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Monday, March 30, 2009

ज्ञान-समृद्धि

ज्ञान सारे अस्तित्व के साथ है।

मानव कितना विस्तार तक ज्ञान रूप में फ़ैल सकता है, आप सोच लो! अनंत और असीम अस्तित्व विशाल रूप में समझ में आता है। जबकि उसके आंशिक रूप में ही मनुष्य का जीना बन जाता है। यह "ज्ञान-समृद्धि" की बात है।

प्रश्न: इसको फ़िर से समझाइये

उत्तर: इस धरती पर ७०० करोड़ आदमी हैं। हम सभी ७०० करोड़ के साथ जीते नहीं हैं। सीमित संख्या के लोगों के साथ हम जीते हैं। ७०० करोड़ आदमी के साथ जीने का सूत्र हमको अध्ययन पूर्वक अनुभव में आया रहता है - जबकि जीते हम सीमित संख्या के लोगों के साथ ही हैं। यह ज्ञान-समृद्धि हुआ कि नहीं? ज्ञान-समृद्धि होने पर ही सुरक्षित रूप में जीना बनता है।

ज्ञान-समृद्धि होने के बाद "वस्तु-समृद्धि" की ओर जाते हैं। "वस्तु-समृद्धि" शरीर-पोषण, शरीर-संरक्षण, और समाज-गति के अर्थ में है। आहार, आवास, अलंकार, दूर-गमन, दूर-श्रवण, और दूर-दर्शन संबन्धी वस्तुएं इसी के लिए प्रयोजनशील हैं।

जो जितना जान पाता है - उतना चाह नहीं पाता, जितना चाह पाता है - उतना कर नहीं पाता, जितना कर पाता है - उतना भोग नहीं पाता। अनुभव पूर्वक मनुष्य के "जानने" का क्षेत्र विशालतम है। अनुभव पूर्वक चाहने, करने, भोगने का क्षेत्र उत्तरोत्तर कम होता है। यह ज्ञान-समृद्धि है। भ्रमित अवस्था में इसके विपरीत स्थिति रहती है। मनुष्य भोगने के क्षेत्र को अधिकतम माने रहता है। भोगने के लिए ही करना, उसी के लिए चाहना। यह "जानने" तक पहुँचता ही नहीं है। इसलिए स्वयं में "खोखलापन" बना ही रहता है।

ज्ञान-समृद्ध होने के लिए मध्यस्थ-दर्शन के अध्ययन का प्रस्ताव है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २००८, अमरकंटक)

समझदारी और दुनियादारी

"दुनियादारी" का प्रचलित मतलब है - दूसरों के साथ अपना काम निकलवाने के लिए राजी-गाजी करा लेने का हुनर। यह प्रिय-हित-लाभ दृष्टियों की सीमा में ही होता है। प्रिय-हित-लाभ दृष्टियों की सीमा में जीने से अपराध ही होता है। "करने" के रूप में ऐसी दुनियादारी भय-प्रलोभन-आस्था के कृत्रिम-आधारों पर टिकी रहती है। आज के समय में दुनियादारी को ही "समझदारी" मान लिया गया है।

"समझदारी" से आशय है - सह-अस्तित्व में अनुभव। मध्यस्थ-दर्शन सह-अस्तित्व में अनुभव के लिए अध्ययन-गम्य प्रस्ताव है। यह स्वयं में न्याय-धर्म-सत्य दृष्टियों को जागृत करने के अर्थ में है।

समझदारी से ही ईमानदारी, जिम्मेदारी, और भागीदारी प्रमाणित होती है। समझदारी हासिल किए बिना ईमानदारी, जिम्मेदारी, और भागीदारी की कोई बात बनती नहीं है। "ईमानदारी" से आशय है - सह-अस्तित्व की समझ के अनुरूप जीने के लिए स्वयं में निष्ठा और दृढ़ता। "जिम्मेदारी" से आशय है - संबंधों में अपने कर्तव्यों और दायित्वों की सटीक पहचान होना। "भागीदारी" से आशय है - सभी संबंधों में कर्तव्यों और दायित्वों का निर्वाह होते हुए, उभय-तृप्ति प्रमाणित होना।

प्रचलित-दुनियादारी न्याय-धर्म-सत्य की समझदारी तक पहुंचाती ही नहीं है। ईमानदारी, जिम्मेदारी, और भागीदारी तो दूर की बात है।

स्त्रोत: मध्यस्थ-दर्शन

Saturday, March 28, 2009

समझदारी से समाधान, श्रम से समृद्धि

IIT में fission-fusion में PhD करने वाले विद्यार्थियों ने मुझसे पूछा - "हम यह सब fission-fusion की पढ़ाई क्यों कर रहे हैं?"

मैंने उनको उत्तर दिया - आराम की रोटी खाने के लिए। जहाँ आपको रोटी मिलने का आश्वासन है, आप वही करते हो। लेकिन मैं आपको इतना बता दूँ - जिस बात की रोटी खाने आप जा रहे हो, उसमें आदमी की हैसियत से आप जी नहीं पाओगे। fission-fusion का क्या प्रयोजन है? क्या अपने घर में atom-bomb डालोगे?

कितना बड़ा foundation में हाथ डालने वाला बात है यह! थोड़ा सा सोच के तुम बताओ। कितना भारी खतरा हम मोल लिए हैं! इस खतरे का मुझे ज्ञान नहीं है, ऐसा नहीं है। लोगों को मेरा ऐसा कहना कितना प्रिय-अप्रिय लगता है, इसका मुझे ज्ञान है। प्रिय लगना, अप्रिय लगना के आधार पर तुलन करना जीव-जानवरों के लिए है।

उन्होंने फ़िर पूछा - "इससे कैसे छूटें हम?"

इस पूरे विकल्प को पहले अच्छे से समझो - फ़िर समाधान संपन्न होने पर अपने परिवार की आवश्यकताओं से अधिक उत्पादन करने में संलग्न हो जाओ। आपके अभी नौकरी वाले तरीके में "जीना" तो बनेगा नहीं। पैसा जरूर हो सकता है। पैसे से वितृष्णा बढ़ना ही है। जैसे यदि आपके पास २ पैसा हो गया, तो ४ पैसे की प्यास बनता ही है। पैसे से हमको तृप्ति मिलेगी या वस्तु से तृप्ति मिलेगी - इसको तय करो! वस्तु से तृप्ति मिलती है, यह समझ में आता है - तो वस्तु के उत्पादन में लगो!

अभी सबसे बड़ी विपदा यही है - पढने के बाद श्रम नहीं करना है। इस प्रस्ताव को लेकर बुद्धिजीवियों के गले में फांसी यहीं पर लगती है। जितना ज्यादा जो पढ़ा - वह श्रम से उतना ही कट गया। श्रम किए बिना पैसा पैदा करना - वैध है, या अवैध है? आप ही तय करो!

प्राकृतिक ऐश्वर्य पर श्रम-नियोजन करने से उपयोगिता-मूल्य स्थापित होता है। जैसे - लकड़ी से इस मेज़ को बनाया। इस मेज़ का उपयोगिता-मूल्य इसमें निहित है। इसको बनाने में जो श्रम लगा, उसके आधार पर इसका विनिमय किया जा सकता है। इसी तरह हर उत्पादित-वस्तु का विनिमय उसके लिए नियोजित श्रम के आधार पर किया जा सकता है। श्रम के आधार पर विनिमय करना न्यायिक होगा या पैसे के आधार पर - आप ही तय करो!

मनुष्य की उपयोगिता की वस्तुएं हैं - आहार, आवास, अलंकार, दूर-श्रवण, दूर-दर्शन, और दूर-गमन संबन्धी। इन ६ के अलावा मनुष्य की उपयोगिता की वस्तुएं आप पहचान नहीं पाओगे। इसके अलावा जो वस्तुएं हैं - जैसे युद्द सामग्री - वे मनुष्य के लिए "उपयोगी" नहीं हैं। अच्छी तरह से देख लेना आप इसको!

