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Sunday, December 25, 2016

मानव समाज और शिक्षा का महत्त्व


- जीवन विद्या राष्ट्रीय सम्मलेन, २०१६, सरदारशहर

शिक्षा और व्यवस्था की अविभाज्यता


- जीवन विद्या राष्ट्रीय सम्मलेन, २०१६, सरदारशहर

मानवीय शिक्षा की प्रस्तावना

- जीवन विद्या राष्ट्रीय सम्मलेन - २०१६, सरदारशहर

Saturday, December 24, 2016

अनुसंधान यात्रा - मानव की धरोहर



- जीवन विद्या राष्ट्रीय सम्मलेन २०१६, सरदारशहर

Thursday, December 22, 2016

ध्यान

मैंने यह भी निष्कर्ष निकाला है - मैंने जो तपस्या किया या साधना किया, वह विगत में जो यती, सती, संत, तपस्वी किए हैं - उससे "बड़ा" कुछ नहीं है। मैंने कोई "अपूर्व" घोर तपस्या, घोर साधना की हो - ऐसा कुछ नहीं है। सामान्य ढंग से जो मुझ से बन पड़ा, करना बना - उतना ही मैं किया हूँ। जिसमें मुझे लेश मात्र भी कष्ट नहीं हुआ। दुःख नहीं हुआ। अभाव का पीड़ा नहीं हुआ। न कोई प्रताड़ना हुई। क्यों नहीं हुआ? शायद मैं अपने लक्ष्य से सम्मोहित हो गया था। अपने लक्ष्य के प्रति मेरी एकाग्रता में ये सब विलय हो गए या निष्प्रभावी हो गए - ऐसा मैं मानता हूँ।

मैंने जो अनुभवगामी विधि या अध्ययन विधि तैयार की - उसका मेरी साधना-प्रक्रिया से कोई लेन-देन नहीं है। अध्ययन-विधि उस सब को छूता भी नहीं है। संयम के बाद जो मुझे उपलब्धि हुई वह आपके हाथ लग रहा है।

प्रश्न: ध्यान की जो अनेक विधियां प्रचलित हैं, उनका प्रयोग क्या अध्ययन के लिए सहायक है?

उत्तर: वे कोई भी इसको छूती भी नहीं हैं। सारी जो प्रचलित ध्यान और अभ्यास की विधियां हैं - वे व्यक्ति की अहमता को बढ़ाने के लिए ही हैं। या सिद्धि प्राप्त करने के लिए हैं। या ऐसी परिस्थितयां पैदा करने के लिए हैं - जिससे दूसरों का सम्मान प्राप्त हो। उनसे न स्वयं का कोई प्रयोजन सिद्ध होता है, न संसार का कोई उपकार सिद्ध होता है।

समाधि, ध्यान प्रक्रियाओं के बारे में बात करने से अध्ययन में कोई सहयोग नहीं है। उसमें समय को बरबाद न किया जाए। अध्ययन, अध्ययन के बाद बोध, बोध के बाद अनुभव, अनुभव के बाद प्रमाण, प्रमाण के बाद व्यवस्था में जीने की बात सोचा जाए।

प्रश्न: आप (अस्तित्व के स्वरूप के बारे में) जो कहते हैं, वह मुझको दिखता नहीं है। 

उत्तर: आपको दिखता नहीं है - यह कोई "शिक्षा" नहीं है। आपको दिखता नहीं है - क्या यह कोई "संदेश" है?

- >
नहीं। 

आपको दिखता नहीं है - क्या यह अस्तित्व के स्वरूप के इस प्रस्ताव पर कोई "प्रश्न" है?

- >
नहीं।

फ़िर क्या चीज है यह?

