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Thursday 6 August 2009

समझ वही है, जो जीने में प्रमाणित हो!

यहाँ अमरकंटक में साधना करने आने से पहले, मैं बनारस में एक वर्ष साधना के लिए गया था। तब मुझे हर दिन ऐसा लगता रहा जैसे मैं देव-सभा में ही बैठा हूँ। वह क्या चीज थी? मेरे मन का ही खेल था! प्रमाण कहाँ हुआ उसका? कल्पना में हम जो बसा लेते हैं, वह हमको सामने असली जैसा भी दिखने लगता है। ऐसी कोरी-कल्पनाएँ जीने में प्रमाणित नहीं होती।

समाधि-संयम पूर्वक मुझे समझ हासिल हुई, जिससे मुझे यह स्वीकार हुआ - "मैं मानव-स्वरूप में जी सकता हूँ।", "मैं देव-मानव स्वरूप में जी सकता हूँ", और "मैं दिव्य-मानव स्वरूप में जी सकता हूँ"। यह समझ मेरे जीने में प्रमाणित होती है।

जीने में समझ ही प्रमाणित होती है।

(मध्यस्थ-दर्शन के) अध्ययन विधि में - परिभाषा से आप शब्द के अर्थ को अपनी कल्पना में लाते हैं। परिभाषा आपकी कल्पनाशीलता के लिए रास्ता है। उस कल्पना के आधार पर अस्तित्व में वस्तु को आप पहचानने जाते हैं। आपकी कल्पनाशीलता वस्तु को छू सकता है। अस्तित्व में वस्तु को पहचानने पर वस्तु साक्षात्कार हुआ। वस्तु के रूप में वस्तु साक्षात्कार होता है - शब्द के रूप में नहीं होता है। साक्षात्कार की वस्तु सह-अस्तित्व स्वरूपी अस्तित्व ही है। सह-अस्तित्व साक्षात्कार होना ही मनुष्य में कल्पनाशीलता का प्रयोजन है। साक्षात्कार होने पर बोध और अनुभव तत्काल होता है। सारी देरी जब तक कल्पना में हैं, तभी तक है। अनुभव में कल्पनाशीलता पूर्वक किया गया अनुमान विलय हो जाता है। अनुभव ही फ़िर प्रभावी हो जाता है। पूरा जीवन अनुभव-मूलक हो जाता है।

इस तरह अध्ययन विधि से जीवन में "समझ" हासिल होती है। यह समझ जीने में प्रमाणित होती है।

समझ वही है, जो जीने में प्रमाणित हो!

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६- अमरकंटक)

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