व्यापार और नौकरी में "जीने" का कोई स्थान ही नहीं है। व्यापार में आदमी के साथ कम देना, ज्यादा लेना का तौर-तरीका है। इसमें "जीना" कहाँ हुआ? नौकरी में भी वैसा ही है। जीने के बारे में सोचा जाए, या जीने के नकली-साधन (पैसा) के बारे में सोचा जाए? यह सोचने का एक मुद्दा है। जीने में तृप्ति है। जीने के लिए नकली साधन (पैसा) को लेकर सारा समय लगा देना - कहाँ तक न्याय है? भौतिक वस्तुएं जीने के लिए असली साधन हैं। भौतिक-वस्तुएं प्राकृतिक ऐश्वर्य पर श्रम-नियोजन द्वारा मनुष्य उत्पादित करता है। अभी विश्व के १२% से कम जनसँख्या उत्पादन-कार्य में लगे हैं। यदि हर व्यक्ति अपने श्रम को उत्पादन करने के लिए नियोजित करने का मन बना ले तो वस्तु कितना होगा - आप सोच लो! समाधान-सम्पन्नता पूर्वक बनी आर्थिक-व्यवस्था में वस्तु से समृद्ध होंगे, न कि पैसे से।

समाधान-सम्पन्नता पूर्वक ही परिवार में समृद्धि के साथ जीने का तौर-तरीका आता है। समाधान-सम्पन्नता से पहले आदमी की तरह जीना तो बनेगा नहीं। मध्यस्थ-दर्शन का प्रस्ताव समाधान-संपन्न होने के लिए है।

सुविधा-संग्रह के चक्कर से मुक्त हुआ जाए और अच्छे से जिया जाए। इसके लिए पुनर्विचार ज़रूरी है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २००८, अमरकंटक)

Thursday, March 26, 2009

ज्ञान का मतलब है - सहस्तित्व में अनुभव

"ज्ञान" का मतलब है - सह-अस्तित्व में अनुभव और कोई ज्ञान होता नहीं है! प्रचलित-विज्ञान (भौतिकवाद) या आदर्शवाद के अनुसार "ज्ञान" के नाम पर जो प्रतिपादित हुआ, उससे अपराध ही होता है। लोगों ने उसके अनुसार आचरण करके देख लिया - उससे दुर्घटना ही हुई, सद्-घटना कोई घटित हुई नहीं। दुर्घटना है - धरती का बीमार होना, प्रदूषण छा जाना, व्यक्तिवाद-समुदायवाद के रूप में अपने-पराये की दूरियां बढ़ जाना।

अस्तित्व में मनुष्य एक सामाजिक-न्यायिक इकाई है। "साथ-साथ होने" की अपेक्षा मनुष्य में सहज है। भौतिकवाद (प्रचलित विज्ञानं) और आदर्शवाद दोनों व्यक्तिवाद की ओर ही ले जाते हैं। व्यक्तिवाद का मतलब है - समानान्तर विचारधाराएं , जो कभी मिलने वाले नहीं हैं। इससे हम एक दूसरे के साथ दूरी बना कर रखने वाले हो गए। दूरी बना कर रखने के कारण हम एक-दूसरे के साथ विश्वास पूर्वक जीने में समर्थ नहीं हुए। लोगों को साथ-साथ लाने के लिए कृत्रिम आधारों की आवश्वकता बन गयी।

भौतिकवाद ने "सुविधा-संग्रह" का कृत्रिम आधार दिया - साथ-साथ लाने के लिए। लेकिन सुविधा-संग्रह का कोई तृप्ति-बिन्दु ही नहीं है। सुविधा-संग्रह लक्ष्य के साथ चलने पर "संघर्ष" (द्रोह, विद्रोह, शोषण, युद्ध) अवश्यम्भावी हो जाता है। इस तरह भौतिकवाद व्यवहारिक सिद्ध नहीं हुआ।

आदर्शवाद ने "रहस्यमयी ईश्वर" (भक्ति-विरक्ति) का कृत्रिम आधार दिया - साथ-साथ लाने के लिए। रहस्यमयता में ही "कल्याण" का चित्रण किया। रहस्य के प्रति आस्थाएं बनी। अपने-अपने रहस्य के प्रति कट्टरताएं और समुदायवादिता पनपी। समुदायवादिता के साथ "अपना-पराया" जुड़ा ही है। इस तरह आदर्शवाद व्यवहारिक सिद्ध नहीं हुआ।

इस तरह दोनों विधियों से मनुष्यों को साथ-साथ लाने के प्रयास असफल हो गए। दोनों विधियों से प्रयत्न खूब हुआ, लोगों ने पूरा जी-जान लगाए। भक्ति-विरक्ति में तत्कालीन "अच्छे" कहलाये जाने वाले लोग जी-जान लगाए। सुविधा-संग्रह में ज्ञानी-अज्ञानी-विज्ञानी तीनो गोता लगा दिए! इस तरह गोता लगाने पर हम घोर-संकट की स्थिति में पहुँच गए, जब धरती ही बीमार हो गयी। अब पुनर्विचार की आवश्यकता बन गयी। साथ-साथ लाने के कृत्रिम-आधारों पर प्रश्न-चिन्ह लग गया।

पूरा मनुष्य-परम्परा ही सुविधा-संग्रह के चक्कर में उलझा है। पूरा मनुष्य-परम्परा ही भ्रमित है। जैसे कुए में भांग घुल गयी हो - ऐसा स्थिति बन गयी है। अब क्या किया जाए? आप-हम उस जगह में खड़े हैं। आप कुछ भी करो, वही भांग-मिला पानी है। सुविधा-संग्रह के लक्ष्य से हम छूटते नहीं हैं। धरती को ही बीमार कर दिया - तो रहोगे कहाँ पर? इसलिए पुनर्विचार की आवश्यकता है।

पुनर्विचार के लिए मध्यस्थ-दर्शन सह-अस्तित्ववाद "विकल्प" के रूप में प्रस्तुत है। विकल्प इसलिए - क्योंकि यह पिछली दोनों विचारधाराओं से जुड़ा नहीं है।

विकल्प के लिए प्रधान मुद्दा है - "ज्ञान" स्पष्ट होना। ज्ञान के मुद्दे पर हम स्पष्ट किए हैं, अध्ययन कराने का वादा किए हैं, अध्ययन होता भी है, आंशिक रूप में आप स्वयं उसमें भागीदारी किए हो - और वह है, सह-अस्तित्व स्वरूपी अस्तित्व का दर्शन होना। सह-अस्तित्व स्वरूप में पूरा अस्तित्व होने का ज्ञान होना। सह-अस्तित्व में ही जीवन-ज्ञान होना। सह-अस्तित्व में ही मानवीयता-पूर्ण आचरण ज्ञान होना। यह तीनो समझ में आने से, उससे संतुष्टि मिलने से, उससे तृप्ति मिलने से - "ज्ञान" हुआ।

तृप्ति का पहला घाट है - "मैं सब कुछ समझ गया हूँ।" सह-अस्तित्व में अनुभव होने पर तत्काल स्वयं में यह स्थिति बनती है। इसका नाम है - "दृष्टा पद"।

इस तरह समझदार होने पर स्वयं को प्रमाणित करने की योग्यता आती है। प्रमाणित करना = अन्य व्यक्ति को अपने जैसा समझदार बना देना। प्रमाणित करने का मतलब यही है। इस तरह एक व्यक्ति यदि दस व्यक्तियों को अपने स्वरूप में परिणित करता है - उससे संसार का "उपकार" है। यही "ज्ञान का प्रमाण" है। भौतिकवादी विधि से laboratory में अपने शरीर का प्रतिरूप तैयार कर लेने को "ज्ञान" माना है। ईश्वरवादी विधि में चेले बनाने को ज्ञान का प्रमाण माना है। जो जितना ज्यादा चेले बनाता है - वह उतना "अच्छा" गुरु! इन दोनों के विकल्प में यहाँ अनेक व्यक्तियों को अपने जैसा समझदार बना लेने को "ज्ञान का प्रमाण" कह रहे हैं।

"मैं सब कुछ समझ गया हूँ।" - मुझ में यह विश्वास डगमगाने की बात अभी तक आया नहीं है। सन् १९७५ में मैंने यह स्थिति हासिल की थी। तब से आज तक जितनी भी घटनाएं हुई, परिस्थितियाँ आईं - वह जड़ हिला नहीं। "अनुभव-ज्ञान में स्थिरता है" - इस बात को माना जाए या नहीं माना जाए?

