्रमाण के अनुरूप जी पाते हैं। इस प्रकार हर मनुष्य अपने सौभाग्य को पहचान सकता है, स्वीकार सकता है, जी सकता है, और उपकार कर सकता है।

- जीवन विद्या राष्ट्रीय सम्मलेन में बाबा श्री नागराज शर्मा के उदबोधन से (२२ अक्टूबर २००५, मसूरी)

Wednesday, December 17, 2008

पहचान और निर्वाह

हर वस्तु अनंत कोण संपन्न हैहर वस्तु हर कोण से दीखता हैहर वस्तु किसी किसी कोण से दूसरे वस्तु से जुडा ही रहता हैइस तरह हर वस्तु दूसरे पर प्रतिबिंबित हैहर वस्तु नियति क्रम में अपनी अवस्थिति के अनुसार दूसरे वस्तु के साथ अपने सम्बन्ध को पहचानता है और निर्वाह करता है

मनुष्य जो सम्बन्ध समझ में गया - उसको वह पहचानता है, और निर्वाह करता हैसम्बन्ध जो समझ में नहीं आया, उसको वह पहचानता है - निर्वाह करता हैमनुष्य को चारों अवस्थाओं के साथ अपने सम्बन्ध को पहचानने की ज़रूरत है, तभी वह भ्रम और अपराध से मुक्त हो पाता हैमनुष्य जब भ्रम और अपराध से मुक्त होता है तभी धरती अपने आप को स्वस्थ कर सकती हैअपराध करते रहेंगे तो धरती पर आदमी जात तो नहीं रहेगा

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २००८, अमरकंटक)

संपर्क - सूचना - अध्ययन - अनुभव - प्रमाण

साक्षात्कार पाँच सूत्र (सह-अस्तित्व, सह-अस्तित्व में विकास-क्रम, सह-अस्तित्व में विकास, सह-अस्तित्व में जागृति-क्रम, और सह-अस्तित्व में जागृति) का होता है - जो अनुभव में जा कर सूत्रित होता है। सभी दिशायें/कोण एक बिन्दु में समाते हैं। वैसे ही सारी मध्यस्थ-दर्शन की व्याख्या अनुभव-बिन्दु में समाती है। बिन्दु का कोई लम्बाई-चौडाई नहीं है। यह हुआ synthesis या synchronization। फैलावट से बिन्दु तक अध्ययन है। अनुभव बिन्दु है। फैलना परम्परा है। अनुभव एक बिन्दु है - उसका विस्तार अनंत दूर तक फैलता है। कहीं रुकता नहीं है वह!

धर्म अनुभव में ही समझ में आता है। धर्म अनुभव में आ गया तो सब समझ में आ गया। वह point को पकड़ने की ज़रूरत है। बाकी सब तर्क-संगति से समझ में आ ही जाता है। रूप और गुण तक चित्रण (स्मृति) में रहता है। स्वभाव का बोध होता है। अनुभव-प्रमाण बोध होना (अनुभव मूलक विधि से) - मतलब, धर्म-बोध होना। इस तरह धर्म और स्वभाव जुड़ गया। वही चित्त के स्तर पर आ कर रूप और गुण से जुड़ता है। इसकी जब तर्क-सांगत व्याख्या करने जाते हैं तो वह फैलने लगता है। इस तरह हम धर्म की व्याख्या करने योग्य हो जाते हैं।

अध्ययन विधि से अनुभव multiply होता है - ऐसा मैं शुरू किया हूँ। अनुभव multiply होने पर ही संसार का कल्याण है, सर्व-शुभ है। इसमें समानता का स्वरूप निकलता है। अगर एक ही व्यक्ति अनुभव कर सकता तो समानता हो ही नहीं सकती थी। अनुभव के बाद सभी समान हैं।

अनुभव तक अध्ययन है। उसके पहले सूचना है। उससे पहले संपर्क है।

संपर्क के बाद ही सूचना है। बिना संपर्क साधे सूचना कैसे दोगे?
सूचना के बाद ही अध्ययन है। बिना सटीक सूचना के अध्ययन कैसे करोगे?
अध्ययन के बाद ही अनुभव है। बिना अध्ययन किए अनुभव कैसे करोगे?
अनुभव के बाद ही प्रमाण है। बिना अनुभव के प्रमाणित क्या करोगे?

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २००८, अमरकंटक)

आत्म-विश्वास और विश्वास

आत्म-विश्वास का मतलब है - अनुभव में विश्वास। आत्म-विश्वास का मूल आत्मा में अनुभव ही है। आत्मा जीवन का मध्यांश है। सह-अस्तित्व में अध्ययन पूर्ण होने पर ही आत्मा अनुभव करता है। अनुभव-सम्पन्नता ही समझदारी है। समझदारी से पहले किसी को आत्म-विश्वास नहीं हुआ।

आत्म-विश्वास के आधार पर ही स्वयम में विश्वास होता है। आत्म-विश्वास के बिना स्वयं में विश्वास हो ही नहीं सकता। आत्म-विश्वास ही श्रेष्ठता का सम्मान करने में विश्वास का आधार है। आत्म-विश्वास ही अपनी प्रतिभा में विश्वास का आधार है। आत्म-विश्वास ही प्रतिभा के अनुरूप व्यक्तित्व में विश्वास का आधार है। आत्म-विश्वास ही व्यवहार में सामाजिक होने में विश्वास का आधार है। आत्म-विश्वास ही उत्पादन में स्वावलंबी होने में विश्वास का आधार है।

स्वयं में विश्वास का परम्परा में गवाही या प्रमाण होता है। वह संबंधों की पहचान और मूल्यों के निर्वाह में विश्वास में गवाहित या प्रमाणित होता है।

आत्म-विश्वास से जीने के लिए ही अध्ययन है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २००८, अमरकंटक)

Monday, December 15, 2008

अध्ययन की परिभाषा

अध्ययन = अधिष्ठान के साक्षी में स्मरण पूर्वक किया गया सभी क्रिया-कलाप

अधिष्ठान के साक्षी का मतलब है - आत्मा का साक्षी। आत्मा जो जीवन का मध्यांश है। मध्यांश निरंतर अनुभव का प्यासा रहता है। अनुभव की रोशनी में जो हम अस्तित्व की वास्तविकताओं को पहचानते हैं, उसको "क्रिया-कलाप" नाम दिया। अनुभव को प्रमाणित करना ही "अनुभव की रोशनी" है। मैं जो अनुभव मूलक विधि से प्रस्तुत हो रहा हूँ, उसको आप जब स्वीकारते हैं - तभी आप का अध्ययन है। मैंने जो संप्रेषित किया वह अनुभव की रोशनी में किया। आपने जो ग्रहण किया वह अनुभव की प्यास (अपेक्षा) में किया। प्यास है, इसी लिए ग्रहण करते हैं। मैं जो समझाता हूँ, वह अपने अनुभव की रोशनी में समझाता हूँ। आप में अनुभव की प्यास है, मुझ में अनुभव का स्त्रोत है। इन दोनों के संयोग में अध्ययन है। इतना ही है। इसमें कोई घटाने-बढ़ाने की ज़रूरत नहीं है। आप अनुभव करने के बाद जब किसी तीसरे को समझाते हो, तो वह आपके अनुभव की रोशनी में समझाते हो।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २००८, अमरकंटक)

अनुभव एक व्यक्ति को हो सकता है, तो दूसरे को भी हो सकता है.

