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Friday, September 24, 2010

अनुभव की आवश्यकता

प्रमाणित करने के लिए अनुभव आवश्यक है। भाषा से समृद्ध रहना पर्याप्त नहीं है। प्रमाणों से समृद्ध रहना आवश्यक है। श्रवण में तर्क-संगति है। समझ में आने पर प्रयोजन स्वीकार हुआ। फिर उसके आगे अनुभव है। अनुभव भाषा से बहुत ज्यादा है। अनुभव का प्रमाण प्रस्तुत करने जाते हैं, तो वह विपुल हो जाता है। कोई उसका अंत ही नहीं है। अनुभव में अस्तित्व स्पष्ट होता है, उसको प्रमाणित करने के क्रम में उसका विस्तार होता है।

पूरी बात अनुभव से पहले स्पष्ट नहीं होता, किसी व्यक्ति को नहीं होगा। अनुभव के लिए क्या समझना आवश्यक है, उसके लिए अनुभव किया हुआ व्यक्ति ही मार्ग-दर्शन करेगा। जो अध्ययन कर रहा है, वह अपने-आप से पता कर ले, कि अनुभव के लिए क्या समझना आवश्यक है - क्या आवश्यक नहीं है, ऐसा नहीं होता।

अनुभव के पहले कुछ भाग को हम 'मान' कर शुरू करते हैं। 'माने हुए को जानना' और 'जाने हुए को मानना' - इन दोनों के साथ हम पूरा पड़ते हैं। "सह-अस्तित्व है" - इसको हम पहले 'मानते' हैं। फिर सह-अस्तित्व क्यों है? और सह-अस्तित्व कैसा है? - उसको फिर समझना है। समझने के बाद उसको प्रमाणित करना है। समझने और प्रमाणित करने के बीच अनुभव होता ही है। अनुभव को व्यव्हार में प्रमाणित करने पर समाधान मिलता ही है। समाधान प्रमाणित होने में ही है। केवल स्वयं में समझ लेने मात्र से समाधान नहीं है। प्रमाणित करने की प्रवृत्ति स्वयं-स्फूर्त होती है। अनुभव होने के बाद उसको प्रमाणित किये बिना रहा ही नहीं जा सकता।

इस सारी प्रक्रिया में 'स्वयं-स्फूर्त' के विरुद्ध जो कदम है - वह है, "मानना"। अभी तक जो पहले मान कर, समझ कर हम चले हैं, 'सह-अस्तित्व को मानना' उससे भिन्न है - इसलिए उसमें श्रम लगता है। अध्ययन के लिए पहला चरण 'मानना' ही है। फिर थोडा सुनने के बाद, उसका महत्त्व थोडा समझ आने के बाद उसमें रूचि बनता है। रूचि बनने के बाद उसको स्वत्व बनाने के लिए हम स्वयम को लगाते हैं। स्वयं को लगाते हैं तो तदाकार होते हैं। तदाकार होने पर हम समझ जाते हैं। तद्रूप होने पर हम प्रमाणित होते हैं। तदाकार होते तक पुरुषार्थ है। उसके बाद परमार्थ है, जो स्वयं-स्फूर्त होता है।

आदर्शवाद ने कहा - "बिरले व्यक्ति को, हज़ारों-लाखों में किसी एक व्यक्ति को अनुभव होगा।" जबकि यहाँ शुरुआत ही ऐसे किये हैं - "हर व्यक्ति को अनुभव होगा।" इस तरह पासा ही पलट गया।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित। (जुलाई २०१०, अमरकंटक)

सत्ता का स्वरूप

सत्ता का स्वरूप है: - पहला, सर्वत्र विद्यमानता या व्यापकता। दूसरा, पारदर्शीयता - हर परस्परता के बीच में, हर जर्रे-जर्रे के बीच में। तीसरे, पारगामियता।

प्रत्येक इकाई में, से, के लिए मध्यस्थ-सत्ता साम्य रूप से प्राप्त है। सत्ता जड़-प्रकृति को साम्य-ऊर्जा के रूप में प्राप्त है। सत्ता चैतन्य-प्रकृति को चेतना के रूप में प्राप्त है। यह सत्ता का वैभव है। सत्ता प्रकृति को नित्य प्राप्त है - इसलिए प्रकृति नित्य-वर्तमान है।

इकाई क्रियाशील है, इसलिए उसमें 'पूर्णता' की बात है। हर क्रियाशीलता 'सम्पूर्ण' है। प्रत्येक इकाई अपने वातावरण सहित 'सम्पूर्ण' है। सम्पूर्णता से पूर्णता तक विकास-क्रम है। पूर्णता है - गठन-पूर्णता, क्रिया-पूर्णता, और आचरण-पूर्णता। सम्पूर्णता के साथ ही पूर्णता का प्रमाण है।

