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Tuesday, September 18, 2018

मध्यस्थ दर्शन के लोकव्यापीकरण की तीन योजनायें

अनुसंधान पूर्वक श्रद्धेय ए नागराज जी  (बाबा जी) ने मध्यस्थ दर्शन सहअस्तित्ववाद (बनाम अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन) को आदर्शवाद और भौतिकवाद के “विकल्प” के स्वरूप में प्रस्तुत किया.  इस दर्शन के लोकव्यापीकरण के लिए तीन योजनाओं को भी प्रस्तुत किया, जिनके शीर्षक निम्न अनुसार हैं.

(१) जीवन विद्या योजना
(२) शिक्षा का मानवीयकरण योजना
(३) परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था योजना

ये तीन योजनायें हैं, और यही तीन योजनायें हैं.  मध्यस्थ दर्शन से जुड़े सभी कार्यक्रम इन तीन योजनाओं से सम्बद्ध हैं.  इन योजनाओं के क्रियान्वयन का क्रम है - पहले जीवन विद्या योजना है, फिर शिक्षा का मानवीयकरण योजना है, फिर परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था योजना है.  लेकिन इन योजनाओं के सूत्रपात का क्रम इससे उल्टा है. यह भेद समझना आवश्यक है.

बाबा जी साधना-समाधि-संयम पूर्वक अनुभव सम्पन्न हुए और मानवीयता पूर्ण आचरण में स्थित हुए, और इसके बाद समाधान-समृद्धि पूर्वक जीने के स्वरूप में अपने परिवार को स्थापित किये – और अपने जीने को ही “प्रमाण” के स्वरूप में घोषित किया और प्रस्तुत किया.  इस तरह परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था योजना का सूत्रपात सबसे पहले हुआ.  मानवीयता पूर्ण आचरण का ही विस्तार है - दस सोपानीय परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था.  बाबा जी ने स्वयं उसके सूत्र-व्याख्या स्वरूप में शरीर यात्रा पर्यंत जिया.
 
 उसके बाद उन्होंने अनुसंधान पूर्वक प्राप्त समझ/ज्ञान/जानकारी का भाषाकरण शुरू किया.  इस तरह मानवीयता पूर्ण आचरण के साथ भाषा/परिभाषा जुडी.  यह दूसरे लोगों के लिए अध्ययन की वस्तु बनी.  इस तरह उन्होंने अनुभवमूलक विधि से अनुभवगामी पद्दति को तैयार किया.  पूरा वांग्मय दर्शन, वाद, शास्त्र, संविधान को लिखा गया.  साथ में परिभाषा संहिता को जोड़ा गया – इसमें शब्द परंपरा से लिए गए लेकिन उनका अर्थ उन्होंने इस विकल्प के अनुसार परिभाषित किया.  इस पूरे वांग्मय को “चेतना विकास - मूल्य शिक्षा” की वस्तु कहा और बताया कि यह मध्यस्थ दर्शन पर आधारित विकल्पात्मक शिक्षा की मूल वस्तु है.  उनके साथ जिज्ञासु जो जुड़े उन्होंने उनको इसका अध्ययन कराना शुरू कर दिया.  इस तरह शिक्षा के मानवीयकरण योजना के स्वरूप का सूत्र-पात हुआ.  आगे चल के उन्होंने अभ्युदय संस्थान अछोटी में अध्ययन शिविरों की शुरुआत कर दी, जो बाद में अन्य स्थानों पर भी शुरू हो गए. 

तीसरी स्थिति में उन्होंने अब जन संपर्क शुरू किया.   यह बात हर मानव, चाहे वह ज्ञानी हो, विज्ञानी हो, अज्ञानी हो – उसको संप्रेषित होती है या नहीं?  उन्होंने स्वयं जीवन विद्या शिविरों के प्रबोधन की शुरुआत की.  “जीवन विद्या – एक परिचय” पुस्तक उनके द्वारा प्रबोधित एक शिविर ही लिपिबद्ध है.  इस तरह उन्होंने जीवन विद्या योजना का सूत्रपात किया.  साथ ही उन्होंने “जीवन विद्या – अध्ययन बिंदु” नाम की पुस्तिका लिखी – जीवन विद्या के प्रबोधकों के मार्गदर्शन के लिए. 

इस तरह संक्षेप में –

परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था योजना की शुरुआत = मानवीयता पूर्ण आचरण
शिक्षा का मानवीयकरण योजना की शुरुआत = मानवीयता पूर्ण आचरण + भाषा
जीवन विद्या योजना की शुरुआत = मानवीयता पूर्ण आचरण + भाषा + जनसंपर्क

लोकव्यापीकरण में तीनो योजनाओं का अपना महत्त्व है, और ये तीनो योजनायें साथ-साथ हैं, इनकी एक-दूसरे पर निर्भरता है.  इसमें केंद्र में है - परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था योजना.  इसी व्यवस्था के अंतर्गत या इस व्यवस्था के आश्रय में मानवीयकृत शिक्षा है, जहाँ शोध होगा और उस शोध की उपलब्धियां जीवन विद्या योजना द्वारा जनसंपर्क पूर्वक जन सामान्य तक पहुंचेगी.  जीवन विद्या योजना अपने में कोई स्वतन्त्र योजना नहीं है – यह अन्य दोनों योजनाओं के आश्रय में है. 

