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Saturday, August 18, 2012

जीना

"जीवन विद्या जीने के लिए है, केवल बोलने के लिए नहीं" - बाबा इस बात पर बारम्बार ध्यान दिलाते हैं।  फिर भी इसका महत्त्व पूरी तरह अभी समझ नहीं आया है।  विद्या को बोलना आ जाना पर्याप्त नहीं है, इसको जीना ही पर्याप्त है।  अपनी विद्वता से दूसरों को प्रभावित करने की दौड़ में अपना जीना कहीं छूट जाता है।  सच बात तो यह है जिनको हम प्रभावित करने के लिए दौड़ रहे होते हैं, उनका वास्तव में हमारे जीने से कोई मतलब भी नहीं होता।  जिनको हमारे जीने से मतलब होता है, उनको हमारे बोलने से ज्यादा मतलब नहीं होता। 

Monday, August 13, 2012

सम्वाद


अभ्यास, अध्ययन


Source: अभ्यास दर्शन, - 2nd Edition, पृष्ठ 133, 175  (Text below will be incorporated in Edition #3, it has been modified from the existing one in Edition #2) - Shriram Narasimhan
अभ्यास, अध्ययन
अध्ययन जागृति के अर्थ में चरितार्थ होता है| यह मानवीयतापूर्ण जीवन के साथ आरम्भ होता है जो श्रवण, मनन एवं निदिध्यासन पूर्वक चरितार्थ होता है| जीवन चरितार्थता ही आचरणपूर्णता है| अध्ययन शास्त्राध्ययन, उपदेश एवं स्व-प्रेरणा का योगफल है| इन सब में प्रामाणिकता का होना अनिवार्य है|  जीवन के कार्यक्रम का आधार ही अध्ययन है | अध्ययन, श्रवण, मनन, निदिध्यासन की संयुक्त प्रक्रिया है| शास्त्राध्ययन, श्रवण एवं मनन ही अध्ययन के लिए अभ्यास है| अध्ययन के लिए मन को लगाना ही अभ्यास है| योगाभ्यास का तात्पर्य अभ्यास एवं अध्ययन से है|
श्रवण का तात्पर्य भास होने से है | भास होने का तात्पर्य परम सत्य रुपी सह-अस्तित्व कल्पना में होना, वाचन व श्रवण भाषा के अर्थ रूप में सत्य स्वीकार होना है| शोध विधि पूर्वक मनन प्रक्रिया में मानवीयतापूर्ण जीवन के अनंतर न्याय धर्म सत्य रूपी वांछित वस्तु देश एवं तत्व में चित्त-वृत्तियों का संयंत होना पाया जाता है| संयत होने पर पूर्णाधिकार के अनंतर श्रवण के सारभूत भाग में अथवा वांछित भाग में चित्त-वृत्ति का केन्द्रीभूत होना पाया जाता है| यही मनन है| मनन का तात्पर्य निष्ठा एवं ध्यान से है| मनन प्रक्रिया में आभास होता है जिसमे न्याय धर्म सत्य दृष्टि से तुलन होता है| आभास का तात्पर्य भाषा सहित अर्थ अस्तित्व में वस्तु रूप में स्वीकार होना, अर्थ संगति होने के लिए तर्क का प्रयोग होना, अर्थ वस्तु के रूप में स्पष्ट तथा स्वीकार होना फलस्वरूप तर्क संगत होना है| अध्ययन विधि में मनन पूर्वक ही ‘तदाकार’ होना पाया जाता हैं जिससे साक्षात्कार होता हैं, एवं बुद्धि में न्याय धर्म सत्य रूपी प्रतीति होती है| यही निदिध्यास है| निदिध्यास का तात्पर्य अर्थ की निरंतरता होने से है| साक्षात्कार पूर्वक बुद्धि में स्वीकारने की विधि ही अध्ययन है| इसके पूर्व में किया गया क्रियाकलाप अध्ययन के लिए अभ्यास है| प्रतीति का तात्पर्य तर्क संगत विधि से सहअस्तित्व रूपी वस्तु बोध होने से है| अर्थ अस्तित्व में वस्तु के रूप में समझ में आना ही प्रतीति है|
