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Friday, February 27, 2009

संविधान

मनुष्य के पास पाँच विभूतियाँ है - रूप, पद, धन, बल, और बुद्धि। इसमें से मनुष्य ने चार का - रूप, पद, धन, और बल - प्रयोग करके व्यवस्था स्थापित करने का प्रयास करके देख लिया है। ये सभी प्रयास असफल रहे हैं। इस तरह - भ्रम विधि से जीने का कोई मॉडल निकलता नहीं है।

मध्यस्थ-दर्शन "बुद्धि" के आधार पर व्यवस्था में जीने का प्रस्ताव है।

बुद्धि के आधार पर "व्यवस्था में जीना" ही संविधान है

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (दिसम्बर २००८, अमरकंटक)

Wednesday, February 25, 2009

क्षमता योग्यता पात्रता

क्षमता = वहन क्रिया
योग्यता = प्रकाशन क्रिया
पात्रता = ग्रहण क्रिया

जीवन में क्षमता, योग्यता, और पात्रता होती है।

अध्ययन (शिक्षा) का लक्ष्य है - अनुभव के लिए पात्रता को विकसित करना। अभी प्रचलित शिक्षा का लक्ष्य है - पैसा पैदा करने की पात्रता को विकसित करना। आदर्शवादी शिक्षा का लक्ष्य था - विरक्ति के लिए पात्रता को विकसित करना।

अध्ययन का फलन है - अनुभव। जो (स्वयं और दूसरे का) सही मूल्यांकन कर पाने के लिए आवश्यक योग्यता है। अनुभव को निरंतर बनाए रखने की क्षमता जीवन में है। अनुभव के अलावा कुछ निरंतर बना रहता भी नहीं है।

अनुभव गामी विधि से जीते हुए - अध्ययन करना या समझना प्रत्यावर्तन है। जैसा समझे हैं उसको जीना परावर्तन है।

अनुभव मूलक विधि से जीते हुए - स्वयं और अन्य का मूल्यांकन करना प्रत्यावर्तन है। जीने में अनुभव को अभियक्त, संप्रेषित, और प्रकाशित करना परावर्तन है।


- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (दिसम्बर २००८, अमरकंटक)

Sunday, February 15, 2009

जागृत मानव और प्रेरणा

अनुसंधान पूर्वक मुझे जागृत-मानव का स्वरूप समझ में आया। मनुष्य ही जागृत होता है - यह समझ में आया। मेरे सम्मुख कोई आदमी आता है तो मैं बता सकता हूँ, वह जागृत है या नहीं। जागृत मानव के उस स्वरूप को प्रमाणित करने के लिए मैं स्वयं तैयार हुआ। जागृति पूर्वक जीने का मॉडल निकला - "समाधान समृद्धि"। समाधान-समृद्धि को जीने में प्रमाणित करने वाला व्यक्ति ही जागृत-मानव है। इस मॉडल के अलावा बाकी सब "भ्रम" सिद्ध हुआ। भ्रम से जागृति तक का अध्ययन का रास्ता लगाया। उसको "अनुभव-गामी विधि" कहा। अब आप भ्रम से जागृत होने के क्रम में हैं तो उस विधि से बात करो। यदि आप जागृत हो चुके हैं तो उस विधि से बात करो।

प्रश्न: क्या आपको जागृत होने के लिए किसी दूसरे व्यक्ति से प्रेरणा मिली?

मुझको पूर्ण जागृत मानव प्रेरणा दिए ही हैं, तभी तो मैं जागृति लक्ष्य के लिए सहमत हुआ। सह-अस्तित्व स्वरूपी अस्तित्व में जागृति है - इस को मैं विश्वास करता हूँ। अस्तित्व में जो नहीं है, वह होता भी नहीं है। सह-अस्तित्व में मुझको प्रेरणा मिलती रही, तभी मैं जागृति के स्वरूप को समझा। इसके अलावा क्या कहा जा सकता है - आप ही बताओ?

प्रश्न: आज की स्थिति में मैं जब अध्ययन कर रहा हूँ - तो आपके जीने, कहने, और करने को प्रेरणा-स्त्रोत के रूप में स्वीकारता हूँ। आप के लिए इस तरह का प्रेरणा स्त्रोत तो नहीं था?

