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Monday, April 15, 2019

क्रिया से क्रिया की तृप्ति संभव नहीं है

प्रश्न:  आपने मानव व्यव्हार दर्शन में लिखा है - "विषयासक्त मानव क्रिया से क्रिया की तृप्ति चाहता है, जो संभव नहीं है.  संवेदन क्रिया से ह्रास व विकास ही संभव है".  इसको समझाइये.

उत्तर:  जैसे - शरीर क्रिया (आहार, निद्रा, भय, मैथुन) से शरीर क्रिया की तृप्ति पाने का प्रयास करना.  वह संभव नहीं है.  तृप्ति मन में होती है - जो शरीर क्रिया से नहीं होती.  संवेदन क्रिया शरीर से सम्बद्ध है - जो जड़ है.  जड़ विकासक्रम में है.  तृप्ति विकास (जीवन जागृति) के साथ होती है - जो एषणात्रय स्वरूप में जीने से होता है, जहाँ संज्ञानीयता में संवेदनाएं नियंत्रित रहती हैं.

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)

Thursday, April 11, 2019

तर्क सच्चाई तक पहुँचने का सेतु है

तर्क सच्चाई (तात्विकता) तक पहुँचने का एक सेतु है.  कारण, कार्य, फल-परिणाम में सामंजस्यता करते हुए तर्क है.  तर्क साधन है, साध्य नहीं है.  तर्क को साध्य मान लेने से आदमी बतंगड़ बन जाता है.  उसका तर्क ख़त्म ही नहीं होता है!  इसी को वितंडावाद कहा है.  विज्ञान ने तर्क-सम्मत होने से शुरुआत की, किन्तु उसमे भूल यहाँ हो गयी जब उसने यह मान लिया कि आदमी सिद्धांत (नियम) बनाता है.

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (मई २००७, अमरकंटक)

समझदारी से सोचा जाए!

संसार में मानव परंपरा है.  मानव परंपरा ज्ञान-अवस्था में है.  इसके प्रमाण में मानव ने अपना भाषा विकसित किया.  भाषा को ज्ञान के स्वरूप में ही माना.  इस "ज्ञान" को फिर न्याय में लगाया.  फिर रहस्यमयी स्वर्ग-नर्क में लगाया.  इसमें काफी समय लगाया.  इस से समाधान नहीं निकला, बल्कि समस्या निकला - और फिर विज्ञान का प्रकटन हुआ.  विज्ञान धरती के साथ भक्कम अपराध करने में टूट पड़ा, जिससे धरती बीमार हो गयी.  यहाँ तक हम पहुँच गए.  अब क्या किया जाए?  समझदारी से सोचा जाए!  समझदारी से मानव का परिभाषा मिला - "मनाकार को साकार करने वाला और मनः स्वस्थता को प्रमाणित करने वाला".  यहाँ पता चला मनाकार को साकार करना तो प्रकारांतर से होता रहा है, पर मनः स्वस्थता का खाका वीरान पड़ा है.  उसको भरा जाये!  इसको भरने के लिए चेतना विकास - मूल्य शिक्षा बताया.  जीव चेतना से मानव चेतना श्रेष्ठ, मानव चेतना से देव चेतना श्रेष्ठतर, देव चेतना से दिव्य चेतना श्रेष्ठतम.  इन तीनो को अध्ययन कराने की व्यवस्था दे दी.  चेतना विकसित होने पर मूल्यों का प्रकटन सहज होता है.  जिससे धरती को अखंड राष्ट्र, सर्व मानव को एक जाति, एक धर्म स्वरूप में पहचानना बन जाता है.  इस आधार पर सार्वभौम व्यवस्था होती है.  सहअस्तित्व विधि से व्यवस्था ही होता है, शासन नहीं होता है.

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (मई २००७, अमरकंटक)

Thursday, March 14, 2019

साम्य ऊर्जा मनुष्य प्रकृति में ज्ञान स्वरूप में है.

