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Monday, December 5, 2016

जीवन विद्या शिविर के प्रबोधकों के लिए मार्गदर्शन



जीवन विद्या प्रबोधकों के लिए मार्गदर्शन: अध्ययन बिंदु

- श्री ए नागराज के साथ संवाद (अगस्त २००६, अमरकंटक)

Thursday, December 1, 2016

दावे की बात



मैं निम्न तीन दावे करता हूँ: -

पहला, मैं अपने सहअस्तित्व में अनुभव किये होने का दावा करता हूँ.

दूसरा, मैं सहअस्तित्व के अनुरूप स्वयं जीने का दावा करता हूँ.

तीसरा, मैं सहअस्तित्व के आनुषंगिक व्यवस्था में भागीदारी करने का दावा करता हूँ.

अभी तक जितने भी लोग मेरे संपर्क में आये - उनमें से एक के साथ भी ऐसा नहीं हुआ कि  मैंने उनकी जिज्ञासा का उत्तर न दिया हो.  सुनने वाला उस उत्तर से तृप्त हुआ हो या नहीं - यह दूसरी बात है.  एक समय तक उस उत्तर से तृप्त न हों, एक समय के बाद तृप्त हों - यह हो सकता है.  ऐसी सर्वतोमुखी समाधान सम्पन्नता हर व्यक्ति के पास होनी चाहिए न?

मैंने सुंदरता के न्यूनतम स्वरूप में जीने का दावा किया है.  संसार के लिए इससे ज्यादा सुन्दर, सबसे सुन्दर जी कर दिखाने का स्थान रखा हुआ है.  यदि आप इस प्रस्ताव को समझते हैं तो आप मुझसे अच्छा ही जियोगे। 

मुझसे आप जो सुनते हो, उसके अर्थ को समझने  का अधिकार आप ही के पास है.  मैं जैसा समझा हूँ, उसको केवल सूचना स्वरूप में आपको प्रस्तुत कर सकता हूँ.  मैं जैसा समझा हूँ, सोचता हूँ, जीता हूँ और करता हूँ - इन चार का भाषाकरण करता हूँ.  इसमें से जो मैं करता हूँ, वह आपको जल्दी पकड़ में आ जाता है.  जो मैं जीता हूँ, उसको समझने के लिए आपको थोड़ा ज्यादा मन लगाना पड़ता है.  जो मैं सोचता हूँ, उसके लिए और ज्यादा।  जो मैं समझता हूँ (अनुभव करता हूँ), उसके लिए और  ज्यादा।  ये चार स्तर हैं मन लगाने के.  अध्ययन में मन लगाना पड़ता है.  यही ध्यान है.  मन लगाने के प्रमाण में ये चारों बात समझ में आती हैं. 

इससे पहले आदर्शवाद और भौतिकवाद जो आया, उसमे निष्कर्ष निकलता है तो निकाल लो.  आदर्शवाद बनाम रहस्य मूलक ईश्वर केंद्रित चिंतन का मतलब है - "कोई मानव समझदार नहीं हो सकता!"  भौतिकवाद बनाम अनिश्चयता अस्थिरता मूलक वस्तु केंद्रित चिंतन का मतलब है - "हर अपराध हर व्यक्ति कर सकता है."  यदि इन दोनों से निष्कर्ष नहीं निकलता है तो इस विकल्प को समझो!  ईमानदारी से समझना पड़ेगा।  इसमें केवल जिज्ञासा व्यक्त करना पर्याप्त नहीं है.  समझना आवश्यक है.