- >
यह मेरी अभी की यथा-स्थिति है।

आपको दिखता नहीं है - क्योंकि आप ध्यान नहीं दिए। यही इसका उत्तर है। जैसे हम बैठे हैं, हमारे सामने से कई लोग निकल जाते हैं, और हम कई को देख नहीं पाते हैं। क्यों नहीं देख पाते - क्योंकि हमने उस ओर ध्यान नहीं दिया। इसके ऊपर और कोई तर्क नहीं किया जा सकता। न इस पर और कोई चर्चा से कोई उपलब्धि हो सकती है। आप ध्यान देंगे तो आप को दिखेगा। आप ध्यान नहीं देंगे तो आप को नहीं दिखेगा।

जब तक अस्तित्व के स्वरूप को देखने (समझने) की प्राथमिकता स्वयं में नहीं बनती, तब तक हमे उसका अनुभव नहीं होता। इसमें किसी पर आक्षेप नहीं है। न यह किसी की आलोचना है।

अध्ययन के लिए ध्यान देना होता है। अध्ययन पूर्वक अनुभव के बाद ध्यान बना ही रहता है।

 ध्यान देने का मतलब है - बुद्धि के अनुरूप में मन हो जाना, विचार हो जाना, इच्छा हो जाना।

मन जब तक तर्क करने में लगा रहेगा तब तक बुद्धि के अनुरूप होने के लिए नहीं जाएगा।

मन को बुद्धि के अनुरूप होने के लिए जो प्रयास है, अभ्यास है, वही पुरुषार्थ है, वही साधना है, वही अध्ययन है. 

आशा, विचार, इच्छा संयत होने के लिए प्रबल जिज्ञासा, प्राथमिकता पूर्वक अध्ययन ही एक मात्र विधि है.

 जो मैंने आपको समझाया, उसको और स्पष्ट करने के लिए आपमें और क्या प्रश्न है?

->
और कोई प्रश्न तो नहीं है। 

केवल इसको आत्म-सात करना ही शेष है, ?

->
हाँ!

आत्म-सात करना एक अभ्यास है। यही अध्ययन में ध्यान देने का मतलब है। आत्म-सात होने का मतलब है, जीवन में यह "साध्य" हो जाना। सह-अस्तित्व दर्शन ज्ञान, जीवन ज्ञान, मानवीयता पूर्ण आचरण ज्ञान - यह जीवन में, से प्रमाणित होना है। यही आत्म-सात होने का मतलब है। धीरे-धीरे आप इसको अभ्यास करेंगे, क्या इस पर मैं विश्वास करूँ?

->
हाँ!

मैंने आपके सामने अपना अनुभव प्रस्तुत किया। अब आपको अनुभव के लिए अध्ययन करना है, या नहीं करना है - उसमें आपकी स्वतंत्रता है।


-
श्री ए नागराज के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)

Tuesday, December 20, 2016

एक दृष्टान्त



भारतीय परंपरा से हमको संस्कृत जैसी प्रचण्ड भाषा धरोहर स्वरूप में मिल गयी.  इसका एक भाषा-विज्ञान है.  यदि यह भाषा न मिली होती तो इस समझ को सम्प्रेषित करने के लिए नयी भाषा का सृजन करना पड़ता। 

संस्कृत भाषा-विज्ञान के अनुसार व्यत्पत्ति के अनुसार शब्दों की परिभाषा की जाती है.  व्यत्पत्ति का एक उदाहरण : - "धर्म" एक शब्द है जिसकी व्यत्पत्ति धृ धातु से है.  धृ = धारणा।  इस तरह धर्म की परिभाषा हुई - धारण करने वाली क्रिया या धारण होने वाली वस्तु।  धारणा की व्याख्या जो शंकराचार्य जी किये हैं - "जो पहना जा सके, ओढ़ा जा सके, उतारा भी जा सके"   (इसी के समर्थन में भगवदगीता में लिखा है - "सभी धर्मों को छोड़ कर केवल मेरी शरण में आ जाओ!" )  अभी जो धर्मांतरण हो रहा है, इसी व्याख्या के आधार पर हो रहा है.  धर्म को लेकर जो यह बताया गया है इसको आप परिवर्तित करने का प्रयास करके देखो - कठिन है या सुलभ!  अब मध्यस्थ दर्शन से जो धर्म का अर्थ स्पष्ट होता है - "जिससे जिसका विलगीकरण न हो सके, वह उसका धर्म है."  इसके सामने पूर्व में "धर्म" और "धर्म परिवर्तन" को लेकर जो परंपरा में कहा गया है - उसका कुछ मतलब नहीं रह गया.  जबकि भारत को "धर्म परायण" कहा जाता है!!