व्यवस्था आचरण का ही फैलाव है.  व्यवस्था और शिक्षा अन्योन्याश्रित है.  व्यवस्था के अंतर्गत शिक्षा है, और शिक्षा व्यवस्था के लिए स्त्रोत है.  यहाँ इस बात पर ध्यान देने की आवश्यकता है कि यह विकल्पात्मक शिक्षा और विकल्पात्मक व्यवस्था की बात है न कि उसकी जो अभी संसार में व्यवस्था और शिक्षा के नाम पर चल रहा है.  दस सोपानीय परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था के अंतर्गत ही इस विकल्पात्मक शिक्षा के सोपानों की भी पहचान है.  जीवन विद्या योजना एक तरह से इस विकल्पात्मक शिक्षा और व्यवस्था के लिए एक induction program है – जिसमे दर्शन की अवधारणाओं और इस विकल्पात्मक शिक्षा और व्यवस्था का एक परिचय है.  जीवन विद्या शिविर का प्रयोजन है – नए संपर्क में आये लोगों को मध्यस्थ दर्शन के अध्ययन से जोड़ना.  मध्यस्थ दर्शन का अध्ययन इसके अनुरूप जीने के वातावरण में संभव है.  दस सोपानीय व्यवस्था के अंतर्गत जीने का अभ्यास करते हुए ही मध्यस्थ दर्शन का अध्ययन संभव है. 

- राकेश गुप्ता (मध्यस्थ दर्शन के अध्ययन क्रम में प्रस्तुत.  इसमें सुधार की सम्भावना है - आपके सुझाव अपेक्षित हैं)

Tuesday, September 4, 2018

सत्संग

सत्संग का प्रमाण होता ही है.  सत्य के प्रति जो जिज्ञासा तृप्त हो गया या समझ में आ गया तो सत्संग हुआ.  समझ में नहीं आया तो सत्संग नहीं हुआ, प्रयत्न हुआ.

सत्य के बारे में बातचीत करना सत्संग नहीं है.  सत्य को समझने की जिज्ञासा रखने वाला हो और सत्य को समझाने वाला हो - फिर समझने वाले को समझाया हुआ यदि समझ में आ जाता है तो सत्संग हुआ.  यदि नहीं समझ आया तो सत्संग शेष है, प्रयत्न है.

(१) शब्द के आधार पर सत्संग
(२) शब्द के अर्थ के आधार पर सत्संग
(३) अनुभव के आधार पर सत्संग

अनुभव के आधार पर सत्संग पूरा होता है.  शब्द के आधार पर सत्संग करने की बात आदिकाल से है.  शब्द के अर्थ पर हम गए नहीं.  पहली सीढ़ी हम चढ़ चुके हैं, बाकी दो सीढियाँ चढ़ना बचा हुआ है.

प्रश्न: सत्य को समझे होने का प्रमाण क्या होगा?

उत्तर: समाधान.  सत्य समझ में आ गया तो सर्वतोमुखी समाधान होता ही है.  इसको "अभ्युदय" नाम दिया.  अभ्युदय शब्द वैदिक परंपरा से है.  शब्द परंपरा से हैं, परिभाषा मैंने दी है.  जिसकी इच्छा है वह अध्ययन करेगा.  जिसकी इच्छा नहीं है वह अध्ययन नहीं करेगा.  अध्ययन करने की इच्छा और अध्ययन कराने की ताकत दोनों की आवश्यकता है.  इन दोनों के योगफल में ही अध्ययन है.

प्रश्न:  मानव में समझने की इच्छा का कारण क्या है?

उत्तर: मानव सुख की निरंतरता चाहता है.  शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध इन्द्रियों में सुख भासता है.  इसकी निरंतरता चाहिए - लेकिन संवेदनाओं में सुख की निरंतरता नहीं है.  सुख की निरंतरता की चाहत और उसका प्रमाण केवल मानव में ही है.  सच्चाई में सुख की निरंतरता है, इस परिकल्पना के आधार पर सत्य को समझने की जिज्ञासा है.

प्रश्न: मानव अपनी जिज्ञासा को कैसे पहचान सकता है?

उत्तर: अनुभव मूलक विधि से जीता हुआ व्यक्ति सामने व्यक्ति की जिज्ञासा को समझ सकता है.  सामने व्यक्ति को जब समझ में आता है तब उसको पता चलता है उसकी जिज्ञासा क्या थी और उस जिज्ञासा का उत्तर क्या था.  यही एक छोटी से दीवार है जिसको नाकना है.  जिज्ञासा ही पात्रता है, उसी के आधार पर ग्रहण होता है.  अभी अभिभावक बच्चों की जिज्ञासा को पहचान नहीं पाते हैं, उसको समझ से भर नहीं पाते हैं - इसीलिये बच्चे जैसे ही बड़े होते हैं माँ-बाप से दूर हो जाते हैं. 