यदि आप मेरे अनुभव करने (समझने), सोचने, जीने और करने को लेकर निर्भ्रम होते हैं तो यह ज्ञान मुझसे आप में अंतरित हो जाएगा।  इन चारों भागों में तदाकार-तदरूप होने की अर्हता हर मानव में है.  इसमें बाधा तब आती है जब कहीं हम हमारे प्रतिकूल लगने वाली किसी बात को नकार देते हैं.  वहीं हम रुक जाते हैं.  यही समझने में अवरोध है.  जीव चेतना से अनुकूलता बैठाने का प्रयास असफल होगा ही, क्योंकि मानव चेतना का कोई भी प्रस्ताव जीवचेतना के अनुकूल नहीं है.  ऐसी कोई जगह नहीं है जहाँ  मानवचेतना जीवचेतना के साथ राजी-गाजी करता हो.  मानवचेतना और जीवचेतना के बीच एक संक्रमण रेखा है.  इस संक्रमण-रेखा के एक तरफ है अपना-पराया की दीवारें और दूसरी तरफ हैं - अपना-पराया की दीवारों से मुक्ति।  इतना ही है.  अपना-पराया के चलते न स्वतंत्रता है, न स्वराज्य है. 

समझना है या नहीं - पहले इसीको निर्णय कर लिया जाए.  यदि समझना है तो यह तदाकार-तद्रूप होने का पूरा मार्ग ठीक है.  यदि नहीं समझना है तो इसका नाम लेने की भी ज़रुरत नहीं है.  मानव जाति जो कर रहा है अभी वही ठीक है.  इस प्रस्ताव में जीव चेतना के साथ राजी गाजी करने का एक भी सूत्र नहीं है.  इसके स्थान पर मानवीयता पूर्वक जीने का प्रस्ताव है. 

यह adjustment की बात नहीं है, replacement की बात है.

- श्री ए नागराज के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)


Sunday, November 20, 2016

अध्ययनशील लोगों के बीच मंगल मैत्री का मार्ग



प्रश्न:  अध्ययनशील लोगों के बीच मंगल-मैत्री और समानता का क्या सूत्र होगा?

उत्तर:  ये सभी लोग, जो जीवनविद्या मध्यस्थ दर्शन - सहअस्तित्ववाद के प्रति समर्पित हैं, सर्वशुभ को चाहने वाले हैं और वैसा ही मैं भी हूँ. 

सर्वशुभ विधि से ही अपना-पराया की दीवारें और अपराध-प्रवृत्ति सामाप्त होती हैं - इसीलिये इनके साथ मंगल-मैत्री स्वाभाविक है.  अपना-पराया और अपराध-प्रवृत्ति के चलते मंगल-मैत्री होता नहीं है.  अपना-पराया और अपराध-प्रवृत्ति से मुक्ति ही भ्रम-मुक्ति है.  इस एकात्मता से जुड़ के अध्ययनशील लोग मंगल मैत्री को प्रमाणित कर सकते हैं.  मंगल-मैत्री की आधार-भूमि सर्वशुभ ही है. 

क्या इसमें कोई खोट है?  क्या इसमें कोई व्यक्तिवाद है?  क्या इसको कोई समुदायवाद छू सकता है? 

इस प्रस्ताव को पहले तर्क विधि से सोच लो, फिर कल्पना विधि से इसका शोध कर लो.  तर्क से आगे है कल्पना!  कल्पना विधि से यदि यह पूरा हो जाता है तो इसको समझने के अलावा और कोई रास्ता स्वयं में नहीं है।  तर्क और कल्पना के योग से स्वयं में "अनुमान" बन जाता है.   फिर उस अनुमान के आधार पर आगे कल्पना से प्रमाण तक पहुँचने के लिए अपने में सामर्थ्य बन जाता है. 

इस तरह अध्ययनशील लोगों के बीच मंगलमैत्री का रास्ता हम साफ़-साफ़ देख पाते हैं.  सबके साथ जी सकते हैं, रह सकते हैं, परस्पर शुभकामना व्यक्त कर सकते हैं, एक दूसरे के सर्वशुभ कार्यों के प्रति प्रसन्न और रोमांचित हो सकते हैं.