श्रृंगेरी के जगद्गुरु श्री अभिनव विद्यातीर्थ ८० के दशक में यहाँ अमरकण्टक आये थे.  मैंने जिनको अपना आस्था का केंद्र स्वीकारा था - जगद्गुरु श्री चंद्रशेखर भारती - उन्हीं के वे शिष्य थे.  मैंने उनको अपना परिचय दिया तो वे मुझे पहचान लिए.  मेरे परिवार के लोगों ने ही उनके परमगुरु - श्री सच्चिदानंद शिवाभिनव नरसिम्हा भारती - को वेदान्त पढ़ाया था.  उन्होंने पूछा मैं यहाँ कैसे आ गया, तो मैंने उनको बताया कैसे मैं अपने गुरु के आज्ञा ले कर यहाँ साधना के लिए (१९५० में) आया और कैसे यहाँ आकर समाधि-संयम किया और इस दर्शन को पाया।  उन्होंने पूछा - "जो पाए उसको लिपिबद्ध भी किये हो या केवल उसको बोलते हो?"  मैंने उनको मानव व्यवहार दर्शन की एक प्रति दी.  उन्होंने २४-२७ घंटे बाद मुझे पुनः मिलने को कहा.  पुनः मिलते ही उन्होंने पहले यही कहा - "तुमने महत कार्य किया है."  इस अनुपम वाक्य का प्रयोग उन्होंने किया।  मैंने उनसे कहा - मैंने जो किया उसका आपने मूल्याँकन कर दिया। लेकिन मैंने क्या कर दिया है, क्या मैं आपके मुखारविंद से सुन सकता हूँ?

उन्होंने कहा - "जितने भी धरती पर धर्म-गद्दियाँ हैं, वे धर्म के लक्षणों का शिष्टानुमोदन नाम लेते हैं.  तुमने धर्म को अध्ययन की वस्तु बना दिया।  इसमें तर्क नहीं है.  इसको स्वीकारने के अलावा दूसरा कोई रास्ता नहीं है.  "मानव सुखधर्मी है" - इस प्रतिपादन के साथ आप क्या तर्क करोगे?  सुखधर्मी नहीं है - यही तर्क किया जा सकता है, जो टिकता नहीं है."

मैंने पूछा - "आपके मुखारविंद से ऐसा यदि सुनने में आता है तो क्या मैं यह पूरा दर्शन श्रृंगेरी पीठ को समर्पित कर दूं?  यदि आप इसको महत कार्य कहते हैं - तो इसमें आपकी क्या जिम्मेदारी बनती है?"

उन्होंने उत्तर दिया - "मेरी जिम्मेदारी यही बनता है - विगत में जो कुछ कहा गया है उसकी समीक्षा करें और इसको प्रबोधित करें।  किन्तु मैं जानता हूँ - अभी यदि मैं विगत को झूठ साबित करता हूँ तो यह अनास्था की ओर ले जाता है.  मैं यह भी जानता हूँ कि  मेरी आयु ७० वर्ष से अधिक हो गयी है और ज्यादा दिन मैं शरीर यात्रा में नहीं रहूँगा।  इन सबको जोड़ करके मैं देखता हूँ तो मैं इस जिम्मेदारी को लेकर चलने योग्य नहीं हूँ."

यदि कोई व्यक्ति सच्चा है, ईमानदार है - तो इससे ज्यादा वह क्या बोल सकता है?  फिर वे बोले -

"मेरी आँखों में यह दिखता है - तुम किसी धर्मगद्दी के पास मत जाओ, न किसी राजगद्दी के पास जाओ, न किसी शिक्षा गद्दी के पास जाओ.  तुम सीधे युवापीढ़ी के पास जाओ.  युवापीढ़ी में ही पुण्यशील जीवन इसे समझेंगे!  यह मेरा आशीर्वाद है.  तुम सफल हो कर रहोगे!  समझा हुआ, प्रमाणित हुआ व्यक्ति तुम्हारी आँखों के सामने तुम्हे दिखेगा।"

इससे बड़ा क्या आशीर्वाद होगा?  इससे बड़ा क्या परिपक्व बात होगा?  इससे ज्यादा क्या सटीक बात होगा?