अनुभव एक व्यक्ति को हो सकता है, तो दूसरे को भी हो सकता है। एक व्यक्ति जो समझ सकता है, कर सकता है - वैसे ही हर व्यक्ति समझ सकता है, कर सकता है। अनुभव संपन्न व्यक्ति के निरीक्षण परीक्षण से एक से दूसरे व्यक्ति के लिए प्रेरणा बनती है। फ़िर उसके लिए दूसरे का प्रयत्नशील होना स्वाभाविक हो जाता है। उसी ढंग से सभी इस बात से जुड़ रहे हैं।

मेरे जीने के तौर-तरीके से जो मैं आप में अनुभव होने का आश्वासन दिलाता हूँ - उसमें तारतम्यता बनता जाता है। उससे आपका विश्वास दृढ़ होता जाता है।

प्रश्न: मुझसे पहले, मुझसे ज्यादा पढ़े- लिखे, अनेक वर्षों से अध्ययन में संलग्न लोग जब अपने अनुभव होने की स्पष्ट घोषणा नहीं कर पाते हैं - तो मेरा विश्वास डगमगा जाता है, कि मैं इसको कभी पूरा समझ पाऊंगा।

उत्तर: इसको escapism में न लगाया जाए। जिम्मेदारी के साथ हम समझते हैं, करते हैं। "हम समझेंगे, और अपनी समझ को जियेंगे।" - यहाँ तक आप अपनी जिम्मेवारी को रखिये। दूसरा समझा या नहीं समझा - उसको अभी मत सोचिये। आप पूरा होने के बाद संसार और ही कुछ दिखने लग जाता है। जैसे मुझ को दिख रहा है कि हर व्यक्ति शुभ चाह रहा है। शुभ के लिए ही सभी प्रयत्न कर रहे हैं। एक दिन पहुँच ही जायेंगे। मेरे पास किसी का विरोध करने का कोई रास्ता ही नहीं है। आप अनुभव करने के बाद वही करोगे, दूसरा कोई रास्ता नहीं है।

सबको आत्मसात किए बिना हम समाधानित नहीं हो सकते। सबको आत्मसात कैसे करोगे? एक दिन सभी सच्चाई को समझेंगे। यह पहला कदम है। यह फ़िर मिटेगा नहीं। अब उसके बाद हम अपना प्रस्ताव देना शुरू किए। प्रस्ताव में लोगों को सम्भावना दिखने लगी। आपकी इस प्रस्ताव में स्वीकृति मुझ को दृढ़ता प्रदान करता है। उसी प्रकार आप जब दूसरों को प्रबोधित करते हैं तब उससे आप की सुदृढ़ता बनती है। इसमें कोई शंका की बात नही है। केवल ध्यान देने की आवश्यकता है। शरीर को हटा कर जीवन पर ध्यान देने की आवश्यकता है।

इस प्रस्ताव की सूचना अब तक एक लाख लोगों तक तो पहुँच चुकी है। उसमें से कम से कम ५० लोग इसके अध्ययन में लग गए हैं। यह ०.०००५ % हुआ। यह भी सन् २००० के बाद शुरू हुआ। उसके पहले के मेरे प्रयत्न में १ या २ व्यक्ति इसके अध्ययन में लगे। जैसे सत्य जी लगे - पर उनका देहांत हो गया। फ़िर रण सिंह लगे, तीसरे साधन भट्टाचार्य लगे। २० वर्ष में ये तीन व्यक्ति टिके। इस दशक में सर्वाधिक प्रगति हुई। अगले दशक में इससे ज्यादा होगा - ऐसा अनुमान होता ही है। इस ढंग से आशा बनती है। इसके लिए program देने के लिए अब मेरे साथ ५० और लोग हो गए। उसमें से सटीक program को रखने वाले १-२ होंगे ही! कुछ कमी होगा तो उसको पूरा करने के लिए मैं बैठा ही हूँ।

प्रश्न: क्या इस बात की कोई सम्भावना है कि इस अनुसंधान का लोकव्यापीकरण न हो? क्या इस बात की सम्भावना है कि आप के रहते कोई भी अपने अनुभव-संपन्न होने की स्पष्ट घोषणा नहीं कर पाये?

उत्तर: इस दशक में आने के बाद अब वह सम्भावना नहीं है। लोग इसको समझ जायेंगे और यह जिन्दा रहेगा - यह आश्वस्ति इस दशक के बाद से हुई। मानव को धरती पर रहना हो तो मध्यस्थ-दर्शन के अनुसंधान के सफल होने की घटना सही है। सन् २००० से पहले मैं कहता था - "मानव को धरती पर रहना होगा, तो इसको समझेगा नहीं तो नहीं समझेगा।" अब यह लोकव्यापीकरण हो के ही रहेगा। इस बात का प्रवाह बनेगा - यह तो निश्चित हो गया है। जो लोग इसके अध्ययन में लगे हैं, और प्रोग्राम में लगे हैं - उनके संकेतों से मुझको ऐसा ही लगता है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २००८, अमरकंटक)

होना क्या चाहिए? - इसका उत्तर दे कर इस प्रस्ताव को नकारिये.

सह-अस्तित्व वाद के इस प्रस्ताव पर तर्क से छेद करने का कोई जगह ही नहीं है। यह पूरा प्रस्ताव तर्क सम्मत है।

दूसरे, इस बात को नकारने की कोई जगह नहीं है।

बाकी बचा - नफरत! नफरत करने का अधिकार हर व्यक्ति के पास रखा है। आप इससे नफरत कर सकते हैं।

मैं अस्तित्व क्यों और कैसा है - इसके लिए अपना अनुभव आपके सामने प्रस्ताव रूप में रखता हूँ।
"हम आपकी बात नहीं मानते!" - एक उत्तर आता है।
आपकी बात शिरोधार्य है, पर होना क्या चाहिए? - मैं कहता हूँ।
"वह हम नहीं जानते!" - बदले में जवाब आता है।

इस तरह कुछ लोग अपना रास्ता इस प्रस्ताव के लिए बंद करके बैठे हैं।

होना क्या चाहिए - इसको बता कर इस प्रस्ताव को नकारिये।

देखिये - इस प्रस्ताव का पूरा implementation आसान तो नहीं है, पर ज़रूरी है। आसान नहीं है, क्योंकि हम इतनी लफ़डेबाजी में फंस गए हैं। जो जितना फंसा हुआ है, उसको उतना ही मुश्किल लगता है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २००८, अमरकंटक)

तर्क की सीमा

तर्क साक्षात्कार तक पहुंचाने के लिए agency है। शब्द का अर्थ होता है - यहाँ तक तर्क है। अर्थ के साथ कोई तर्क नहीं है। इसी का नाम है - साक्षात्कार। अर्थ का मतलब है - अस्तित्व में वस्तु। अर्थ के साथ क्या तर्क करोगे? शब्द का अर्थ समझ में आया = साक्षात्कार हुआ। साक्षात्कार के बाद बोध ही है, अनुभव ही है, अनुभव-प्रमाण बोध ही है, प्रमाणित होने का संकल्प ही है। इतने तक में कोई तर्क नहीं है। अनुभव मूलक विधि से चिंतन करते हुए प्रमाणित होने के लिए जो चित्रण करते हैं - वहाँ से फ़िर तर्क का उपयोग है। सम्प्रेश्ना का तर्क सम्मत होना आवश्यक है - तभी वह शिक्षा में आ सकता है।

साक्षात्कार होता गया तो अनुभव की सम्भावना उदय होता गया। साक्षात्कार पूरा होने पर बोध और अनुभव होता ही है। साक्षात्कार होने से तृप्ति की सम्भावना उदय हो जाती है। तृप्ति अनुभव के बाद ही है। दसों क्रियाएं प्रमाणित होने पर ही जीवन-तृप्ति होती है, इससे पहले नहीं।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २००८, अमरकंटक)

Sunday, December 14, 2008

ज्ञान

व्यापक ही ज्ञान है। ज्ञान में सभी अवस्थाओं का स्वभाव और धर्म निहित होता है। क्रिया में रूप और गुण रहता है। ज्ञान और क्रिया का सह-अस्तित्व है।

स्वभाव और धर्म समझ में आने के बाद मानव को सह-अस्तित्व में बोध होना बन जाता है। सह-अस्तित्व में बोध होना मतलब पूरा अस्तित्व ही समझ में आ जाना।

चारों अवस्थाओं में स्वभाव और धर्म ज्ञान स्वरूप में है - यह मुझ को समझ में आया। अभी तक यह न भौतिकवादी विधि से सफल हुआ था, न आदर्शवादी विधि से। आदर्शवादियों ने जगत को मिथ्या बता कर टाल दिया। भौतिकवादियों ने यंत्र में ले जाकर लटका दिया। इस तरह हम "समझ" से चूक गए। अब विधि यही है - पूरा समझें - और समझ के अनुसार जियें।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २००८, अमरकंटक)

जीवन में मूल्यांकन

मूल्यांकन का मतलब - सम्पूर्ण पहचान। शरीर का पहचान मन करता है। मन शरीर की पूरी हैसियत को पहचानता है।

प्रश्न: "मन शरीर की पूरी हैसियत को पहचानता है" - इसका क्या अर्थ है?