एक दिन में सारा निर्माण पूरा होता नहीं है, इसमें समय लगता ही है.  मेरा उदाहरण लें तो मैं अभी संसार को मानवचेतना का परिचय कराने के लिए प्रयत्नशील हूँ.  इतने में ही अभी हम असमंजस में हैं जबकि मैं मानव चेतना, देव चेतना और दिव्य चेतना तीनों में पारंगत हूँ.  अभी बहुत ज्यादा पहुँच गए हों ऐसा स्थिति में हम आये नहीं हैं.  आप हमारे बीच संवाद भी मानव चेतना का परिचय कराने के अर्थ में है.  यह बात सही है - लोगों में इस बात की भनक पड़  गयी है, वैचारिक रूप में इसकी स्वीकृति भी कुछ बनी है, कार्य रूप में कुछ प्रयास भी है.  ज्यादा लोगों में इसकी भनक पड़ी  है, कुछ लोग अपनी वैचारिक स्वीकृति को प्रमाणित करने का प्रयास कर रहे हैं.  इस प्रयास क्रम में अनुभव का बिंदु आता ही है.  प्रयास करते समय में "अनुभव" का जिक्र तो ख़त्म नहीं होता।  वह अनुभव का झोंका आता ही है.  अनुभव से जुड़ना पड़ता ही है, समझाने का सम्मान उसके बिना बनता ही नहीं है.  यह पूरा प्रक्रिया ऐसा ही है - कोई एक छोर आपने पकड़ लिया तो पूरा होने की संभावना है. 

प्रश्न:  आपकी बात को हम "समझ के करें" या "कर कर के समझें"?

उत्तर:  समझ के ही करें।  विकल्प को समझ के ही उसको करने (समझाने) का प्रवृत्ति बनता है.  समझ चाहे "मानी हुई" स्वीकृति के स्तर की क्यों न हो, उसके बिना समझाने का प्रयत्न नहीं बनेगा।  स्वीकृति के आधार पर यदि समझाने का प्रयत्न करते हैं तो एक दिन अनुभव तक पहुंचेंगे ही!  जीवन विद्या परिवार के लोग जो जागृति  के लिए प्रयत्न कर रहे हैं, उन परिवारजनों  में मंगलमैत्री के लिए यह एक बहुत बड़ा आधार बन गया है.  यह निर्विवाद है.  इसी विधि से सब जुड़े हैं.  सबके साथ जुड़ने का यही सुगम उपाय है. 

यदि आप इस बात को सोचें तो उससे यही निकलता है कि हमको अपने प्रयास की शुरुआत करने के लिए एक छोर को पकड़ने की आवश्यकता है.  इसको आप "सिद्धांत" भले ही न मानो।  यदि हम इसमें चले जाते हैं कि "पूरा समझे बिना मुँह ही नहीं खोलना है" - तो वह प्रयास बुरा नहीं है, पर यह "दुर्घट प्रयास" है.  सम्मानजनक भाषा में कहें तो यह "परिपक्व प्रयास" है.  इस प्रयास में कोई खोट नहीं है - पर उससे सही बात को संसार के सामने तत्काल प्रकट करने का कोई सूत्र नहीं मिलता।  जबकि दूसरे विधि में हम अपने प्रयास के लिए जो छोर पकड़े हैं उस विश्वास को व्यक्त कर सकते हैं.  उस प्रयास के फलन में अनुभव होने पर हम स्वयं प्रमाण होने के दावे के साथ बोल सकते हैं.  मैं सोचता हूँ, आज नहीं तो कल इस प्रकार सत्यापित करने वाले सैंकड़ों व्यक्ति तैयार हो जाएंगे।  इस जगह आये बिना सब जगह पहुँचने का गति भी नहीं बनेगा। 

मानव को सच्चाई का थोड़ा भी यदि भनक लगता है तो वह अपने को रोक नहीं पाता है.  आदमी को जब यह स्वीकार होता है कि  यह बात सही और शाश्वत है, तो वह उस स्वीकृति को अपने तक रोक नहीं पाता है.  यह बात फैलनी चाहिए, इसी जगह में वह आता है - चाहे उस बात को लेकर वह उसमें अभी पारंगत नहीं हुआ हो!

समझने का जहाँ  छोर पकड़ा, वहीं से उपकार कार्य में जिम्मेदारी-भागीदारी भी शुरू हो जाती है.  जैसे-जैसे लोगों का इसमें रुझान बनता है, स्वयं के अनुभव  तक पहुँचने का रास्ता भी बनता है. 

