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Saturday, March 27, 2010

प्रयोजन पहले विश्लेषण बाद में


हम आँख से कुछ देखते हैं, स्पर्श से कुछ देखते हैं - इस तरह पाँचों ज्ञानेन्द्रियों से देखने की जो विधि है उसको स्वीकारने पर जीवन में एक कम्पनात्मक गति होती है.  इसके पहले जीवन शरीर को जीवंत बनाये हुए था.  यदि जीवन शरीर को जीवंत न बनाए तो किसी संवेदना का पता नहीं चलेगा.

प्रश्न:  जीवंत बनाने के लिए जीवन क्या करता है?

उत्तर:  शरीर प्राणकोशिकाओं द्वारा रचित एक रचना है.  प्राणकोशिकाएं छलनी जैसे माँस, रक्त आदि सप्त-धातुओं से शरीर रचना रचना किया रहता है.  जीवन परमाणु में इन प्राणकोशिकाओं के आर-पार होने की अर्हता रहता है.  जीवन इनमे से हर जगह घूमता रहता है, जिससे हर प्राणकोशिका जीवंत रहता है.  

शरीर के जीवंत रहने का अर्थ है - शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध इन्द्रियों के संकेतों को ग्रहण करने योग्य रहना.  शरीर यदि जीवंत नहीं है तो इन संकेतों को वह ग्रहण करेगा नहीं.

जीवन जब तक शरीर को बचाने का इच्छुक रहता है तब तक उसको वह जीवंत बनाए रखता है.  जब जीवन यह मान लेता है कि शरीर को नहीं बचाया जा सकता तो उसको छोड़ देता है.  रोजमर्रा में हमको इसकी हज़ारों गवाहियाँ मिलती हैं.  

प्रश्न:  पेड़-पौधों में प्राणकोशिकाएं बिना जीवन के कैसे रह पाते हैं?

उत्तर:  पेड़-पौधों में प्राणकोशिकाएं "जीवंत" नहीं "सप्राणित" रहते हैं.  जीवन के शरीर को चलाने के लिए मेधस की आवश्यकता है जो झाड-पौधों में नहीं पाया जाता.  झाड़-पौधों में जीवन नहीं होता.  

प्रश्न:  जीवन्तता के मूल में जीवन है, इसको हम कैसे मान लें?

उत्तर: जीवन के अस्तित्व पर ध्यान न दें तो यह आपकी ही उदारता है!  आप इसको अपनी आवश्यकता के अनुसार ही इसको स्वीकारोगे.  इसकी विवेचना करना पड़ेगा, यथास्थिति पर विश्वास रखना पड़ेगा.  मनगढ़ंत विवेचना से आपका कोई कल्याण होने वाला नहीं है.  वस्तु जैसा है, उसकी वैसी ही विवेचना कीजिये.

जैसे - झाड़-पौधों, जीवों और मानव को एक ही प्रकार का बताना अपनी ही हवसबाजी है.  इस विवेचना से तो जीव और मानव भी आहार की वस्तु हैं!

मनुष्य अपनी कल्पनाओं से बहुत सारी परेशानियों को ओढ़ा रहता है.  इसको "भ्रम" नाम दिया.  भ्रम का परिहार है - जो वस्तु जैसा है उसको वैसा ही अध्ययन किया जाए.   प्रयोजन समझ के फिर प्रक्रिया को पहचानना या  प्रक्रिया समझ के फिर प्रयोजन को पहचानना - इन दो विधियों से अध्ययन हो सकता है.  किसी भी वस्तु के प्रयोजन को समाधान विधि से, समृद्धि विधि से, अभयता विधि से या सहअस्तित्व विधि से पहचानें - मानव के लिए वांछित उतना ही है. इसके अलावा वांछित कुछ भी नहीं है.  मानव सहज लक्ष्य (वांछा) के अर्थ में किसी भी वस्तु के प्रयोजन को पहचानिए.  मानव लक्ष्य के अर्थ में उस वस्तु के प्रयोजन को पहचानने के बाद (उसकी प्रक्रिया समझने के लिए) उसका विश्लेषण-संश्लेषण, खंड-विखंड जो करना है करिए -  आपको सब स्पष्ट होगा.