उत्तर: मन शरीर क्रियाओं और शरीर में होने वाली पाँच संवेदनाओं (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध) को पहचानता है।

मन में मान्यता का अधिकार रखा है। शरीर में जो संवेदनाओं को पहचाना तो जीवन शरीर को ही जीवन मान लेता है। यही भ्रम का आधार है। मन ने जैसा पहचाना वैसा ही वृत्ति सहमत हो कर, चित्त में चित्रण सहमत हो जाता है। वहीं तक lock है अभी।

वृत्ति मन को पहचानता है। अर्थात वृत्ति मन का मूल्यांकन करता है। मन ने संवेदनाओ को जो पहचाना उसमें सही ग़लत क्या हुआ - यह तुलन/विश्लेषण वृत्ति में होता है। अनुभव से पहले संवेदनाओं के अर्थ में ही प्रिय-हित-लाभ दृष्टियों से यह सही-ग़लत को तुलन करना बनता है। मन में जो संवेदनाओ की पहचान हुई - उसके अनुमोदन में ही वृत्ति में तुलन, और चित्त में चित्रण हो जाता है। इस तरह वृत्ति शरीर मूलक दृष्टियों से मन का दृष्टा बना रहता है।

चित्त में वृत्ति का मूल्यांकन होता है। चित्त इस बात का दृष्टा होता है कि वृत्ति में क्या तुलन हुआ। यह चित्रण में जाता है। शरीर मूलक जीने में चित्रण से आगे की कोई बात होती नहीं है।

जीवन मूलक जीने में अनुभव से शुरू करते हैं। वह मन से शुरू नहीं होता। अनुभव के अनुरूप बुद्धि, चित्त, वृत्ति, और मन हो जाते हैं। मन के द्वारा शरीर के साथ प्रमाण होता है। इस तरह शरीर के द्वारा जीवन अपने आप को प्रमाणित करता है। इस तरह वृत्ति में प्रिय-हित-लाभ के स्थान पर न्याय-धर्म-सत्य दृष्टियों के आधार पर तुलन होता है। बोध में सह-अस्तित्व की स्वीकृति रहती है। चिंतन पूर्वक न्याय-धर्म-सत्य को प्रमाणित करने की विधि आ गयी। यह होने से जीवन की दसों क्रियाएं प्रमाणित हो गयी।

जीवन मूलक विधि से जीने में वस्तु की पूरी पहचान (रूप, गुण, स्वभाव, और धर्म) तथा सह-अस्तित्व की पूरी पहचान - इन दोनों की पूरी पहचान होती है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २००८, अमरकंटक)

जीवन ज्ञान का पहला सिद्धांत

अधिक बल और शक्ति कम बल और शक्ति के माध्यम से प्रकट होता है जीवन भौतिक-रासायनिक रचना (शरीर) से अधिक बल और शक्ति संपन्न है। इसीलिये जीवन शरीर के माध्यम से प्रकट होता है। जैसे बिजली अपने से कम बल-शक्ति वाली वस्तु के माध्यम से प्रकट होता है। इस बात को अच्छे से समझना पड़ेगा। जीवन-ज्ञान का यह सबसे पहला सिद्धांत है।

जीवन अक्षय बल और अक्षय शक्ति संपन्न है इसमें कम-ज्यादा होने की बात ही नहीं है। सटीक होने की बात है। सटीक होने के लिए गुणात्मक परिवर्तन है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २००८, अमरकंटक)

Friday, December 12, 2008

विचार का मूल रूप

प्रश्न: विचार का मूल रूप क्या है?

उत्तर: विचार का मूल रूप है - तुलन। तुलन ही गति रूप में है - विश्लेषण। वही विचार है। तुलन के बिना आदमी एक कदम आगे नहीं रख सकता। जैसे - प्रिय-तुलन के अर्थ में ठीक लगना, हित-तुलन (शरीर स्वस्थता ) के अर्थ में ठीक लगना, लाभ के अर्थ में ठीक लगना। फ़िर उसी के अनुसार विश्लेषण हो जाता है। कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता के तृप्ति बिन्दु मिलने के प्रयोजन से ही मनुष्य विश्लेषण करता है। मनुष्य के सुख की मूल चाहना के लिए तुलन करना बहुत आवश्यक है। सुख की मूल चाहना के प्रमाणित होने में न्याय-धर्म-सत्य पूर्वक तुलन होता है, यह मध्यस्थ दर्शन का प्रतिपादन है।

प्रश्न: क्या भाषा के साथ ही विचार होता है?

विचार जीवन में है ही। शब्द/भाषा मानव-परम्परा में विचारों की सम्प्रेश्ना के लिए माध्यम है। भाषा के मूल में "भाव" होता है। मध्यस्थ-दर्शन ने "भाव" के मूल में जीवन-क्रियाओं को पहचाना। आशा, विचार, इच्छा, संकल्प, और अनुभव - ये भाव भाषा द्वारा संप्रेषित होते हैं। शब्द द्वारा सम्प्रेश्ना का प्रयोजन है - दूसरे व्यक्ति को किसी क्रिया, प्रयोजन, वस्तु, घटना का बोध कराना।

आदर्शवादियों ने "भाव" को पाँच संवेदनाओं की सीमा में ही पहचाना। ज्ञान ही "पूर्ण भाव" है - ऐसा बताया। भक्ति-वादियों ने जिस देवी-देवता को मानते हैं, उसका स्वरूप ही "पूर्ण भाव" है - यह बता दिया। वह सब रहस्य हो गया - प्रमाण नहीं हुआ।

भौतिकवादी "भाव" को नहीं मानते। जो बात यांत्रिक विधि से प्रमाणित नहीं होता उसको वे मन-घड़ंत बताते हैं।

मध्यस्थ-दर्शन के अनुसार जीवन की १० क्रियाएं (स्थिति में ५, और गति में ५) ही भाव हैं। इन्ही भाव में ही सभी मूल्य निहित हैं। मानव परम्परा में जीवन की १० क्रियाएं ही मौलिक रूप में व्यक्त होने की वस्तु है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २००८, अमरकंटक)

जीने दो, जियो

मानव को चारों अवस्थाओं के साथ संतुलित रहने के लिए आवश्यक नियम है - "जीने दो, जियो"।

ज्ञान-अवस्था (मनुष्य) के साथ सम्बन्ध में "जीने देने" का मतलब है - न्याय। न्याय पूर्वक ही मानव संबंधों में संतुलन प्रमाणित होता है। न्याय का मतलब है - मानव संबंधों में प्रयोजनों की पहचान, मूल्यों का निर्वाह, और उभय-तृप्ति। इस तरह जीने देने पर ही मनुष्य अपने जीने का प्रमाण प्रस्तुत कर पाता है।

जीव-अवस्था के साथ सम्बन्ध में "जीने देने" का मतलब है - जीवों के "जीने की चाहना" धर्म के प्रमाणित होने में पूरक होना, उसमें हस्तक्षेप नहीं करना।

वनस्पति-संसार, रसायन-संसार, और भौतिक संसार के साथ सम्बन्ध में "जीने देने" का मतलब है - उनको "रहने देना"। उनकी प्राकृतिक व्यवस्था में पूरक होना।

इसके विपरीत भौतिकवाद का प्रतिपादन है - "अति बलवान को ही जीने का अधिकार है।" (survival of the fittest।) मतलब - सबको खा पी कर हज़म करो! मध्यस्थ-दर्शन के "जीने दो, जियो" और भौतिकवाद के इस प्रतिपादन में कितना दूरी है? - आप ही तय करो! आप मेरे कहने पर कुछ करो - ऐसा मैं नहीं कहता हूँ। मैं केवल अपराध-मुक्त जीने का रास्ता बताता हूँ। आपको अपराध में ही जीना है तो उसका तो पूरा दूकान ही खुला है! धरती बीमार होने से यह बात तो उजागर हो गयी है कि धरती के साथ मनुष्य द्वारा ज्यादती हुई है। यह तो अब layman को भी पता चल गया है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २००८, अमरकंटक)

Sunday, December 7, 2008

मानव इतिहास - मध्यस्थ-दर्शन के दृष्टिकोण से

मनुष्य जब धरती पर सबसे पहले प्रकट हुआ तो जीव जानवरों की तरह ही जिया। जीव-चेतना में मनुष्य जिया - पर जीवों से अच्छा जीना चाहा। मनुष्य में कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता है - इसी लिए वह जीवों से अच्छा जीना चाहा। यह "अच्छा चाहना" मनुष्य में गुणात्मक परिवर्तन की सहज-अपेक्षा का ही प्रदर्शन है।

मनुष्य ने अपनी कल्पनाशीलता कर्म-स्वतंत्रता के चलते आहार, आवास, अलंकार, दूर-श्रवण, दूर-दर्शन, दूर-गमन की सभी वस्तुओं का इन्तेज़ाम कर लिया। "अच्छा चाहने" के अर्थ में वस्तुओं का तो इन्तेजाम कर लिया पर अपनी आवश्यकता का निर्णय नहीं होने से वस्तुओं के पीछे पागलपन बढ़ता गया। भौतिकवाद व्यवहारिक नहीं हुआ।

