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Friday, February 23, 2018

स्वत्व - स्वतंत्रता - स्वराज्य

- श्रद्धेय नागराज जी के उदबोधन से (जीवन विद्या सम्मलेन २००६, कानपुर)

अध्ययन - अभ्यास - अनुभव

- श्रद्धेय नागराज जी के उदबोधन से (जीवन विद्या सम्मलेन २००६)

अध्ययन की आवश्यकता

आदर्शवाद और भौतिकवाद का विकल्प

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद (जनवरी २००७, अमरकंटक)

Thursday, February 22, 2018

आप चाहें तो अभी समझ सकते हैं

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक)

इतिहास में अभी तक मानव द्वारा प्रकृति के साथ पूरकता की पहचान नहीं हुई.

प्रश्न:  क्या मानव अपने इतिहास में प्रकृति के साथ अपनी पूरकता के अर्थ में अपने 'आहार', 'आवास' और 'अलंकार' को पहचान पाया?

उत्तर:  आयुर्वेद और वेदविचार भी मानवीय आहार का निर्णय नहीं कर पाया.  मानव को शाकाहार करना चाहिए या मांसाहार इस निर्णय पर नहीं पहुँच पाया.  जीव चेतना में रहते हुए आहार का निर्णय करना बनता ही नहीं है.  मानव स्वयं को जीव ही माना है, और जीव दोनों प्रकार के आहार करते दिखते हैं तो मानव ने भी दोनों प्रकार के आहार करना शुरू कर दिया.  उसके साथ नशाखोरी का अभ्यास जुड़ गया.

आवास और अलंकार को लेकर मानव ने एक से बढ़ कर एक चीजों को तैयार किया, किन्तु वह सब 'सुविधा' के अर्थ में रहा न कि 'पूरकता' के अर्थ में.  मानव प्रकृति को नाश करने गया न कि उसके साथ पूरक बनने.  जीव चेतना पर्यंत पूरकता की बात ही नहीं है.


 - श्री ए नागराज के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक)

Sunday, February 18, 2018

न्याय - धर्म - सत्य

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद (जनवरी २००७, अमरकंटक)