मैंने प्रतिपादित किया है - "अस्तित्व स्थिर है, विकास और जागृति निश्चित है।" यह प्रचलित-विज्ञान के अस्थिरता-अनिश्चयता मूलक प्रतिपादन पर कितना बड़ा प्रहार है, आप सोच लो! यह hitting point है - इसको मैं अच्छे से जानता हूँ। hitting इसलिए आवश्यक है, क्योंकि नींद वालों को जगाना आवश्यक है। यह hitting point होते हुए भी इसमें कितना प्यार घुला है - आप सोच लो! प्यार घुला है - इसीलिये मैं सफल हो जाता हूँ। "आदमी बनो, मगरमच्छ मत बनो! मगरमच्छ बनने से धरती को बीमार कर दिया, जो ठीक नहीं हुआ।" - यह प्यार नहीं है, तो और क्या है? क्या इस बात का विरोध भी करना बनता है किसी से? इससे दूर भागना बन सकता है। इससे दूर भागते हैं तो हाथ-पैर ठंडा होना बनता ही है। हाथ-पैर ठंडा होता है तो आज नहीं तो कल इसी दरवाजे पर आयेंगे।

प्रश्न: ज्ञान की पारदर्शीयता से क्या आशय है?

उत्तर: मैं यहीं बैठा हूँ, अभी मैंने आपके सामने सारे विगत की राज-गद्दी, धर्म-गद्दी, व्यापार-गद्दी का समीक्षा प्रस्तुत किया। यह ज्ञान की पारदर्शीयता है या नहीं? अनुभव-मूलक ज्ञान से सभी विगत का समीक्षा हो गया - इसको ज्ञान की पारदर्शीयता कहा जाए या नहीं? मैं यहीं बैठा हूँ, संसार में गया नहीं हूँ, किसी से data collect नहीं किया हूँ। अनुभव होने से अस्तित्व सह-अस्तित्व स्वरूप में कैसे है - यह समझ में आ गया। अस्तित्व क्यों है - यह भी समझ में आ गया। सह-अस्तित्व में अनुभव के आधार पर मैं अस्तित्व में हर बात का विश्लेषण और समीक्षा प्रस्तुत करता हूँ। इसको ज्ञान की पारदर्शीयता का प्रमाण माना जाए या नहीं?

आप मेरा उदाहरण देखो - मैंने बिना कुछ आधुनिक-संसार की पढ़ाई किए समग्र अस्तित्व का ज्ञान हासिल किया है। आधुनिक-संसार की पढ़ाई की कौनसी सार्थकता है, जो मेरे दर्शन में नहीं आयी है? इसको ज्ञान की पारदर्शीयता माना जाए या नहीं माना जाए?

मैं किसी भी घटना को देखने जाता हूँ तो मुझे वह घटना-परिस्थिति तो समझ में आता ही है, उससे ज्यादा भी समझ में आता है। उस घटना या परिस्थिति के समाधान तक पहुँच जाता हूँ मैं। इसको ज्ञान की पारदर्शीयता माना जाए या नहीं माना जाए? मुझ में यह qualification साधना-समाधि-संयम पूर्वक अनुभव-संपन्न होने पर आया। उससे पहले यह qualification मुझ में नहीं था। यह qualification सभी में हो, उसी के लिए मध्यस्थ-दर्शन के अध्ययन का प्रस्ताव है।

सह-अस्तित्व में अनुभव पूर्वक हम ज्ञान के प्रति पारदर्शी हो जाते हैं।

प्रश्न: ज्ञान की पारदर्शीयता का क्या फायदा हुआ?

उत्तर: इससे नकारात्मक और सकारात्मक का नीर-क्षीर न्याय होता है। सकारात्मक भाग मानव के "जीने" में आता है। नकारात्मक भाग अपराध में जाता है। नकारात्मक भाग को मैंने "अपराध" नाम दिया है। तात्विक रूप में नकारात्मक और सकारात्मक दोनों घटनाएं ही हैं। नकारात्मक घटनाओं में कोई क्रम-बद्धता नहीं होती। सकारात्मक घटनाएं एक से दूसरी, दूसरी से तीसरी क्रम-वत जुड़ते चले जाते हैं। इन दोनों में यही अन्तर है।

प्रश्न: ज्ञान की पारगामियता से क्या आशय है?

उत्तर: स्वयं में समझ के आधार पर जब मैं अस्तित्व की व्याख्या प्रस्तुत करता हूँ, तो आप में समझने की इच्छा पैदा होता है। ज्ञान एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में transfer होता है। यही ज्ञान की पारगामियता का प्रमाण है। मेरा प्रतिरूप यही है। जीवन का प्रतिरूप होता है - न कि शरीर का! अनुभव मूलक ज्ञान का प्रतिरूप होता है। यह सिद्धांत है। विज्ञानी जो शरीर का प्रतिरूप बनाने में लगे हैं, वह कितना व्यर्थ है - आप सोच लो!

प्रश्न: ज्ञान की पारगामीयता से क्या फायदा हुआ?

उत्तर: इससे उपकार की विधि निकल गयी। समझे हुए को समझाना, सीखे हुए को सिखाना, किए हुए को करना - यही उपकार है। ज्ञान की पारगामियता है - तभी समझा हुआ व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को समझाने में समर्थ हो सकता है। ज्ञान की पारगामियता है - तभी तो शिक्षा विधि से ज्ञान का लोकव्यापीकरण सम्भव है।

जब कोई व्यक्ति मेरे सम्मुख प्रस्तुत होता है तो वह ऐसे क्यों प्रस्तुत हो रहा है, यह मुझे तुंरत समझ में आ जाता है। फ़िर उसको कैसे समझाना है, उसका design मुझमें अपने आप से निकल आता है। वह design सफल हो जाता है। इसमें मुझे कोई श्रम नहीं करना पड़ता - यह स्वयं-स्फूर्त रूप में हो जाता है। ज्ञान पारदर्शी है, पारगामी है - तभी यह सम्भव है।

ज्ञान पूर्वक ही मनुष्य भ्रम-मुक्ति, अपने-पराये से मुक्ति, और अपराध-मुक्ति को पाता है। सकारात्मक रूप में कहें तो - सर्व-मानव को एक जाति के रूप में पहचानना बनता है। "मानव-जाति एक है" - यह पहचानना अनुभव-मूलक ज्ञान से ही बन पाता है। और किसी विधि से बनता होगा तो आप बताओ! "मानव-जाति एक है" - यह पहचानना किसी मशीन से सम्भव हो, तो बताओ! "मानव-जाति एक है" - यह रहस्य-विधि से पहचानना सम्भव हो, तो आप बताइये!

सह-अस्तित्व में अनुभव ही ज्ञान है। सत्ता में संपृक्त प्रकृति स्वरूपी अस्तित्व क्यों है, और कैसा है - इसका उत्तर स्वयं में स्थापित होना ही अनुभव है। सऊर से जीने की शुरुआत यहाँ से है। इसके अलावा दूसरे किसी विधि से बात बन नहीं पा रही है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २००८, अमरकंटक)
ज्ञान की पारदर्शीयता

Sunday, March 22, 2009

रचना-विरचना

परमाणु में स्वभाव-गति का स्वरूप है - एक से अधिक परमाणु-अंशों का स्वयं-स्फूर्त विधि से परस्पर अच्छी निश्चित दूरी में रह कर क्रियाशील रहना। हर परमाणु स्वयं-स्फूर्त विधि से अणु के रूप में, हर अणु स्वयं-स्फूर्त विधि से रचना के रूप में वैभवित होने के लिए प्रवृत्त है। यही इनकी स्वभाव-गति है।

स्वभाव-गति का मतलब है - यथास्थिति में संतुलन, और विकास में प्रवृत्ति।

स्वभाव-गति प्रतिष्ठा में ही रचना और विरचना प्रवृत्ति होती है। आवेशित-गति में विरचना प्रवृत्ति ही होती है।

भौतिक-रासायनिक संसार के क्रियाकलाप में "रचना-विरचना" स्वभाव-गति का स्वरूप है। यह हर रचना-विरचना में अध्ययन किया जा सकता है। रचना-क्रम में विकास को प्रकाशित करने के लिए सर्वाधिक भौतिक-रासायनिक संसार का द्रव्य प्रवृत्त रहता है। अत्यल्प वस्तु (परमाणु) गठन-पूर्णता लक्ष्य की ओर हैं।