जीवन शरीर के साथ ही नहीं, शरीर छोड़ने के बाद भी प्रेरणा देने में समर्थ होता है। जागृत-जीवन दूसरों की जागृति के लिए प्रेरक होते ही हैं। उनका प्रेरणा जहाँ प्रभावी हो सकता है, वहाँ वे प्रेरणा देते हैं। इसी धरती पर अनेक समाधि-संयम पूर्वक अनुभव-संपन्न जीवन हैं, जो प्रमाणित नहीं हो पाये हैं। मुझसे पहले किसी को समाधि नहीं हुआ, संयम नहीं हुआ, अनुभव नहीं हुआ - ऐसा मैंने नहीं कहा है। जागृति का प्रमाण मानव-परम्परा में नहीं हुआ, अध्ययन-गम्य नहीं हुआ - यह कहा है। जागृति को मानव-परम्परा में प्रमाणित करने का काम, उसको अध्ययनगम्य बनाने का काम मैं कर रहा हूँ। इसके लिए पूर्व में जागृत-जीवन मेरे लिए प्रेरक रहे। अभी जैसे आप ही यदि कल जागृति को प्रमाणित करने योग्य होते हो, तो आप में वह कैसे आ गया? यह प्रश्न बनता ही है। उसके लिए आपको जागृत व्यक्ति का प्रेरणा है कि नहीं? प्रेरणा नहीं मिली तो आप में कैसे आ गया? अभी हम बात कर रहे हैं - मैं स्वयं जागृत हूँ, उससे आपको प्रेरणा मिल रहा है। इसी प्रकार से मेरी जागृति के लिए मुझे भी पूर्व जागृत जीवनों से प्रेरणा मिली। दूसरा और कोई रास्ता नहीं है।

प्रश्न: आपको जो मह्रिषी रमण और आचार्य चंद्रशेखर भारती ने जो साधना करने के लिए जो आशीर्वाद दिया था - क्या वह भी प्रेरणा ही थी?

वह भी प्रेरणा ही थी। यहाँ अमरकंटक आने से पहले अनुभव का तो मुझे कोई ज्ञान नहीं था। जिनको मैं पूज्य मानता था - उनकी बात को मैंने मान लिया, स्वीकार कर लिया। उनकी बात "अच्छे काम" के लिए प्रेरणा रही क्योंकि मैं प्रमाणित हो गया। यदि मैं प्रमाणित नहीं हो पाता, असफल हो जाता - तो "अच्छा काम" क्या होता, "प्रेरणा" क्या होती?

प्रश्न: तो आज की स्थिति में आप यह कह पाते हैं कि उनका आशीर्वाद आपके लिए प्रेरणा थी, क्योंकि आप का अनुसंधान सफल हो गया।

हाँ। शास्त्रों में साधना-समाधि के लिए लिखी बात पर उन्होंने बल दिया। "समाधि में ज्ञान होता है" - उनके इस निर्देश को मैंने स्वीकार लिया। उन दोनों व्यक्तियों से मैं पूछ सकता था - आपको समाधि हुई थी या नहीं? आपको समाधि में ज्ञान हुआ था कि नहीं? पर उन दोनों व्यक्तियों से मैंने यह सवाल नहीं किया, अपना शंका व्यक्त नहीं किया।

प्रश्न: क्यों नहीं किया?

भय वश। यदि मैं उनसे पूछ लेता - "आपको समाधि हुआ है या नहीं?" और वे कहते - नहीं! तो मुझे साधना पूर्वक समाधि होगा इस बात पर मैं कैसे विश्वास करता? यदि वे कहते - हाँ, हमको समाधि हुआ है। तो मेरा उनसे पूछना बनता ही - "आपको समाधि में क्या ज्ञान हुआ?" यह सब पूछने के अपने अधिकार मैंने इन दो व्यक्तियों पर प्रयोग नहीं किया। इन दो व्यक्तियों के प्रति मेरी श्रद्धा थी, इसलिए मैंने उनकी बात को बिना शर्त मान लिया। उनकी प्रेरणा के अनुसार मैंने साधना किया। साधना के फल में समाधि की स्थिति को भी प्राप्त किया। समाधि के बाद संयम का डिजाईन बनाने में मैंने अपनी कल्पनाशीलता का प्रयोग किया। जिसको करने पर मैंने संयम काल में अस्तित्व का अध्ययन किया, अनुभव किया। अब आप बताओ - इसमें किस पर दोष है, किस पर आरोप है? मेरे साधना के सफल होने में उन दो व्यक्तियों का प्रेरणा बलवती नहीं रहा - यह मैं मान ही नहीं सकता। संयम पूर्वक अनुभव संपन्न होने पर अब मैं कह रहा हूँ - सम्पूर्ण मानव जाति के पुण्य से मैं सफल हुआ हूँ। इसलिए जो मैंने पाया उसको मानव को अर्पित कर दिया। क्या गलती किया?

