आदर्शवादियों ने "सत्य" को लेकर कुछ बताया। उसको लेकर बहुत सारे लोग आदर्शवादी मार्ग पर चलने के लिए न्योछावर हुए। उनको उससे कुछ सत्य भासा होगा - तभी वे न्योछावर हुए होंगे। आदर्शवाद में "ब्रह्म सत्य, जगत मिथ्या" बताया गया था। मनुष्य को भी मिथ्या बता दिया। मिथ्या सत्य को कैसे अध्ययन कर सकता है? सत्य को प्राप्त करने के लिए तप और अभ्यास विधियां बतायी। "समाधि में सत्य का ज्ञान होता है" - यह बताया।
आदर्शवादी मार्ग पर अंत तक चलके देखा गया और पाया गया - समाधि में कोई ज्ञान नहीं होता।
समाधि में ज्ञान नहीं हुआ तो मैंने अपने समाधि हुए का सत्यापन करने के उद्देश्य से संयम किया। संयम के लिए जो विभूतिपाद में लिखा था - वह मुझे "अप्राप्त को प्राप्त करने" अथवा सिद्धि प्राप्त करने के उद्देश्य से लिखा हुआ समझ में आया। इसलिए मैंने "धारणा", "ध्यान", और "समाधि" तीन स्थितियों के क्रम को उलटाया - और फ़िर संयम किया। ऐसा करने पर सम्पूर्ण अस्तित्व सहअस्तित्व स्वरूप में मेरे अध्ययन में आया। "सहअस्तित्व ही परम सत्य है" - यह समझ में आया। "व्यापक में संपृक्त प्रकृति ही सह-अस्तित्व है" - यह समझ में आया। "मनुष्य सह-अस्तित्व स्वरूपी सत्य को समझ सकता है" - यह समझ में आया।
मुझे जो यह समझ में आया - वह न भौतिकवादी विधि से समझा जा सकता था, न आदर्शवादी विधि से समझा सकता था। इसीलिये मैंने मध्यस्थ दर्शन सहअस्तित्ववाद को आदर्शवाद और भौतिकवाद के "विकल्प" के स्वरूप में प्रस्तुत किया है।
हर मनुष्य के पास कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता "अधिकार" रूप में है। इस कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता के रहते मनुष्य "परम-सत्य" को भी चाहता है। सच्चाई की "चाहत" मनुष्य में सदा से है। सच्चाई का भास-आभास होना भी मानव के लिए सहज है। मनुष्य को सच्चाई का जो भास-आभास होता है, उसी आधार पर मनुष्य में पठन के बाद अध्ययन की प्रवृत्ति बनती है।
"सत्य है", "समाधान है", "न्याय है" - यही सार रूप में मध्यस्थ-दर्शन की सूचनाएं हैं। यही तीन प्रधान मुद्दे हैं - अस्तित्व में अध्ययन के लिए। इन प्रधान मुद्दों के आधार पर ही सारी सूचनाएं होती हैं। इन सूचनाओं को सुनने पर हमको लगता है - "सत्य कोई चीज है।" इसमें और आगे अध्ययन में जाते हैं, तो हमको लगने लगता है - "सत्य ऐसा ही है"। इसी क्रम में - सह-अस्तित्व स्वरूपी सत्य में "अनुभव करने" की जगह हम पहुँच जाते हैं। सह-अस्तित्व स्वरूपी सत्य को समझने पर मनुष्य स्वयं को अपने जीने में "प्रमाणित करने" के योग्य हो जाता है।
मध्यस्थ-दर्शन के अध्ययन पूर्वक मनुष्य के लिए सत्य को समझना सुगम हो गया है।
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)
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