हर बच्चा जन्म से ही न्याय का याचक, सही कार्य-व्यवहार करने का इच्छुक और सत्य वक्ता होता है.  बचपन में यह जो जिज्ञासा रहता है वह बड़े होते होते कम हो जाता है.  परंपरा से काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य के प्रभाव से यह कम हो जाता है.

प्रश्न: क्या सभी बच्चों में जिज्ञासा समान रहती है या हरेक में उनके प्रारब्ध के अनुसार जिज्ञासा होती है?

उत्तर: पहले सत्य को समझने के लिए जो परिश्रम किया वो तो रहेगा ही.  फिर सत्य को समझाने के लिए पूरी बात यहाँ है.

प्रश्न: अनुभव होते तक विद्यार्थी जो कुछ भी "करता है", क्या वह गुरु के प्रभाव में करता है या अपनी स्वीकृति से करता है?

उत्तर: अपनी स्वीकृति से.  गुरु का प्रभाव समझाने तक ही है.  समझ के अनुसार आदमी अपना कार्यक्रम बनाता है.  इससे न ये कम होता है, न ज्यादा होता है.

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २०११, अमरकंटक)

Saturday, September 1, 2018

अध्यास और शक्तियों का अंतर्नियोजन

आपने लिखा है -"जो चैतन्य है वह पहले जड़ था, चैतन्य में जो कुछ भी अध्यास की रेखाएं हैं वे अंकित हैं ही.  यही कारण है कि चैतन्य इकाई अग्रिम विकास चाहती है."  इसको और स्पष्ट कीजिये.

उत्तर: अंकित रहने का मतलब है - जड़ प्रकृति को चैतन्य प्रकृति (जीवन) पहचान सकता है.  चैतन्य द्वारा जड़ को पहचान सकने की ताकत को अध्यास नाम दिया है.

जड़ ही विकसित हो कर चैतन्य पद में संक्रमित हुआ है.  जैसे - जड़ परमाणु अंशों से गठित हैं वैसे ही चैतन्य (जीवन) परमाणु भी अंशों से गठित हैं.  चैतन्य (जीवन) में गठन की तृप्ति है.  जड़ से चैतन्य तो हो गया, पर चैतन्य होने का प्रमाण नहीं हुआ.  यही चैतन्य में अतृप्ति है.  चैतन्य तृप्ति का स्वरूप है - क्रियापूर्णता और आचरणपूर्णता.  इसीलिये चैतन्य (जीवन) अग्रिम विकास के लिए प्रयत्नशील है.

अध्यास की परिभाषा आपने दी है - "मानसिक स्वीकृति सहित संवेदनाओं के अनुकूलता में शारीरिक क्रिया से जो प्रक्रियाएं संपन्न होती हैं उसकी अध्यास संज्ञा है".  इस परिभाषा को समझाइये.

उत्तर: जीवन द्वारा शरीर को जीवंत बनाने पर संवेदनाएं शरीर द्वारा व्यक्त हुई.  जिससे जीवन ने शरीर को ही जीवन मान लिया.  यही मतलब है इस परिभाषा का.  जीवन में अध्यास से अग्रिम विकास के लिए उसका प्रवृत्त होना हो गया.  अब अग्रिम विकास के लिए आगे जो प्रयास होगा उसका आगे फल मिलेगा.

आपने आगे लिखा है - "जागृति के मूल में मानव कुल के हर इकाई में अपने शक्ति का अंतर्नियोजन आवश्यक है, क्योंकि इकाई की ऊर्जा के बहिर्गमन होने पर ह्रास परिलक्षित होता है तथा ऊर्जा के अन्तर्निहित होने पर जागृति परिलक्षित होती है.  अंतर्नियोजन का तात्पर्य स्वनिरीक्षण-परीक्षण पूर्वक निष्कर्ष निकालना और प्रमाणित करना ही है."  इसको और स्पष्ट कीजिये.

उत्तर: जीवन शक्तियां आशा, विचार, इच्छा, संकल्प स्वरूप में प्रवाहित हो रहे हैं.  तृप्ति के पहले ये शक्तियां यदि बहिर्गमन होती हैं तो वह तृप्ति के पक्ष को ह्रास करता है.  तृप्ति के लिए मानव प्रयत्नशील नहीं होता है, निष्ठा नहीं बनता है.  शक्तियों का अंतर्नियोजन = अध्ययन.  स्वयं का अध्ययन, जीवन का अध्ययन, शरीर का अध्ययन, मानव का अध्ययन, इसके मूल में सहअस्तित्व का अध्ययन, और इसके प्रयोजन रूप में मानवीयता पूर्ण आचरण का अध्ययन है.

- श्रद्धेय ए नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २००८, अमरकंटक)

Sunday, August 26, 2018

संवेदनशीलता से संज्ञानशीलता की ओर

अभी कल ही अपने कुछ मित्रों के साथ whatsapp पर एक बातचीत हो रही थी, जो मुझे लगता है मध्यस्थ दर्शन का अध्ययन कर रहे सभी विद्यार्थियों के लिए प्रासंगिक है.  इसीलिए सबके साथ साझा कर रहा हूँ.  आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतज़ार रहेगा.