जो कुछ भी प्रकृति में प्रकटन हुआ है वह नियम से हुआ है.  नियम के मूल में आशय होता है.  वह आशय क्या है?  वह आशय साम्य ऊर्जा (सत्ता) है.  साम्य ऊर्जा मनुष्य प्रकृति में ज्ञान स्वरूप में है.  वह ज्ञान प्रमाणित हो जाए - इसलिए मानव तक प्रकृति में प्रकटन हुआ.  एक तरफ़ परमाणु में गठनपूर्णता और दूसरी तरफ रचना में विकास होते हुए मानव शरीर रचना का प्रकटन हुआ.  मानव शरीर रचना द्वारा ही जीवन सहज कल्पनाशीलता-कर्म स्वतंत्रता प्रमाणित है.  उसके आधार पर मानव में ज्ञान की आवश्यकता है.  मानव की परिभाषा है - मनाकार को साकार करने वाला और मनः स्वस्थता का आशावादी व प्रमाणित करने वाला. मनाकार को साकार करने में मानव सफल हुआ है, मनः स्वस्थता का प्रमाणित होना अभी शेष है. उसकी आवश्यकता आपको भी लगती है, मुझे भी लगती है - इस आधार पर हम काम कर रहे हैं.

- श्रद्धेय ए नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (मार्च २००८, अछोटी)

Monday, December 24, 2018

प्रकृति की इकाइयों में परस्पर पहचान का स्वरूप

कुछ दिन पहले मेरी साधन भाई से दर्शन के कुछ मुद्दों पर स्पष्टता पाने के लिए बात हुई थी।  उसी के continuation में।  आशा है कि यह आपके लिए उपयोगी होगी।

प्रश्न:  इकाइयों का उनकी परस्परता में निर्वाह उनका सम्बन्ध की पहचान पूर्वक है या एक का दूसरे पर प्रभाव वश उनकी बाध्यता है?  इसको कैसे देखें?

उत्तर: पहली इकाई के प्रभाव वश दूसरी इकाई का निर्वाह के लिए बाध्य होना और दूसरी इकाई में निर्वाह करने की पात्रता-क्षमता होना ये दोनों ही हैं.  पहली इकाई का प्रभाव है, उसको दूसरी इकाई स्वीकार कर पा रहा है - इसके लिए दूसरी इकाई में पात्रता-क्षमता भी है. 

प्रकटन क्रम के हर स्तर पर निर्वाह है.  परमाणु अंश भी निर्वाह कर रहा है, उससे अग्रिम सभी स्थितियां भी निर्वाह कर रही हैं.  यह निर्वाह करना केवल दूसरे के प्रभाव वश बाध्यता ही नहीं है, सहअस्तित्व विधि से जिस स्थिति में वह है उसके अनुसार उसकी क्षमता भी है.  परस्परता या वातावरण बाध्यता है.  निर्वाह करना इकाई की क्षमता है, जो उसकी श्रम पूर्वक अर्जित है.  जैसे -पदार्थावस्था + श्रम = प्राणावस्था.  प्राणावस्था + श्रम = जीवावस्था.  इस तरह श्रम पूर्वक पहचानने की क्षमता अर्जित हो रही है. 

प्रश्न:  भौतिक-रासायनिक वस्तुएं भी "पहचान" रही हैं - इस भाषा से ऐसा लगता है जैसे उनमे भी जान हो!  इसको कैसे देखें?

उत्तर:  बाबा जी ने सारा मानव भाषा में लिखा है.  भौतिक-रासायनिक वस्तुओं के क्रियाकलाप को भी.  सामान्यतः जड़ उसको कहते हैं जो गति रहित हो.  जबकि हर परमाणु गतिशील है.  यहाँ जड़ की परिभाषा है - पहचानने-निर्वाह करने वाली वस्तु.  सत्ता में संपृक्त होने से हर वस्तु एक तरह से कहें तो "जिन्दा" है!

पहचानना-निर्वाह करना सम्पूर्ण प्रकृति में है.  मानव में जानना-मानना अतिरिक्त है.  जानने-मानने के बाद भी पहचानना-निर्वाह करना ही होता है.  मानव के पहचानने-निर्वाह करने में जो कमी थी उसको ठीक किया है.  बाकी प्रकृति में पहचानने-निर्वाह करने में कमियां ही नहीं हैं.  मानव में जब जानने-मानने के आधार पर पहचानना-निर्वाह करना हुआ तो वह भी व्यवस्था में हो गया. 