प्रयोजन को पहचाने बिना विश्लेषण की काट-पीट किये तो नीम-हकीम खतरे-जान ही होगा.

- श्री ए नागराज के साथ संवाद पर आधारित (१९९७, आन्वरी)

समाधान = भय मुक्ति (भाग २ )

समाधान = भय मुक्ति (भाग १)

सह-अस्तित्व में गति - भाग २

सह-अस्तित्व में गति - भाग १

Saturday, March 20, 2010

परमाणु की व्यवस्था

सह-अस्तित्व में अवस्थाएं - भाग २

सह-अस्तित्व में अवस्थाएं - भाग १

जीवन सहज अपेक्षा सुख है.

समझदारी के साथ ईमानदारी



सहअस्तित्व समझ में आए बिना, जीवन समझ में आए बिना - मनुष्य का जीना तो बनेगा नहीं! समझदार होना है, फ़िर समझदारी को जीने में प्रमाणित करना है - इतनी सी बात है। जीवन-जागृति मनुष्य-परम्परा में ही प्रमाणित होती है। मानव परम्परा में यह चार जगह पहुँचता है - आचरण, शिक्षा, संविधान, व्यवस्था। इन चार जगह में यदि जीवन जागृति पहुँचा, तो मानव परम्परा प्रमाणित हुआ।

अभी इस प्रस्ताव पर आधारित व्यवस्था बनी नहीं है, इसलिए "प्रवर्तनशील" होने की आवश्यकता है। प्रवर्तनशील होना = दूसरों तक इस बात को पहुंचाने के लिए प्रयासरत होना। व्यवस्था हो जाने के बाद "स्वभावशील" होना बनेगा। स्वाभाविक रूप में एक पीढी अपनी समझदारी को आगे पीढी को अर्पित करेगा।

प्रश्न: क्या स्वयं अनुभव होने से पहले दूसरों को समझाने निकल पड़ने में कोई परेशानी नहीं है? क्या ऐसा करने से स्वयं के अध्ययन से ध्यान बंटने की सम्भावना नहीं है?

उत्तर: "सम्भावना" के अर्थ में आपकी बात सुनने योग्य है, सोचने योग्य है। उसके साथ यह भी देखने की जरूरत है - मनुष्य व्यक्त होता ही है। छुप कर रहने में कोई मनुष्य राजी नहीं है। मनुष्य जैसा और जितना समझता है, उतना व्यक्त होता ही है। जिसकी जितनी और जैसे व्यक्त होने की प्रवृत्ति है, वह उतना और वैसे व्यक्त होता ही है। उसके साथ ईमानदारी जुडी ही रहती है।

समझ के इस प्रस्ताव को लेकर ईमानदारी के साथ ही चला जाता है, या चलना पड़ता है। बेईमानी इस बात के साथ टिक नहीं पाता है। टिकता भी है तो क्षणिक रूप में।

हमारा लक्ष्य है - अनुभव का जीने में प्रमाणित होना। अभी हम जहाँ हैं - वह हमारी आज की यथा-स्थिति है। लक्ष्य और यथा-स्थिति - इन दोनों के प्रति स्पष्ट हुए बिना आगे बढ़ने का कोई स्पष्ट कार्यक्रम बनता नहीं है।

अधूरे में कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता।

फ़िर भी जो इस रास्ते पर जो जितना प्रवर्तनशील है, उसके लिए वह धन्यवाद का पात्र है। प्रवर्तन-शील होने की चार stages बनी। इन चार stages में (इस बात से जुड़े) सभी हैं।

(१) प्रस्ताव की सूचना देने में प्रयासरत होना।
(२) पढाने के लिए प्रयासरत होना।
(३) समझाने के लिए प्रयासरत होना।
(४) प्रमाणित करने के लिए प्रयासरत होना।