These days I've been thinking about how Samvedansheelata may actually pertain to biochemical emotional dependencies in humans until we become aware of them. As our awareness of these increases, so does our conscious control and regulation of them.

आजकल मैं इस बारे में सोच रही हूँ कि संवेदनशीलता किस प्रकार मानव में होने वाली जैव-रासायनिक भावनात्मक निर्भरताओं से सम्बद्ध है, जबतक वे उनके बारे में सजग नहीं हो जाते.  (मुझे लगता है) जैसे जैसे उनके प्रति हम और सजग होते जाते हैं वैसे वैसे हम उनको इच्छा अनुसार नियंत्रित और संयमित कर सकते हैं.

मुझे जो इस बारे में अब तक पकड़ में आया है, वह इस प्रकार है... संवेदनशीलता को जीवन ज्ञान के बिना पूरा पहचाना नहीं जा सकता।  संवेदनशीलता  =  विचार + भावनाएं (feelings) + संवेदनाएं (sensations) + मेधस और ज्ञानवाही तंत्र (brain and neurological impulses) + क्रियावाही तंत्र का क्रियाकलाप (physiological responses).  विचार संवेदनशीलता का सबसे सूक्ष्म आयाम है।  विचार की एक स्थिति है जीवचेतना और दूसरी है मानवचेतना।  विचार का मूल या तो "शरीर" हो सकता है या "अनुभव".  विचार का मूल इन दो जगह पर ही बन सकता है।  अध्ययन विधि में हम अपने विचार का मानव चेतना के लक्ष्य के लिए ध्रुवीकरण कर रहे हैं।  ध्रुवीकरण के लिए अध्यापक का प्रमाण एक सिरा है और अपने मे ज्ञान की मूल चाहना दूसरा।  इनके योग में यह मंथन है।  जिसका फल अवधारणा बोध है।  तो संवेदनशीलता के पूरे फैलाव में जहां उपरोक्त हर आयाम का महत्त्व है और अपरिहार्य भागीदारी है, मध्यस्थ दर्शन के अध्ययन विधि में बाबा जी ने संवेदनशीलता के सूक्ष्मतम आयाम (विचार) को पकड़ा है.

अध्यापक का प्रमाण तो विद्यार्थी के लिए सूचना ही है, जिसे संवेदनशीलता के माध्यम से ही विद्यार्थी ग्रहण करता है। ऐसे में आप के अनुसार विद्यार्थी मानव चेतना में किस प्रकार ध्रुवीकृत हो सकता है? दूसरा ज्ञान की चाहना या आवश्यकता कैसे बनती है?

भैया इसको लेकर अपना अनुमान ही बता सकता हूँ।  अध्यापक में अनुभव प्रमाण एक स्थिति है, जो एक सच्चाई है।  इसके समकक्ष विद्यार्थी में उसके लिए उन कारण क्रियाओं में अपेक्षा बनी ही है।  विद्यार्थी का ध्यानाकर्षण हो जाना उसकी इन अपेक्षा वाली कारण क्रियाओं में संभावना उदय है।  यह संवेदनशीलता और सूचना से अधिक है।  लेकिन यह अपने मे पूरा नहीं है यह भी है।  तो विद्यार्थी केवल संवेदनशीलता और सूचना से ही नहीं जूझ रहा है।  उससे अधिक है, जो अगली स्थिति का भ्रूण स्वरूप है।

संवेदनशीलता व सूचना से जो "अधिक" है उसे क्या नाम देंगे?

जिज्ञासा

क्या जिज्ञासा संज्ञानशीलता है? क्योंकि संवेदनशीलता से अधिक तो संज्ञानशीलता ही है।

जिज्ञासा संज्ञानशीलता का भ्रूण स्वरूप है। बोध पूर्ण होते तक अध्यापक के संबंध के साथ ही उसका अस्तित्व पहचान में आता है।  उसके बिना नहीं।  तो इस स्थिति में चेतना विकास तो नहीं हुआ है, पर पिछले की जड़ें ढीली पड़ गयी हैं।  इस स्थिति में विद्यार्थी अध्यापक के वातावरण में अनुकरण विधि से सुरक्षित है, और ज्ञान के अर्थ में पोषण को प्राप्त कर रहा है।  वैसे ही जैसे गर्भ में शिशु रहता है।

आपके अनुसार आज जब अध्यापक सशरीर इस धरती पर उपलब्ध नही हैं और कोई भी विद्यार्थी मानव चेतना में संक्रमित होने का सत्यापन अथवा प्रमाण प्रस्तुत नही किया है, ऐसे में विद्यार्थी को ज्ञान पोषण कैसे प्राप्त होगा?