प्रश्न:  एक चट्टान में "पहचानना" क्या क्रिया है?

उत्तर: सहअस्तित्व में नियतिक्रम में जो वस्तु समर्पित हो रहा है वही पहचानना है.  जैसे - एक परमाणु अंश अकेला होने पर दूसरे को ढूँढने लगा.  दूसरा मिलने पर एक परमाणु बना लिया.  व्यवस्था में होने की जो यह मूल प्रवृत्ति है, श्रम है - इस स्थिति को ही पहचानना कह रहे हैं.  यह जैसे परमाणु अंश में है, परमाणु में है, वैसे एक चट्टान में भी है.  - दिसंबर 2018

अनुभव पूरा होता है, उसका अभिव्यक्ति क्रम से होता है.




अनुभव पूरा होता है, उसका अभिव्यक्ति क्रम से होता है.  जीव चेतना से मानव चेतना में परिवर्तन के लिए अनुभव एक साथ ही होता है.  वह क्रम से मानव चेतना, देव चेतना, दिव्य चेतना के रूप में प्रमाणित होता है.  अनुभव होने पर दृष्टा पद में हो गए.  मैं समझ गया हूँ - इस जगह में रहते हैं.  समझा हुए को वितरित करना मानव परंपरा में ही होगा.  इसमें पहले मानव चेतना ही वितरित होगी, फिर देव चेतना, फिर दिव्य चेतना.  ऐसा क्रम बना है.

अनुभव के बिना मानव चेतना आएगा नहीं.  पूरे धरती पर मानव चेतना के प्रमाणित होने के स्वरूप में कम से कम ५% लोग अनुभव संपन्न रहेंगे ही, भले ही बाकी लोग उनका अनुकरण करते रहे.  अनुभव सम्पन्नता के साथ देव चेतना और दिव्य चेतना में प्रमाणित होने का अधिकार बना ही रहता है.  परिस्थितियाँ जैसे-जैसे बनती जाती हैं, वैसे-वैसे उसका प्रकटन होता जाता है.

दिव्यचेतना के धरती पर प्रमाणित होने का अर्थ है - सभी लोग मानव चेतना और देव चेतना में जी रहे हैं.  तभी दिव्य चेतना का वैभव है.  दिव्य चेतना के आने के बाद धरती पर कोई प्रश्न ही नहीं है!  उसके बाद मानव इस धरती को अरबों-खरबों वर्षों तक सुरक्षित रख सकता है.  यह धरती अपने में शून्याकर्षण में है.  यह ख़त्म होने वाला नहीं है.  मानव यदि बर्बाद न करे तो यह धरती सदा के लिए है.

- श्रद्धेय श्री ए नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २००८, अमरकंटक)

Tuesday, December 18, 2018

मध्यस्थ क्रिया और नियति क्रम का अनुसरण

अभी दो-तीन दिन पहले मैं साधन भाई के साथ फोन पर बात कर रहा था, दर्शन के कुछ मुद्दों पर स्पष्टता पाने के लिए...  मुझे लगा यह चर्चा बाकी साथियों के लिए भी उपयोगी होगी, इसलिए आपसे साझा कर रहा हूँ.

प्रश्न: मध्यस्थ क्रिया के स्वरूप का जड़ और चैतन्य में क्या भेद है?

उत्तर:  जड़ परमाणु में मध्यांश द्वारा एक सीमा तक अपने गठन को बनाए रखने का प्रयास है.  उससे ज्यादा आवेश होने पर परमाणु टूट जाता है.  चैतन्य परमाणु (जीवन) में ऐसा है कि परमाणु टूटेगा ही नहीं, उसका गठन टूट ही नहीं सकता. 

परमाणु में मध्यस्थ क्रिया द्वारा ही नियति क्रम का अनुसरण होता है. 