रचनाओं में विकास (श्रेष्ठता) इस धरती पर विविध स्वरूप में प्रमाणित हो चुकी है। यह अंडज, पिंडज, और उद्भिज परम्परों के रूप में प्रमाणित है। यह सब रासायनिक संसार का रचना-वैभव है। मनुष्य-शरीर का प्रकटन भी रचना-क्रम में विकास पूर्वक इस धरती पर हुआ।

विरचना भी पूरकता क्रम में सार्थक है। नियम से रचना है, नियम से ही विरचना है। विरचना प्रवृत्ति रचना प्रवृत्ति का पोषक होना पाया जाता है। यह आवश्यक भी है। रचना-विरचना कार्य एक दूसरे का पूरक है।

मनुष्य-शरीर प्राण-कोशिकाओं से रचित एक भौतिक-रासायनिक रचना है। मनुष्य-शरीर गर्भाशय में रचित होता है, एक अवधि के बाद यह विरचित होता है। मनुष्य-शरीर द्वारा ही जीवन अपनी जागृति को प्रमाणित कर सकता है।

- स्त्रोत : मध्यस्थ-दर्शन (अनुभवात्मक अध्यात्मवाद)

Friday, March 20, 2009

स्थिति-गति

सत्ता को स्थिति-पूर्ण स्वरूप में पहचाना। प्रकृति को स्थिति-शील स्वरूप में पहचाना।

सत्ता क्रिया नहीं हैं। प्रकृति क्रिया है।

सत्ता में संपृक्त प्रकृति ही अस्तित्व है।

क्रिया को स्थिति-गति स्वरूप में पहचाना।

अस्तित्व में तीन ही तरह की क्रियाएं हैं - भौतिक क्रिया, रासायनिक क्रिया, और जीवन क्रिया। अस्तित्व में चारों अवस्थाओं का प्रकटन - इन तीनो क्रियाओं का ही जोड़-जुगाड़ है।

स्थिति को "होने" के स्वरूप में पहचाना। प्रकृति की कोई भी वास्तविकता "है" - वही उसकी स्थिति है। नियति-क्रम विधि से अस्तित्व में वास्तविकताओं का प्रकटन है - उसके अनुसार उनकी स्थिति है। स्थिति हर वस्तु (वास्तविकता) की प्रतिबद्धता है। "होना" हर वस्तु का धर्म है।

गति को व्यवस्था में रहने, स्थानान्तरण, और परिवर्तन के स्वरूप में पहचाना। स्थानान्तरण और परिवर्तन सम और विषम गति है - जिसकी मनुष्य गणना कर सकता है। व्यवस्था में रहना "मध्यस्थ-गति" है। मध्यस्थ-गति गणना में नहीं आती, मनुष्य उसको केवल समझ सकता है।

प्रश्न: सत्ता स्थिति-पूर्ण है, इसका क्या आशय है?

उत्तर: परिवर्तन पूर्वक सत्ता आया नहीं है। परिवर्तन उसमें होता नहीं है। इसलिए स्थिति-पूर्ण है।

प्रकृति में परिवर्तन होता है। जड़-प्रकृति में मात्रात्मक परिवर्तन के साथ गुणात्मक परिवर्तन होता है। चैतन्य प्रकृति (जीवन) में केवल गुणात्मक परिवर्तन सम्भव है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक; दिसम्बर २००८, अमरकंटक)

Thursday, March 19, 2009

देखना - समझना

देखने का मतलब है - समझना। समझ में आता है - तभी देखा, नहीं तो क्या देखा? यदि आप कोई वस्तु को देखते हैं, और वह आप को समझ में नहीं आता है - तो आपने उसको देखा है, उसका क्या प्रमाण है?

देखा है, पर समझा नहीं है - उसी जगह में सकल अपराध होते हैं।

समझा नहीं है, पर अपने को समझा हुआ मान लिया है - उसी जगह में सारे गलतियाँ/अपराध होते हैं।

नासमझी ही गलती और अपराध का आधार है।

जैसे - आप अपने भाई को देखते हो, लेकिन भाई के साथ अपने सम्बन्ध को नहीं समझते हो - तो उस सम्बन्ध में आप से गलती/अपराध होना संभावित है। सम्बन्ध में जो मूल्य निर्वाह होना चाहिए - वह नहीं हो पाना ही सम्बन्ध में गलती/अपराध करना है।

उसी तरह अस्तित्व अपने में एक व्यवस्था है। यह व्यवस्था हमें समझ में नहीं आता है - तो हम गलती और अपराध के अलावा क्या करेंगे? गलती करते हैं, फ़िर उस गलती को दूसरी गलती से रोकने का प्रयास करते हैं। अपराध करते हैं, फ़िर उस अपराध को दूसरे अपराध से रोकने का प्रयास करते हैं। जब तक हम अस्तित्व की व्यवस्था को नहीं समझते तब तक हम गलती और अपराध के अलावा और कुछ कर ही नहीं सकते।

मनुष्य अस्तित्व में व्यवस्था को समझने के बाद ही स्वयं व्यवस्था में जीने को प्रमाणित कर सकता है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा से संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक)

परमाणु व्यवस्था का मूल स्वरूप है.

अनुसंधान पूर्वक मैंने देखा (समझा) - परमाणु अपने स्वरूप में एक व्यवस्था है। हर परमाणु परमाणु-अंशों का एक निश्चित गठन है। परमाणु-अंशों में व्यवस्था की प्यास है। कम से कम दो अंश के परमाणु में एक निश्चित व्यवस्था है। गठनशील परमाणु में निश्चित आचरण नहीं हो - तो वह विकास (गठन-पूर्णता) तक नहीं पहुँच सकता।

गठन-पूर्णता होने के बाद परमाणु से कोई प्रस्थापन-विस्थापन होने की सम्भावना ही नहीं रहती, इसलिए उसकी बल और शक्तियां अक्षय हो जाती हैं। सत्ता में सम्पृक्तता वश हर परमाणु (गठनशील या गठन-पूर्ण) में चुम्बकीय बल सम्पन्नता है। चैतन्य परमाणु (जीवन) में यह बल-सम्पन्नता चैतन्य-बल के रूप में है। जैसे - आस्वादन एक चैतन्य बल है। इसी तरह तुलन, चिंतन, बोध, और अनुभव चैतन्य बल हैं। जीवन को इन पाँच बलों के स्वरूप में देखा। जीवन-गति को चैतन्य-शक्तियों के स्वरूप में देखा। प्रमाण-शक्ति स्वरूप में एक गति है। उसी तरह - संकल्प-शक्ति, चित्रण शक्ति, विश्लेषण शक्ति, चयन शक्ति। पाँच क्रियाएं स्थिति में, और पाँच गति में मिल कर जीवन-क्रियाकलाप को पहचाना गया। उसके detail में उसको १२२ आचरणों के स्वरूप में पहचाना।

प्रश्न: प्रचलित-विज्ञान तो परमाणु के मूल में अस्थिरता और अनिश्चयता बताता हैवह कैसे?