भैया - मेरे अनुसार इसकी संभावना बनी हुई है.  बाबा जी के सान्निध्य में जो लोग रहे, जिसमे हम भी शामिल हैं, उन सभी ने ज्ञान को लेकर पोषण प्राप्त किया ही है.  जब मैं ऐसे लोगों से मिलता हूँ तो मुझे तो उसमे कभी-कभी बाबा जी की ही छवि दिखती है.  जितना समर्थन एक दूसरे के साथ रहता है उससे खुशहाली होती है और जो बातें मेरी अनदेखी, अनसुनी रह गयी हैं - वे भरती हुई सी लगती हैं.  बाबा जी ने कहने में कमी नहीं की है, मैंने सुनने में कमी की है.  फिर उस मुद्दे पर जो बाबा जी ने कहा था, लिखा है - वह मुझे याद आ जाता है - और उसके प्रति मेरी स्वीकृति उतनी ही बन जाती है जैसे बाबा जी का प्रत्यक्ष साथ हो.  इस तरह मुझे विकल्प गोष्ठी और मनन गोष्ठी की quality वैसी ही लगती है जैसे बाबा जी के साथ संवाद करते हुए हुआ करती थी.  वैसे ही intensity!  मैं सोचता हूँ, हम सब लोग मिलके साक्षात्कार की वस्तु की पूरी तस्वीर को ग्रहण कर ही लिए होंगे. यदि नहीं तो पुनः समाधि-संयम के अलावा कोई रास्ता मानव जाति के पास है नहीं.  बाबा जी से इस पर जो पूछा गया था (श्रीराम भाई द्वारा) उसके उत्तर में उनका कहना था यदि अध्ययन विधि में पूरा विश्वास बन गया हो तो अध्यापक के जाने के बाद भी पार लग सकते हैं.

बढ़िया भैया, एक और स्पष्टीकरण चाहता हूँ, आपके अनुसार अब अध्यापक के सशरीर उपलब्ध न होते हुए अध्ययन विधि क्या है?

मुझे लगता है अध्ययन विधि तो वही है.  शब्द से अर्थ तक पहुंचना.  उसके साथ समाधान-समृद्धि के मॉडल का अनुकरण.  यथास्थिति में संतुलन बनाए रखते हुए.  पहले बाबा जी के अलावा और कोई दिखता नहीं था, अब और लोग भी दिखने लगे हैं.  बाबा जी के जाने के बाद जाग्रति का यह रास्ता बंद हो गया - ऐसा नहीं लगा. पहले जैसा ही है - कभी जल्दी-जल्दी गति, कभी धीरे-धीरे.

भैया समाधान समृद्धि का अनुकरण कैसे?

भैया - अनुकरण तो प्रमाण का ही होता है.   हम सभी के पास समाधान-समृद्धि को प्रमाणित करते हुए बाबा जी के स्वरूप का एक अंदाज है, जो हमारे लिए श्रेष्ठता का basic reference है, जो हमे अनुकरणीय लगता है.  उसके साथ जुडी हैं कुछ बातें जो बाबा जी ने कही-लिखी हैं, जी हैं पर हमने उनकी अनदेखी-अनसुनी की हैं (जो शायद दूसरे ने देख-सुन ली हों).  तो उस basic reference को अपने में यथावत बनाए रखते हुए, हम दूसरे के इसको लेकर होने वाले प्रयासों से भी अपनी अनुकरण की तस्वीर को भर सकते हैं.  इससे विकल्पात्मक सामाजिकता का उदय हो सकता है.

भैया मेरे सभी स्पष्टीकरणों को आपने बहुत ईमानदारी से उत्तरित किया उसके बहुत बहुत धन्यवाद, मैं इन सब मुद्दों पर सोच कर फिर से आपसे चर्चा करूंगा।

Thursday, August 2, 2018

दर्शन के लोकव्यापीकरण की दो Approaches

मानव जाति इस धरती पर जब से प्रकट हुआ तब से अब तक वह जीवचेतना में जिया है, मानवचेतना में जिया नहीं है.  जीवचेतना में संवेदनशीलता (शरीर मूलकता) को ही सर्वोच्च मूल्य माना जाता है.  अभी के जो भी systems बने हैं (जैसे – शिक्षा, स्वास्थ्य, व्यापार, उत्पादन, विनिमय) वे सभी संवेदनशीलता पर आधारित हैं, जो “अधूरी समझ” है.  इस अधूरी समझ से मानव जाति ने  अच्छे से अच्छे जितने भी डिजाईन/सिस्टम्स बनाए – वे व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र, अन्तर्राष्ट्र और प्रकृति के साथ व्यवस्था का समीकरण कर पाने में असमर्थ रहे हैं.  इन systems में अव्यवस्था से हुई समस्याओं से “पीड़ा” होना स्वाभाविक है.  इन्ही systems में कार्यरत/जिम्मेदार संवेदनशील लोगों का इस पीड़ा से मुक्ति पाने के लिए उपाय तलाशना, कार्यक्रम बनाना स्वाभाविक रहा.  AICTE का induction program, Technical Universities में Human Values Professional Ethics प्रोग्राम, दिल्ली सरकार द्वारा चलाया जाने वाला Happiness Curriculum Program इसके current examples हैं. 
 