- श्री ए नागराज के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)

Tuesday, December 13, 2016

जीवनी क्रम



जीव संसार जीवनी क्रम में है.  इसका प्रमाण है - गाय का बछड़ा गाय जैसा ही आचरण करता है.  वैसा ही वह खाता है, पीता है, दौड़ता है - जैसा पिछली पीढी की गाय का आचरण था.  यही बात बाघ में भी है.  धरती पर बाघ के प्रकटन के समय उसका जो आचरण था, वही आज भी है.  यही बात सभी जीवों के साथ है.  इस प्रकार अनेक प्रकार के जीवों के आचरण स्थापित हुए.  सभी जीवों के आचरण की परंपरा आज भी यथावत है.  जब तक मानव का हस्तक्षेप न हो, इनके आचरण में कोई व्यतिरेक नहीं होता।  मानव के हस्तक्षेप से उनके आचरण में विकृति ही होती है, सुकृति होती नहीं है.  जीवों में संकरीकरण से उनका वंश ही समाप्त हो जाता है.  संकरीकरण एक प्रजाति के जीवों का दूसरी प्रजाति के जीवों के साथ व्यभिचार कराना है - इस बात को ध्यान में लाने की आवश्यकता है.

"जीव संसार जीवनी क्रम में है" - इस बात को मानव ही समझता है, जीव-जानवर इस बात को नहीं समझता।  मानव इसलिए समझता है क्योंकि मानव हर वस्तु  को समझके उसके साथ व्यवहार करना चाहता है.  बिना समझे कोई व्यवहार करना नहीं चाहता है, आज की स्थिति में! 

प्रश्न:  कौनसा जीवन किस जीव प्रजाति के शरीर को चलाने योग्य है, इसके चुनाव की क्या प्रक्रिया होती है?

उत्तर:  हर जीवन का गतिपथ एक पुन्जाकार स्वरूप में होता है.  जीवन का पुन्जाकार अपने में एक 'स्वरूप' है, उस रूप के जीव-शरीर को वह 'अपना' मान लेता है.  पुन्जाकार जीवन की आशा-गति का स्वरूप है.  जीवन शरीर के साथ होने पर उस शरीर को जीवन मान लेता है.  शरीर को चलाते हुए भी जीवन अपने आपको शरीर होना मानता है, जीवन होना मानता नहीं है.  भ्रमित मानव में भी जीवन शरीर को जीवन मानता है, जीवन को जीवन मानता नहीं है.  भ्रम का मतलब इतना ही है. 

प्रश्न: मृत्यु के समय जब शरीर और जीवन का वियोग होता है तब क्या प्रक्रिया होती है?

उत्तर: जीवों में और मानव में मृत्यु की प्रक्रिया में भेद है. 

जीवों में मृत्यु  घटना:  रोगी/घायल शरीर को जीवन चला नहीं पाता है तो उसे छोड़ देता है. 

मानव में मृत्यु घटना:  शरीर अब चलने योग्य नहीं रहा, इसलिए उसको जीवन छोड़ता है.  मानव शरीर को जीवन जब छोड़ता है तो अपनी शरीर यात्रा का मूल्याँकन करता है.

प्रश्न:   चार विषय और पाँच संवेदनाओं का क्रियाकलाप जीवों में भी दिखता है और मानवों में भी.  फिर जीवों और मानवों में मौलिक भेद क्या है?  (reference)

उत्तर: जीवों में संवेदनाओं के प्रति जागृति नहीं होती।  जीव आहार-निद्रा-भय-मैथुन विषयों को पहचानते हैं और उनको करते हैं.  जीवों में संवेदनाएं चार विषयों के अर्थ में काम करती रहती हैं.

जीवों में "समृद्ध मेधस" होता है, लेकिन मानव में "समृद्धि-पूर्ण मेधस" होता है.  समृद्धि-पूर्ण मेधस के कारण मानव में जीवन द्वारा कल्पनाशीलता प्रकाशित होती है.  जो जीवों से मौलिकतः भिन्न है, जिसके आधार पर मानव ज्ञानावस्था में गण्य है. 