उत्तर: प्रचिलित विज्ञानियों ने परमाणु के विखंडन पूर्वक परमाणु-अंशों को खोल दिया। मनुष्य अपना प्रभाव डाले बिना वह खुलता नहीं है। खुलने के बाद परमाणु अपने स्वाभाविक स्वरूप में नहीं रहा। उस पर मनुष्य का प्रभाव रहा। मनुष्य प्रभाव में परमाणु विकृत स्वरूप में रहा। विकृत स्वरूप को मनुष्य ने सही मान कर परमाणु को अस्थिर अनिश्चित ठहरा दिया। जबकि परमाणु वास्तविकता में व्यवस्था का मूल स्वरूप है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक)

Wednesday, March 18, 2009

न्याय की चाहत और न्याय का प्रमाण

अभी की स्थिति में "न्याय" चाहिए, पर प्रिय-हित-लाभ से छूटे नहीं हैं। प्रिय-हित-लाभ शरीर संवेदनाओं से जुडी तुलन दृष्टियाँ हैं। इसलिए हम "न्याय" को भी संवेदनाओं के साथ जोड़ने लग जाते हैं। प्रिय-हित-लाभ दृष्टियों के साथ भय, प्रलोभन, और सम्मोहन जुडा ही रहता है। प्रिय-हित-लाभ दृष्टियों के साथ न्याय कुछ होता नहीं है। हम राजी-गाजी से किए गए arrangement को न्याय मान लेते हैं - पर कुछ समय बाद वह fail होता ही है।

न्याय compromise नहीं है।

"न्याय" शब्द द्वारा न्याय वास्तविकता की शाश्वतीयता इंगित है। इंगित होने के बाद उसका कल्पना, उसके लिए विचार, और उसका चित्त में साक्षात्कार - यह क्रम है। यह तीनो होने पर बोध और अनुभव होता ही है। उसके बाद न्याय प्रमाणित करने की योग्यता आती है।

संवेदनाओं के स्थान पर संबंधों पर ध्यान के shift होने पर न्याय की स्थिति बनती है। सम्बन्ध अस्तित्व में वास्तविकता है। संबंधों के नाम लेना तो हमारे अभ्यास में आ चुका है। जैसे - माता, पिता, भाई, बहन, गुरु आदि। संबंधों के प्रयोजनों को पहचानने की बात अभी शेष है। संबंधों का प्रयोजन है - व्यवस्था में जीना।

जिस क्षण से माता-पिता ने अपनी संतान से सम्बन्ध को पहचाना, ममता और वात्सल्य उनमें अपने आप से उमड़ता है। उसके लिए कोई अलग से training लेने की ज़रूरत नहीं है। ममता, वात्सल्य मूल्य जीवन में स्थापित/निहित हैं, तभी तो संबंधों की पहचान होने पर वे उभरते हैं।

अस्तित्व में व्यवस्था का स्वरूप समझ में आने पर संबंधों की पहचान होना और निर्वाह होना स्वाभाविक हो जाता है। समाधान-समृद्धि पूर्वक हम अस्तित्व की व्यवस्था में जी सकते हैं, भागीदारी कर सकते हैं, और उपकार कर सकते हैं।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक)

सर्वशुभ का रास्ता

हम जहाँ हैं, वह हमारा घर है।
हम अस्तित्व में हैं, अस्तित्व हमारा घर है।
घर की सुन्दरता पहचान में आती है तो इस में सुंदर ढंग से जीने की बात बनती है।
सुंदर ढंग से जीने में शुभ होता ही है।
यही सर्व-शुभ का रास्ता है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक)

Tuesday, March 17, 2009

निर्भीकता से अध्ययन

"पठन विधि" और "अध्ययन विधि" के भेद को समझने की ज़रूरत है।

"पठन विधि" में भय-प्रलोभन हमारी परिकल्पना में स्थापित रहता है। प्रलोभन के पक्ष में जो पठन है, उसको स्वीकार लेता है - बाकी को नकार देता है। अध्ययन विधि में भय-प्रलोभन आता नहीं है। अभी जैसे अपना ही उदाहरण लें - आप हमारे संयोग में हम डांट-फटकार के साथ भी चले हैं, प्यार-पुचकार से भी चले हैं। क्या आपको कोई भय-प्रलोभन हुआ? "आपको चाहिए - नहीं चाहिए?", "आप समझे - नहीं समझे?" इन्ही दो column में मेरी सारी प्रस्तुति है। इसी अर्थ में मेरा सारा तर्क है।

प्रचलित-विज्ञान का तर्क नकारात्मक खूंटे से बंधा रहता है। ईश्वर-वाद का तर्क रहस्य के खूंटे से बंधा रहता है। यहाँ तर्क सकारात्मक खूंटे से बंधा रहता है। सकारात्मक खूंटे से बांधे बिना आप कोई निश्चित जगह पहुँच भी नहीं सकते।

इसलिए यहाँ पहला परिशीलन यही है - "आपको जागृत होना है या भ्रमित ही रहना है?" मानव जाति जागृति को नकार नहीं पाता है।

फ़िर जागृति के तीन स्तर बताये - (१) चार विषय (आहार, निद्रा, भय, और मैथुन), (२) पाँच संवेदनाएं (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध), और (३) न्याय, धर्म, सत्य। इनमें से आप जागृति के किस स्तर पर जीना चाहते हैं? - यह पूछा। इसका उत्तर - "न्याय धर्म सत्य में जागृत होना है।" - यही निकलता है। जागृति के पहले दो खाके "जागृति-क्रम" में गण्य हैं। तीसरा खाका - न्याय, धर्म, सत्य का - "जागृति" में गण्य है। जागृति प्रमाणित होने के तीन स्तर हैं - मानव चेतना, देव चेतना, और दिव्य-चेतना।

यह तर्क व्यवहार-संगत नहीं है - यह कहना बनता नहीं है। यह तर्क समझ (ज्ञान-विवेक-विज्ञानं) के विरुद्ध है - यह भी कहना बनता नहीं है। यह तर्क नियति-विरोधी है, तृप्ति-दायक नहीं है - यह भी कहना बनता नहीं है। यह तर्क "व्यवहार प्रमाण" में न्याय और समृद्धि से जुड़ता है। "विचार प्रमाण" में समाधान से जुड़ता है। "अनुभव प्रमाण" में सत्य से जुड़ता है।


कुल मिला कर - मनुष्य में जागृति की सहज-अपेक्षा पर मध्यस्थ-दर्शन का सारा तर्क जुड़ा हुआ है। जागृति की अपेक्षा मनुष्य में आदि-काल से है। "हर व्यक्ति समझदार हो सकता है।" - यहाँ से यह बात शुरू है। यही इस प्रस्तुति का आधार है।

संवाद, प्रबोधन, और परिशीलन पूर्वक हम अध्ययन-कक्ष में पहुँचते हैं। अध्ययन-कक्ष में पहुंचना, मतलब वस्तु के प्रति निर्भीक रूप में कल्पनाशीलता को दौडाना। उसके बाद तुलन होना। उसके बाद साक्षात्कार होना।

अपनी कल्पना में वस्तु के प्रति जो आप पहले से परिकल्पना बना रखे हैं, उसके आधार पर तुलन नहीं करना है। यदि पूर्व स्मृतियों और परिकल्पनाओं के आधार पर तुलन करते हैं - तो वह "अच्छा लगने" के आधार पर ही होता है। विगत की सभी स्मृतियों और परिकल्पनाओं के आधार पर तुलन में भय और प्रलोभन के प्रति विवशता रहती ही है। यह प्रस्ताव "अच्छा लगने" के स्थान पर "अच्छा होने" के लिए है। "अच्छा होने" के लिए भय और प्रलोभन से मुक्त हो कर तुलन करने की आवश्यकता है।

धैर्य से, सार्थकता की चोटी से बाँध कर हर कदम रखा जाए। आतुरता करते हैं, तो वह "प्रयोग" ही हुआ। धैर्य से चलते हैं, तो "पद्यति" है। अब आगे की ज़िंदगी में हमें प्रयोग नहीं करने हैं, पद्यति पर चलना है। हर व्यक्ति को शोध पूर्वक पद्यति के साथ पैर रखना है।

प्रश्न: "प्रयोग" और "पद्यति" में क्या अंतर है?

उत्तर: प्रयोग होता है - अज्ञात को ज्ञात करने के लिए, और अप्राप्त को प्राप्त करने के लिए। परम्परा में जो प्रावधानित नहीं है - तब प्रयोग या अनुसंधान करने की आवश्यकता होती है।

"प्राप्ति" को लेकर हम देखते हैं - सामान्याकंक्षा (आहार, आवास, अलंकार) और महत्त्वाकांक्षा (दूर-श्रवण, दूर-दर्शन, और दूर-गमन) संबन्धी सभी वस्तुएं मनुष्य को प्रयोग पूर्वक प्राप्त हो चुकी हैं। ये सभी मनाकार को साकार करने के रूप में हैं। अप्राप्ति को लेकर अब जो प्रयोग हैं - वे व्यापार को बुलंद करने के लिए ही हैं। और कोई प्रयोग धरती पर शेष नहीं रह गया। अप्राप्त को प्राप्त करने का कोई खाका अब शेष बचा नहीं है।

अज्ञात को ज्ञात करने का पक्ष अभी तक खाली रहा है। अज्ञात को ज्ञात करना मनः स्वस्थता को प्रमाणित करने के अर्थ में है। उसके लिए ही मध्यस्थ-दर्शन का अध्ययन करने के लिए प्रस्ताव है। अध्ययन करना कोई प्रयोग नहीं है। अध्ययन एक निश्चित पद्यति है। इस प्रस्ताव के अध्ययन करने के बाद यदि आप पाते हैं - यह पूरा नहीं पड़ता, तो पुनः प्रयोग किया जाए!