सबसे पहली बात – ये सभी कार्यक्रम स्वागतीय हैं.  ये मानव में वर्तमान अव्यवस्था से पीड़ा / व्यवस्था की अपेक्षा / परिवर्तन की कामना के द्योतक हैं. साथ ही ये संसार के लिए मध्यस्थ दर्शन के परिचय के द्वार भी हैं.  इन्ही से ही वे व्यक्ति निकल के आयेंगे जो मध्यस्थ दर्शन को पूरा यथावत अध्ययन करके प्रमाणित करेंगे.  ध्यान से देखें तो हम स्वयं भी इसी विधि से इस दर्शन या बाबा जी से जुड़े.  दर्शन के लोकव्यापीकरण में इनकी अहम् भूमिका है.  निम्न प्रस्तुति को इन कार्यक्रमों और उनको संचालित करने वालों/प्रेरणा देने वालों की आलोचना नहीं माना जाए.  यहाँ आशय है - मध्यस्थ दर्शन के अध्ययन-अभ्यास में रत लोगों के इन कार्यक्रमों से जुड़ने की approaches को स्पष्ट करना.  फिर कौनसी approach लेना है कौनसी नहीं – इसमें हमारी स्वतंत्रता है.  कौनसी approach को किसमें विलय होना है – इसका भी अनुमान किया जा सकता है.  इसके दो ही approaches हों, ऐसा ज़रूरी नहीं है.  इन दो के बीच अनेक हो ही सकती हैं - किन्तु यह सही है कि "पूरे सही" में सारे "अधूरे सही" का अंततोगत्वा विलय होना निश्चित है.  

इन सभी कार्यक्रमों में साम्यता या इनके common traits:

(१) अभी systems में “शक्ति केन्द्रित शासन” ही प्रचलित है – इसलिए ये सभी कार्यक्रम शासन विधि से ही चलाये जाते हैं.
(२) इन कार्यक्रमों को चलाने वालों (शासन) का लक्ष्य है – इनके systems में शामिल लोगों को systems में ही निहित अव्यवस्था से होने वाली पीड़ा से राहत मिले.  इसके अलावा उनके परोक्ष लक्ष्य भी हो सकते हैं – जैसे व्यक्तिगत यश की कामना, गद्दी पर बने रहने की कामना आदि.
(३) ये कार्यक्रम मध्यस्थ दर्शन के पूरे vision (अखंड समाज सार्वभौम व्यवस्था) के अनुरूप systems में मूलभूत परिवर्तन को नहीं चाहते हैं.  यदि व्यक्तिगत रूप में शासन में बैठे लोग ऐसी कामना भी करते हों तो उसको वो अधिकारिक रूप में किसी मंच से स्पष्ट करने का साहस नहीं कर पाते हैं.  मध्यस्थ दर्शन और उसका पूरा vision उनको स्पष्ट हो – यह भी कहना मुश्किल है.
(४) कार्यक्रम कैसे चलेगा, क्या चलेगा, चलेगा या नहीं  – इसका पूरा control शासन के पास रहता है.  अधिकारी बदल जाने के बाद कार्यक्रम बदल सकता है, या बंद हो सकता है.  शासन के जिस स्तर से काम होता है उसके ऊपर का स्तर राजी न हो तो कार्यक्रम को कभी भी बंद किया जा सकता है, बदला जा सकता है.
(५) इन कार्यक्रमों की “सफलता” का मूल्यांकन शासन द्वारा इसी आधार पर होता है कि लोगों को अव्यवस्था से होने वाली पीड़ा से कितनी राहत मिली.  उनसे इस सफलता को सही से नापना संभव नहीं रहता, क्योंकि उनके पास सफलता का कोई absolute reference नहीं रहता.  इसलिए वे लोगों का general फीडबैक, दूसरे जगह पर पीड़ा से राहत के प्रयासों से तुलना, और अपनी general feeling से किये गए assessment को ही मूल्यांकन मान लेते हैं.  

मध्यस्थ दर्शन के अध्ययन-अभ्यास में रत लोगों के इन कार्यक्रमों से जुड़ने की दो approaches

Approach – 1: 