सूचना दिया, उससे भी व्यवस्था बनने के लिए गति में कुछ योगदान हुआ। जो आज सूचना ही देता है, कल उसकी पढने में प्रवृत्ति बनती है। जो आज पढाता है, उसकी कल समझने में प्रवृत्ति बनती है। जो आज समझाता है, कल उसकी प्रमाणित करने की प्रवृत्ति बनती है। इस तरह एक से एक कडियाँ जुडी हैं।

प्रमाण परम है। प्रमाण के बाद परम्परा बनती ही है। यह बात सही है - प्रमाण के बिना परम्परा नहीं है।  इस बात में जीवन विद्या परिवार में सभी सहमत हैं.  निष्ठा की स्थिति जरूर लोगों की अलग अलग है.  इसको आंकलित किया जा सकता है.

सार्वभौम व्यवस्था में परिवार से विश्व-परिवार तक जीने की व्यवस्था है.  समाधान समृद्धि पूर्वक जिए बिना कोई विश्वपरिवार में भागीदारी नहीं करेगा, चोरी ही करेगा!  समझने के बाद आदमी चोरी कर नहीं सकता.  समझदारी से समाधान संपन्न होने पर समृद्धि भावी हो जाती है.

व्यवस्था का पूरा ढांचा-खांचा दरिद्रों का नहीं है.  व्यवस्था समाधान-समृद्धि संपन्न व्यक्तियों से बनती है.  समाधान-समृद्धि के बिना एक भी आदमी व्यवस्था में जियेगा नहीं.

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)

Monday, March 15, 2010

प्रामाणिकता की मुहर

मध्यस्थ-दर्शन के प्रस्ताव के शब्दों से अस्तित्व में वास्तविकताएं इंगित होती हैं।

अध्ययन पूर्वक:
साक्षात्कार हुआ = शब्द से इंगित वस्तु पहचान में आई।
बोध हुआ = पहचान में आई वस्तु स्वीकार हुई।
इस प्रकार हुए साक्षात्कार, बोध के समर्थन में ही अनुभव होता है।

साक्षात्कार केवल सच्चाई का ही होता है - बाकी सब छूटता जाता है। बुद्धि में सच्चाइयाँ परिष्कृत हो कर पहुँचती हैं। जिसका मतलब है, शब्द के अर्थ स्वरूप में वस्तु की पहचान स्वीकार हो गयी। उसी की स्वीकृति जो आत्मा में हुई, उसको हम "अनुभव" कह रहे हैं।

चारों अवस्थाओं के साथ अनुभव होता है। सह-अस्तित्व "में" अनुभव होता है। सह-अस्तित्व चारों अवस्थाओं के साथ है।

अध्ययन विधि से यथास्थितियों और प्रयोजनों का चित्त में "साक्षात्कार" और बुद्धि में "बोध" होता है। साक्षात्कार और बोध जो हुआ, उसके समर्थन में ही अनुभव होता है। बुद्धि में ही अस्तित्व की स्वीकृतियों के समर्थन में ही आत्मा में अनुभव होता है। बोध होने के बाद आत्मा में "अनुभव" होता ही है। उसके लिए कोई अलग से जोर नहीं लगाना पड़ता। जिस बात का बोध हुआ था, उसकी "मुहर" है अनुभव!

आत्मा में अनुभव ही होता है - और कुछ होता ही नहीं है। आत्मा में "अध्ययन-कक्ष" कुछ है ही नहीं! बुद्धि में बोध तक अध्ययन है। बोध होने के बाद सह-अस्तित्व में अनुभव होता है। अनुभव ही प्रमाण होता है।