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक)

Monday, March 16, 2009

पृथ्वी गंधवती है.

"पृथ्वी गंधवती है" - वैदिक-विचार में भी इस बात को कहा है।

सुगंध और दुर्गन्ध दोनों प्राण-अवस्था से स्पष्ट हुई। जीवों में गंध के आधार पर अपने आहार को पहचानने की विधि बनी। मनुष्य ने "रुचि" के आधार पर अपने आहार को पहचाना। मनुष्य और जीव में आहार की पहचान में यही मौलिक फर्क है।

ज्ञानी और विज्ञानी दोनों मिल कर मानव का आहार (शाकाहार या मांसाहार) तय नहीं कर पाये अभी तक! आचरण तो दूर की बात है!

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (दिसम्बर २००८, अमरकंटक)

Sunday, March 15, 2009

प्रचलित विज्ञान की समीक्षा

रूप, गुण, स्व-भाव, और धर्म का विखंडन नहीं किया जा सकता। रूप, गुण, स्व-भाव और धर्म अविभाज्य हैं।

प्रचिलित विज्ञानियों का हठ है - रूप और गुण (empirically observable aspects) को मानेंगे, स्व-भाव और धर्म को नहीं मानेंगे! स्व-भाव (मौलिकता या सह-अस्तित्व में प्रयोजन) कुछ होता है, धर्म कुछ होता है - यह प्रचलित-विज्ञान नहीं मानता। यह सोच ही विखंडन-वादी (reductionism) है।

स्थिति और गति अविभाज्य हैस्थिति से आशय है - "होना"। गति से आशय है - "प्रकटन"। प्रचलित-विज्ञानं गति को तो मानता है, स्थिति ("होना") को नहीं मानताइकाई का होना (या उसकी स्थिति) उसके स्व-भाव और धर्म द्वारा इंगित हैइकाई का परस्परता में प्रकटन (या उसकी गति) उसके रूप और गुण द्वारा इंगित होती है

प्रश्न: विज्ञानी ऐसा तो नहीं कहते कि धर्म और स्व-भाव को नहीं मानेंगे...

उत्तर: वे जो भी कहते हों, यह मेरे अनुभव की रोशनी में प्रचलित-विज्ञान का समीक्षा है। विज्ञान-भाषा व्यापार-भाषा में ही जुड़ती है। विज्ञान application में engineering और medicine के रूप में आता है। इन दोनों के कार्यक्रमों में विखंडन-वादी सोच साफ़ दिखती है। दोनों व्यापार के लिए समर्पित हैं। बिना टुकडा किए (विखंडन किए) व्यापार होता नहीं है। व्यापार धोखाधड़ी से छुटा नहीं है। व्यापार न्याय से जुड़ता नहीं है।

प्रचलित-विज्ञान की यही सोच उसे ज्ञान-व्यापार की तरफ़ ले गयी। Intellectual Property Right महान अपराध है।

प्रचलित-विज्ञान ने parts to whole को सोचा। parts को जोड़ कर whole बना सकते हैं - यह सोचा। parts को artificially बना सकते हैं - यह सोचा। इस सोच से सार्थक जो निकला वह है - दूर-संचार। अधिकाँश रूप में विखंडन-वादी सोच से विनाश ही हुआ।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (दिसम्बर २००८, अमरकंटक)
[१] Scientific Method
[२] प्रचलित विज्ञानं का ज्ञान पक्ष ग़लत है, तकनीकी पक्ष सही है

Thursday, March 12, 2009

मानव का अध्ययन

अस्तित्व में मानव एक अविभाज्य इकाई है। मानव का स्वरूप शरीर और जीवन के सह-अस्तित्व में प्रमाणित है। जीवन शरीर को जीवंत बनाता है। शरीर-संवेदना के क्रियाकलाप जीवन्तता के आधार पर ही पाँचों ज्ञानेन्द्रियों (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध इन्द्रियां) का कार्य संपादित हो पाता है। कर्मेन्द्रियों का क्रियाकलाप जीवन्तता स्पष्ट न रहते हुए भी कुछ क्षण, कुछ दिन, कुछ मास तक भी पराधीनता विधि से सप्राणित रह सकता है - अर्थात श्वास और ह्रदय क्रिया चल सकती है।

जीवन्तता जीवन का ऐश्वर्य है। श्वास छोड़ने-लेने की प्रक्रिया प्राण-कोशिकाओं से रचित शरीर-रचना की महिमा है। जीवन अक्षय शक्ति और अक्षय बल संपन्न इकाई है। प्राण कोशिकाओं का शक्ति और बल उनके द्वारा रचित रचना के आधार पर सीमित रहता ही है। क्योंकि हर रचना के साथ विरचना क्रम जुड़ा ही रहता है। प्राण-कोशिकाओं से रचित जितनी भी रचनाएँ हैं (जैसे - पेड़ पौधे, जीव शरीर, मनुष्य शरीर) - वे "शीघ्र परिवर्ती" हैं। भौतिक रचनाएँ (पत्थर, मिट्टी, मणि, धातुएं) "दीर्घ परिवर्ती" हैं। जीवन अपरिवर्तनीय है - अर्थात जीवन के गठन में कोई परिवर्तन नहीं होता। दूसरे शब्दों में - जीवन "अमर" है। जबकि - भौतिक-रासायनिक रचनाएँ "नश्वर" हैं। नश्वर का मतलब - परिवर्तनशील हैं। शरीर जड़ प्राण-कोशिकाओं से रचित रचना होने के आधार पर जड़ कोटि में ही गण्य है। क्योंकि जो जिससे बना होता है, वह उससे अधिक नहीं होता। शरीर प्राण-कोशिकाओं से रचित होने के कारण उसमें "परिवर्ती" कार्यक्रम चलता रहता है। इसीलिये शरीर नश्वर है। इस तरह जीवन शरीर की अपेक्षा अधिक बल और शक्ति संपन्न है। एक सिद्धांत है - अधिक बल और शक्ति, कम बल और शक्ति संपन्न माध्यम के द्वारा प्रकाशित होता है। इस तरह, जीवन शरीर के द्वारा प्रकाशित होता है।

जीवों में शरीर और जीवन का सह-अस्तित्व वंश-अनुशंगियता के रूप में प्रमाणित है। वंश-अनुशंगियता में जीवन जीव-शरीरों के अनुरूप कार्य-कलापों में संलग्न हो जाता है। जीवों में "समृद्ध मेधस" होता है, तभी जीवन उसके द्वारा संकेत-प्रसारण पूर्वक शरीर को संचालित कर पाता है। प्राण-कोशिकाओं में निहित प्राण-सूत्रों में जो रचना-विधी होती है, उसमें उत्तरोत्तर गुणात्मक विकास होने से ही उत्तरोत्तर समृद्ध शरीर-रचनाओं का प्रकटन होता है। रचना में श्रेष्ठता प्रधानतः मेधस-रचना और मेधस-तंत्र प्रधानतः पहचानी जाती है। ह्रदय-तंत्र मेधस-तंत्र के बाद मुख्य तंत्र है। इस प्रकार शरीर में अनेक तंत्र हैं, जो मिल कर अपने आप में एक व्यवस्था हैं।

इसी रचना-विधि में गुणात्मक-विकास क्रम में मनुष्य-शरीर रचना का प्रकटन है, जिसमें "समृद्धि-पूर्ण मेधस" है। मनुष्य-शरीर रचना नियति-क्रम में ऐसी प्रकट हुई की उसके द्वारा जीवन द्वारा कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता प्रकाशित होने लगी। कल्पनाशीलता का तात्पर्य है - अनुरूप, प्रतिरूप, रूप, कुरूप, स्वरूप विधियों से चित्रित करना। कर्म-स्वतंत्रता का तात्पर्य है - आवश्यकता या कांक्षा (कल्पित आवश्यकता) के अर्थ में कायिक, वाचिक, मानसिक, कृत, कारित, अनुमोदित विधि से कार्य करने की स्वतंत्रता।

कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता पूर्वक जीवन द्वारा "सुख की चाहत" मनुष्य के जीने में प्रकाशित होने लगी। जीवन को संवेदनाओं द्वारा विषयों में सुख भासा - तो उसी में सुख की निरंतरता के लिए प्रयास-रत हो गया। संवेदनाओं में सुख जैसा लगता है, पर सुख होता नहीं है। संवेदनाओं में सुख होता तो उस सुख की निरंतरता भी होती। संवेदनाओं में सुख नहीं है, इसी लिए उनमें सुख की निरंतरता भी नहीं है।

प्रश्न: जीवन में "सुख की निरंतरता" कैसे हो?