अध्ययन विधि में निश्चित अवधारणा की स्थापन प्रक्रिया ही निदिध्यास है | बुद्धि में होने वाली बोध ही अवधारणा हैं जो मन, वृत्ति, चित्त में भास, आभास, साक्षात्कार से अधिक स्थिर होते हैं अथवा वस्तु स्थिति सत्य, वस्तुगत सत्य,स्थिति सत्य –सत्य बोध सहज यथावत जानने-मानने की बोध क्रिया ही अवधारणा है| अवधारणा ही अनुमान की पराकाष्ठा एवं अनुभव के लिए उन्मुखता हैं | अवधारणा के अनंतर ही अनुभव होता है |
ध्येय के अर्थ मात्र में अर्थात ध्येय के मूल्य में चित्त-वृत्ति एवं संकल्प का निमग्न होना ही सत्तामयता में अनुभूति (अनुभव) है | यही तदरूप अवस्था में होने का तात्पर्य है| यही अभ्यास एवं अध्ययन की सर्वोत्कृष्ट उपलब्धि है | अनुभव का तात्पर्य सत्ता में अनुभूतिमयता की निरंतरता या अक्षुणणता है | अक्षुणणता प्रत्येक क्रियाकलाप एवं कार्यक्रम में भी स्थिर होने के अर्थ में है | यही भ्रम मुक्ति है | अनुभव में होना ही केंद्रीकृत ध्यान एवं सहज निष्ठा है, यही निदिध्यासन की अक्षुणणता है|
अध्ययन पूर्णतया सामाजिक एवं व्यवहारिक है| अव्यवहारिकता एवं असामाजिकता पूर्वक अध्ययन होना संभव नहीं है| मानवीयता के अनंतर ही अभ्युदय का उदय होता है| पूर्णता पर्यंत इस उदय का अभाव नहीं है| उदय एवं अभ्यास का योगफल ही गुणात्मक परिवर्तन हैं जो योगाभ्यास (अभ्यास, अध्ययन) पूर्वक चरितार्थ होता है|
व्यायाम, आसान व प्राणायाम योगाभ्यास के लिए सहायक है| शरीर का स्वेछानुरूप उपयोग करने, स्वस्थ रखने के लिए ये प्रक्रियाएं आवश्यक हैं| वातावरण, अभ्यास के लिए सहज उपलब्धि हैं| कृत्रिम वातावरण ही अतिप्रभावशाली है, जिसका निर्माण मानव ही करता है| कृत्रिम वातावरण के लिए शिक्षा एवं व्यवस्था प्रधान तत्व है| प्रकाशन, प्रदर्शन व प्रचार भी उसी के अनुरूप संपन्न होता है | विपरीत वातावरण अर्थात अमानवीय वातावरण में योगाभ्यास (अभ्यास-अध्ययन) होने के लिए स्वयं मानवीयता से परिपूर्ण होना अनिवार्य हो जाता है | ऐसे स्थितियों में यह साधनों में गण्य है | अध्ययन का पूर्व साधन अथवा मूल साधन मानवीयता ही है |
अनुभव एवं समाधान दोनों ही न होने की स्थिति में अध्ययन नहीं है| यह केवल निराधार कल्पना है | जो अध्ययन नहीं हैं, वह मानवीयता को प्रकट करने में समर्थ नहीं है| इसी सत्यातावश मानव समाधान एवं अनुभूति योग्य अध्ययन से परिपूर्ण होने के लिए बाध्य हुआ है | यह बाध्यता मानवीयता पूर्ण पद्धति से सफल अन्यथा असफल है | मानवीयतापूर्ण जीवन में वैचारिक समत्व स्वभावत:सिद्ध होता हैं जिसमे कायिक अवं वाचिक समत्व प्रत्यक्ष होता है| स्थापित मूल्यानुभूती एवं उसकी निरंतरता ही योगाभ्यास की अर्थवत्ता है| चैतन्य प्रकृति में ही अनुभव योग्य क्षमता अभ्यास एवं अध्ययन पूर्वक स्थापित होती है| ये सब चैतन्य इकाई में होने वाले अविभाज्य क्रियाएँ हैं|