मानव पांच संवेदनाओं को राजी रखने के अर्थ में (या "रुचि" के लिए) चार विषयों के क्रियाकलाप को करता है.  संवेदनाओं के आधार पर मानव ने सर्वप्रथम ज्ञान को स्वीकारना शुरू किया।  मानव में पायी जाने वाली कल्पनाशीलता का यह पहला प्रभाव है.  मानव ने पहले जीवों के जैसा ही जीने का शुरुआत किया।  लेकिन संवेदनाओं को राजी करने के लिए जीने का अभ्यास करते-करते मानव ने जीवों से भिन्न जीना शुरू कर दिया।  इसके चलते मानव द्वारा मनाकार को साकार करना तो हो गया पर मनः स्वस्थता का भाग वीरान पड़ा रहा.   मानव की चेतना का स्तर "जीव चेतना" ही रहा. जीवचेतना में मानव दुखी/समस्याग्रस्त रहता है.  मानवचेतना में मानव सुखी/समाधानित रहता है.

मध्यस्थ दर्शन का अध्ययन मानव के जीवचेतना से मानवचेतना में संक्रमित होने के अर्थ में है. 

- श्री ए नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)

Sunday, December 11, 2016

अनेक शरीर यात्राएं !


प्रश्न:  क्या बहुत सारी जीव योनियों से गुजरने के बाद जीवन को मानव शरीर चलाने के लिए मिलता है?

उत्तर: जिसका प्रमाण नहीं, वह बात मुझे करना नहीं!  सप्तधातु से रचित शरीर हो, समृद्ध मेधस हो, और मानव के संकेतों को पहचानता हो - ऐसे जीवों में जीवन होता है. 

प्रश्न:  मानव की मृत्यु के बाद अगली शरीर यात्रा में उस जीवन को मानव शरीर ही मिलता है या कोई जीव शरीर भी मिल सकता है?

उत्तर: शरीर यात्रा समाप्त होने पर जीवन अपना मूल्यांकन करता है.  सुख-दुःख और सुरूप-कुरूप का स्वीकृति करते हुए जीवन शरीर को छोड़ता है.  इस शरीर यात्रा में जैसा रूप (शरीर वंश का आकार) था, वैसा ही रूप या उससे अच्छे रूप के प्रति स्वीकृति के साथ जीवन शरीर को छोड़ता है.  (जो उसकी अगली शरीर यात्रा का कारण बनता है) हर जीवन के साथ ऐसा है. 

प्रश्न:  आप किस प्रमाण के आधार पर कहते हैं कि शरीर यात्रा समाप्त होने पर जीवन अपना मूल्यांकन करता है?

उत्तर: मैंने समाधि को देखा है.  समाधि के समय जीवन शरीर को छोड़ा रहता है.  समाधि होने के पहले जीवन अपनी शरीर यात्रा का मूल्याँकन कर लेता है.  इस आधार पर मैं कहता हूँ कि शरीर छोड़ते समय जीवन अपना मूल्याँकन करता है. 

प्रश्न: शरीर छोड़ते हुए जीवन क्या मूल्याँकन करता है? 

उत्तर: शरीर यात्रा में पहली सांस से आखिरी सांस तक क्या "अच्छा लगा" और क्या "बुरा लगा" उसको जीवन स्वीकारता है.  जीव चेतना में जीते तक जीवन में 'सही' और 'गलत' का मूल्याँकन करने का आधार नहीं रहता है, इसलिए 'अच्छा लगने' और 'बुरा लगने' के आधार पर ही शरीर यात्रा का मूल्याँकन करता है.  शरीर यात्रा में एक सीमा तक ही संवेदनागत सुख या दुःख को भोगा या झेला जा सकता है, क्योंकि शरीर में उसको झेलने की एक सीमा होती है.  जबकि जीवन शरीर यात्रा में उस संवेदनागत सुख या दुःख की सीमा से अधिक का कर्म किया रह सकता है.  दो शरीर यात्राओं के बीच की अवधि में ऐसा जो सुख या दुःख भोगा नहीं गया होता है, उसको जीवन भोग लेता है.  उसको भोग लेने के बाद अगली शरीर यात्रा को आरम्भ करता है. 

प्रश्न:  अगली शरीर यात्रा कहाँ शुरू होगी, इसका कैसे निर्णय होता है?