अनुभव पूर्वक जीवन में प्रामाणिकता आ जाती है।

अनुभव पूर्वक अनुभव-प्रमाण का बोध पुनः बुद्धि में होता है। अनुभव ही प्रमाण स्वरूप में बुद्धि में प्रकाशित होता है। अनुभव-प्रमाण बोध संपन्न बुद्धि फिर पूरे जीवन पर प्रभावित हो जाती है। अनुभव-प्रमाण (प्रामाणिकता) सम्पूर्ण जीवन पर बुद्धि पूर्वक ही प्रभावित होती है। अनुभव-प्रमाण का ही प्रकाशन या प्रभावन पूरे जीवन में हो जाता है - बुद्धि में, चित्त में, वृत्ति में, मन में। पूरा जीवन अनुभव-प्रमाण में तदाकार-तद्रूप हो जाता है। जिससे चित्त में चिंतन, वृत्ति में न्याय-धर्म-सत्य का तुलन, और मन में मूल्यों का आस्वादन होता है।

इस तरह पूरे जीवन में अनुभव प्रकाशित होने पर व्यवहार में भी अनुभव प्रकाशित होने लगता है। यही सत्य में तदाकार-तद्रूप होने का फल है। ऐसे अनुभव-मूलक विधि से जीने के स्वरूप का नाम है - "मानव चेतना"। अनुभव के बाद मानवत्व स्वरूप में जीना बन ही जाता है। मानवत्व स्वरूप में जीने का मॉडल है - समाधान -समृद्धि। मानव-चेतना पूर्वक जीना शुरू करते हैं, तो अखंड-समाज और सार्वभौम-व्यवस्था की सूत्र-व्याख्या होने लगती है। इस तरह "उपकार" करने का अधिकार आ जाता है।

प्रश्न: अध्ययन-बोध (अनुभव-गामी बोध) और अनुभव-प्रमाण बोध (अनुभव-मूलक बोध) में क्या अंतर है?

उत्तर: अध्ययन पूर्वक शब्द से अर्थ और अर्थ से वस्तु तक पहुंचना बनता है। अनुभव में जो अध्ययन पूर्वक सच्चाइयों का बोध हुआ था - उसकी स्वीकृति हो जाती है। अनुभव में इस प्रकार स्वीकृति होने पर प्रामाणिकता आ गयी। जिसके फल-स्वरूप बुद्धि में प्रमाण-बोध होता है। जिसको प्रमाणित करने के लिए बुद्धि, चित्त, वृत्ति, मन सब काम करने लगते हैं।

बुद्धि का वर्चस्व (मौलिकता) बोध ही है। चित्त का वर्चस्व चिंतन ही है। वृत्ति का वर्चस्व न्याय-धर्म-सत्य के आधार पर तुलन ही है। मन का वर्चस्व मूल्यों का आस्वादन करना ही है। इस ढंग से पूरा जीवन "अनुभव-मय" हो जाता है।

अध्ययन विधि से अनुभव में स्वीकृति तक पहुँचते हैं, अनुभव मूलक विधि से प्रमाणित होने तक पहुँचते हैं। जो अध्ययन कराया - उसको प्रमाणित करना।

प्रमाणित होने की शुरुआत अनुभव-मूलक चिंतन से है। उससे पहले दृष्टापद है। अनुभव पूर्वक मनुष्य दृष्टा पद में हो जाता है। प्रमाणित होने जीने में परंपरा के रूप में ही होता है।

अनुभव तभी होता है जब बोध सही हुआ हो। "सही" के अलावा कुछ बोध होता भी नहीं है। "सही" के अलावा दूसरा कुछ भी मनुष्य के आगे आता है, उसको तर्क फंसा ही लेता है। जब तक "सही-पन" का प्रस्ताव मनुष्य के आगे नहीं आता तब तक तर्क उसे अपने चंगुल में फंसाए ही रखता है। "सहीपन" तर्क के चंगुल में आता नहीं है। तभी सही-पन का बोध होता है। सह-अस्तित्व स्वरूप में अस्तित्व-बोध बुद्धि में होता है। सह-अस्तित्व परम-सत्य है - इसीलिये अनुभव होता है। सह-अस्तित्व बोध होने के बाद ही सह-अस्तित्व में अनुभव होता है। मैं जो साधना-समाधि-संयम पूर्वक जो चला - उसमें भी सह-अस्तित्व बोध होने के बाद ही मुझे अनुभव हुआ।