(१) इन कार्यक्रमों को चलाने की जिम्मेदारी/control शासन के अनुग्रह से स्वयं पर ले ली जाए.  या शासन में पद पर बैठे व्यक्तियों को बाहर से नियंत्रित किया जाए.
(२) कार्यक्रम को सफल बनाना लक्ष्य माना जाए, न कि दर्शन को!  अपने कार्यक्रम को किसी भी तरह सफल बनाने को ही “संकल्प” माना जाए.  कार्यक्रम को अपना अस्तित्व माना जाए.  कार्यक्रम के मूल्यांकन को अपना मूल्यांकन माना जाए.
(३) कार्यक्रम की आवश्यकता अनुसार दर्शन के प्रस्तावों को selectively use किया जाए.  पूरी बात यथावत न ली जाए.  इसमें अपनी कल्पना से और पिछली परंपरा से या अन्य अभ्यास पद्दतियों के inputs को भी आवश्यकता अनुसार जोड़ा जाए, मिलाया जाए.  
(४) मध्यस्थ दर्शन को धरती पर मानव जाति के अब तक के इतिहास में आये आदर्शवाद और भौतिकवाद के “विकल्प” स्वरूप में न माना जाए, न ऐसे प्रस्तुत किया जाए.  दर्शन के मूल में हुए अनुसंधान, उसके प्रणेता, और उसके पूरे संकल्प और vision के साकार होने में इस कार्यक्रम की उपयोगिता के लिंक को स्पष्ट न किया जाए.  
(५) दर्शन में दिए गए मूल्यांकन फ्रेमवर्क के अनुसार स्वयं की स्थिति को स्पष्ट न किया जाए.  
(६) कार्यक्रम की अनुकूलता के अनुसार दर्शन के लोकव्यापीकरण कार्यक्रम (जैसे – जीवन विद्या योजना, अध्ययन शिविर आदि) को अपने अनुसार डिजाईन कर लिया जाए.  जो अपने डिजाईन के अनुसार न हो, दर्शन के अन्य प्रबोधक आदि, उनको अपने कार्यक्रम में प्रवेश न होने दिया जाए.  
(७) अपने नाम और अपने narrative को आगे रखा जाए.  दर्शन का narrative पीछे या गौण कर दिया जाए.  “बाबा जी या दर्शन का नाम लिया तो प्रोग्राम ही बंद हो जाएगा”,  “हम जो कर रहे हैं, बता रहे हैं – यही सार बात है”, “वस्तु को पकड़ो, व्यक्ति को छोडो!”– यह बताया जाए.

Approach – 2: 

(१) इन कार्यक्रमों को चलाने की जिम्मेदारी को शासन और उसके तंत्र पर ही छोड़ा जाए.  अपनी जिम्मेदारी को दर्शन को यथावत प्रस्तुत करने तक ही रखा जाए.   
(२) यदि कार्यक्रम की दिशा दर्शन के vision और उसके स्त्रोत से पूरा जुड़ने की सम्भावना नहीं लगे तो उसको छोड़ दिया जाए. अपने जीने का कार्यक्रम यथावत बना ही रहता है.  संसार के साथ किस कार्यक्रम से जुड़ना है, किससे नहीं जुड़ना है – इसमें अपनी स्वतंत्रता रहे.
(३) मध्यस्थ दर्शन के विद्यार्थियों द्वारा अपना narrative इन कार्यक्रमों और उनकी परिस्थितियों के अनुसार बदला न जाए.  Root to Fruit connection को बनाए रखा जाए.  Root = साधना-समाधि-संयम विधि से श्री ए नागराज द्वारा अनुसंधान पूर्वक मध्यस्थ दर्शन सह-अस्तित्ववाद का उद्घाटन, मानव जाति के लिए अध्ययन पूर्वक जागृत होने का मार्ग, अखंड-समाज सार्वभौम व्यवस्था का vision, इसको साकार होने के लिए तीन योजनायें. 
Fruit = उन योजनाओं पर चलते हुए दस सोपानीय परिवार मूलक व्यवस्था में जीने का अभ्यास.  अनुकरण-अनुसरण पूर्वक अध्ययन-अभ्यास क्रम में शिक्षा और व्यवस्था को लेकर शोध किया जाना .  इन शोध के results को संसार के सामने स्त्रोत और अपने मूल्यांकन की ईमानदारी के साथ प्रस्तुत किया जाना.
(४) दस सोपानीय परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था के सोपानो को अपने जीने में स्थापित किया जाए.  पहले परिवार, फिर परिवार समूह, फिर ग्राम,and so on.  जहां इन सोपानो में स्वयं जीते हुए आवश्यकता के अनुसार reference institutions (शुद्ध बुद्ध संस्थान) को स्थापित किया जाए.
(५) कार्यक्रम को चलाने वालों को उनके सिस्टम्स में अखंडता-सार्वभौमता को पाने के लिए दर्शन पर आधारित मूलभूत परिवर्तनों/ सूत्रों को दिया जाए.  अभी सिस्टम्स में कार्यरत लोग जहां हैं, वहां से सार्वभौम मानव लक्ष्य तक पहुँचने के लिए उपाय/steps सुझाए जाए.  अपने reference institutions और जीने के प्रमाणों से उदाहरण दिया जाए.  दर्शन पर आधारित शोध के results को प्रस्तुत किया जाए.
(६) इस कार्यक्रम में संलग्न जो वर्तमान शासन के सिस्टम्स से निकल के पूरी तरह दर्शन को समझ के जीना चाहते हैं, उनके लिए अपने जैसे व्यवस्था में जीने के अवसर उपलब्ध कराये जाएँ.  हमारा जीने का मॉडल scalable हो.  स्थानीयता से जुड़ा हो.
(७) मध्यस्थ दर्शन के प्रस्तावों और उससे निर्गमित योजनाओं को यथावत प्रस्तावित किया जाए.  अभी के सिस्टम्स के documents में मध्यस्थ दर्शन के नाम, मूल अवधारणाओं और उसके प्रणेता के नाम को पहुँचाया जाए.  
(८) कार्यक्रम को चलाने वाले शासन तंत्र के लोग अपनी सफलता का स्वयं मूल्यांकन करें.  उनको जैसा समझ आया है, उसके अनुसार मध्यस्थ दर्शन के स्त्रोत और उनका अध्ययन करने वालों से जो प्रेरणा मिली उसका दर्शन को श्रेय देने या न देने में वे स्वतन्त्र रहे.  
(९) इस कार्यक्रम से जुड़े मध्यस्थ दर्शन के विद्यार्थी अपना मूल्यांकन इस अर्थ में करें कि वे दर्शन को कितना यथावत पहुंचा पाए.  कार्यक्रम का मूल्यांकन इस अर्थ में किया जाए कि इस कार्यक्रम से दर्शन की तीन योजनाओं के क्रियान्वयन में क्या प्रगति हुई.  इन कार्यक्रमों से कितने लोग वर्तमान सिस्टम्स से निकल के आये, दर्शन को यथावत अध्ययन करके अपने जीने में प्रमाणित करने के लिए.  शासन के सफलता के पैमानों से, या उनके द्वारा की गयी प्रशंसा से अपना मूल्यांकन न करें.