प्रश्न:   इस तरीके से चलें तो समझदारी पूरा होने तक एक अध्ययन करने वाला किस-किस घाट से गुजरता है?

उत्तर:  सच्चाई के इस प्रस्ताव का "श्रवण" करना एक घाट है.  श्रवण के बाद सर्वशुभ के अर्थ में अपने प्रयास के लिए मूल मुद्दे के रूप में "एक छोर को स्वीकार लेना" दूसरा घाट है.  सच्चाई का "साक्षात्कार कर लेना" तीसरा घाट है.  समझदारी जब पूरा होता है तो वह जीवचेतना से मानव चेतना में संक्रमण स्वरूप में प्रमाणित होता है. 

अध्ययन करने वाले में "स्व-निरीक्षण" चलता रहता है.  जिस प्रयास को मैंने कल्याणकारी स्वीकारा है, क्या उसमें मैं पारंगत हो गया हूँ?  यदि पारंगत नहीं हुआ हूँ तो पारंगत होने के लिए रास्ता क्या है? 

प्रश्न: इसमें गुत्थी यही है - हम पूरा समझ के मुँह खोलें या जितना समझे हैं उतना मुँह खोलते हुए आगे के लिए प्रयास करते रहें।  अभिव्यक्ति में श्रेष्ठता का क्रम क्या है?

उत्तर:  अनुभव मूलक अभिव्यक्ति परम है.
स्वीकृति मूलक अभिव्यक्ति द्वितीय स्तर पर है.
तर्क मूलक अभिव्यक्ति तृतीय स्तर पर है.
कल्पना मूलक अभिव्यक्ति चतुर्थ स्तर पर है.

प्रश्न:  कल्पना, तर्क या स्वीकृति मूलक अभिव्यक्ति करने में समय लगाना क्या अपनी शक्तियों का अपव्यय तो नहीं है?

उत्तर: नहीं!  आपकी कल्पना, तर्क या स्वीकृति में सर्वशुभ का क्या स्वरूप आता है, उसको आप कह ही सकते हैं.  उसमें शक्ति का अपव्यय कहाँ हुआ?  आपके पास कल्पना रहता ही है, तर्क रहता ही है, स्वीकृति रहता ही है.  इन तीनो में से कोई भी कड़ी अध्ययन के लिए विरोधी नहीं है.  अध्ययन का अंतिम बिंदु है - अनुभव!  पीछे की तीनों कड़ियाँ अनुभव के लिए सहायक हैं.   आपके पास जो है वह आवंटित न हो, ऐसा कोई व्यवस्था नहीं है.  आप इस ढंग से आवंटित न करें, दूसरे ढंग से करें - यह हो सकता है!  पर आवंटित न करें - यह हो नहीं सकता। 

अभिव्यक्ति का निम्नतम आधार कल्पना है.  हमने अपनी कल्पना में सर्वशुभ को ऐसे पहचाना है, इसको घोषित करने में किसको क्या तकलीफ है?  इसको नकारने का किसी का अधिकार ही नहीं बनता है. 

प्रश्न: हमारी स्थिति तर्क की है, या कल्पना की या स्वीकृति की - इसका मूल्यांकन कौन करेगा?

उत्तर:  अध्ययन करने वाला स्वयं अपनी स्थिति का मूल्यांकन करेगा।  आपकी स्वीकृति हो जाने के बाद आप अपनी कल्पना के दृष्टा हो जाते हो.  आप जब स्वीकृति के स्तर पर हो तो अपनी कल्पना का दावा कर सकते हो.  अनुभव होने के बाद व्यवहार में दावा कर सकते हो.  अपनी स्थिति को भुलावा देते हैं तो संसार का आक्षेप होता है. 