प्रश्न: आपकी सफलता मानव जाति के पुण्य से घटित हुई, यह निर्णय आपने कैसे ले लिया?

इसलिए क्योंकि मानव जाति में "शुभ" की कामना है, पर शुभ घटित नहीं हुआ है। शुभ के लिए प्रयास कर रहे हों, या अशुभ के लिए प्रयास कर रहे हों - पर हर मनुष्य में शुभ की अपेक्षा है। इस आधार पर मैं मानव-जाति का पुण्य मानता हूँ। मैंने जो पाया उसमें सर्व-शुभ का सूत्र है। इसलिए मैंने अपने कार्यक्रम को मानव के पुण्य से जोड़ लिया। सर्व-शुभ के लिए यह प्रस्ताव पर्याप्त है या नहीं - इसको हर व्यक्ति अपने में जांचेगा। जरूरत होगा तो अपनाएगा, जरूरत नहीं होगा तो छोड़ देगा। छोड़ देगा तो आगे और कोई अनुसंधान करेगा सर्व-शुभ के लिए। कोई दीवाल नहीं है किसी के लिए। यह बिल्कुल निर्विवाद बात है। यदि आप बुद्धि का प्रयोग करो - तो आप यही पायेंगे। निर्बुद्धि से आप इस प्रस्ताव को गाली देते रहो - मैं सुन ही लेता हूँ। निर्बुद्धि की बातों के लिए मेरे पास "क्षमा" बहुत है! क्षमा का मतलब है - दूसरे की अयोग्यता से प्रभावित नहीं होना। अयोग्यता से प्रभावित होना अयोग्यता ही है। यह निर्विरोध कार्यक्रम है। इसको करने के लिए मैं कोई पसीना बहा रहा हूँ, ऐसा बिल्कुल नहीं है। स्वाभाविक रूप में हो रहा है।

प्रश्न: समझने की प्रक्रिया में भी क्या कोई संघर्ष नहीं है?

पहले से हम दोनों मनुष्य हैं।
हम दोनों शुभ चाहते हैं।
यह सर्व-शुभ के अध्ययन का प्रस्ताव है।
चाहो तो इसका अध्ययन करो, नहीं चाहो तो मत करो!
अध्ययन करने पर आप सर्व-शुभ के लिए इस प्रस्ताव में कुछ कमी पाते हो, तो आप आगे अनुसंधान करो।
यह पूरी तरह निर्विरोध और निर्विवाद बात है।
यह पूरी तरह सकारात्मक बात है।
सकारात्मक को नकारना आदमी से बनता नहीं है।
हर मुद्दे पर सकारात्मक का सार्वभौम आधार आज तक बना नहीं है।
हर मुद्दे पर सकारात्मक के सार्वभौम-आधार का यह प्रस्ताव है।

मानव जाति के लिए एक अद्भुत बात तो हुआ है। प्रभावशील होने की जहाँ तक बात है, धीरे-धीरे होगा। नियति विधि से परिस्थितियां जन-मानस को इस ओर सोचने के लिए मजबूर कर रही हैं। ५० वर्ष पहले की तुलना में आज की स्थिति में इस मुद्दे पर सोचने वालों की संख्या लाखों गुना बढ़ गयी है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (दिसम्बर २००८, अमरकंटक)

रसोवयी ईषा का अंत

रस, छंद, अलंकार - ये सब कुकर्मो को सुकर्म मानने में लगे। मूल में "रस" के बारे में बताया गया था "रसोवयी ईषा" में। "रस" को मूल में ईश्वर स्वरूपी बताया गया था। ईश्वर को ज्ञान स्वरूप पहले ही वेदों में बताया गया था। ईश्वर (ब्रह्म) ही ज्ञान है, ज्ञाता है, और ज्ञेय है - इन तीनो को मिलाने से त्रिपुटी-संगम कहा। उसको रस कहा। "रस ही ज्ञान है।" - ऐसा निष्कर्ष निकाला।