प्रश्न: नियति क्रम का अनुसरण क्या केवल परमाणु में होता है? 

उत्तर: नियतिक्रम को अनुसरण करने की बात परमाणु में ही नहीं, परमाणु अंश में भी है.  परमाणु अंश तभी मिलकर परमाणु का गठन कर लेते हैं.  नियति क्रम को अनुसरण करने की क्रिया स्फूर्ति (अपने आप में) और स्फुरण (बाहर के प्रभाव से) दोनों से होती है.  बाहर से भी होगा तो उसको पहचानने वाला इकाई में होना ही होगा, और उसका श्रेय सर्वप्रथम मध्यस्थ क्रिया को ही है.

प्रश्न: जीवन परमाणु के मध्यांश (आत्मा) में यदि नियतिक्रम को अनुसरण करने की ताकत पहले से ही है तो भ्रम जीवन पर कैसे हावी हो जाता है?

उत्तर: जागृतिक्रम में मन शरीर से जुड़ता है.  शरीर से जुड़ने का मतलब शरीर को चलाता है.  शरीर से मन प्रभावित नहीं होगा तो वह शरीर को चला नहीं पायेगा.  जीवावस्था में शरीर से प्रभावित होने तक की ही बात रहती है.  यहाँ मन में अपने आप से इतनी ताकत नहीं होती, या कल्पनाशीलता/कर्मस्वतंत्रता नहीं होती, कि वह शरीर से कुछ और करा ले.  जीव शरीरों में मेधस तंत्र जितना permit करता है उतना ही जीवन उसके द्वारा प्रकाशित हो पाता है.  इसीलिये जीव वन्शानुषंगी हैं.

जीवन का शरीर द्वारा प्रकाशन की शुरुआत मन से है.  मानव शरीर को चलाने की जब बात है तो उसमे शरीर मूलक और जीवन मूलक दोनों तरह से चलाने का अवकाश रहता है.  शरीर को नहीं सुने तो शरीर को चलाना, जीवित रखना संभव नहीं है.  साथ ही शरीर के सुनने से जीवन को सुख का भास प्रिय-हित-लाभ स्वरूप में भी होने लगता है.  इससे भी जीवन शरीर का ही अनुसरण किये रहता है.

जागृतिक्रम में जीवन में पहले मन का प्रत्यावर्तन होगा, फिर वृत्ति का होगा, फिर चित्त का होगा, फिर बुद्धि और आत्मा का एक साथ प्रत्यावर्तन होगा.  यह क्रम है.  यदि मानव शरीर को चलाने के साथ ही आत्मा का सीधे प्रत्यावर्तन हो जाता तो वन्शानुषंगी जीवावस्था से सीधे संस्करानुषंगी जागृत मानव ही पैदा होता! 

तो मानव जीवन में आत्मा नियतिक्रम के अनुसरण के अर्थ में रहता है, साथ ही मन शरीर से जुड़ा रहता है.  मानव में कल्पनाशीलता/कर्म स्वतंत्रता के चलते उसमे जाग्रति की सम्भावना है, इसलिए मानव में शरीर से अधिक का भी कल्पना/अनुमान बनने लगता है, और जब यह अनुमान/कल्पना (अनुसंधान या अध्ययन पूर्वक) नियति के अनुसार सज जाती है तो आत्मा उस पर अनुभव की मुहर लगा देता है.

जीवन में एक विशेष बात है - इसका मध्यांश, आत्मा जब प्रत्यावर्तित होता है तब व्यापक के महिमा सदृश अन्तर्यामी (स्थिति) होता है।  और जब इसका बाह्य परिवेश मन शरीर (मेधस) मे परावर्तित होता है तब मेधस सदृश वन्शानुषंगीय आचरण प्रस्तुत करता है।
  वस्तुतः मेधस व मन तथा आत्मा  व व्यापक में अंतर अत्यंत सूक्ष्म है।  इसे स्पष्ट करना परम्परा में शेष रहा।  यह अब मध्यस्थ दर्शन में स्पष्ट हुआ है।

(१४ दिसम्बर २०१८)