हर दो इकाइयों के बीच अवकाश रहता ही है। कितनी भी सूक्ष्म इकाई हो... कितनी भी स्थूल इकाई हो। एक समझने वाला, एक समझाने वाला - इनके मध्य में सत्ता रहता ही है। तभी समझ पाते हैं, तभी समझा पाते हैं। मध्य में सत्ता न हो, तो न समझ पायेंगे - न समझा पायेंगे। वैसे ही हर दो इकाइयों के बीच अवकाश रहता है, जिससे उनमें परस्पर पहचान होती है, निर्वाह होता है।

साधना के फल-स्वरूप मुझे समाधि हुआ। समाधि में गहरे पानी में डूब कर आँखे खोल कर देखने में मधुरिम प्रकाश जैसा दिखता है, वैसा मुझे दिखता रहा। समाधि में मेरी आशा-विचार-इच्छा चुप रही, यह आंकलित हो गया। इसमें 'ज्ञान' नहीं हुआ। फिर संयम में सत्ता में अनंत प्रकृति को भीगा हुआ देख लिया। समाधि में जो दिख रहा था, वह 'सत्ता' है - यह स्पष्ट हो गया। समाधि के बाद ही संयम होता है।

प्रकृति की वस्तु में अपने में कोई ताकत नहीं है। ताकत सत्ता है। यदि प्रकृति की इकाई स्वयं में ताकतवर होता, तो उसे सत्ता से अलग होना था! लेकिन सत्ता सब जगह है, सत्ता से इकाई बाहर जा ही नहीं सकती। प्रकृति की इकाई कहीं भी जाए, रहती सत्ता में ही है। इसलिए इकाई ऊर्जामय है। इकाई ऊर्जा-सम्पन्नता के आधार पर क्रियाशील है।

ऊर्जा की प्यास वस्तु को है। वस्तु को ऊर्जा की प्यास है। ऊर्जा वस्तु को छोड़ नहीं सकती। वस्तु ऊर्जा को छोड़ नहीं सकती। चैतन्य-प्रकृति चेतना के बिना नहीं रह सकती। जड़-प्रकृति ऊर्जा के बिना नहीं रह सकती। चेतना और ऊर्जा सत्ता ही है। सत्ता के प्रगटन के लिए प्रकृति है। प्रकृति की क्रियाशीलता के लिए सत्ता है। इसके आधार पर दोनों निरंतर अविभाज्य साथ-साथ हैं। जिसको हम "सह-अस्तित्व" नाम दे रहे हैं।

सत्ता में प्रकृति की वस्तु को मिटाने या बनाने की कोई "चाहत" नहीं है। चाहत निश्चित दायरे में होती है। सत्ता निश्चित दायरे में नहीं है। इसलिए उसमें चाहत नहीं है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (जुलाई २०१०, अमरकंटक)

Thursday, September 16, 2010

ज्ञान-वाही और क्रिया-वाही तंत्र

जैसे पेड़-पौधों में क्रिया होती है, वैसे ही शरीर में क्रियावाही तंत्र का कार्य-कलाप होता है। जीवन क्रिया-वाही तंत्र को जीवंत रख कर संरक्षित रखता है, तभी जीवन उसको चला पाता है। जब तक क्रियावाही तंत्र जीवंत कार्यकलाप करता है, तब तक ज्ञान-वाही तंत्र द्वारा जीवन उसको चला पाता है। क्रियावाही तंत्र का अपना कार्य-कलाप बंद कर देना ही 'मृत्यु' के रूप में पहचाना जाता है। जीवन सारे शरीर में, हर प्राण-कोशा तक जो भ्रमण करता है, उससे जीवंत बनाने का कार्य होता है। जीवंत बनाना = ज्ञान-वाही तंत्र द्वारा व्यक्त होने योग्य बनाना। जीवन शरीर को जीवंत बनाने के लिए कितना काम करता है, उसका मूल्याङ्कन होने की आवश्यकता है।

शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध - ये पांच ज्ञान-इन्द्रियां हैं। इन्द्रियों से मेधस, मेधस से जीवन तक संकेत प्रसारण और जीवन से मेधस, मेधस से कर्मेन्द्रियाँ तक संकेत प्रसारण - यह ज्ञान-वाही तंत्र के माध्यम से है।

जीवन शरीर के उपयोग से "देखता" है, और शरीर का उपयोग करके "करता" है। जीवन और शरीर के संयुक्त रूप में मानव है।

प्रश्न: समाधि-संयम की स्थिति में जीवन-शरीर की क्या स्थिति होती है?