"सभा में मंच पर अभिनय करने से, प्रस्तुत करने से देखने-सुनने वालों में रसोत्पदन होता है" - ऐसा राजा भरत के समय में बताया गया था। फ़िर जैसा मंच बनाने का स्वरूप बताया था - वैसा बनाया, लोगों को इकठ्ठा किया, राजा स्वयं सभा में बैठा - और उनके सम्मुख रसास्वादन कार्यक्रम प्रस्तुत किया गया। उस तरह की प्रस्तुति ब्रह्म, ईश्वर, ज्ञान न हो कर ईष्ट-देवता के लिए भक्ति हो गयी। पहली गलती वहीं हुई। ईश्वर-रस भक्ति-रस में परिवर्तित हो गया। उसको "भरत-नाट्यम" नाम दिया गया।

वह भरत-नाट्यम अंततोगत्वा श्रृंगारिकता में पहुँच गया। श्रन्गारिकता यौन-चेतना में पहुँच गया। नृत्य सभी राजा के आश्रयी होते गए। नृत्य करने वाले राजाओं के यौन-भोग की वस्तु होते गए। मंदिरों में वे पुजारियों के भोग-द्रव्य बने। "रस" को ईश्वर का स्वरूप बता कर जो सोच शुरू हुई थी - उसकी मृत्यु इस प्रकार हुई। कुल मिला कर इसकी समीक्षा यही है - रसोवयी ईषा भक्ति से चल कर श्रृंगार में अंत हुई। आज वही श्रृंगारिकता का भौंडा स्वरूप आप हॉलीवुड और बॉलीवुड के रूप में आप देख ही रहे हो।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (दिसम्बर २००८, अमरकंटक)

Saturday, February 14, 2009

तदाकार तद्रूप

हर मनुष्य में तदाकार-तद्रूप होने का माद्दा है। कल्पनाशीलता के आधार पर तदाकार होते हैं। जिसके फलन में अनुभव मूलक विधि से तद्रूपता को प्रमाणित करते हैं।

प्राप्त का अनुभव और प्राप्य का सान्निध्य होता है। सत्ता (व्यापक) हमको "प्राप्त" है - उसका हमको अनुभव करना है। सभी मनुष्य-सम्बन्ध और मनुष्येत्तर सम्बन्ध हमको "प्राप्य" हैं - उनको हम तदाकार विधि से समझते हैं, और तद्रूपता विधि से प्रमाणित करते हैं। जैसे - आपकी माता के साथ आपका सम्बन्ध है। इस सम्बन्ध को आप तदाकार विधि से समझते हैं, और समझने के बाद इस सम्बन्ध में न्याय प्रमाणित करना है या नहीं करना है - उसका आप निर्णय लेते हैं। समझने के बाद "न्याय प्रमाणित करना है" - यही निर्णय करना बनता है। फ़िर उस सम्बन्ध को आप तद्रूपता विधि से प्रमाणित करते हैं। उसी तरह व्यवस्था संबंधों को भी तदाकार-तद्रूपता विधि से प्रमाणित करते हैं। उसी तरह उपकार करने में भी तदाकार-तद्रूप विधि से प्रमाणित होते हैं। तदाकार-तद्रूप विधि के अलावा स्वयं को प्रमाणित करने का दूसरा कोई विधि हो ही नहीं सकता।

प्रश्न: तदाकार-तद्रूप नहीं हो पा रहे हैं - तो क्या करें?

उत्तर: उसके कारण को खोजना पड़ेगा। यदि अपनी कल्पनाशीलता को हम अमानवीय कृत्यों में जीव-चेतना विधि से प्रयोग करते हैं - तो उससे छूट नहीं पाते हैं। इस तरह सुविधा-संग्रह बलवती हो जाता है, समाधान-समृद्धि लक्ष्य की प्राथमिकता नीचे चली जाती है। यदि समाधान-समृद्धि लक्ष्य प्राथमिक बनता है, तो बाकी सब उसके नीचे चला जाता है। समाधान-समृद्धि में जब हम पारंगत हो जाते हैं, तो बाकी सब उसमें घुल जाता है। समस्याएं समाधान में विलय हो जाती हैं। उनका कोई अवशेष नहीं बचता। सारा अज्ञान ज्ञान में विलय हो जाता है।