उत्तर: भ्रम (जीव चेतना) में रहते तक जीवन में सुखी (अच्छा लगना) और दुखी (बुरा लगना) होने के लिए स्वयं का प्रवृत्ति रहता है.  भ्रमित रहते तक जीवन शरीर को ही जीवन मानता है.  जिस वातावरण में वह अपनी (शरीर मूलक) अनुकूलता को मानता है, वैसे वातावरण में शरीर यात्रा शुरू करता है.  दूसरे, अपने बंधु -बांधवों के बीच, फिर उनसे सम्बंधित लोगों में, फिर उस गाँव में, उस देश में, फिर सर्वदेश में.  इस क्रम से अगली शरीर यात्रा के स्थान का कारण बनता है.  पुनः शरीर यात्रा जब मानव परंपरा में शुरू होता है तो सुखी होने के लिए शुरू करता है.  परंपरा में सुखी होने का मार्ग न होने पर पुनः रोते -गाते शरीर यात्रा को अंत करता है.

प्रश्न: यदि मेरी जागृति की ओर गति शुरू हो गयी, लेकिन किसी कारणवश मेरी आकस्मिक मृत्यु हो जाती है तो मेरी अगली शरीर यात्रा कैसी होगी?

उत्तर:  जागृति की ओर शुरू किये हैं तो उनका अगला शरीर यात्रा मानव परंपरा में ही होगा।  जितना इस शरीर यात्रा में जागृति के लिए काम किये थे उससे आगे का प्रवृत्ति हो जाता है.  जिस भी वातावरण में जीवन शरीर यात्रा शुरू करे, उसको भेदते हुए जीवन अपनी अग्रिम गति के लिए जगह बना लेता है.  मेरे साथ भी वैसा ही हुआ! 

पिछली शरीर यात्रा की प्रवृत्ति के अनुसार ही अगली शरीर यात्रा शुरू होती है.  उस प्रवृत्ति का सही पक्ष को लेकर बीज समाप्त नहीं हुआ रहता है.  इस ढंग से जीवन का पीढ़ी दर पीढ़ी अच्छा होने (सुधरने) के लिए एक "सीढ़ी" बनी है.  पीढ़ी दर पीढ़ी अच्छा होने की सीढ़ी पर चढ़ते-चढ़ते आज मानव-जाति चेतना विकास के दरवाजे पर पहुँच गया!  चेतना विकास के अर्थ में यहाँ (मध्यस्थ दर्शन की) चर्चा शुरू हुई.  यदि चेतना विकास के लिए स्वीकृति होती है तो वह मरता नहीं है.  अगली शरीर यात्रा में और पुष्ट होता है.  सभी सकारात्मक स्वीकृतियों का पुष्टि इसी विधि से हुआ है.  अपनी प्रवृत्तियों के अनुरूप परिस्थितियों को पहचानने का गुण हर जीवन में होता है.  जीवन की प्रवृत्ति ही उसका पूर्व संस्कार है. 

प्रश्न: जीवन द्वारा बारम्बार शरीर यात्रा करने का उद्देश्य क्या है?

उत्तर: जीवन जागृति को प्रमाणित करने के उद्देश्य से बारम्बार शरीर यात्रा करता है.  मानव को कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार प्राप्त है, जिसके कारण मानव सुखी होने का प्रयास करता है.  जागृति के बिना उसका सुखी होना संभव नहीं है.  सुखी होने के लिए जीवन हर बार शरीर यात्रा आरम्भ करता है.  जब शरीर यात्रा में सुख हासिल नहीं कर पाता तो दुखी होता है.

प्रश्न: जीवन द्वारा जागृति को हासिल करने के लिए क्या उपाय है?  इस अनुसंधान के पहले जागृति को लेकर क्या उपाय था?

उत्तर: परंपरा स्वरूप में जागृति को हासिल करने का स्वरूप अभी तक कुछ नहीं है.  कोई एक व्यक्ति कभी कुछ पा गया हो तो उसको हम जानते नहीं हैं, वह गण्य होता नहीं है.  साधना विधि से जो कल्याण होने का आश्वासन दिया गया था, वह व्यक्ति के साथ ही चला गया.  साधना से उस व्यक्ति को जो उपलब्धि हुई होगी वह मानव परंपरा तक नहीं पहुँच पायी।  हम कुछ व्यक्तियों को पहुँचा हुआ मानते रहे, उनको प्रणाम/सम्मान करते रहे, पर पहुँचे हुए वे व्यक्ति जो पाए होंगे वह मानव परंपरा में आया नहीं।  अब वह व्यक्ति पहुँचा था या नहीं - इसका भी कोई प्रमाण नहीं है. 