Tuesday, July 3, 2018

क्रिया को अलग करके अनुभव किया ही नहीं जा सकता.



प्रश्न:  क्या यह कहना सही होगा कि जागृति का मूल मुद्दा व्यापकता में अनुभव है?

उत्तर:  व्यापकता में सम्पूर्ण एक एक के सहअस्तित्व में होने का अनुभव है.  व्यापकता में हम तो हैं ही, चारों अवस्थाएं भी व्यापकता में हैं.  यही अनुभूति का सम्पूर्ण वस्तु है.  व्यापकता में अनुभव किया का मतलब है व्यापकता में सम्पूर्ण अस्तित्व का अनुभव किया.  चारो अवस्थाओं का अनुभव किया.  क्रिया को अलग करके अनुभव किया ही नहीं जा सकता.  यदि क्रिया को भुलावा दिया तो हमारा कोई कार्यक्रम ही नहीं है.  क्रिया को भुलावा देने का मतलब हम भी क्रिया से शून्य हो गए.  उसी का नाम है समाधि - या आशा, विचार, इच्छा का चुप हो जाना.

कौन कितने जन्मों में समाधि को प्राप्त करेगा इसको कहा नहीं जा सकता.  किन्तु अध्ययन विधि से एक ही शरीर यात्रा में मानव अपनी समझ को पूर्ण कर सकता है, प्रमाणित कर सकता है, जी सकता है.

आप भले ही इस प्रस्ताव को "अंतिम बात" न मानो.  आगे और भी अनुसंधान हो सकता है ऐसा मान लो.  किन्तु इस अनुसंधान से जो ज्ञात हुआ उसको हृदयंगम करने के बाद ही तो आप इसके आगे कुछ करोगे?  जैसे - मैंने वैदिक विचार को पूरा हृदयंगम किया, फिर उसमे छेद दिखा, उसको पूरा करने के लिए मैंने अनुसन्धान किया.  मेरे प्रस्तुति में कोई छेद दिखता है तो उसको भरने का अर्हता आगे पुण्यशील व्यक्तियों में होगा ही.

आगे की पीढ़ी हमसे अच्छे ही होंगे.  यह केवल उत्साहित करने के लिए नहीं कह रहे हैं, यह सच्चाई भी है.

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (मार्च २००८, अमरकंटक)

स्वयंस्फूर्त और क्रमागत प्रकटन



संयम के लिए समाधि आवश्यक है.  समाधि के बिना संयम होता नहीं है.

प्रश्न: यदि धरती पर समाधि-संयम की विधि ही न विकसित हुई होती तो?

उत्तर: धरती पर मानव क्रमागत विधि से प्रकट हुआ है.  मानव के प्रकट होने के बाद धरती पर क्रमागत विधि से समाधि-संयम विधि का प्रकट होना स्वयंस्फूर्त आता ही है.  मैं जो अभी प्रकट कर रहा हूँ वह उसके आगे की कड़ी के रूप में स्वयंस्फूर्त है.  सच्चाई के प्रति जीवन में प्यास बना ही रहता है.  आशा के आधार पर मानव पहले जीना शुरू करता है, फिर विचार के आधार पर, फिर इच्छा के आधार पर.  इतने में मनाकार को साकार करना हो गया.  पर उससे तृप्ति नहीं मिला.  तृप्ति नहीं मिलने पर दर्द बढ़ना शुरू हुआ.  फिर उससे आगे की बात हुआ.

पहले भी समाधि धरती पर कई लोगों को हुआ.  किन्तु संयम हुआ जिसके फलन में मानव को जिम्मेदार बनाया हो, ऐसा नहीं हुआ.  यदि संयम किन्ही को हुआ भी हो तो उन्होंने ईश्वर को जिम्मेवार बताया, मानव को जिम्मेवार नहीं बताया और बनाया.  यह गलत निकल गया.  इसलिए अपनी बात को विकल्प स्वरूप में प्रस्तुत किया.  पुराना जो लिखा है उसको व्याख्या करने मैं नहीं गया.


- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (मार्च २००८, अमरकंटक)