ज्ञान के पक्ष में हम सभी हैं। ज्ञान क्या है - उसको स्वीकारने का माद्दा मनुष्य में है। जीव-चेतना को हम पकड़े रहे - और हमको ज्ञान हो जाए, यह हो नहीं सकता। मानव-चेतना में जीव-चेतना विलय होता है।

मनुष्य में जीवन-सहज विधि से तदाकार-तद्रूप होने की विधि है। जैसे अभी रूप, पद, धन, और बल के साथ तदाकार-तद्रूप है ही मनुष्य। सच्चाई के साथ तदाकार-तद्रूप होना शेष रह गया। सच्चाई क्या है? - उसके लिए मध्यस्थ-दर्शन का प्रस्ताव आपके अध्ययन के लिए प्रस्तुत है। सह-अस्तित्व दर्शन ज्ञान परम-सत्य है। सह-अस्तित्व में जीवन-ज्ञान परम-सत्य है। सह-अस्तित्व में ही जीवन है। सह-अस्तित्व से परे कुछ भी नहीं है। जीवन ही ज्ञान का धारक-वाहक है। सह-अस्तित्व दर्शन ज्ञान, जीवन-ज्ञान, और मानवीयता पूर्ण आचरण ज्ञान - ये तीनो के मिलने से ज्ञान हुआ।

सत्य हमको प्राप्त है। प्राप्त का हमको अनुभव करना है। अनुभव के लिए अध्ययन आवश्यक है।

तदाकार-तद्रूप होना ही अनुभव है। अनुभव उससे अलग नहीं है।

प्रश्न: अभी प्रचलित शिक्षा में जो हम पढ़ते हैं, उसकी विधि क्या इससे अलग है?

उत्तर: आज जो प्रचलित-शिक्षा में पढ़ा रहे हैं - वह इस सह-अस्तित्व ज्ञान से कोसों दूर है। अभी की शिक्षा से जो हम अपराध सीखते हैं, और करते हैं - वह भी तदाकार-तद्रूप विधि से ही करते हैं। इस तरह - अवैध को वैध मानने से जीने में गलतियाँ होती हैं। गलतियां समस्याओं को जनित करती हैं। समस्याएं पीड़ा को जनित करती है। यही पीड़ा फ़िर "वैध" की आवश्यकता को स्वयं में जनित करती है। संवेदनशीलता से होने वाली मदद इतना ही है। संवेदनशीलता पूर्वक होने वाली पीड़ा संज्ञानीयता की आवश्यकता को स्वयं में बना देती है।

(मध्यस्थ दर्शन के) अध्ययन पूर्वक हम संज्ञानीयता तक पहुँचते हैं। संज्ञानीयता में फ़िर संवेदनाएं नियंत्रित हो जाती हैं। इससे अच्छा क्या हो सकता है - आप ही बताओ? इसमें किसी का आक्षेप नहीं है। आक्षेप होता तो प्रतिशोध होता। सुधार होता है तो आक्षेप कहाँ है?

प्रश्न: आप जब अपने प्रस्ताव को विगत का "विकल्प" कहते हैं, तो कई लोग उससे तुनक जाते हैं।

उत्तर: उनका तुनक जाना इस प्रस्ताव के प्रति उनका आक्षेप और प्रतिशोध ही है। मैं कहता हूँ - आप को यह बात स्वीकार नहीं होती तो आप दूर रहो इससे। क्या तकलीफ है उससे? तुनकने के साथ कथकली भी कर लो! वीर-रस का प्रयोग कर लो!! पर है वह प्रतिशोध ही!

प्रश्न: इस प्रस्ताव को समझने में मुझे बहुत समय लग रहा है, उसका क्या करें?

उत्तर: अभी आप और सब चीजों को साथ लेकर चलते हुए समझने का प्रयास कर रहे हैं, इसलिए समय लग रहा है। सघन विधि से अध्ययन करें - तो समय ज्यादा नहीं लगेगा।

प्रश्न: यदि मेरा नौकरी करना बाधक है, तो उसको मुझे छोड़ देना चाहिए?

उत्तर: समझने के लिए कोई छोड़ने-पकड़ने की ज़रूरत नहीं है। समझने के बाद "जीने" के लिए आप निर्णय कीजिये - आपको कैसे जीना है? जीने का डिजाईन बनाने की जब बात आती है - तब नौकरी छोड़ना, कुछ नया setup बनाना, या नए setup में शामिल होना - ये सब बात आती है।

प्रश्न: लेकिन इस बात को भी सोचें और नौकरी भी करें - यह बहुत अंतर्विरोधी हो जाता है?