उत्तर: समाधि-संयम की स्थिति में जीवन शरीर का उपयोग नहीं करता। समाधि की स्थिति में जीवन अपने कार्य को स्वयं देखता है, और स्वयं करता है - शरीर का उपयोग नहीं करता। समाधि की स्थिति में जीवन शरीर को जीवंत बनाने का कार्य नहीं करता। समाधि की स्थिति में जीवन मेधस से, शरीर से असंलग्न रहता है। समाधि-काल में जीवन शरीर संवेदनाओं को ग्रहण नहीं करता। जीवन शरीर के आस-पास ही रहता है। इस तरह समाधि की स्थिति में मेधस का कोई रोल नहीं है।

अध्ययन-विधि जीवंत शरीर के साथ है। अनुसन्धान पूर्वक समाधि-संयम करना हर किसी के वश का रोग नहीं है, इसीलिये अध्ययन-विधि प्रस्तावित है। अनुसंधान करने के लिए 'तीव्र जिज्ञासा' का होना आवश्यक है। 'तीव्र जिज्ञासा' होने के लिए प्रचलित परंपरा (चाहे भौतिकवादी या आदर्शवादी) पर पूरा चलने के बाद उसके किसी मुद्दे पर उत्तर न मिल पाने की घोर-पीड़ा होनी आवश्यक है। यदि प्रचलित परंपरा से चलते हुए कोई अटकाव, निराशा नहीं है - तो जिज्ञासा कहाँ हुई? बिना जिज्ञासा के अनुसंधान के लिए निष्ठा कैसे होगी?

यह प्रस्ताव भौतिकवाद और आदर्शवाद दोनों परम्पराओं से जुड़ता नहीं है। इसीलिये इस प्रस्ताव को 'विकल्प' कहा है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (जुलाई २०१०, अमरकंटक)

Saturday, September 4, 2010

तदाकार-तद्रूप

अध्ययन पूर्वक हम हर वस्तु के साथ तदाकार-तद्रूप होते हैं। समझदारी के लिए तदाकार-तद्रूप होना है। प्रकृति की इकाइयों के साथ भी, और व्यापक के साथ भी तदाकार-तद्रूप होते हैं। आप हमारे बीच जो खाली स्थली है, वह अपने में एक रूप है - वही व्यापक-वस्तु है, इसके साथ तदाकार-तद्रूप होना है। सर्वत्र एक सा विद्यमान रहना ही व्यापकता का स्वरूप है।

तदाकार होना = 'वस्तु है' इसका विश्वास स्वयं में होना = साक्षात्कार = अध्ययन
तद्रूप होना = इस समझ के 'स्वत्व' हो जाने में विश्वास = अनुभव = जीने में प्रमाण

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (जुलाई २०१०, अमरकंटक)

अनुभव की बात

जड़-वस्तुओं को व्यापक-वस्तु ऊर्जा के रूप में प्राप्त है - जिससे वे क्रियाशील हैं। चैतन्य वस्तुओं को व्यापक वस्तु चेतना के रूप में प्राप्त है। चेतना ही ज्ञान है। चेतना-विधि से ही जीवन कार्य करता है। उसी प्रकार ऊर्जा-विधि से जड़-प्रकृति कार्य करता है, जिससे कार्य-ऊर्जा तैयार होता है।

मूल-ऊर्जा (व्यापक) साम्य रूप में सभी वस्तुओं के साथ बना हुआ है, यही अनुभव में आता है। रासायनिक-भौतिक वस्तुओं को व्यापक-वस्तु में भीगे होने से ऊर्जा प्राप्त है - यह अनुभव होना है। अनुभव के बिना यह आता नहीं है।

मानव में कल्पनाशीलता है, उसी की बदौलत तदाकार-तद्रूप विधि से प्रमाण होता है। कल्पना में प्रमाण होता नहीं है। अनुभव में प्रमाण होता है।

अनुमान गलत होगा तो फल-परिणाम भी गलत होगा। अनुमान सही है या नहीं है - इसका निर्णय फल-परिणाम के आधार पर ही है। फल-परिणाम है - 'अखंड-समाज सार्वभौम-व्यवस्था' होना। सह-अस्तित्व का मतलब ही है - मानव द्वारा 'अखंड समाज - सार्वभौम व्यवस्था' प्रमाणित होना, और जड़-प्रकृति में नियम-नियंत्रण-संतुलन प्रमाणित रहना। इन दोनों का दायित्व मानव पर ही है - क्योंकि मानव ज्ञान-अवस्था की इकाई है।