- श्री ए नागराज के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक)

Saturday, November 19, 2016

पूर्व स्मृतियों की बाधा और उसके लिए उपाय - भाग २



जीव चेतना में जीता हुआ मानव गलतियों में "विवश" हो सकता है पर "गिरफ्त" नहीं हो पाता।  सच्चाई का रास्ता कहीं न कहीं उसमे बना ही रहता है.  सहीपन की अपेक्षा में ही वह गलती करता है.  जागृत मानव उसके सामने "सही के स्वरूप" को प्रमाणों सहित प्रस्तुत करता है.  उस सहीपन को स्वीकारने, अनुभव करने और प्रमाणित करने की कड़ियों के साथ यदि वह सुनता है तो सहीपन उसका स्वत्व बन जाता है.  ऐसा तभी संभव है जब वह पीछे की अपनी स्मृतियों को ताक में रख के सुने।  सही के स्वरूप के रास्ते में जीव चेतना की विवशता को बारम्बार ला लाकर बिछाना उचित होगा या अनुचित होगा?  इस तरह विवशता को आगे लाने से समझने में ज्यादा समय लग जाता है.  सहीपन की चाहत में परिवर्तन होता नहीं है पर विवशता को आगे लाने से विलम्ब हो जाता है.  शीघ्रता से यदि समझना है तो इस उपाय को अपना सकते हैं. 

अच्छाई की तृषा चाहत के रूप में (जीव चेतना में जीते) मानव में बनी हुई है.  इसी को देख कर कहा है - जीव चेतना में जीता हुआ मानव भी ५१% से अधिक अच्छा ही है. अच्छाई को स्वीकारने की जगह में जब आते हैं तो पूर्व स्मृतियाँ परेशान करती हैं.  हमने ऐसा सोचा था, तैसा सोचा था.  ऐसा किया था, तैसा किया था  आदि.  यही सब अवरोध करता है.  समझते तक उन स्मृतियों को रोक कर रखा जाए.  अभी पहले समझ लेते हैं, समझने के बाद यदि तुम्हारी ताकत है तो बने रहोगे, ताकत नहीं है तो उजड़ोगे!  यह वैसा ही है - पत्ते में जब तक ताकत रहता है तब तक तने से चिपका रहता है, जब ताकत समाप्त हो जाता है तो अपने आप गिर जाता है.  हमारे सारे सोच-विचार, कार्य व्यवहार, और उनके फल-परिणाम जीवन के फूल-पत्ते जैसे ही हैं.  समझ स्वत्व होने के उपरान्त जो जीवन के अनुरूप होंगे वे बने रहेंगे, बाकी सब झड़ जाएंगे, ख़त्म बात! 

तरण-तारण विधि यही है, जिसमें एक मानव अनुभवमूलक विधि से दूसरे  को अनुभवगामी  पद्दति से पारंगत बना देता है.

"करो - न करो" - यह उपदेश विधि है.

"हम यह चाहते हैं, आपकी चाहत में इसकी एकरूपता को मिलाते हैं", "हम यह करते हैं, आपको इसका बोध कराते हैं", "हम यह पाए हैं, आपको इसके मिलने का रास्ता बता देते हैं" - यह प्रमाण विधि है. 

भ्रम और जागृति : 

अपने-पराये से मुक्ति और अपराध-मुक्ति ही भ्रम-मुक्ति है.  भ्रम-मुक्ति ही मोक्ष है. जबकि विगत में "मोक्ष" के बारे में लिखा है - जीवन मुक्ति, क्लेश मुक्ति और आवागमन से मुक्ति। 

भ्रम जीवचेतना की सीमा है
जागृति  जीवचेतना से मुक्ति है

जीवचेतना में जीते तक जीवचेतना के सूत्रों की ही व्याख्या होती है.  जिसमे अतृप्ति बना ही है. 
जीवचेतना से मुक्त होने पर मानवचेतना की सूत्र व्याख्या अपने आप से प्रकट होने लगती है. 

मानवचेतना ही मानव का स्वत्व है, इसी में मानव की स्वतंत्रता है, यही मानव का अधिकार है.  मानवचेतना सहज स्वत्व, स्वतंत्रता व अधिकार ही मानवत्व है. मानव अपने ऐश्वर्य (मानवत्व) को छोड़ कर कैसे सुखी हो सकता है? 

