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Friday, April 28, 2017

Wisdom Tradition

Wisdom is the thing for evidencing.  When I make others wise after becoming wise from you that becomes evidence of your wisdom.  This is the way wisdom flows into human tradition from one generation to next.   That which is not wisdom cannot flow into tradition or get transferred to next generation.  The content of wisdom has no variation among different individuals.  Wisdom would be same for all (wise) human beings.  The variation would only be in its presentation.  Therefore tradition of wisdom shall become stronger and more precise with every next generation.  With every new generation it would become easier to do the right (live wisely).  All human beings have this need.  Therefore one with wisdom alone becomes contented by offering their wisdom to next generation, and next generation also becomes contented this way.

- Excerpt from English Translation of Jeevan Vidya Ek Parichaya.

Orderly Living

Among the four Orders of nature, only human being has the need for understanding and thereby becoming resolved and happy.  Material order is regulated by way of constitution-conformation.   Bio order is regulated by way of seed-conformation.  Animal order has regulation by way of specie-conformation.  Their being orderly, as definiteness in their respective conducts, itself evidences regulation therein.  The need of definiteness in conduct is there in human being as well.  Human being becomes regulated by way of sanskar-conformation.  What is sanskar?  Sanskar is acceptance of wisdom.  Wisdom becomes evident in the form of Humane Conduct.  When human being becomes Wise, their living becomes Orderly and their Conduct becomes Humane.  When human being doesn’t have this capability of Orderly living, their Conduct is called Inhuman.  This is the demarcation of Humane Conduct from Inhumane Conduct.  Now we can decide whether we need Humane Conduct or not.  We naturally seek that which we need.  This is the link to human awakening.  Jeevan neither gets born, nor does it die.  Body gets formed and it gets deformed.  Jeevan wants to control human body in a way that is natural for jeevan.  The natural way of jeevan’s controlling human body is to do things for becoming happy.  This is different from animals, where jeevan controls animal body in hope to live on by way of specie-conformation.  Human being wants to live with happiness, but he suffers when he tries to live like animals.  That is all there is to it.

- Excerpt from English Translation of Jeevan Vidya - Ek Parichaya 

Wednesday, April 26, 2017

अस्तित्व मूलक मानव केंद्रित चिंतन का आधार

भय से मुक्ति हर मानव की आवश्यकता है.  हर मानव चाहता है कि भय न रहे.  हर मानव कहीं न कहीं चाहता है कि हम विश्वास पूर्वक जी सकें।  यह बात मानव में निहित है.  जब तक भय है तब तक अपने में विश्वास कहाँ है?  भय के स्थान पर मानव समाधान-समृद्धि पूर्वक जी सकता है.  इसको मैंने समझ लिया और जी लिया।  इसके बाद "अस्तित्व मूलक मानव केंद्रित चिंतन" को प्रस्तुत किया।  अस्तित्व तो था ही, मानव भी था ही - अस्तित्व में अनुभव पूर्वक मानव के जीने के सूत्र, सुख को अनुभव करने के सूत्र, समाधानित होने के सूत्र, समृद्ध होने के सूत्र, वर्तमान में विश्वास करने के सूत्र, सहअस्तित्व (सार्वभौम व्यवस्था) में जीने के सूत्र को हासिल कर लिया।  मानव ही इन सूत्रों की व्याख्या अपने जीने में करता है.  इस ढंग से वर्तमान में प्रमाणित होने के धरातल से अस्तित्व मूलक मानव केंद्रित चिंतन का आधार बना.

अस्तित्व एक ध्रुव है - जो मूल है, अस्तित्व में जागृति दूसरा ध्रुव है - जो फल है.  मूल भी सहअस्तित्व है, फल भी सहअस्तित्व है. अब यह जाँच सकते हैं, मानव क्या जागृति के अनुरूप जी रहा है या नहीं?  जीने के लिए तत्पर है या नहीं?