अध्ययन पूरा होने पर ही अनुभव होता है। अध्ययन की वस्तु सम्पूर्ण सह-अस्तित्व ही है। अध्ययन यदि पूरा होता है तो प्रमाणित करने के संकल्प के साथ तुरंत अनुभव होता है। अनुभव पूर्वक ही प्रमाणित करने का प्यास तत्काल बुझता है। अध्ययन पूरा होने की स्थिति में प्रमाणित होने की तत्परता बनता है।


यदि आत्मा में अनुभव होता है, तो हम स्वयम को प्रमाणित करने के योग्य हो गए।

अनुभव-मूलक विधि से ही प्रमाण होता है। दूसरा कोई प्रमाण होता नहीं है।

अनुभव-मूलक विधि से प्रमाण ही होता है। दूसरा कुछ होता नहीं है। अनुभव ही अंतिम प्रमाण है। अनुभव के बिना प्रमाणित होने का हैसियत तो आएगा नहीं!

अनुभव के प्रकाशन का स्वरूप है - न्याय, धर्म, सत्य। आखिरी बात यही आती है - "जीने देना है, और जीना है। होने देना है, होते ही रहना है।"

इसमें क्या तर्क करोगे - बताओ? हर जीवन न्याय-धर्म-सत्य को चाहता ही है। जन्म से ही बच्चे न्याय के याचक होते हैं, सही कार्य-व्यव्हार करना चाहते हैं, और सत्य वक्ता होते हैं। हर बच्चा न्याय का याचक है - उसमें न्याय-प्रदायी क्षमता को स्थापित करने की आवश्यकता है। हर बच्चा सही कार्य-व्यव्हार करना चाहता है - उसमें कर्म और व्यव्हार के अभ्यास कराने की आवश्यकता है। हर बच्चा सत्य-वक्ता है (जैसा देखा-सुना रहता है, वैसा ही बोलता है) - उसमें सत्य-बोध कराने की आवश्यकता है।

प्रमाणित होने की "प्रवृत्ति" मनुष्य में है ही! प्रमाणित होने की "आवश्यकता" मनुष्य में है ही! लेकिन प्रमाणित होने के लिए "वास्तविकताओं की समझ" मनुष्य में अभी तक नहीं थी, वह स्पष्ट करने के लिए ही मध्यस्थ-दर्शन का अध्ययन है।

जब तक अनुभव नहीं है, तब तक तर्क का झंझट बना ही रहता है। ऐसा तर्क "निश्चयन विधि" से जीने के लिए बाधक है। निश्चयन विधि से जीने के लिए अनुभव ही है। सह-अस्तित्व स्थिर है, विकास और जागृति निश्चित है। इन तीन बातों को ही जीने में प्रमाणित किया जाता है। इन तीन बातों को समझाने के लिए ही पूरा दर्शन, वाद, शास्त्र लिखा है। पूरा वांग्मय संक्षिप्त होने पर पांच सूत्रों में सूत्रित होता है - सह-अस्तित्व, सह-अस्तित्व में विकास-क्रम, सह-अस्तित्व में विकास, सह-अस्तित्व में जागृति-क्रम, और सह-अस्तित्व में जागृति।

अनुभव मूलक विधि से जीने की प्रक्रिया है - अभिव्यक्ति, संप्रेषण, और प्रकाशन। इन तीन तरीकों से मनुष्य अपने अनुभव को जीने में प्रस्तुत करता है। प्रकाशन अनुभव की ज्यादा व्याख्या है। सम्प्रेष्णा में सीमित-व्याख्या है। अभिव्यक्ति में संक्षिप्त-व्याख्या है। सामने व्यक्ति के अधिकार के अनुसार व्याख्या होती है। अध्ययन का लक्ष्य है - विस्तार से संक्षिप्त की ओर बढ़ना। स्वयं प्रमाण स्वरूप हो जाना। इससे ज्यादा कुछ होता नहीं है। इससे ज्यादा की कल्पना भी नहीं की जा सकती। कल्पना के आधार पर ही मनुष्य ज्ञान-संपन्न होता है। नियम-नियंत्रण-संतुलन-न्याय-धर्म-सत्य - ये ६ आयामों में ही मनुष्य के प्रमाणित होने की सीमा है। इससे ज्यादा नहीं है।

