समझने के पहले स्वावलंबन का डिजाईन होता नहीं है। "मैं समझ गया हूँ, प्रमाणित होना है" - इस जगह में स्वावलंबन का डिजाईन जीवन से स्वयं-स्फूर्त निकलता है। "मैं समझ गया हूँ" - जब तक आप मान नहीं लेते, तब तक आप अपने स्वावलंबन का डिजाईन बना नहीं सकते। "मैं समझ गया हूँ" - जब इस जगह में आपका "मान्यता" आता है तो आप अपने स्वावलंबन का डिजाईन बना दोगे।
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)
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