उत्तर: वह तो स्वाभाविक है। नौकरी और व्यापार "जीने" से कोसों दूर हैं। जीने में sincerity है। व्यापार और नौकरी में insincerity है। समझने के बाद निर्णय लेने की ताकत आती है


- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (दिसम्बर २००८, अमरकंटक)

Sunday, February 8, 2009

तदाकार होने की स्थिति

आपने हमको बताया: आपने साधना पूर्वक "समाधि" की स्थिति प्राप्त की। समाधि में आपने कहा - आपको ज्ञान नहीं हुआ। आपने फ़िर "संयम" करने का अपना डिजाईन बनाया। जिसके फलन में आपने एक परमाणु से लेकर मनुष्य तक अस्तित्व में व्यवस्था के स्वरूप को देखा, उसका अध्ययन किया। उसका आपने हमको वर्णन भी किया। क्या हम जो अध्ययन कर रहे हैं, उससे हमको वही सब दिखेगा?
उत्तर: मैंने जो देखा वह आपके पास सूचना है। सूचना होना भर आपके लिए पर्याप्त नहीं है। इस सूचना से आपको तदाकार होने तक जाना है। तदाकार होने पर आपको वही दिखेगा जो मुझे दिखा। अनुभव की रोशनी में स्मरण पूर्वक प्रयत्न करने से हम तदाकार होने की स्थिति में पहुँचते हैं।
कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता हर व्यक्ति में पूंजी के रूप में रखा है। यह हर व्यक्ति में अध्ययन करने का स्त्रोत है। इससे ज्यादा क्या guarantee दी जाए?
मैंने एक मिट्टी से लेकर मानव तक त्व-सहित व्यवस्था में रहने के स्वरूप का अध्ययन किया। व्यवस्था में होने का प्रवृत्ति एक परमाणु-अंश में भी है, इस बात का मैं अध्ययन किया हूँ। तदाकार विधि से आप अध्ययन करेंगे तो आप को भी वैसे ही दिखेगा। इसके लिए कोई यंत्र काम नहीं आएगा, कोई किताब काम नहीं आएगा - केवल जीवन ही काम आएगा। जीवन की प्यास अस्तित्व सहज वास्तविकताओं में तदाकार होने पर ही बुझती है।
तदाकार होने तक पहुंचाना ही अध्ययन की मूल चेष्टा है।
शब्द से अर्थ की ओर ध्यान देने से अर्थ के मूल में अस्तित्व में जो वस्तु के साथ तदाकार होना बनता ही है। उसके बाद तद्रूप होना (प्रमाणित होना) स्वाभाविक है। अर्थ अस्तित्व में वस्तु के स्वरूप में साक्षात्कार होने तक पुरुषार्थ है। उसके बाद बोध और अनुभव अपने आप होता है। साक्षात्कार के बाद बुद्धि में बोध, और आत्मा में अनुभव तुंरत ही होता है। उसमें देर नहीं लगती।
तदाकार होने की स्थिति में जब हम पहुँचते हैं - तो हमको स्पष्ट होता है:
वस्तु, वस्तु का प्रयोजन, और वस्तु के साथ हमारा सम्बन्ध।
यह हर वस्तु के साथ होना। इसमें कोई भी कड़ी छुटा तो वह केवल शब्द ही सुना है। इस association में जो सबसे प्रबल प्रस्ताव है, वह यही है।
तदाकार होने की स्थिति केवल अध्ययन से आता है। तद्रूप विधि से प्रमाण आता है - यह अनुभव के बाद होता है।
तदाकार-तद्रूप होने की स्थिति ही "दृष्टा-पद" है।
इससे पहले (मध्यस्थ-दर्शन के प्रकटन से पहले) भक्ति में तदाकार-तद्रूप की बात की गयी है। जैसे - नारद भक्ति सूत्र में। और कहीं तदाकार-तद्रूप की बात नहीं है। उसमें ईष्ट-देवता के साथ तदाकार-तद्रूप होने की बात कही गयी है। उसके लिए नवधा-भक्ति सूत्र दिया गया। कौन उन नौ सीढियों को पार कर पाया - उसका कोई प्रमाण परम्परा में आया नहीं।
यहाँ (मध्यस्थ-दर्शन में) कह रहे हैं - अस्तित्व में सभी वस्तुएं (वास्तविकताएं) हैं। वस्तु को पहचानना ज्ञान है। उसमें तदाकार होना भक्ति है। ज्ञान के बिना भक्ति होता नहीं है।
प्रश्न: क्या तदाकार-तद्रूप होने के लिए कोई discipline की आवश्यकता है?
उत्तर: जीने के लिए कोई "उपदेश" की ज़रूरत नहीं है। अस्तित्व सहज नियमो को पहचानने पर तदाकार-तद्रूप स्वरूप में जीने की अर्हता बन ही जाता है। समझदारी के लिए सूचना है। सूचना के बाद अध्ययन है। अध्ययन पूर्वक हम अनुभव मूलक विधि से जीने के लिए तैयार हो जाते हैं।
प्रश्न: समझने के क्रम में क्या discipline का कोई रोल नहीं है?
उत्तर: सही जीने का कोई मॉडल हो, उस ढंग से हम जीना शुरू कर देते हैं, तो उस ढंग से विचारने की ओर भी जाते हैं। सही जीने का मॉडल वही व्यक्ति होगा जो सही को समझा होगा। सही जीने का मॉडल है - समाधान-समृद्धि पूर्वक जीना। मॉडल का हम अनुकरण-अनुसरण करते हैं, उसके साथ शब्द को सुनते हैं, शब्द से अर्थ की ओर जाते हैं। अनुकरण-अनुसरण करना अध्ययन के लिए प्रेरणा है। अर्थ की ओर जाने पर उसके मूल में अस्तित्व में वस्तु से तदाकार होने का प्रवृत्ति जीवन में रहता ही है। तदाकार होने पर साक्षात्कार हो गया, बोध हो गया, अनुभव हो गया। अनुभव होने पर हम तद्रूप हो गए। तद्रूपता प्रमाण है।
प्रश्न: प्रमाण रूप में जीने का क्या अर्थ है?
उत्तर: प्रमाण रूप में जीना = हर मोड़-मुद्दे पर समाधानित जीना। श्रम पूर्वक अपने परिवार की आवश्यकताओं से अधिक उत्पादन कर लेना। शरीर-पोषण, संरक्षण, और समाज-गति इन तीन के अलावा भौतिक वस्तुओं का और कहीं नियोजन ही नहीं है। मानवीयता विधि से भौतिक वस्तुओं के नियोजन की सीमा यही तक है।
- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (दिसम्बर २००८, अमरकंटक)