आप इस बात को पूरा समझ कर मेरे बराबर अच्छा जियोगे, या मुझसे ज्यादा अच्छा जियोगे! आपकी कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता इस समझ से जुड़ेगा तो आप हमसे अच्छे हो ही गए! इससे पहले न भौतिकवाद ऐसे सोच पाया, न आदर्शवाद ऐसे सोच पाया। भौतिकवाद का मृत्यु reservation (intellectual property right) और specialization में हुआ। आदर्शवाद रहस्य में जा कर फंस गया। इन दोनों के विकल्प में मध्यस्थ-दर्शन प्रस्तुत हुआ है।


- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (दिसम्बर २००८, अमरकंटक)

Saturday, March 13, 2010

चिकित्सा विज्ञान

आदर्शवाद और भौतिकवाद का विकल्प

मानव जाति एक है, मानव धर्म एक है.



भौतिकवादी ऐसा बताते हैं - मानव की शरीर रचना के आधार पर उसके गुणों का प्रकाशन होता है.  रचना (रूप) के आधार पर गुण होता है - ऐसा वे मानते हैं.  यह सर्वथा गलत सिद्ध हो गया.  ऐसा कोई कार्य नहीं है जो एक नस्ल वाला आदमी कर सकता हो पर दूसरे नस्ल वाला आदमी न कर सकता हो.  ऐसा कोई उपलब्धि नहीं है जो एक नस्ल वाला आदमी पा सकता हो पर दूसरे नस्ल वाला आदमी न पा सकता हो.  ऐसा कोई समझ नहीं है जो एक नस्ल वाला आदमी समझ सकता हो पर दूसरे नस्ल वाला आदमी न समझ सकता हो.  मानव में रंग और नस्ल की भिन्नता मिलती है, यह बात तो सही है लेकिन जो कुछ भी एक आदमी कर सकता है, पा सकता है, समझ सकता है - उसको सभी नस्ल वाले, रंग वाले, सम्प्रदाय वाले पा सकते हैं.  कोई सम्प्रदाय, रंग या नस्ल "विशेष" नहीं है.  अतः सभी रंग, नस्ल, संप्रदाय वाले समझदार हो सकते हैं, ईमानदार हो सकते हैं, जिम्मेदार हो सकते हैं, भागीदार हो सकते हैं.  किसी भी तरह का पुरोहितवाद या आरक्षणवाद मानव जाति की छाती का पीपल ही होगा.  

इन सभी नजीरों के आधार पर हम निर्णय पर पहुँच सकते हैं कि "मानव जाति एक है".

मानव जाति एक है - इसी आधार पर मानव धर्म के एक होने को भी हम पहचान सकते हैं.  मानव धर्म सुख है.  सभी रंग, नस्ल, सम्प्रदाय वालों में सुखी होने का आशय (चाहना) समान रूप से निहित है.   गर्भाशय में रंग और नस्ल के आधार पर शरीर बनता है.  सुखी होने का आशय जीवन में निहित है.  रंग-नस्ल शरीर के साथ है, जीवन के साथ नहीं.

अतः सभी मानवों के सुखी होने की विधि को हम पहचान सकते हैं और उसका लोकव्यापीकरण कर सकते हैं.