कल्पनाशीलता को दूसरे ओर मनुष्य ने "रहस्य" के लिए भी invest किया। "अच्छा चाहने" के लिए ही यह किया, इसमें दो राय नहीं है। रहस्यवाद व्यवहारिक नहीं हुआ।

इस तरह दोनों तरह से मनुष्य को स्थिरता -निश्चयता की जगह नहीं मिली। इसलिए मनुष्य आवारा हो गया। आवारा हुआ तो मनमानी करता ही है। मनमानी करने के परिणाम हमारे सामने आ ही गए हैं। धरती बीमार होने से मनुष्य की गलती उजागर हो गयी। अब विकल्प की आवश्यकता बन गयी।

मानव इतिहास को मैं ऐसे पहचानता हूँ। अभी मानव-इतिहास को ऐसे कोई पहचानता नहीं है। घटना-क्रम को इतिहास बताते हैं। यह घटना हुई, फ़िर दूसरी घटना हुई - इसको अभी इतिहास बताते हैं। मानव में गुणात्मक-परिवर्तन की सहज-अपेक्षा यदि नहीं होती तो मानव-चेतना के इस प्रस्ताव को प्रस्तुत करने की जगह ही नहीं होती। धरती का बीमार होना भी मानव-चेतना में संक्रमित होने की आवश्यकता को ही इंगित करता है। अपेक्षा और आवश्यकता के साथ अब सम्भावना का भी उदय हो गया है। मध्यस्थ-दर्शन के अनुसंधान पूर्वक मानव जाति की जागृति की सम्भावना उदय हो चुकी है। यह एक ऐतिहासिक घटना है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २००८, अमरकंटक)

Saturday, December 6, 2008

सच्चाइयों की स्वीकृति

बोध में सभी सच्चाइयां ही स्वीकार होती हैं। सच्चाइयों का स्वीकृति बुद्धि में ही होता है। verbally नहीं होता। ध्वनी-मत से स्वीकृति नहीं है। वस्तु-मत से है। वस्तु - सह-अस्तित्व स्वरूप में सभी सच्चाइयाँ रखा है। सच्चाइयों का तीन खाका है - सह-अस्तित्व दर्शन ज्ञान, जीवन ज्ञान, और मानवीयता पूर्ण आचरण ज्ञान। सह-अस्तित्व में ही जीवन है, और मानवीयता पूर्ण आचरण है। सह-अस्तित्व में ही पदार्थ-अवस्था, प्राण-अवस्था, जीव-अवस्था, और ज्ञान-अवस्था (मानव) है। सह-अस्तित्व का मूल रूप व्यापक में संपृक्त प्रकृति है। यह पाँच सूत्रों के रूप में है - सह-अस्तित्व, सह-अस्तित्व में विकास-क्रम, सह-अस्तित्व में विकास, सह-अस्तित्व में जागृति-क्रम, सह-अस्तित्व में जागृति। यही पाँच सूत्र अनुभव-मूलक विधि से प्रमाणित होते हैं।

समझ जीने में ही प्रमाणित होती है। समझ गए हैं और "जीने" के लिए प्रयत्न कर रहे हैं - यह एक खाका है। दूसरा खाका है - प्रयत्न पूरा हो गया है, अब प्रमाणित हैं। ये दो ही खाका है। इसके अलावा और कोई तरीका ही नहीं है। यह हर व्यक्ति के साथ प्राण-संकट है, या सौभाग्य है! शरीर के साथ वरीयता करते हैं - तो प्राण-संकट है। शरीर के साथ वरीयता छोड़ते हैं - तो सौभाग्य लगता है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २००८, अमरकंटक)

वैचारिक फंसावट का विकल्प

मनुष्य जाति की वैचारिक-फंसावट दो जगह है।

(१) शरीर को जीवन मान लेना
(२) रहस्यमय आस्था

शरीर को जीवन मान लेने से शरीर से होने वाली संवेदनाओं को राजी रखने के लिए भौतिक साधनों की होड़ शुरू हो जाती है। जीवन की अक्षय अपेक्षाएं सामयिक शरीर-संवेदनाओं से पूरी हो नहीं सकती - चाहे कितने भी भौतिक साधन इकठ्ठा कर लें। शरीर को जीवन मान लेने से सुविधा-संग्रह ही जीवन का लक्ष्य बन जाता है। सुविधा-संग्रह का तृप्ति-बिन्दु मिलता नहीं है। किसी एक व्यक्ति को भी नहीं मिला, न आगे किसी को मिलने की सम्भावना है। यही भौतिकवाद की वैचारिक फंसावट है। इसका निदान यही है - शरीर को शरीर जाना-माना जाए, जीवन को जीवन जाना-माना जाए। शरीर जीवन का साधन है।

रहस्यमय आस्था का मतलब है - बिना जानते हुए मान लेना। रहस्य का पूजा करो! आस्था करो! शास्त्र में जो लिखा है - वह मान लो! आज्ञापालन, उपदेश, भाषण को मान लो! आस्था के आधार पर जीना आज भी जन-सामान्य को सुविधा-संग्रह के बनिस्पत ज्यादा अच्छा लगता है। लेकिन अच्छा लगने मात्र से अच्छा हुआ नहीं। आस्था का प्रमाणीकरण नहीं हुआ। हम आस्था ही करते रह गए। यही आदर्श-वाद की वैचारिक फंसावट है। इसका निदान है - माने हुए को जान लो, जाने हुए को मान लो। बिना जाने हुए मान लेना रूढी है। जान कर मानते हुए जीना प्रमाण है।

मध्यस्थ-दर्शन भौतिकवाद और आदर्शवाद दोनों के विकल्प के स्वरूप में प्रस्तुत हुआ है। इसमें प्रस्तावित है:
समझदारी से समाधान
श्रम से समृद्धि

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २००८, अमरकंटक)

Friday, December 5, 2008

अध्ययन-क्रम में अपना मूल्यांकन

अध्ययन-क्रम में जीवन की ४.५ क्रियाएं १० क्रियाओं को पूरा करने के पक्ष में रहती हैं। अध्ययन पूरा करने के बाद ही दसों क्रियाओं का प्रमाण हो पाता है।

प्रश्न: अध्ययन करते समय स्वयं को ४.५ क्रिया में माने या उससे अधिक?

कहाँ मान सकते हैं ४.५ से अधिक? यही कह सकते हैं - ४.५ क्रिया से जो प्रयोजन था, वह पूरा होता जा रहा है। साड़े चार क्रिया पूर्वक आप भ्रमित पहले जी रहे थे। वहाँ आपको अनुमान हुआ - ऐसे जीना पर्याप्त नहीं है। उसके बाद आपको दसों क्रियायें चालित करने का स्त्रोत मध्यस्थ-दर्शन के रूप में मिल गया। उसके अध्ययन में आप लग गए। अध्ययन-क्रम में आपको लगा कुछ भाग आपको बोध हो गया है, कुछ बोध होना शेष है। तब तक आपके जीवन की ४.५ क्रियाओं का समर्पण १० क्रियाओं के लिए हो गया कि नहीं? इससे ४.५ क्रिया से उत्थान की ओर गति हुई। उत्थान हो गया तब मानेंगे जब दसों क्रियायें प्रमाणित हुआ।

अध्ययन-क्रम में ४.५ क्रियायें १० क्रियाओं को पूरा करने के लिए समर्पित रहती हैं। गुणात्मक परिवर्तन के लिए समर्पित होना जिज्ञासा के आधार पर आता है। जिज्ञासा कैसे आया? जीव-चेतना में जीने से जो धक्के खा रहे हैं - उससे आया! जीव-चेतना में जीने से असहमति स्वयं में होने के बाद "सही क्या है?" - इसके लिए स्वयं में जिज्ञासा उदय होती है। सही का अध्ययन करते हुए हमको जितना संतुष्टि मिलती है उसको हम तत्काल प्रकाशित करते ही हैं। इस ढंग से हैं - अपने (जीवन विद्या) परिवार में सभी आज। यह ग़लत नहीं हुआ। इससे उपकार यह हुआ - संसार में इस प्रस्ताव की एक ध्वनी तो पहुँचने लगी! लोगों के ध्यान-आकर्षण के लिए यह ध्वनी पहुंचना जरूरी था।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २००८, अमरकंटक)

Wednesday, December 3, 2008

सम्पृक्तता

मध्यस्थ-दर्शन प्रस्तावित करता है - "ईश्वर में कण-कण है। " (यह आदर्शवाद की मान्यता से भिन्न है - जिसने कहा "कण-कण में ईश्वर है।") ईश्वर को व्यापक वस्तु के रूप में पहचाना। कण-कण को प्रकृति के रूप में पहचाना। हर वस्तु व्यापक (ईश्वर) में डूबी भीगी और घिरी है। व्यापक ही ऊर्जा है - जिसमें संपृक्त होने से कण-कण ऊर्जित है। अस्तित्व को व्यापक में संपृक्त जड़ और चैतन्य प्रकृति के स्वरूप में पहचाना। ईश्वर है। प्रकृति भी है। दोनों साथ-साथ हैं। अस्तित्व सह-अस्तित्व है।