- बाबा श्री ए नागराज के साथ संवाद पर आधारित (जुलाई २०१०, अमरकंटक)

संक्रमण

पहला संक्रमण है - गठन-पूर्णता। जिससे चेतना को व्यक्त करने के लिए प्रकृति तैयार हो गया।

दूसरा संक्रमण है - मानव चेतना में संक्रमण। मानव-चेतना में संक्रमण के बाद स्वयं से गलती-अपराध होना समाप्त हो गया।

मानव-चेतना में उपकार की शुरुआत हुआ, देव-चेतना में उपकार और अधिक हो गया। दिव्य-चेतना में पूर्ण-उपकार हो गया, जो तीसरा संक्रमण है।

मानव-चेतना के लिए संक्रमण ही दुष्कर है। मानव-चेतना में संक्रमण होने के बाद कोई परेशानी नहीं है - फिर तो परंपरा है।

- बाबा श्री ए नागराज के साथ संवाद पर आधारित (जुलाई २०१०, अमरकंटक)

व्यापक-वस्तु का प्रतिरूप

सत्ता अमूर्त है। ज्ञान अमूर्त है। अस्तित्व में अमूर्त वस्तु एक ही है। ज्ञान व्यापक-वस्तु का प्रतिरूप है। व्यापक वस्तु ही ज्ञान स्वरूप में मानव को प्राप्त है। प्रबुद्धता पूर्वक अमूर्त-वस्तु (ज्ञान) के आधार पर मनुष्य का जीना बन जाता है। प्रबुद्धता = अनुभव मूलक अभिव्यक्ति। व्यक्ति प्रमाणित होने के अर्थ में प्रबुद्धता है। अभी भ्रमित-स्थिति में मनुष्य क्रिया के आधार पर जीता है, या भाषा के आधार पर जीता है, या कल्पना के आधार पर जीता है।

प्रश्न: "ज्ञान व्यापक-वस्तु का प्रतिरूप है" - इससे क्या आशय है?

उत्तर: सह-अस्तित्व सहज प्रगटन-क्रम में व्यापक-वस्तु ज्ञान स्वरूप में मनुष्य द्वारा प्रगट होता है। ज्ञान व्यापक का ही स्वरूप है। प्रतिरूप इसे ही कहा है।

व्यापक-वस्तु चेतना के रूप में चैतन्य-वस्तु को प्राप्त है। चेतना ही ज्ञान है। मानव में ज्ञान स्वरूप में व्यापक-वस्तु दिखता है। तात्विक रूप में व्यापक, चेतना, ज्ञान, साम्य-ऊर्जा - एक ही वस्तु है। अमूर्त-वस्तु एक ही है - जो जड़-प्रकृति को ऊर्जा रूप में प्राप्त है और चैतन्य प्रकृति (जीवन) को चेतना और ज्ञान स्वरूप में प्राप्त है।

व्यापक वस्तु (ज्ञान) मानव द्वारा व्यवहार में प्रकाशित होता है। प्रकाशित होने का स्वरूप है - न्याय, धर्म, सत्य। व्यापक-वस्तु ही मनुष्य द्बारा मूल्यों के रूप में प्रमाणित होता है। मूल्यों का अर्थ अमूर्त ही होता है। सभी मूल्य ज्ञान का ही प्रकाशन हैं। मूल्यों का प्रकाशन क्रिया के साथ है, फल-परिणाम के साथ है।

अमूर्त-वस्तु (व्यापक) और मूर्त-वस्तु (प्रकृति) दोनों अस्तित्व में अविभाज्य स्वरूप में हैं, और अध्ययन-गम्य हैं। अमूर्त-वस्तु मूर्त-वस्तु के द्वारा ही प्रमाणित होगी। सह-अस्तित्व का मतलब यही है। अमूर्त और मूर्त का सह-अस्तित्व नित्य-वर्तमान है।

मूर्त-वस्तु के बिना अमूर्त-वस्तु का प्रगटन नहीं होता है। जैसे - मानव जीवन और शरीर का संयुक्त स्वरूप है। जीवन भी मूर्त है। शरीर भी मूर्त है। ज्ञान अमूर्त है। जीवन ही ज्ञान का धारक-वाहक है। शरीर ऊर्जा का धारक-वाहक है। कार्य-ऊर्जा द्वारा जो काम होना है, वह शरीर द्वारा होता रहता है। अमूर्त-वस्तु (ज्ञान) का मूर्त-परम्परा (मानव = जीवन + शरीर) में प्रमाणित होना है। मानव ही इसका धारक-वाहक है। इस तरह मानव के प्रमाणित हुए बिना सह-अस्तित्व प्रमाणित होगा ही नहीं! बहुत अच्छे मन से इस बात को समझने की ज़रुरत है, अनुभव करने की ज़रुरत है, प्रमाणित करने की ज़रुरत है।