Saturday, February 7, 2009

चर्चा करनी है, या पारंगत होना है?

"चर्चा कम, पारंगत होना ज्यादा" - इस बात को ले कर चलें तो समय की बचत होगी।

पारंगत होने के लिए समझना आवश्यक है। चर्चा में हम तर्क में जुट जाते हैं, समझना और पारंगत होना वरीयता में नीचे चला जाता है। तर्क पारंगत बनाने में सहायक है। तर्क पारंगत होने का कोई लक्षण नहीं है।

तर्क में शब्द प्रधान है, वस्तु शून्य है।
समझने में वस्तु प्रधान है, शब्द गौण है।

जैसे - "पानी" एक शब्द है। पानी क्यों है, कैसा है? पानी नहीं रहने पर क्या होता है? पानी होने से क्या हो गया? नहीं रहने से क्या फर्क पड़ता है? यह सब हम तर्क कर ही सकते हैं।

मौलिक तर्क है - "पानी एक शब्द नहीं है, पानी एक वास्तविकता है।"

पानी को समझने के लिए इतना तर्क आवश्यक है। यह तर्क पानी की तात्विकता तक पहुंचाने के लिए एक सेतु है।

तर्क एक बौद्धिक साधन है। साधन साध्य नहीं होता है।

प्रश्न: मानव के पास तर्क का साधन कहाँ से आ गया?

उत्तर: तर्क का साधन मनुष्य के पास कल्पनाशीलता वश आ गया। मनुष्य के पास कुछ बौद्धिक साधन हैं, और कुछ भौतिक साधन हैं। शब्द विधि से बौद्धिक साधन हैं - जो कल्पनाशीलता वश आए। भौतिक वस्तुओं के स्वरूप में जो साधन हैं - वे मनुष्य के प्रयत्न या पुरुषार्थ से आए।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित। (दिसम्बर २००८, अमरकंटक)