हर मानव अस्तित्व मूलक मानव केंद्रित चिंतन के अध्ययन पूर्वक समाधानित होगा तथा अनुभवमूलक विधि से परिवार में समृद्धि, समाज में अभय और राष्ट्र में सहअस्तित्व (सार्वभौम व्यवस्था) को प्रमाणित करेगा।

- श्री ए नागराज के साथ संवाद पर आधारित (आंवरी १९९९)

Tuesday, April 25, 2017

ईश्वरवाद की समीक्षा

जिज्ञासा के लिए सबसे बाधक तत्व यदि कोई है तो वह है "भय".  ईश्वरवाद को हम जब तक ओढ़े रहेंगे तब तक हम भय से मुक्ति नहीं पाएंगे।  ईश्वरवाद का मतलब है - "ईश्वर सब कुछ करता है."  इस भ्रम को छोड़ देना चाहिए।  ईश्वर की ताकत से ही हम सब भरे हैं, जिसको उपयोग करके हम समाधानित हो सकते हैं, समृद्ध हो सकते हैं - इस ढंग से सोचने की आवश्यकता है.  यह सहअस्तित्ववादी विचार का मूल रूप है.

ईश्वरवादी विधि में सोचा गया - "ईश्वर ही सब कुछ करता है."  इससे मानव का कोई जिम्मेदारी ही नहीं रहा.  हर क्षण ईश्वर से डरते रहो, डर के ईश्वर से प्रार्थना करते रहो.  जो कुछ भी हो रहा है, उन्ही की मर्जी से हो रहा है - ऐसा मानो।  मर गए तो इसका मतलब है ईश्वर रूठ गए.  जी गए तो ईश्वर की कृपा रही.  ऐसी हम व्याख्या देने लगे.  इस तरह डर-भय में जीने वाली बात ईश्वरवाद से आयी.

आदर्शवादी विधि से असंख्य कथाएँ लिखित रूप में आ चुकी हैं.  नर्क के प्रति भय पैदा करना, स्वर्ग के प्रति प्रलोभन पैदा करना - इसी अर्थ में सारी आदर्शवादी कथायें लिखी गयी हैं.

आदर्शवाद मानव को ज्ञानावस्था की इकाई के रूप में पहचान नहीं पाया और मानव को भी एक जीव ही कहा.  जीव में स्वाभाविक रूप से भय की प्रवृत्ति होती है, ऐसा बताये।  भय से मुक्त होने के लिए 'आश्रय' की आवश्यकता होना बताया गया.  मूल आश्रय ईश्वर होना बताया गया.  ईश्वर ही सबके भय को दूर करने वाला है, उनकी कृपा होने की आवश्यकता है - ऐसे ले गए.  इसकी दो शाखाएं निकली - पहले ज्ञान ही एक मात्र बात थी, बाद में भक्ति को भी लोकमान्यता मिली।  भक्ति से भी भय से मुक्ति हो जाती है - ऐसी परिकल्पना दी गयी.  कौन भय से छुड़ायेगा?  इस प्रश्न के उत्तर में ईश्वर के स्थान पर देवी-देवता आ गए.  देवी-देवता को प्रमाणित करने वाला कोई नहीं है, किन्तु देवी-देवता से भय-मुक्ति हो जाएगा - ऐसा सबके मन में भरे.  भय को मानव की स्वाभाविक गति बताया गया.  

कोई भयभीत आदमी ईश्वर को वर करके भय मुक्त हो गया हो, ऐसा प्रमाण मिला नहीं।  न ही कोई व्यक्ति ऐसा घोषणा कर पाया कि मैं भय से मुक्त हो गया हूँ, भय मुक्त विधि से जी रहा हूँ.  जो अपने को भय से मुक्त हो गया मानते हैं, ऐसे "सिद्ध" कहलाने वाले भी ईश्वर से प्रार्थना करते हैं - "हमको भय से मुक्ति कराओ, दरिद्रता से छुडाओ!"  और जो सिद्ध नहीं हुए हैं, उनको भी ऐसे ही प्रार्थना करना है!  फिर क्या फर्क पड़ा?

ईश्वर है तो वह वस्तु क्या है?  ईश्वर वस्तु (जो कोई वास्तविकता को व्यक्त करे) है या केवल शब्द या भाषा ही है?

ईश्वरवादी विधि में शब्द को प्रमाण माना, वस्तु को प्रमाण माना ही नहीं!  यह ऐसा ही है, जैसे मैं आपको कहूं आप गौण हैं, आपका नाम प्रधान है.  इस प्रकार की बातें आने से मानव और गुमराह हो गया.  मैं अपनी मूर्खता वश, या हठ वश, या परिस्थिति वश, या स्वविवेक वश, या नियति वश कहीं न कहीं इसको लांघ गया.  मैंने सोचा - यह तो कहीं गड़बड़ है, इसकी स्पष्ट रूपरेखा होना आवश्यक है.