अस्तित्व में जो कुछ भी हो रहा है - उसको कारण-गुण-गणित के संयुक्त स्वरूप में समझा जा सकता है, समझाया जा सकता है। कारण सह-अस्तित्व है। हर घटना, स्थिति-गति का मूल कारण सह-अस्तित्व ही है। गुण - सम, विषम, और मध्यस्थ है। गुण इकाइयों की परस्परता में प्रकट होते हैं। गणना = गणित। कारण को समझे बिना गुण और गणित से अस्तित्व को पूरा समझा नहीं जा सकता।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २००८, अमरकंटक)

Sunday, November 30, 2008

विगत की मान्यताओं का विकल्प

व्यापक में प्रकृति प्रेरणा पाने योग्य स्थिति में है। प्रकृति व्यापक में स्वयं स्फूर्त विधि से प्रेरणा पाता ही रहता है। व्यापक ऊर्जा स्वरूप में है। प्रकृति व्यापक में संपृक्त होने के कारण ऊर्जा-संपन्न रहती ही है। इस सम्पृक्त्ता के कारण ही प्रकृति में क्रियाशीलता है। यह क्रियाशीलता पूर्वक ही सह-अस्तित्व सहज नियति-क्रम का प्रकटन है। नियति-क्रम है - विकास-क्रम, विकास, जागृति-क्रम, जागृति।

सह-अस्तित्व को न पहचानने से, जीवन को न पहचानने से, मानवीयता पूर्ण आचरण को न पहचानने से - इसके विपरीत कुछ मान्यताएं रहती हैं। इन मान्यताओं में परस्पर कोई तालमेल न बैठने से मनुष्य-जाति को कोई निश्चित समझदारी हाथ लगा नहीं - जिससे न्याय प्रदायी क्षमता स्थापित की जा सके, सही कार्य-व्यवहार किया जा सके, सत्य-बोध कराया जा सके। विगत की मान्यताओं से इनको लेकर मानव जाति - ज्ञानी, अज्ञानी, और विज्ञानी - सर्वथा असफल रहे। यह फ़ैसला हम अपने में नहीं कर पाते हैं, तो इस प्रस्ताव के अध्ययन में हम आगे बढ़ नहीं सकते। विगत की किसी मान्यता के साथ इस प्रस्ताव का गुड-गोबर ही करेंगे। गुड-गोबर करेंगे तो न गुड हाथ लगना है, न गोबर!

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक)

Saturday, November 29, 2008

चेतना विकास

चेतना-परिवर्तन की परिकल्पना ईश्वर-वादियों ने दिया। भौतिक-वादी ऐसी परिकल्पना भी दे नहीं पाये। भौतिक-वादियों के पास चेतना-परिवर्तन की प्रेरणा देने के लिए कोई अर्हता नहीं है। भौतिक वाद के पास ऐसा कोई माद्दा ही नहीं है, वह बीज ही नहीं है।

चेतना-विकास से मध्यस्थ-दर्शन का क्या आशय है?

चेतना विकास से आशय है - जीव-चेतना से मानव-चेतना में संक्रमित होना। जीव-चेतना का अर्थ है :- प्रिय-हित-लाभ दृष्टियों से विचार करते हुए चार विषयों (आहार, निद्रा, भय, और मैथुन) और पाँच संवेदनाओं (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध) के लिए जीना। मानव-चेतना का अर्थ है - ज्ञान (सह-अस्तित्व दर्शन ज्ञान, जीवन-ज्ञान, मानवीयता पूर्ण आचरण ज्ञान) और उससे अनुबंधित विवेक और विज्ञान के अनुसार जीना। ज्ञान-विवेक-विज्ञान कुल मिला कर मानव-चेतना का विस्तार है। मध्यस्थ-दर्शन मानव-चेतना में संक्रमित होने के लिए अध्ययन विधि (शिक्षा) को प्रस्तावित करता है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक)

सह-अस्तित्व में प्रकटनशीलता स्वाभाविक है.


सह-अस्तित्व चार अवस्थाओं के रूप में प्रकट होने के लिए तीन प्रकार की क्रियायें हैं - भौतिक क्रिया, रासायनिक क्रिया, और जीवन क्रिया। प्राकृतिक रूप में प्रकटन के बाद परम्परा है। मतलब - कोई अवस्था जब प्रकट होती है, तब उसके बने रहने का स्वरूप परम्परा के रूप में स्थापित प्राकृतिक रूप में हो जाता है। इनमें "घटना-बढ़ना" भ्रमित मनुष्य की प्रवृत्ति और कार्य-व्यवहार से होता है।

पदार्थ-अवस्था ही प्राण-अवस्था को यौगिक विधि से प्रकट करता है। यह स्वयं-स्फूर्त विधि से होता है। इसको कोई बाहरी ताकत नहीं करता। विगत (आदर्श-वाद) में बताया था - "यह परमात्मा की करनी है।" मध्यस्थ-दर्शन ने परमात्मा को व्यापक स्वरूप में पहचाना। परमात्मा (व्यापक) का प्रकटन में "करने वाले" के रूप में कोई रोल नहीं है। परमात्मा (व्यापक) जड़-चैतन्य प्रकृति में प्रेरणा के स्वरूप में है ही! जड़ प्रकृति परमात्मा (व्यापक) में भीगे होने से प्रेरित है, जिससे क्रियाशील है। यह प्रेरणा नित्य है। यह प्रेरणा घटता बढ़ता नहीं है। वस्तु की क्रिया से व्यापक में कोई क्षति होता ही नहीं है। व्यापक में प्रेरणा अभी मिला, बाद में नहीं मिला, अभी ज्यादा मिला, बाद में कम मिला - ऐसा कुछ नहीं होता।

परमाणु अंश भी इस तरह ऊर्जा-संपन्न है, और घूर्णन गति के रूप में क्रियाशील है। सभी परमाणु-अंश एक जैसे हैं। परमाणु की प्रजातियों में भेद उनके गठन में समाहित होने वाले परमाणु-अंशों के अनुसार है। सभी तरह के परमाणु-प्रजातियों के प्रकट होने के बाद भौतिक-संसार तृप्त हो जाता है। उसके बाद ही वह यौगिक-क्रिया में प्रवृत्त होता है। भौतिक-क्रिया में तृप्ति के बाद ही यौगिक क्रिया में प्रवृत्ति बन जाती है। फ़िर स्वयं स्फूर्त विधि से यौगिक प्रकटन होता है। यौगिक प्रकटन के लिए समस्त प्रकार के भौतिक-परमाणु सहायक (पूरक) हो जाते हैं। यौगिक प्रकटन के लिए "भूखे" परमाणु भी सहायक हैं, "अजीर्ण" परमाणु भी सहायक हैं। यौगिक विधि से सर्वप्रथम जल ही प्रकट हुआ।

सह-अस्तित्व में प्रकटनशीलता स्वाभाविक है। इसी प्रकटनशीलता के आधार पर प्राण-अवस्था स्थापित हो गयी। प्राण-कोष में निहित प्राण-सूत्रों में उत्तरोत्तर गुणात्मक विकास से नयी रचना विधि का प्रकटन होता है। इसी क्रम में प्राण-अवस्था के सभी झाड़, वनस्पति, औषधि प्रकट होने के बाद प्राणावस्था तृप्त हो गयी। प्राण-अवस्था तृप्त होने के बाद जीव-अवस्था की रचनाएँ शुरू हुई। जीव-अवस्था भुनगी-कीडे (स्वेदज संसार) से शुरू हो कर अंडज और पिंडज दो प्रकार की प्रजातियाँ स्थापित हुई। उनमें से जलचर, भूचर, और नभ-चर तीनो प्रकार के जीव हुए। शाकाहारी जीवों में प्रजनन क्रिया द्वारा multiplication ज्यादा होता है। मांसाहारी जीवों में अपेक्षाकृत कम multiplication होता है। शाकाहारी संसार की संख्या में संतुलन करने के लिए मांसाहारी संसार का प्रकटन हुआ - यह मुझको समझ में आया। जीवावस्था के सभी वंश-परम्पराएं स्थापित होने के बाद मानव-शरीर रचना का प्रकटन हुआ।