- श्री ए नागराज के साथ संवाद पर आधारित (आन्वरी आश्रम, १९९९)

शरीर रचना बनने की प्रक्रिया



शरीर की रचना गर्भाशय में होती है.  गर्भाशय में जितना लम्बा-चौड़ा रचना हो पाती है, उसको 'शिशु' हमने नाम दिया है.  इस संरचना के मूल में डिम्ब कोषा के डिम्ब सूत्र और शुक्र कोषा के शुक्र सूत्र - इन दोनों के संयोग से भ्रूण बनता है.  भ्रूण विकसित हो कर शिशु बनता है.  यह कार्य प्रकृति सहज विधि से आदिकाल से होता आया है.

गर्भ में ५ माह का शिशु होने पर मेधस रचना पूरा तैयार हो जाता है.  मेधस रचना तैयार होने के बाद ही कोई न कोई जीवन शरीर रचना को संचालित करता है.  इसका संकेत गर्भवती माँ को मिलता है - गर्भाशय में शिशु के अपने-आप घूमने लगने के रूप में.  इस तरह भ्रूण से शिशु, जीवन और शरीर का संयोग, शरीर का बड़ा होना, फिर शिशु का जन्म.  शिशु के जन्म के बाद शरीर का विकास फिर वंशानुषंगीय क्रम में ही होता है - बाल्य, कौमार्य, युवा, प्रौढ़ और फिर वृद्ध अवस्था यह क्रम से होना हमको पता चलता है.  

मेधस तंत्र के आधार पर ही जीवन शरीर रचना को संचालित करता है.  ज्ञानवाही तंत्र को तंत्रित करता है, संवेदनाएं काम करती हैं और संज्ञानशीलता प्रमाणित होती है.  संज्ञानशील कार्यकलापों में जीवन और शरीर का संयुक्त स्वरूप प्रमाणित होता है.  संज्ञानशीलता विधि से ही जीवन का वैभव स्पष्ट होता है.  केवल संवेदनशीलता विधि से जीवन को पहचानना बहुत कठिन है.  

जीवों में वंशानुषंगीय विधि से संवेदनशीलता व्यक्त हुई है.  यह मनुष्य को भ्रम में डालता है.  घोड़ा, गधा, कुत्ता, बिल्ली में संवेदनाएं होती हैं और मनुष्य में भी संवेदनाएं होती हैं - इसलिए भ्रम होता है कि मानव भी उनके सदृश एक जीव ही है.  जबकि मनुष्य जीव नहीं है.  मनुष्य ज्ञानावस्था की इकाई है.  जब मानव अपने कार्यकलापों को संज्ञानशीलता विधि से संपन्न करना शुरू करता है तब जीवन और शरीर का संयुक्त कार्यकलाप प्रमाणित होने लगता है.  

प्रश्न:  शरीर को कृत्रिम रूप से प्रयोगशाला में तैयार करने की उपयोगिता के बारे में आपका क्या मंतव्य है? 

उत्तर:  शरीर के बनने की प्रक्रिया को कृत्रिम रूप से घटित कराने के लिए मानव ने प्रयास किया, किन्तु प्राणकोषा को कृत्रिम रूप में रचित करवा पाने में असफल रहा है.  इसके स्थान पर शरीर के अन्य स्थान जैसे हाथ-पाँव के चमड़े से कोषाओं को लेकर, उनसे सूत्रों को निकाल कर, भ्रूण को फलित बना कर, पुष्ट बना कर, उनको गर्भाशय या गर्भाशय के सदृश परिस्थितियों में शिशु को तैयार करने का सोचा गया, किया गया.  एक ओर तो आप कृत्रिम विधि से शरीर रचना बनाने के प्रयोग करते हैं तो दूसरी ओर जनसँख्या वृद्धि की समस्या को रोते हैं - यह अंतर्विरोध है.  व्यापार विधि से पैसा बनाने के लिए आपको इन प्रयोगों की आवश्यकता दिखती होगी, पर मुझे इसकी मानव परंपरा के लिए कोई आवश्यकता दिखती नहीं है.