भ्रम में जीता हुआ मानव अपने सुखी होने का प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर पाता है, इसलिए उसका जड़ ही हिला रहता है.  भ्रम की सभी स्वीकृतियाँ भय और प्रलोभन के रूप में हैं.  इसके अलावा भ्रम की पहुँच कुछ भी नहीं है.  मानव में कल्पनाशीलता कर्म-स्वतंत्रता होने से उसमें भय और प्रलोभन से वशीभूत होने का भी रास्ता बना.  भ्रम से भय और प्रलोभन की ही सूत्र-व्याख्या है.  जीव चेतना में हम कुछ भी करते हैं उसके मूल में भय और प्रलोभन ही है.  नौकरी और व्यापार के मूल में भय और प्रलोभन है ही.  भय और प्रलोभन को छोड़ के न नौकरी किया जा सकता है, न व्यापार!  भय और प्रलोभन ही विवशता है.  विवशता मानव को स्वीकार नहीं है.  इसी लिए भ्रम में जीते हुए मानव का जड़ हिला रहता है. 


- श्री ए नागराज के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक)  

Wednesday, November 16, 2016

पूर्व स्मृतियों की बाधा और उसके लिए उपाय - भाग १



"अध्ययन = कल्पनाशीलता का प्रयोग करके शब्द से अर्थ को पहचानना.  अर्थ अस्तित्व में वस्तु है.  वस्तु की पहचान (तुलन में) न्याय-धर्म-सत्य दृष्टियों के (अनुकरण-अनुसरण पूर्वक) अभ्यास द्वारा है.  यह प्रक्रिया जीवन की साढ़े चार क्रियाओं की सीमा में ही होती है.  इस प्रकार वस्तु की पहचान होने पर जीवन में साक्षात्कार, बोध और अनुभव स्वतः होता है.  अनुभव के बाद बुद्धि में अनुभव-प्रमाण बोध और संकल्प, चित्त में उसका चिंतन-चित्रण होकर वृत्ति में न्याय-धर्म-सत्य विचार, मन में मूल्यों का आस्वादन और संबंधों के चयन द्वारा वह मानव के जीने में प्रमाणित होने के लिए तैयार हो जाता है. "  - यह हमने आप से सुना है.

बाबा जी: सुना है या समझा है?

अभी सुना है!  और यह हमारे स्मरण में है. 

बाबा जी: आपके अनुसार हर स्थिति में हम स्मरण के आधार पर बात करें या अनुभव के आधार पर बात करें?

अनुभव के आधार पर बात करें, हमारी अपेक्षा तो यही है. 

बाबा जी:  सुनने के बाद समझने की जिम्मेदारी आप ही की है.  समझने में आपको कोई कठिनाई होगा तो उसको दूर करने का काम मेरा होगा।

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प्रश्न:  आप अपने तर्क को एक तरीके से प्रस्तुत करते हैं, उसके अनुसार हम अपने को पशुमानव-राक्षसमानव श्रेणी में पाते हैं.  यह कठोर होते हुए भी हमको आहत नहीं करता, बल्कि सही ही लगता है.  आपका अपने तर्क को प्रस्तुत करने का क्या तरीका है?   इस तर्क की सीमा क्या है और इस तर्क के आगे क्या है?

उत्तर:  इस दर्शन में मानव को पाँच कोटियों (प्रजातियों) में पहचाना गया है.  जीवचेतना में दो प्रजाति हैं - पशुमानव और राक्षसमानव।  मानव चेतना, देव चेतना और दिव्य चेतना में एक-एक प्रजाति है.  राक्षस मानव का स्वभाव क्रूरता प्रधान है.  पशुमानव का स्वभाव दीनता प्रधान है.  मानव का स्वभाव धीरता, वीरता, उदारता है.  देव मानव का स्वभाव दया, कृपा, करुणा है.  दिव्य मानव का स्वभाव करुणा है.  ऐसा मैंने प्रस्तुत करके आपके सोचने के लिए (अपना मूल्यांकन करने के लिए) छोड़ दिया है.  इसको आपने "तर्क" कहा.  यह तर्क नहीं (अनुभव मूलक) "विश्लेषण" है. 