मानव-शरीर रचना सर्व-प्रथम किसी जीव से ही प्रारंभ हुआ, उसके बाद मानव-परम्परा शुरू हुई। जल, सघन-वन, सभी प्रकार के जीव-जानवर प्रक ट होने के बाद ही मनुष्य का प्रकटन हुआ। इन्ही के बीच मनुष्य पला। मनुष्य-शरीर के प्रकटन के साथ ही जीवन अपनी कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता प्रकट करने की जगह में आ गया। सह-अस्तित्व सहज प्रकटन विधि से इतने सब श्रम के बाद मनुष्य का प्रकटन इस धरती पर हुआ।

मनुष्य ने अपनी कल्पनाशीलता के चलते पहले वनों का संहार करना शुरू किया। विज्ञान युग आने के बाद खनिज-संसार का संहार करना शुरू कर दिया। जबकि - वन और खनिज के संतुलन से ही ऋतु-संतुलन होता है। बिना ऋतु-संतुलन के मनुष्य-जाती का धरती पर बने रहना सम्भव नहीं है। इस बात को आज के संसार के सामने highlite करने की ज़रूरत है। यह जो मैं समझा रहा हूँ - यह waste नहीं जाना चाहिए।

मनुष्य ने अपनी कल्पनाशीलता के प्रयोग से अपनी परिभाषा के अनुरूप मनाकार को साकार करने का काम बहुत अच्छे से कर लिया। मनः-स्वस्थता का खाका वीरान पड़ा रहा। मनुष्य के प्रकट होने से पहले जीव-चेतना जीव-अवस्था द्वारा प्रकट हो चुकी थी। मनुष्य ने पहले जीवों जैसे ही जीने का प्रयत्न किया, फ़िर जीवों से अच्छा जीने का प्रयत्न किया। जीवों से अच्छा जीने के लिए मनुष्य ने जीव-चेतना का ही प्रयोग किया। इससे "अच्छा लगने" तक हम पहुँच गए। "अच्छा होना" इससे बना नहीं। "अच्छा लगने" की दौड़ में सुविधा-संग्रह लक्ष्य बना कर धरती का शोषण किया, और मनुष्य-परस्परता में अपराध किया। इसके चलते चलते धरती ही बीमार हो गयी। अब विकल्प की आवश्यकता आ गयी। उसी अर्थ में मध्यस्थ-दर्शन अध्ययन के लिए प्रस्तुत है। मध्यस्थ-दर्शन (जीवन विद्या) मनुष्य-जाति के लिए जीव-चेतना से मानव-चेतना में संक्रमित होने लिए प्रस्ताव है। मानव चेतना पूर्वक ही मानव-परम्परा धरती पर बनी रह सकती है। और किसी विधि से नहीं।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक)

Friday, November 28, 2008

प्रबोधन

प्रबोधन का मतलब है - परिपूर्णता के अर्थ में शब्दों को व्यक्त करना। प्रबोधन का प्रयोजन है - सामने व्यक्ति को बोध होना। बोध होने के बाद वही व्यक्ति जिसको बोध हुआ, अनुभव पूर्वक पुनः प्रबोधित करेगा। इस ढंग से यह multiply होता है। कितने भी multiply होने पर ज्ञान न कम होता है, न ज्यादा। न भाग होता है, न विभाग होता है। जितना हम दूसरों को बोध कराते हैं - हमारा प्रसन्नता उतना ही बढ़ता है। इस प्रसन्नता से और लोगों को बोध कराने का उत्साह बनता है। इससे मनुष्य थकने वाले गुण से मुक्त होता है। सत्य बोध जिनसे हुआ - उनके प्रति कृतज्ञ रहना ही बनता है। उसका return वही है। इससे ज्यादा उसका return होता भी नहीं है।

मंगल-मैत्री के बिना प्रबोधन सफल हो ही नहीं सकता। मंगल-मैत्री पूर्वक हम एक दूसरे पर विश्वास कर सकते हैं। सुनने वाले और सुनाने वाले दोनों। वही है संगीत। संगीत विधि से ही सम्प्रेष्णा होता है। सुनाने वाले को यह विश्वास हो कि सुनने वाला ईमानदारी से सुन रहा है - और उसको बोध होगा। सुनने वाले को यह विश्वास हो कि सुनाने वाला ईमानदारी से सुना रहा है - वह स्वयं बोली जा रही बात में पारंगत है, प्रमाण है।

अभी की स्थिति में १२ वी कक्षा के ८०% से अधिक बच्चे पढाने वाले को नालायक मानते हैं। उनसे अपने को श्रेष्ठ मानते हैं। पैसे के आधार पर। "हमने पैसा दिया है - यह पढाएगा!" - ऐसी इनकी सोच है। पढाने वाला स्वयम आत्म-विश्वास से संपन्न नहीं है। इस स्थिति में प्रबोधन की कोई बात ही नहीं है।

बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)

सह-अस्तित्व दर्शन ज्ञान

साधना समाधि संयम पूर्वक जो मैंने अध्ययन किया - उसमें सर्वप्रथम सह-अस्तित्व को देखा। देखने का मतलब है समझा। इससे "पैदा होता है और मरता है" - इस विपदा से छूट गए। परिवर्तन होता है, परिणाम होता है - यह पता लगा। रचना की विरचना हो सकती है। मरता कुछ नहीं है। जैसे - शरीर की रचना गर्भाशय में होती है। शरीर की विरचना भी होती है। सत्ता में संपृक्त जड़-चैतन्य प्रकृति को सह-अस्तित्व स्वरूप में देखा - यही परम सत्य है। नित्य-वर्तमान यही है। मैंने जो साधना की थी, उसके मूल में जिज्ञासा थी - "सत्य से मिथ्या कैसे पैदा होता है?" उसका उत्तर मिला - अस्तित्व में कुछ भी असत्य नहीं है। अस्तित्व सह-अस्तित्व स्वरूपी है। सह-अस्तित्व में असत्य की कोई जगह ही नहीं है। "ब्रह्म सत्य - जगत मिथ्या" - जो शास्त्रों में लिखा है, वह ग़लत सिद्ध हो गया। उसकी जगह होना चाहिए - "ब्रह्म सत्य - जगत शाश्वत"।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक )

Tuesday, November 25, 2008

स्वभाव गति में ही अध्ययन होता है.

समझने के क्रम में यथासंभव स्वभाव-गति को बनाए रखें। स्वभाव-गति में ही मंगल-मैत्री होती है। आवेशित-गति में मंगल-मैत्री नहीं होती। बेहोश रहने में भी नहीं होती। तीसरे - चंचलता बने रहने में भी स्वभाव-गति नहीं रहती।

स्वभाव-गति में ही अध्ययन होता है।

मन सुनते समय भटकता है, इधर-उधर भागता है - तब स्वभाव-गति नहीं होती। मन को एक ही समय में तीन जगह रहने का अधिकार है - इसीलिये अध्ययन के लिए मन को एक जगह स्थिर करने की आवश्यकता है। इसी का नाम है - ध्यान। यदि आपने ध्यान दिया तो अस्तित्व में कोई ऐसी चीज नहीं है, जो आपको बोध न हो। अस्तित्व में किसी वस्तु पर बुरका नहीं लगा है। अस्तित्व की सभी वास्तविकताएं सह-अस्तित्व स्वरूप में प्रकट ही हैं। इसीलिये अस्तित्व को समझे हुए आदमी द्वारा दूसरे को बोध कराना सहज है। इसी का नाम "प्रबोधन" है। प्रबोधन को सुनने वाला "स्वभाव-गति" में ही receive करता है। receive करने के बाद यदि कोई बात संतुष्टि नहीं दे पाता है, उस स्थिति में सुनने वाला "जिज्ञासा" करता है - संतुष्ट होने के लिए। इस प्रकार सुनाने वाले और सुनने वाले के बीच मंगल मैत्री पूर्वक सारे बात स्पष्ट हो सकता है। सुनने वाले और सुनाने वाले को वस्तु समान रूप से स्पष्ट हो गयी - तो दोनों के बीच कोई अन्तर नहीं रह गया। इसी को "अनन्यता" या "प्रेम" कहा है।

प्रेम या अनन्यता के बारे में परम्परा में नवधा-भक्ति (नारद भक्ति सूत्र) की बात किया गया है। इसमें ९ सीढियों से गुजरने की बात कहा गया है। कब उन नौ सीढियों को कोई पूरा करेगा, किसी को पता नहीं चला!