- श्री ए नागराज के साथ सम्वाद पर आधारित (आन्वरी आश्रम, १९९९)


Wednesday, March 3, 2010

अवधारणा

अवधारणा = अभ्यास के लिए प्राप्त स्वीकृतियां

अभ्यास किस लिए? अभ्युदय को अपनाने के लिए, अपना स्वत्व बनाने के लिए। अभ्युदय का मतलब है - सर्वतोमुखी समाधान। जैसे किसी झाड के बीज को धरती में हम डालते हैं, उसको सींचते हैं, ताकि उसका वृक्ष हमारा स्वत्व बन सके। उसी तरह अवधारणा अभ्युदय का बीज है।

स्थिति-सत्य, वस्तु-स्थिति सत्य, और वस्तु-गत सत्य की अवधारणा होती है।

साक्षात्कार = शुभ के लिए जितनी भी सूचना (शब्द) मिलती है उससे जो वस्तु (अर्थ) इंगित होता है, उसको कल्पना में भर लेना। साक्षात्कार चित्त में होता है।

अवधारणा प्राप्त होने, साक्षात्कार होने तक ही मनुष्य का पुरुषार्थ है। अवधारणा प्राप्त होने के बाद, साक्षात्कार होने के बाद परमार्थ ही है। स्थिति-सत्य, वस्तु-स्थिति सत्य, और स्थिति सत्य की अवधारणा का बुद्धि में बोध होता है। उसके बाद स्थिति-सत्य अनुभव में आता है। सत्ता में संपृक्त जड़-चैतन्य प्रकृति - सह-अस्तित्व ही स्थिति-सत्य है। यह अनुभव में आता है। अनुभव में आने पर इसकी निरंतरता हो जाती है।

स्थिति-सत्य (सह-अस्तित्व) में ही वस्तु-स्थिति सत्य और वस्तु-गत सत्य का प्रगटन होता है। वस्तु मूलतः रासायनिक, भौतिक, और जीवन स्वरूप में है। सम्पूर्ण वस्तुएं सत्ता में भीगी, डूबी, घिरी हैं। भीगे होने से ऊर्जा-सम्पन्नता है, डूबे होने से क्रियाशीलता है, घिरे होने से नियंत्रण है। यही सह-अस्तित्व है। यही नियति है। नियति विधि से ही हम ऊर्जा संपन्न हैं, नियति विधि से ही हम बल-संपन्न हैं, नियति विधि से ही हम नियंत्रित हैं। सह-अस्तित्व नित्य प्रगटन-शील है - यही नियति है। मनुष्य का जीवन और शरीर दोनों नियति-विधि से हैं। नियति विधि से ही हम साक्षात्कार तक पहुँचते हैं।

सह-अस्तित्व (नियति) नित्य प्रगटन-शील होने से अपने प्रतिरूप के स्वरूप में मानव को प्रस्तुत कर दिया - उसका प्रमाण अनुभव-मूलक विधि से ही होता है। इस तरह ईर्ष्या मुक्ति, द्वेष मुक्ति, अपराध-मुक्ति, और भ्रम-मुक्ति हो जाती है। ईर्ष्या, द्वेष, अपराध, और भ्रम से मुक्त हो जाना ही अनुभव संपन्न होने का प्रमाण है। ईर्ष्या, द्वेष, अपराध, और भ्रम से हम सम्बद्ध हैं, मतलब अनुभव हुआ नहीं है। यही "स्व-निरीक्षण" में देखने की बात है।

अनुभव का प्रमाण होता है। प्रमाण है - परंपरा में पीढी से पीढी अनुभव अंतरित होना। इसका नाम है - "अनुभव मूलक विधि"।  अनुभव-मूलक विधि के बिना प्रमाण नहीं है।

सत्ता स्वयं ज्ञान-स्वरूप है। चैतन्य-प्रकृति को सत्ता ज्ञान-स्वरूप में प्राप्त है। ज्ञान का प्रमाण मनुष्य व्यवहार में न्याय-स्वरूप में प्रस्तुत करता है, उत्पादन में नियम-नियंत्रण-संतुलन रूप में प्रस्तुत करता है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (दिसम्बर २००९, अमरकंटक)