जागृत-मानव ही सह-अस्तित्व प्रमाण का धारक वाहक है। मानव का प्रगटन होते तक शरीर-रचना में परिवर्तन होता रहा। झाड से लेकर मानव-शरीर रचना तैयार होते तक प्राण-कोशों में निहित रचना विधि में परिवर्तन होता रहा। उसी प्रकार जीव-चेतना से मानव-चेतना, देव-चेतना, दिव्य-चेतना तक "चेतना-विकास" की व्यवस्था दे दिया। समाधान और अभय स्वरूप में सह-अस्तित्व प्रमाणित होता है। समृद्धि शरीर के लिए हो जाता है। अभी तक परंपरा में समाधान-समृद्धि के योग को पहचाना नहीं गया था।

आप इस पूरी बात को समझने का अपने में पूरा धैर्य संजोइए, स्वयं पूरा पड़ने के बाद आज यह बात जिस स्तर तक पहुँची है, उससे अगले स्तर तक पहुंचाइये। आगे की पीढी आगे!

प्रश्न: आपसे हमे इस पूरी बात की सूचना मिली, अब इसको अध्ययन करके अनुभव करने की आवश्यकता है। क्या इस क्रम में ऐसा हो सकता है कि मुझे भ्रम हो जाए कि मुझे 'अनुभव' हो गया है, 'पूरा समझ' आ गया है - जबकि वास्तव में ऐसा न हुआ हो?

उत्तर: अनुभव होता है तो वह जीने में समाधान-समृद्धि पूर्वक प्रमाणित होता है। वही तो कसौटी है। सूचना देना समाधान देना नहीं है। समाधान जी कर ही प्रमाणित होता है। समाधान का वितरण करना शुरू करते हैं, तो सभी स्तरों पर समझा पाते हैं। आप मुझे देखिये - किसी भी बारे में समाधान प्रस्तुत करने में मुझ पर कोई दबाव नहीं पड़ता है। मैं अपने गुरु जी से पूछ के बताऊंगा, कोई किताब को पढ़ कर बताऊंगा - ऐसा कहने की कोई जरूरत मुझे नहीं है। समाधान की कसौटी में उतरे बिना एक भी व्यक्ति प्रमाणित नहीं होगा। "मैं प्रमाणित हूँ" - यह कहने के लिए जाँचिये, क्या आप समाधान-समृद्धि पूर्वक जीते हैं? शरीर की आवश्यकता के लिए समृद्धि, जीवन की आवश्यकता के लिए समाधान।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (जुलाई २०१०, अमरकंटक)

आभार - प्रवीण-आतिशी (मानव-स्थली, भोपाल)

अनुक्रम से अनुभव

प्रश्न: "अनुक्रम से अनुभव होता है" - इसको समझाइये।

उत्तर: पहले - शब्द; दूसरे -शब्द का अर्थ; तीसरे - शब्द के अर्थ स्वरूप में अस्तित्व में वस्तु; चौथे - अस्तित्व में वस्तु के साथ तदाकार होना; पांचवे - अनुभव होना। इस तरह अनुभव होता है। अनुभवगामी विधि में ये पांच हैं। अनुक्रम की वस्तु है - पदार्थ-अवस्था से प्राण-अवस्था, फिर प्राण-अवस्था से जीव-अवस्था, फिर जीव-अवस्था से ज्ञान-अवस्था का प्रगटन। अनुक्रम सहज अनुभव होता है। अनुक्रम पूर्वक अनुभव होता है। ज्ञान-अवस्था अनुभव-मूलक विधि से प्रमाणित होती है।

इस प्रस्ताव को और सुगम बनाने की युक्ति मेरे पास अभी तक आया नहीं है। आप लोग इसको अनुभव करो फिर सोचो, कैसे इसको और सुगम बनाया जा सकता है!

अध्ययन प्रक्रिया में अध्ययन करने वाले और अध्यापन करने वाले दोनों की भागीदारी है। अनुभव यदि एक व्यक्ति से दूसरे में अंतरित होना है तो - अध्यापन कराने वाले में प्रामाणिकता पूरा होना चाहिए, और अध्ययन करने वाले में जिज्ञासा पूरा होना चाहिए। दोनों हुए बिना अध्ययन-प्रक्रिया सफल नहीं होगा।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (जुलाई २०१०, अमरकंटक)

आभार - प्रवीण, आतिशी (मानव-स्थली, भोपाल)