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)

Monday, November 24, 2008

समझदारी की घोषणा का मतलब

सह-अस्तित्व स्वरूपी अस्तित्व की वास्तविकताओं को आपने सटीक पहचाना है, इसका प्रमाण आपके जीने में ही आएगा। व्यक्ति के प्रमाणित होने का मतलब - उस व्यक्ति द्वारा अन्य लोगों को समझा देना। प्रमाणित होने का स्वरूप है - समझे हुए को समझाना, सीखे हुए को सिखाना, किए हुए को कराना। समझदारी का और कौनसा प्रमाण हो सकता है - आप बताओ? समझा देना ही समझे होने का प्रमाण होता है।

प्रश्न: आपने अनुसंधान पूर्वक समझा, उसमें पूरा समझने के बाद ही दूसरों को समझाने की बात रहीलेकिन हम जो अध्ययन विधि से चल रहे हैं, उसमें आप कहते हैं - जितना समझे हो, उतना समझाते भी चलोइसको समझाइये

उत्तर: समझाने से अपनी समझ को पूरा करने का उत्साह बनता है। जैसे आपने थोड़ा सा समझा, उसको दूसरे को समझाया - उससे आप में और आगे समझने का उत्साह बनता है। यह खाका ग़लत नहीं है। यह समझने की गति बढाता है। हमें उत्सवित भी रहना है, सच्चाई को समझना भी है, और सच्चाई को प्रमाणित भी करना है। कुछ लोग पूरा समझ के ही समझाना चाहते हैं - वह भी ठीक है। कुछ लोग समझते-समझते समझाना भी चाहते हैं - वह भी ठीक है। लक्ष्य है - समझदारी हो जाए। समझदारी के बिना प्रमाण होता नहीं है। समझदारी के पूरा हुए बिना "जीना" तो बनेगा नहीं। यही कसौटी है। "जीना" बन गया तो समझदारी पूरा हुआ, समझाना बन गया। उसके बाद उत्साहित रहने के अलावा और क्या है - आप बताओ?

इसमें व्यक्तिवाद जोड़ा तो अकड़-बाजी होने लगती है। अकड़-बाजी होती है, तो हम पीछे हो जाते हैं। व्यक्तिवाद जोड़ने से पिछड़ना ही है।

प्रश्न: व्यक्तिवाद के चक्कर से बचने का क्या उपाय है?

उत्तर: स्व-मूल्यांकन को हमेशा ध्यान में रखा जाए। दूसरों को जांचने जाते हैं - तो दिक्कत है। जो स्वयं को पारंगत घोषित किया है, उसे ही जाँचिये। जैसे मैंने अपने को ज्ञान में पारंगत घोषित किया है, आप मुझको जांच ही सकते हैं। मुझको जांचने में किसीको झिझक नहीं होनी चाहिए। मुझको उससे कोई दिक्कत नहीं है।

प्रश्न: समझदारी की घोषणा का क्या मतलब है?

जो स्वयं को समझदार घोषित किया है, उसके परीक्षण से ही अध्ययन करने वाले को अपनी समझ की पुष्टि मिलती है। घोषित किए बिना आपको कोई जांचने जायेगा नहीं।

मैं पहला व्यक्ति हूँ - जिसने स्वयं को समझदारी का प्रमाण घोषित किया। एक आदमी के ऐसे घोषणा किए बिना इस कार्यक्रम में कोई गति हो ही नहीं सकती थी। कितना बड़ा भारी ख़तरा ओढ़ लिया है - आप सोचो!! इसके बावजूद मैं निर्भय हूँ, मुझे कोई आतंक नहीं, कोई शंका नहीं, किसी तरह का प्रतिक्रिया नहीं - क्या बात है यह? क्या चीज है यह? यह एक सोचने का मुद्दा है आप के लिए। मैंने जो समझदारी के प्रमाण होने का जो पहला मील का पत्थर रख कर जो रास्ता शुरू किया - वह ठीक हुआ, ऐसा मैं मानता हूँ।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २००८, अमरकंटक)

Sunday, November 23, 2008

अध्ययन सुगम है

अज्ञात को ज्ञात करने की तीव्र इच्छा मुझ में थी। उसके लिए मैंने २० वर्ष समाधि के लिए, और ५ वर्ष संयम के लिए लगाया। संयम-काल में प्रकृति ने अपने एक एक पन्ने को खोलना शुरू किया। जैसा प्रकृति प्रस्तुत हुआ, मैंने वैसा ही अध्ययन किया। आप किताब खोल कर प्रकृति के बारे में पढ़ते हो - (संयम काल में) प्रकृति ने अपने आप को खोल कर मुझ को पढाया। पहले सह-अस्तित्व कैसे है, क्यों है - यह आया। उसके बाद विकास-क्रम कैसे है, क्यों है - यह आया। इसके साथ भौतिक रासायनिक रचना के स्वरूप में शरीर, उसके मूल में प्राण-कोष, प्राण-सूत्र यह सब आ गया। पूरी शरीर रचना के मूल में प्राण-सूत्र हैं। पूरी भौतिक रचनाओं के मूल में अणु-परमाणु हैं। फ़िर विकास (गठन पूर्णता) कैसे है, क्यों है - यह आ गया। जीवन और शरीर के संयुक्त रूप में जीव भी आ गया। जीने के मूल में जीवन है - यह स्पष्ट हुआ। इस तरह प्रकृति में तीन तरह की क्रियाएं हैं - भौतिक क्रिया, रासायनिक क्रिया, और जीवन क्रिया। मैं स्वयं क्यों-कैसे काम कर रहा हूँ - इस जगह पर पहुँचने पर अपने "जीवन" का अध्ययन किया।

जीवन क्रिया के विस्तार में जाने पर उसके १२२ आचरणों को पहचाना। (जैसे) मन की क्रियाओं को मैंने देखा है। जीवन के मन परिवेश (चौथा परिवेश) में शरीर संवेदना पूर्वक होने वाले अलग-अलग आस्वादनो की पहचान करने वाली क्रियाओं को मैंने पहचाना। इस तरह - जीवन के अध्ययन के साथ मनुष्य का भी अध्ययन हुआ। जीवन और शरीर के संयुक्त रूप में मैंने मानव का अध्ययन किया है। जीवंत शरीर सहित मैंने जीवन का अध्ययन किया। सभी में वैसे ही जीवन है, यह स्वीकारा। इसको "सिन्धु-बिन्दु न्याय" कहा। अकेले जीवन का ही अध्ययन होता, मनुष्य (जीवन और शरीर का संयुक्त स्वरूप) का अध्ययन नहीं होता - तो मनुष्य जाति के लिए इस बात का प्रयोजन नहीं निकलता। जीवन का अध्ययन मानव के जीने के अर्थ में ही है।

मैंने जो अध्ययन पूर्वक अनुभव किया वह मेरे अकेले के परिश्रम का फल नहीं है, यह समग्र मानव जाति के पुण्य का फल है - यह मैंने स्वीकार लिया। इसी लिए इसको मानव जाति को पकडाने का दायित्व मैंने स्वीकारा। मैंने जैसा अध्ययन किया वैसा ही उसको शब्दों में रखने का कोशिश किया। शब्द परम्परा के हैं - परिभाषा मैंने दी है।

अभी तक मनुष्य परम्परा में जो कुछ भी अध्ययन के आधार हैं - वे मनुष्य द्वारा ही प्रस्तुत किए गए। उन आधारों से तथ्य तक पहुँचने का कोई रास्ता नहीं मिला। प्रचलित सभी आधारों को छोड़ कर के यह बात है। परम्परा-गत आधारों पर चलने से मानव-जाति न्याय-धर्म-सत्य तक नहीं पहुँचा था, इसीलिये भ्रम-मुक्त और अपराध-मुक्त नहीं हुआ था। इसी लिए यह नया आधार अनुसंधानित हुआ। मैं इस नए आधार का प्रणेता हूँ। आप इसको जांच करके देखिये - पूरा पड़ता है या नहीं? जांचने का अधिकार हर व्यक्ति के पास रखा है।

अध्ययन विधि से पहले यह आपके साक्षात्कार में लाना है। साक्षात्कार हो सकता है, यहाँ तक आप पहुंचे। साक्षात्कार हो गया है - वहां आप को पहुंचना है। उसके बाद अनुभव हो गया है - वहां पहुंचना है। उसके बाद प्रमाण हो गया - वहां पहुंचना है। अध्ययन प्राथमिकता में आता है, तो हम जल्दी पहुँच सकते हैं। अध्ययन यदि द्वितीय-तृतीय प्राथमिकता में रहता है तो हम धीरे-धीरे पहुँचते हैं - इसमें क्या तकलीफ है? प्राथमिकता में जब तक यह नहीं आता है तब तक दूर ही दीखता है। इस बात के अध्ययन में कहीं अहमता बनता नहीं, कहीं कोई विरोध होता नहीं - इससे ज्यादा क्या सुगमता खोजा जाए?