उत्तर: मध्यस्थ-दर्शन के अनुसंधान से निकला - समाधान ही सुख है संस्कार-संपन्न होने पर मनुष्य समाधानित होता है, फलतः सुखी होता है। संस्कार-संपन्न होने के लिए मध्यस्थ-दर्शन के अध्ययन का प्रस्ताव है।

मनुष्य शरीर को संचालित करते हुए जीवन का वैभव संस्कार-अनुशंगियता के रूप में ही प्रमाणित हो सकता है।

संस्कार एक जीवन-गत तथ्य हैसंस्कार शरीर-गत तथ्य नहीं है। जीवन में सम्पूर्ण समझदारी का स्थान और प्रणाली है। शरीर में कोई ऐसा स्थान नहीं है जिसमें नियम, न्याय, समाधान, सत्य की प्यास हो। मेधस रचना में कोई स्थान नहीं है जो श्रुति और स्मृति का धारक वाहक हो सके। ज्ञान-इन्द्रियों से शरीर द्वारा जो संकेत ग्रहण होता है - वह जीवन में ही प्रभावित होता है। जीवन में ही नियम, न्याय, समाधान, और सत्य की प्यास है। प्यास तृप्त होने के अर्थ में ही है।

देखने-समझने वाली इकाई जीवन ही है जीवन में ही जानने, मानने, और पहचानने का सम्पूर्ण वैभव समाहित रहता है। शरीर के द्वारा निर्वाह संपन्न होना पाया जाता है। इस तरह शरीर मानव-परम्परा में जागृति के प्रमाणित होने के लिए एक आवश्यकीय और अनिवार्य माध्यम है। मानव-संचेतना का अध्ययन शरीर और जीवन के संयुक्त रूप में है। मानव-संचेतना का तात्पर्य संज्ञानशीलता और संवेदनशीलता का संयुक्त स्वरूप है, जो जानना, मानना, पहचानना, और निर्वाह-करना का संयुक्त कार्य-कलाप है।

संज्ञानशीलता पूर्वक ही मनुष्य में संवेदनाएं नियंत्रित होती हैंनियंत्रित संवेदनाएं ही मानव के निश्चित आचरण के स्वरूप का आधार है। अनियंत्रित संवेदनाओं के साथ मानव का आचरण निश्चित नहीं हो सकता। ज्ञान सम्पन्नता (संज्ञानीयता) के साथ मनुष्य के आचरण को ही "मानवीयता पूर्ण आचरण" कहा है। मानवीयता पूर्ण आचरण का स्वरूप है - मूल्य, चरित्र, और नैतिकता। "मूल्य" से आशय है - मानव-संबंधों में न्याय प्रमाणित होना। मूल्यों की शुरुआत परिवार से है। "चरित्र" से आशय है - स्व-धन, स्व-नारी/स्व-पुरूष, दया पूर्ण कार्य-व्यवहार पूर्वक सामाजिकता प्रमाणित होना। "नैतिकता" से आशय है - तन, मन, धन का सदुपयोग और सुरक्षा के लिए सार्वभौम-व्यवस्था का प्रमाणित होना। मनुष्य के व्यवस्था में जीने पर ही बाकी तीनो अवस्थाओं की निरंतरता सुरक्षित हो सकती है। यही सर्व-शुभ का सूत्र है।

प्रश्न: जागृत-जीवन और भ्रमित-जीवन के मनुष्य-शरीर को संचालित करने में क्या अन्तर है?

जागृत-जीवन शरीर को जीवंत रखते हुए, जागृत-जीवन में होने वाली आशा, विचार, इच्छा, ऋतंभरा, और प्रामाणिकता के आधार पर मनुष्य-शरीर को संचालित करता है। भ्रमित-जीवन शरीर को जीवंत रखते हुए, भ्रमित-जीवन में होने वाली आशा, विचार, इच्छा (४.५ क्रिया) के आधार पर मनुष्य-शरीर को संचालित करता है।

स्त्रोत: मध्यस्थ-दर्शन (मानव संचेतना वादी मनोविज्ञान)

Tuesday, March 10, 2009

शरीर यात्रा

शरीर को जीवन मान कर जब जीते हैं - तो यह सोच बुढापे में जा कर fail हो ही जाती है। बचपन में अभिभावकों के संरक्षण में बच्चे कुछ करते हैं, फ़िर युवावस्था में कुछ करते हैं, प्रौढावस्था में अपना जलवा दिखाते हैं, और बुढापे में चारों खाने चित्त पड़ जाते हैं। वैसे ही जैसे अखाडे में पहलवान चारों खाने चित्त गिर जाता है!

प्रश्न : बुढापे में चारों खाने चित्त होने के स्थान पर होना क्या चाहिए?

संबंधों का निर्वाह होना चाहिए। माँ-बाप को अपने घर पर ही मरना चाहिए - nursing-homes में नहीं! nursing-homes में उनके मरने का इंतज़ार करने के लिए उन्ही के बच्चे ले जाते हैं। अपने घर में अपने विश्वसनीय जनों के सान्निध्य में शरीर-त्याग करना ज्यादा अच्छा है। क्या ठीक होगा? - आप ही सोच कर तय करो।

जब तक मरणासन्न वृद्ध की साँस चलती है - आस रखो। उसकी जो सेवा की आवश्यकता है, वह कर दो। जैसे बच्चे निस्सहाय होते हैं, उनकी सेवा करके उनके माता-पिता उनको बड़े बनाते हैं... ठीक उसी तरह बुजुर्गों की आख़िरी साँसों के समय में उनकी अपेक्षाओं को पहचान कर उनकी सेवा करते रहने में क्या तकलीफ है? यह आपको करना नहीं है - यह आपकी कायरता है। विवेक पूर्वक सोचा जाए तो उसके अलावा बचने की कोई जगह नहीं है। चाहे यह देश हो, या कोई और देश हो!

चिंतन-अभ्यास शरीर यात्रा पर्यंत चलता रहता है। यह अपने घर-परिवार के लोगों के बीच आश्वस्ति पूर्वक होता है। जैसे - आपके सामने मैंने यह पूरा चिंतन व्यक्त किया। आपके सामने इस चिंतन को बनाए रखने में मुझे विश्वास होगा या नहीं?