ईश्वरवाद के अभ्यास, साधना, योग आदि उपक्रमों से मैं गुजरा हूँ.  मैंने यह निष्कर्ष निकाला - ये सारे उपक्रम, अभ्यास विधियों का उपयोग करना कोई अनुचित नहीं है यदि समझदारी को प्राप्त करना लक्ष्य हो तो.  यदि समझदारी लक्ष्य नहीं है, केवल पूजा-पाठ, यज्ञ-हवन, जप-तप आदि करने को ही समझदारी का प्रमाण बताना चाहेंगे तो वह सार्थक नहीं होगा।

- श्री ए नागराज के साथ संवाद पर आधारित (आंवरी १९९९)   

जीवन बल और शक्ति

Sunday, April 23, 2017

जब समझ रहे हो उस समय समझने पर ध्यान दो

सत्ता में सम्पृक्तता ही जीवन में ज्ञान के प्राप्त रहने का आधार  है.  ज्ञान प्रयत्न से प्राप्त नहीं होता।  ज्ञान प्राप्त रहता ही है.  ज्ञान संपन्न होने के लिए मानव को कोई प्रयत्न नहीं करना है.  प्राप्त ज्ञान में मानव को अनुभव करना है.  प्राप्त  ज्ञान को कार्य रूप में परिणित करने के लिए मानव को प्रयत्न करना होता है.  शरीर द्वारा ज्ञान को प्रमाण रूप में प्रस्तुत करने के लिए पूरा अध्ययन है.  अध्ययन ही अभ्यास या साधना है.

अध्ययन या समझना ज्ञान में अनुभव करने के लिए एक synchronization process है.  ज्ञान को अभिव्यक्त करना एक expansion process है.  समझते समय "इसको अभिव्यक्त कैसे करेंगे", इसमें आपका ध्यान रहता है तो आप कभी समझ नहीं पाएंगे।  जब समझ रहे हो उस समय समझने पर ध्यान दो, न कि दूसरों को इसे कैसे बताना है उस पर.  अध्यवसायिक विधि में रुकावट वहीं है.

समझने के लिए ध्यान देना होता है.  समझने के बाद ध्यान बना रहता है.  अध्ययन के लिए मन लगाते हैं तभी समझ में आता है.

- बाबा श्री ए नागराज के साथ संवाद पर आधारित (अछोटी, जुलाई २०११)

Tuesday, April 18, 2017

भाषा की शैली

प्रश्न: आपकी भाषा शैली के बारे में कुछ बताइये.  हम दर्शन को दूसरी भाषाओँ में ले जाते समय किन बातों का ध्यान रखें?

भाषा अपने में स्वतन्त्र नहीं है, मानव द्वारा रचित शैली द्वारा नियंत्रित है.  शैली का एक आयाम है - कर्ता, कारण, कार्य, फल-परिणाम इनमे से किसको महत्त्व या प्राथमिकता देनी है उसको पहले रखना.
दर्शन में कारण को महत्त्व दिया है.  वाद में कर्ता को महत्त्व दिया है.  शास्त्र में कार्य को महत्त्व दिया है.  संविधान में फल-परिणाम को महत्त्व दिया है.

लिंग के आधार पर विभक्तियों को कम या समाप्त कर दिया.  इस प्रस्ताव को दूसरी भाषाओँ में ले जाते समय इस बात का ध्यान रहे.

प्रश्न:  शैली क्या समय के साथ बदलती है?

मूल वस्तु बदलता नहीं है, उसको बताने का तरीका समय के साथ बदल जाता है.

प्रश्न:  आपने अपनी समझ को बताने के लिए शब्दों का चुनाव कैसे किया?

उत्तर:  मैंने जब वस्तु को देखा तो उसको बताने के लिए नाम अपने आप से मुझ में आने लगा.  शब्द को मैंने बुलाया नहीं, शब्द अपने आप से आने लगा.  उसमें से एक शब्द को लगा दिया.

मैंने प्रयत्न पूर्वक इस दर्शन को व्यक्त किया, ऐसा नहीं है.  यह स्वाभाविक रूप में हुआ.  समझने के बाद सबको ऐसा ही होगा.  समझ के लिखा जाए तो लाभ होगा.

-श्री ए नागराज के साथ संवाद  पर आधारित (अप्रैल २०१०, अमरकंटक)