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २००८, अमरकंटक)

Tuesday, November 18, 2008

कल्पनाशीलता की महिमा वश ही मनुष्य अस्तित्व में अध्ययन का साहस जुटा पाता है.

नियति सहज विधि से मनुष्य-शरीर रचना धरती पर प्रकट हुई। पदार्थ-अवस्था से प्राण-अवस्था, प्राण-अवस्था से जीव-अवस्था, और जीव-अवस्था से ज्ञान-अवस्था का प्रकटन हुआ। मनुष्य-शरीर रचना ऐसी हुई कि जीवन उसके द्वारा अपनी कल्पनाशीलता को प्रकाशित कर पाया। यदि कल्पनाशीलता नहीं होती तो मनुष्य ज्ञान के लिए प्रयत्न ही नहीं करता। कल्पनाशीलता-कर्म स्वतंत्रता का प्रकाशन ही मनुष्य और जीवों में मूल अन्तर है। कल्पनाशीलता की महिमा वश ही मनुष्य अस्तित्व में अध्ययन का साहस जुटा पाता है।

कल्पनाशीलता का भ्रूण रूप जीवावस्था में जीने की आशा के स्वरुप में है। जीने की आशा के प्रकाशन के रूप में जीव जानवर चयन क्रिया संपादित करते हैं. चयन क्रिया का भ्रूण रूप प्राणावस्था (पेड़ पौधों) में है। अपने लिए आवश्यक रस द्रव्यों को जड़ें चयन कर लेती हैं।

प्राणावस्था की शरीर रचनाएँ मूलतः प्राण-कोशिकाओं से बनी हैं। प्राण-कोशों में प्राण सूत्र हैं। उन प्राण-सूत्रों में रचना-विधि है, जिसके अनुरूप प्राण-कोशाएं रचना कार्य में संलग्न होती हैं। रचना-विधि में गुणात्मक परिवर्तन होने से प्राण-सूत्रों में नयी तथा और समृद्ध रचना-विधि स्वयं-स्फूर्त निकल आती है। जिससे नयी तरह की रचना तैयार होती है। इस तरीके से उत्तरोत्तर विकसित प्राण-अवस्था की रचनाएँ तैयार हो गयी।

प्राणावस्था की शरीर-रचनाओं में से कुछ में चलायमानता होते हुए भी जीवन उनको नहीं चलाता। जैसे - कीडे मकौडे, जौंक, आदि। उन जीवों में जीवन है, जिनमें - (१) सप्त धातुओं से रचित शरीर हो, (२) समृद्ध मेधस हो, (३) जो मनुष्य के संकेतों को पहचानते हों।

शरीर-रचना में विकास क्रम मनुष्य शरीर रचना तक पहुँचा। मनुष्य-शरीर रचना में मेधस पूर्ण समृद्ध हो गया। समृद्धि पूर्ण मेधस द्वारा जीवन मनुष्य शरीर द्वारा कल्पनाशीलता और कर्म स्वतंत्रता को प्रकाशित करने में समर्थ हुआ। इसी कल्पनाशीलता और कर्म स्वतंत्रता के चलते मनुष्य जंगल-युग, शिला-युग, धातु-युग, ग्राम-कबीला युग, राज-युग से चलते चलते आज तक पहुँच गया। इससे मनुष्य अपनी परिभाषा के अनुरूप मनाकार को साकार करने में सफल हो गया। लेकिन मनः स्वस्थता का पक्ष अभी तक वीरान पड़ा रहा।

मनः स्वस्थता के पक्ष को भरने के लिए मनुष्य अनुसंधान करता रहा। इसी अनुसंधान क्रम में आदर्शवाद और भौतिकवाद आए। मध्यस्थ-दर्शन का अनुसंधान भी इसी क्रम में ही हुआ। यह अनुसंधान सफल हो गया। इस अनुसंधान ने मनः स्वस्थता के स्वरूप को पहचान लिया, और जीने में प्रमाणित कर दिया। अनुसंधान को अध्ययन गम्य बनाने के लिए इसको शब्दों में प्रस्तुत किया गया। शब्द कल्पनाशीलता के लिए सहारा हैं - अर्थ तक पहुँचने के लिए। शिक्षा विधि से इस अनुसंधान के लोकव्यापीकरण के लिए प्रयास जारी हैं।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २००८, अमरकंटक)

मानव की परिभाषा

मनाकार को साकार करने वाला, और मनः स्वस्थता की आशा करने वाला - तथा प्रमाणित करने वाला मानव है।

मानव जीवन और शरीर का संयुक्त स्वरूप है।

मनाकार से अर्थ है - रूप और गुण के अनुसार चित्रण करना। यह कल्पनाशीलता की महिमा है। जीवन में आशा, विचार, और इच्छा का संयुक्त रूप है - कल्पना। कल्पना से ही मनुष्य अपनी योजना, कार्य-योजना बनता है, उनको क्रियान्वित करता है।

मनः स्वस्थता की मनुष्य में सहज-अपेक्षा रहती है। हर मनुष्य सुख चाहता है। सुख की आशा हर मनुष्य में है। सुख की निरंतरता ही मनः स्वस्थता का स्वरूप है। समाधान ही सुख है। हर मनुष्य अध्ययन पूर्वक समाधानित हो सकता है, और सुख की निरंतरता को अपने जीने में प्रमाणित कर सकता है।

सुख की निरंतरता को जीने में प्रमाणित करना ही मनः स्वस्थता का प्रमाण है।

मनाकार को साकार करने में मनुष्य सफल हो चुका है। सामान्य-आकांक्षा (आहार, आवास, अलंकार) और महत्त्वाकांक्षा सम्बंधित वस्तुओं का उपार्जन इसी तरह हुआ।

मध्यस्थ-दर्शन मनः स्वस्थता को प्रमाणित करने के लिए एक प्रस्ताव है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित।

Monday, November 17, 2008

तत्-सान्निध्य, तदाकार, और तद्रूप

वस्तु का मतलब है - जो अपनी वास्तविकता को प्रकाशित करे। दो तरह की वस्तुएं हैं। इकाइयां या प्रकृति - जिनको हम गिन सकते हैं। और दूसरी व्यापक (Space or emptiness), जिसमें सभी इकाइयाँ डूबी-भीगी-घिरी हैं। इकाइयों की वास्तविकता चार आयामों में है - रूप, गुण, स्व-भाव, और धर्म। व्यापक (शून्य) की वास्तविकता तीन आयामों में है - पारगामियता, पारदर्शिता, और व्यापकता। व्यापक में संपृक्त प्रकृति ही अस्तित्व समग्र है। मध्यस्थ-दर्शन अस्तित्व के अध्ययन का प्रस्ताव है।

प्रस्ताव शब्दों में है। शब्द का अर्थ होता है। अर्थ के मूल में अस्तित्व में वस्तु होता है। अध्ययन पूर्वक वस्तु का अर्थ व्यक्ति को बोध हो जाता है।

तत्-सान्निध्य - कोई भी वस्तु सान्निध्य (पास में होना) में ही दिखता है। शब्द से इंगित वस्तु का सान्निध्य हो जाना = तत्-सान्निध्य। जैसे - "यह खाली स्थली ही व्यापक वस्तु है", इस तरह अंगुली-न्यास हो जाना व्यापक का तत्-सान्निध्य है। "यह वस्तु पदार्थावस्था है", इस तरह अंगुली-न्यास हो जाना ही पदार्थावस्था से तत्-सान्निध्य है।

तदाकार - वस्तु पर ध्यान देने से वस्तु के आकार में जब हमारा ज्ञान होता है, तब हम वस्तु को समझे। यही तदाकार का मतलब है। तदाकार विधि से हम एक एक वस्तु को पहचानते हैं। अध्ययन विधि से जीवन एक-एक वस्तु में तदाकार होता है। प्रकृति की इकाइयों के साथ तदाकार होने का मतलब उनके रूप, गुण, स्व-भाव, और धर्म को समझना। रूप और गुण के साथ मनाकार होता है। स्व-भाव और धर्म का बोध और अनुभव होता है। व्यापक वस्तु का केवल अनुभव होता है।

तद्रूप - व्यापक और ज्ञान में भेद समाप्त हो जाना ही तद्रूप है। "व्यापक वस्तु ही जीवन में ज्ञान है" - यही अनुभव में आता है।

तदाकार विधि से अध्ययन के पूर्ण होने पर जीवन तद्रूपता में स्वयं को पाता हैतद्रूपता में ही प्रमाण है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २००८, अमरकंटक)

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