अब मध्यस्थ दर्शन का प्रस्ताव मानव जाति के पास आ गया है, जिससे स्वयं में जागृति को पहचान सकते हैं. इसके पहले शिक्षा विधि से जागृति को पहचानने का कोई प्रस्ताव नहीं है. 

मध्यस्थ दर्शन का यह प्रस्ताव वर्तमान में जीने हेतु निष्कर्ष निकालने के लिए है, न कि मरने के बाद क्या होता है - इसको सोचने के लिए!



भ्रमित मानव को जब तक जीने का ज्ञान नहीं होगा तब तक उसको मरने का ज्ञान और मरने के बाद का ज्ञान नहीं हो सकता।  मेरे साथ भी वैसा ही हुआ.  जीना समझ में आने के बाद ही मरने के बाद क्या होता है - यह मुझे स्पष्ट हुआ.  उसके पहले नहीं!  जबकि मैंने प्रकृति में अनुभव किया है.  इससे ज्यादा क्या कहा जाए?

सिलसिला तो यही है - पहले जीना समझ में आये, फिर मरना समझ में आये, फिर मरने के बाद का समझ में आये.  अभी आदमी को न जीने का पता है न मरने का पता है.  जीना ही पता न हो तो मरना कैसे पता होगा? - यह सोचने का मुद्दा है. 

जीने को नियति माना जाए या मरने को?  इसमें आपका क्या कहना है?

जीने की जगह में अभी मानव भ्रमित है क्योंकि शरीर को जीवन मानके चला है.  जीवसंसार में भी वैसे ही जीवन शरीर को जीवन मानके जीने की आशा को व्यक्त करता है.  जीवों के लिए जीवचेतना ठीक है किन्तु मानव ज्ञान-अवस्था का होने के कारण जीव चेतना उसके लिए ठीक नहीं है.  जीव चेतना में जीव दुखी नहीं है, पर मानव का जीव चेतना में दुखी होना बना ही है.  घटना विधि से मानव ने जीवचेतना में जीने का अभ्यास किया है, वहाँ से मानव चेतना में परिवर्तित होना पहला बिंदु है. 

मानव चेतना में परिवर्तित होने पर हम मूल्य-चरित्र-नैतिकता स्वरूप में व्यक्त होना शुरू करते हैं.  इससे पहले मानव दो ही स्वरूप में व्यक्त हुआ - पहला, भक्ति-विरक्ति और दूसरा, सुविधा-संग्रह।  भक्ति-विरक्ति रहस्यमय हो गया, सार्थक नहीं हुआ.  सुविधा-संग्रह किसी को तृप्ति-बिंदु तक पहुंचाता नहीं है, न ही यह सबको मिल सकता है.  इसलिए सुविधा-संग्रह निरर्थक सिद्ध हुआ.  इसके बदले में हो क्या?  इसके बदले में समाधान-समृद्धि पूर्वक जीना।  समाधान समझदारी से, समृद्धि श्रम से!  इसके लिए शिक्षा विधि काम करेगी, न कि उपदेश विधि। 

- श्री ए नागराज के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)

Monday, December 5, 2016

जीवन विद्या शिविर के प्रबोधकों के लिए मार्गदर्शन



जीवन विद्या प्रबोधकों के लिए मार्गदर्शन: अध्ययन बिंदु

- श्री ए नागराज के साथ संवाद (अगस्त २००६, अमरकंटक)

Thursday, December 1, 2016

दावे की बात



मैं निम्न तीन दावे करता हूँ: -

पहला, मैं अपने सहअस्तित्व में अनुभव किये होने का दावा करता हूँ.

दूसरा, मैं सहअस्तित्व के अनुरूप स्वयं जीने का दावा करता हूँ.

तीसरा, मैं सहअस्तित्व के आनुषंगिक व्यवस्था में भागीदारी करने का दावा करता हूँ.

अभी तक जितने भी लोग मेरे संपर्क में आये - उनमें से एक के साथ भी ऐसा नहीं हुआ कि  मैंने उनकी जिज्ञासा का उत्तर न दिया हो.  सुनने वाला उस उत्तर से तृप्त हुआ हो या नहीं - यह दूसरी बात है.  एक समय तक उस उत्तर से तृप्त न हों, एक समय के बाद तृप्त हों - यह हो सकता है.  ऐसी सर्वतोमुखी समाधान सम्पन्नता हर व्यक्ति के पास होनी चाहिए न?