जीवन मूलक विधि से सोचते हैं तो हम "अच्छी तरह जीने" की जगह में पहुँचते हैं। शरीर की अपनी मर्यादा है। उससे समाधान यही है - "आयु के अनुसार काम"। जैसे - कोई बच्चा पैदा होते ही तो pilot का काम करना नहीं शुरू कर देता। किसी आयु में ही कर पाता है। आयु शरीर की ही होती है। आयु के अनुसार शरीर काम करने योग्य होता है। जीवन की कोई आयु नहीं होती। जीवन में केवल जागृति या भ्रम ही होता है।

जागृति के लिए मनुष्य सदा से ही प्रयास रत रहा है। पहले भी था, आज भी है, आगे भी रहेगा। प्रयास तो रहा है - विधिवत हो या विधि को छोड़ कर हो। "मध्यस्थ-दर्शन का अध्ययन" विधि-वत प्रयास के लिए एक प्रस्ताव है।

हर अभिभावक अपने में जो त्रुटियां मानता हैं, वे अपने बच्चों में न हों - यह सोचता है। यह इस बात की गवाही है - मनुष्य स्वयं जागृत न हो, तो भी उसकी आगे परम्परा से जागृति की अपेक्षा रहती है।

जीवन के "सार ज्ञान" को संसार में आवंटित करके शरीर की यात्रा को पूरा करना हर व्यक्ति चाहता है। जिसको भी वह "सार" माना रहता है। इसी से मनुष्य जाति एक पीढी से दूसरा पीढी enrich होता आया है। इसी विधि से मनुष्य पहले जीव-चेतना में चार विषयों की सीमा से पाँच संवेदनाओं की सीमा में आया। अब पाँच संवेदना से मानव-चेतना का रास्ता (अध्ययन विधि) बन गया है। मानव-चेतना में संज्ञानीयता पूर्वक संवेदनाएं नियंत्रित होती हैं। इस प्रस्ताव की मनुष्य परम्परा से coupling केवल संवेदनाओं के part में है। संवेदनाओं के part में हम जुड़े हैं - संवेदनाएं नियंत्रित होने की जगह के लिए। और कुछ भी नहीं है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक)

Sunday, March 8, 2009

परिवार में ही व्यवस्था की शुरुआत है.

समाधान ही सुख है।

यंत्र के पास समाधान नहीं है। यंत्र साधन है।
किताब में समाधान नहीं है। किताब सूचना है।

समाधान किसके पास होता है?
जागृत-मनुष्य के पास।

यह अपने में समझ में आने से अपने में उत्साह भी जागना चाहिए। हम समझ सकते हैं, और समझा भी सकते हैं। हम जी सकते हैं, जीने दे सकते हैं। हम अपने समझे होने का प्रमाण समझा पाने में प्रस्तुत कर सकते हैं। हम अपने जीने का प्रमाण जीने दे सकने के रूप में प्रस्तुत कर सकते हैं।

परिवार में ही जीने दे कर जीने की शुरुआत है। परिवार में ही व्यवस्था की शुरुआत है। परिवार में ही completion भी है। हमारी sincerity की पहचान - ज्ञान का पहचान, विवेक का पहचान, विज्ञान का पहचान - सर्वप्रथम परिवार में ही है। इससे बहुत बड़ा impetus यह आया - संबंधों में जीना हमारी प्राथमिक आवश्यकता बन जाती है।

संबंधों में जीने के लिए "विश्वास" ही एक मात्र आधार है। संबंधों में निर्वाह निरंतरता को बनाए रखना ही "निष्ठा" है। संबंधों के निर्वाह में मूल्यों का प्रकटन है - जैसे वात्सल्य, ममता, कृतज्ञता, गौरव, सम्मान, प्रेम, स्नेह, श्रद्धा, और विश्वास। इस प्रकार ९ मूल्य सभी संबंधों में प्रकट होने लग गए।

संबंधों में मूल्यों का प्रकटन ज्ञान की सर्वप्रथम उपलब्धि है।

इस तरह हर जगह मैं मूल्यों को निष्ठा पूर्वक निर्वाह करने के योग्य हो जाता हूँ। संबंधों को जब पहचानते हैं - तो संबंधों के साथ धोखाधड़ी नहीं होता। संबंधों को हम ठीक पहचानते नहीं हैं - तभी संबंधों में धोखाधड़ी होती है। मनुष्य जहाँ सम्बन्ध को सटीक नहीं पहचानता - वहीं सारा कुकर्म है। कितना सारा पोल खुल गया! यहाँ से पोल खुल जाता है। हर जगह संबंधों की पहचान के साथ जीना है, या धोखाधड़ी करते हुए ही जीना है? - आप तय करो! न्याय पूर्वक जीने का रास्ता बनाना है या नहीं? एक लोहार जैसा चोट हमारे सिर पर आता है।

इस बात पर संवाद नहीं कर सकते हैं - मैं नहीं कह रहा हूँ। आप ही decide करो, आप ही निर्णय लो! कोई जबरदस्ती नहीं है।

सत्य जी (Late Prof Yashpal Satya from IIT Delhi) ने जो जीवन विद्या के साथ experiment किया उसका यही result था - "जब संवाद का मुद्दा बनाते हैं, तो हर व्यक्ति सकारात्मक बात का पक्षधर हो जाता है।"

लेकिन सहमत होने भर से हम विद्वान हो गए - ऐसा कुछ नहीं है। सहमति के साथ निष्ठा जोड़ने पर - अध्ययन में लगने पर - विद्वान होना, समझदार होना बन जाता है। अध्ययन के द्वार तक आप पहुँच चुके हैं - अब उसके पार आपको पहुंचना है। अध्ययन के लिए जो प्रबंध हैं - वे आप के पास सूचना के रूप में हैं। परिभाषा विधि से शब्द द्वारा वस्तु की कल्पना होती है। अस्तित्व में वस्तु के स्वरूप में पहचान हुई - तो हम समझदार हुए।

जब अध्ययन कर लिया, तो अध्ययन करा सकने की स्थिति आती है। अध्ययन कराने का मतलब है - हम ज्ञान को जब अपने में प्रमाणित करते रहते हैं, तो दूसरे में उसकी आवश्यकता बन जाती है। जैसे - मैं विश्वास का निर्वाह करता हूँ, तो मेरी संतानों में विश्वास के निर्वाह करने की आवश्यकता बन जाती है। इस ढंग से सार्थक विधि को हम पकड़ लिए।

असामान्य विधि से व्यवस्था को पहचानने की कोई विधि नहीं है। सामान्य विधि से ही व्यवस्था में जीने से परस्परता में विश्वास होना स्वाभाविक हो जाता है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक)

Wednesday, March 4, 2009

मनुष्य और समाधान

(१) नियति-क्रम में मनुष्य शरीर रचना ऐसी हुई जिससे जीवन द्वारा कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता मनुष्य द्वारा प्रकट होने लगी।

(२) मनुष्य कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता वश "सुख की चाहत" को व्यक्त करता है।

(३) मनुष्य में सुख की सहज-अपेक्षा है। मनुष्य में सुख की अपेक्षा को समाप्त नहीं किया जा सकता।

(४) समाधान ही सुख है। समाधानित हुए बिना सुखी नहीं हुआ जा सकता।

(५) अध्ययन विधि से समाधानित होना सहज है।

मनुष्य जो सोच-विचार करता है - उस सोच-विचार के मूल में "ज्ञान" होना आवश्यक है। अस्तित्व दर्शन ज्ञान, जीवन-ज्ञान, और मानवीयता पूर्ण आचरण ज्ञान - ये तीनो मिल कर ज्ञान हुआ। यही अध्ययन की वस्तु है। इसी ज्ञान के आधार पर "विवेक" और "विज्ञान" कार्य करता है। ज्ञान मूल में होने से विवेक सम्मत विज्ञान, और विज्ञान सम्मत विवेक होता है। इस तरह ज्ञान-मूलक सोच-विचार से योजना, कार्य-योजना, और उसके क्रियान्वयन से फल-परिणाम होते हैं। ज्ञान-मूलक कर्मो के फल-परिणाम भी ज्ञान-सम्मत होते हैं। यही समाधान का स्वरूप है। मनुष्य के कर्म के फल-परिणाम जब तक ज्ञान-अनुरूप नहीं हैं - तब तक समाधान नहीं हुआ।

भ्रमित मनुष्य के सोच-विचार, योजना, कार्य-योजना के मूल में ज्ञान-विवेक-विज्ञान नहीं रहता। इसलिए भ्रमित मनुष्य के कर्मो के फल-परिणाम ज्ञान-अनुरूप नहीं होते, और समस्याकारी ही होते हैं।

मानवीयता पूर्वक जीने की बात समझदारी पूर्वक ही आयेगी। समझदारी से ही समाधान होता है। समझदारी अनुभव में ही होता है। नासमझी के सारे काम जीवन साड़े चार क्रिया में कर लेता है। जीवन की दसों क्रिया को प्रमाणित करने के लिए अनुभव ही है। यह मेरी जांची हुई बात है - अनुभव के बिना मनुष्य का मानवत्व सहित व्यवस्था में जीना बनता नहीं है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (दिसम्बर २००८, अमरकंटक)