प्रश्न:  लेकिन आपकी प्रस्तुति तर्क-सम्मत तो है?   आपके तर्क का सार स्वरूप क्या है?

उत्तर:  हाँ, मेरा विश्लेषण तर्क-सम्मत है.  मैं मानव चेतना  और जीव चेतना को जानता हूँ, उस ज्ञान को मैं जीता हूँ, प्रमाण हूँ - उस आधार पर मैं आपसे पूछता हूँ आपको जीव चेतना में जीने की विधि चाहिए या मानव चेतना में जीने की विधि चाहिए?  इस तरह मैं पहले आपकी "चाहत" को पूछता हूँ.  क्यों ऐसा पूछते हो - तो उसके उत्तर में तर्क है कि जीव चेतना की सीमा में हम अपराध मुक्त नहीं हो सकते।  क्यों अपराध मुक्त नहीं हो सकते - इसके लिए फिर पूरा तर्क है.  अपराध मुक्ति अपने-पराये की दीवारों से मुक्ति जीव चेतना पर्यन्त संभव नहीं है.  अपना-पराया की दीवारों के साथ जीना है या इन दीवारों से मुक्त होकर जीना है - फिर यह मैं पूछता हूँ.  उसको तर्क-सम्मत विधि से प्रस्तुत करता हूँ.  आप जब मानव चेतना के लिए चाहत को व्यक्त करते हो तो उससे सम्बंधित बातों का अध्ययन कराता हूँ.  इसके बाद देव चेतना और दिव्य चेतना की बात करते हैं.  मानव, देव  मानव, दिव्य मानव चेतना स्वरूप में जीना ही अखंड-समाज सार्वभौम व्यवस्था सूत्र-व्याख्या करना है.  इसकी आवश्यकता होगा तो हम इसको करेंगे ही!  विश्लेषण -> चाहत को लेकर प्रश्न  -> चाहत के अनुरूप संबोधन।  यही मेरे तर्क प्रस्तुत करने का सार स्वरूप है. 

प्रश्न:  सुनने वाले की चाहत को पूछना क्यों आवश्यक है? 

उत्तर:  यदि चाहत को नहीं पूछते तो वह पत्थर पर पानी बरसने जैसा है.  पत्थर पर बरसता है तो पत्थर भीगता नहीं है.  मिट्टी पर बरसता है तो मिट्टी भीग जाती है.  इस तरह अध्ययन विधि कोई लदाऊ-फंसाऊ कार्यक्रम नहीं है.  अध्ययन मानव सहज अपेक्षा के अनुरूप है.  चाहत को पूछना प्रौढ़ लोगों के लिए जो शिक्षा से हट चुके हैं, अपने जीने का कार्यक्रम बना चुके हैं, उसमें ढल चुके हैं, जिम्मेवारियाँ स्वीकार चुके हैं.  इससे भिन्न बच्चों में सच्चाई के अलावा कुछ भी चाहत नहीं है.  हर मानव संतान जन्म से ही न्याय का याचक, सही कार्य व्यवहार करने का इच्छुक और सत्य वक्ता होता है.  चाहे वह संतान अय्याशी की, कुकर्मी की, दुष्ट की, सज्जन की, पशु मानव की, राक्षस मानव की, देव मानव की, दिव्य मानव की क्यों न हो.  हर मानव संतान यही चाहता है. 

ग्रहण करने वाली स्थिति में प्रबोधन ज्यादा कारगर है.  उसके लिए ही सुनने वाले में इसके लिए चाहत को पूछना।  मानव में चाहत सहीपन की ही है.  सहीपन की सूचना पर किसी को ऐतराज नहीं है.  जैसे - आपसे पूछें कि आपको जीव चेतना चाहिए या मानव चेतना, तो आप मानव चेतना ही कहोगे।  दूसरा कुछ कहना बनता ही नहीं है.  जीव चेतना में पशु मानव - राक्षस मानव होते हैं, वह आपको स्वीकार नहीं होगा।  उसके बाद यथास्थिति बताते हैं कि मानव परंपरा अभी तक जीव चेतना में जिया है.  यह यथास्थिति तो प्रत्यक्ष है, इसमें बाकी सब कुछ को भले ही हम ढक लें, किन्तु धरती का बीमार होने को ढक  नहीं पा रहे हैं.  इसको ढका  नहीं जा सकता। फिर मानव में श्रेष्ठता की चाहत के अनुरूप मानव चेतना का प्रबोधन शुरू करते हैं.