मैंने सुंदरता के न्यूनतम स्वरूप में जीने का दावा किया है.  संसार के लिए इससे ज्यादा सुन्दर, सबसे सुन्दर जी कर दिखाने का स्थान रखा हुआ है.  यदि आप इस प्रस्ताव को समझते हैं तो आप मुझसे अच्छा ही जियोगे। 

मुझसे आप जो सुनते हो, उसके अर्थ को समझने  का अधिकार आप ही के पास है.  मैं जैसा समझा हूँ, उसको केवल सूचना स्वरूप में आपको प्रस्तुत कर सकता हूँ.  मैं जैसा समझा हूँ, सोचता हूँ, जीता हूँ और करता हूँ - इन चार का भाषाकरण करता हूँ.  इसमें से जो मैं करता हूँ, वह आपको जल्दी पकड़ में आ जाता है.  जो मैं जीता हूँ, उसको समझने के लिए आपको थोड़ा ज्यादा मन लगाना पड़ता है.  जो मैं सोचता हूँ, उसके लिए और ज्यादा।  जो मैं समझता हूँ (अनुभव करता हूँ), उसके लिए और  ज्यादा।  ये चार स्तर हैं मन लगाने के.  अध्ययन में मन लगाना पड़ता है.  यही ध्यान है.  मन लगाने के प्रमाण में ये चारों बात समझ में आती हैं. 

इससे पहले आदर्शवाद और भौतिकवाद जो आया, उसमे निष्कर्ष निकलता है तो निकाल लो.  आदर्शवाद बनाम रहस्य मूलक ईश्वर केंद्रित चिंतन का मतलब है - "कोई मानव समझदार नहीं हो सकता!"  भौतिकवाद बनाम अनिश्चयता अस्थिरता मूलक वस्तु केंद्रित चिंतन का मतलब है - "हर अपराध हर व्यक्ति कर सकता है."  यदि इन दोनों से निष्कर्ष नहीं निकलता है तो इस विकल्प को समझो!  ईमानदारी से समझना पड़ेगा।  इसमें केवल जिज्ञासा व्यक्त करना पर्याप्त नहीं है.  समझना आवश्यक है.

यदि आप मेरे अनुभव करने (समझने), सोचने, जीने और करने को लेकर निर्भ्रम होते हैं तो यह ज्ञान मुझसे आप में अंतरित हो जाएगा।  इन चारों भागों में तदाकार-तदरूप होने की अर्हता हर मानव में है.  इसमें बाधा तब आती है जब कहीं हम हमारे प्रतिकूल लगने वाली किसी बात को नकार देते हैं.  वहीं हम रुक जाते हैं.  यही समझने में अवरोध है.  जीव चेतना से अनुकूलता बैठाने का प्रयास असफल होगा ही, क्योंकि मानव चेतना का कोई भी प्रस्ताव जीवचेतना के अनुकूल नहीं है.  ऐसी कोई जगह नहीं है जहाँ  मानवचेतना जीवचेतना के साथ राजी-गाजी करता हो.  मानवचेतना और जीवचेतना के बीच एक संक्रमण रेखा है.  इस संक्रमण-रेखा के एक तरफ है अपना-पराया की दीवारें और दूसरी तरफ हैं - अपना-पराया की दीवारों से मुक्ति।  इतना ही है.  अपना-पराया के चलते न स्वतंत्रता है, न स्वराज्य है. 

समझना है या नहीं - पहले इसीको निर्णय कर लिया जाए.  यदि समझना है तो यह तदाकार-तद्रूप होने का पूरा मार्ग ठीक है.  यदि नहीं समझना है तो इसका नाम लेने की भी ज़रुरत नहीं है.  मानव जाति जो कर रहा है अभी वही ठीक है.  इस प्रस्ताव में जीव चेतना के साथ राजी गाजी करने का एक भी सूत्र नहीं है.  इसके स्थान पर मानवीयता पूर्वक जीने का प्रस्ताव है. 

यह adjustment की बात नहीं है, replacement की बात है.

- श्री ए नागराज के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)