प्रश्न:  जो आप मानव चेतना का प्रबोधन करते हैं, उसको स्वीकारने में हमारे एक सीमा के बाद अटक जाने का क्या कारण है? 

उत्तर: अटकने का कारण है - पूर्व स्मृतियाँ।  पूर्व स्मरण आते ही हैं.  मानव चेतना संबंधी प्रबोधन पूर्व स्मृतियों के विपरीत होने पर हम अटक जाते हैं.  पूर्व स्मृतियाँ इसके अनुकूल रहने पर यह आगे बढ़ता है.

प्रश्न:  जीव चेतना में जिए हुए की स्मृतियाँ मानव चेतना के प्रस्ताव के अनुकूल कैसे होंगी?

उत्तर: अपेक्षा रखने में हम क्यों कंजूसी करें।  जीव चेतना में जीते हुए मानव में अपेक्षा मानव चेतना की ही होती है.  संवाद करते समय दुसरे व्यक्ति की सही को लेकर अपेक्षा को स्वीकारने में कहीं भी कंजूसी न करें।   मानव के पास शुभ की ओर जाने का रास्ता चाहे संकीर्ण हो, पर सदा बना है.  इसी की गवाही में हर मानव स्वयं में शुभ की अपेक्षा को होना बताता है. 

अब हम यहाँ जीव चेतना से मानव चेतना में संक्रमित होने की बात कर रहे हैं.  मानव चेतना का कोई भी बात जीव चेतना की किसी भी बात की वकालत नहीं करता - न जीव चेतना के संविधान की, न जीव चेतना की मानसिकता की, न जीव चेतना की शिक्षा की, न जीव चेतना की व्यवस्था की. 

इस आधार पर निष्कर्ष निकाला - यदि मानव चेतना संबंधी बात को समझना शुरू करते हैं तो पीछे की जीव चेतना संबंधी स्मृतियों को थोड़ा देर के लिए रोक रखा जाए.  इसके साथ मिलाने और इसके साथ तौलने का कोशिश न किया जाए.  पूर्व स्मृतियों को आगे लाने से मानव चेतना संबंधी बात को अवगाहन करने में, तोलने में, जीने के ढाँचे-खांचे में बैठाने में हमको तकलीफ होती है.

प्रश्न:  पूर्व स्मरण आते ही हैं, उनको स्थगित करने का क्या उपाय है?

उत्तर: मानव चेतना के प्रस्ताव को उसके श्रवण से उसको समझने, अनुभव करने से लेकर जीने में प्रमाणित करने तक की कड़ियों को जोड़ कर सुनने से वह अपना स्वत्व होता है. 

जिस वस्तु को समझ रहे हैं, उस वस्तु का बोध, उस वस्तु का अनुभव, उस वस्तु का प्रमाण, और उस वस्तु के साथ जीने की कड़ियों को जोड़ कर सुनने से जल्दी समझ हाथ लगती है.  यदि ऐसा नहीं करते तो वस्तु के प्रयोजन से हम नहीं जुड़ते।  सुनते हैं, फिर उसे भूल भी जाते हैं. 

सुना हुआ बात भूल सकता है, समझा हुआ बात भूल नहीं सकता।  यह सिद्धांत है.


- श्री ए नागराज के साथ संवाद, जनवरी २००७, अमरकंटक

Tuesday, November 1, 2016

अनुभव शिविर 2011



अनुसंधान विधि में पहले अनुभव होता है, उसके बाद हम अभिव्यक्त होते हैं.  अध्ययन विधि में अभिव्यक्त होने के क्रम में अनुभव होता है.

- अनुभव शिविर, जनवरी २०११, अमरकंटक

शिक्षा संस्कार योजना

-आंवरी आश्रम १९९७