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Sunday, December 1, 2013

मौलिकता

प्रश्न: मौलिकता क्या है?

उत्तर: हर वस्तु में उसकी प्रजाति की मौलिकता है.  जैसे - दो अंश के परमाणु की एक मौलिकता है, जो दो अंश वाले परमाणुओं की प्रजाति में ही देखने को मिलती है.  तीन अंश वालों में दो अंश वाली मौलिकता नहीं मिलती, वहाँ तीन अंश वाली मौलिकता मिलती है।  उसी प्रकार प्राण-अवस्था में दूब प्रजाति की एक मौलिकता है, जो दूब प्रजाति में ही मिलेगी, आम प्रजाति में नहीं।  इसी प्रकार जीव-अवस्था में वंश प्रजाति के अनुसार मौलिकता स्पष्ट होती है.  मौलिकता है -  उस प्रजाति की उपयोगिता और पूरकता।  स्वयं में उपयोगी, अन्य के लिए पूरक।

प्रश्न: मानव के लिए "मौलिकता" के इस सूत्र की क्या व्याख्या है?

उत्तर: मानव में ज्ञान के आधार पर मौलिकता स्पष्ट होती है.  मानव ज्ञान विधि से मौलिक है.  मानव ज्ञान-अवस्था का है और मानवों में जातियों की विविधता नहीं है.  सभी मानव एक ही जाति के हैं.  मानव में पूरकता-उपयोगिता का स्वरूप बहु-आयामी है.  मानव में मौलिकता (पूरकता-उपयोगिता) मानव-लक्ष्य (समाधान, समृद्धि, अभय, सह-अस्तित्व) और जीवन-मूल्य (सुख, शान्ति, संतोष, आनंद) के अर्थ में है.  यह ज्ञान का वैभव है.

- श्री ए नागराज के साथ संवाद पर आधारित (दिसंबर २००८, अमरकंटक)

Sunday, November 10, 2013

मानव की पहचान



ज्ञानगोचर और इन्द्रियगोचर के संयुक्त रूप में मानव की पहचान है.  मानव में समझदारी ज्ञानगोचर है.  ईमानदारी ज्ञानगोचर है.  जिम्मेदारी ज्ञानगोचर और इन्द्रियगोचर दोनों है.  भागीदारी इन्द्रियगोचर है.

सहअस्तित्व अपने में ज्ञानगोचर है.  सहअस्तित्व को समझे बिना मानव अपने में ज्ञानगोचर को पहचान ही नहीं सकता।  इसलिए सहअस्तित्व को पहचानना, सहअस्तित्व में जीवन को पहचानना, सहअस्तित्व में शरीर रचना को पहचानना, फिर शरीर और जीवन के संयुक्त रूप में मानव को पहचानना।

ज्ञानगोचर विधि से मानव में "निर्णय" (या निश्चयन) है.
इन्द्रियगोचर विधि से मानव में "गति" (व्यव्हार और कार्य) है.

- श्री ए नागराज के साथ संवाद (जनवरी २००७, अमरकंटक) 

Thursday, April 18, 2013

स्वभाव गति

सहअस्तित्व में अनुभव पूर्वक मानव अपने स्वभाव (धीरता, वीरता, उदारता) में स्थित होता है और व्यवस्था में भागीदारी कर पाता है।  अनुभव से पहले "स्व-भाव" जीव-चेतना का ही होता है - क्रूर या अक्रूर।  अक्रूर को अहिंसा मान लेते हैं, क्रूर को हिंसा मान लेते हैं।  अक्रूर या अहिंसावादी को मध्यस्थ दर्शन में "पशु-मानव" कहा गया है, क्रूर या हिंसावादी को "राक्षस-मानव" कहा गया है।  राक्षस-मानव चलाता है, पशु-मानव चलता है।  अभी संसार में वैसा ही दिखता है - घर में, बाजार में, देश में, विदेश में। यही शोषण है।  धीरता-वीरता-उदारता मध्यस्थ स्वभाव है।  इस स्वभाव में स्थित होकर व्यक्ति दूसरे को "चलाता" नहीं है, न ही विवश होकर दूसरे के अनुसार "चलता" है - बल्कि सुख पूर्वक समग्र-व्यवस्था में भागीदारी करता है।

अध्ययन जीव-चेतना से मानव-चेतना में संक्रमण के लिए है।  जीव-चेतना में जीते हुए भी हर मानव में "सुख" की कामना है।  हर मानव सुख चाहता है।  सुख क्या है, यह जानता नहीं है - फिर भी सुख को चाहता है।  जीव-चेतना में शरीर को "स्व" मानता है, इसलिए शरीर संवेदनाओं में ही सुख को खोजता है।  इस तरह या तो संवेदनाओं को नकारता है या सकारता है।  इन दोनों विधियों से सुख हासिल नहीं होता।  अध्ययन सुख को हासिल करने के लिए ही है।  सुख के लिए ज्ञान चाहिए।

सुख ज्ञान पूर्वक अनुभव में आता है और मानव के जीने में समाधान स्वरूप में प्रमाणित होता है।  ज्ञान निर्णय  पूर्वक होता है।  मानव ज्ञान-अवस्था की इकाई है।  इसलिए मानव ज्ञान को स्वेच्छा पूर्वक ही अपना सकता है या अनुभव कर सकता है।  मेरी इच्छा न हो, और ज्ञान मेरे अनुभव में आ जाए - ऐसा होगा नहीं।  ज्ञान प्राप्त करने की तीव्र इच्छा तभी होगी, जब जीव-चेतना समीक्षित हो जाए और मानव-चेतना स्पष्ट हो जाये।  अध्ययन में जीव-चेतना और मानव-चेतना का विश्लेषण होता है, और मानव-चेतना की श्रेष्ठता स्वीकार होती है।  "मुझे मानव-चेतना में ही जीना है" - यह निर्णय होता है।  मानव चेतना में जीने की अर्हता आये बिना उसमे जीना बनेगा नहीं।  जीव चेतना की समीक्षा हुए बिना उससे छूटना बनेगा नहीं।  मानव चेतना में जीने की अर्हता है - हमको जीवन का स्वरूप समझ में आ जाए, सब कुछ कैसे प्रयोजनशील है और व्यवस्था में है - यह समझ में आ जाए, मानव का व्यवस्था में जीने का क्या स्वरूप है - यह स्पष्ट हो जाए।

हर मानव में कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता प्रकृति-प्रदत्त विधि से है।  कल्पनाशीलता में अर्थ निकालने का गुण है।  जो भी सुना, उसका मतलब क्या है? - यह पूछना हर मानव में स्वाभाविक रूप से बना हुआ है।  बच्चों में यह बहुत स्पष्ट देखने को मिलता है।  इसी कल्पनाशीलता में तृप्ति या सुख की "सहज अपेक्षा" है।  अध्ययन कल्पनाशीलता के आधार पर होता है।  दूसरे, मानव कर्म करने में स्वतन्त्र है।  इसका मतलब है - मानव अपनी कल्पना के अनुसार क्या करना है, उसको चुन सकता है।  यह बात जीवों से भिन्न है।  जीव-जानवर वही करते हैं, जो उनके वंश के बाकी जीव करते हैं।  जीवों के कर्म का आधार वंश है।  मानव के कर्म का आधार कल्पना है।  कल्पना का आधार समझ है।  बिना समझ के कल्पना का कोई आधार नहीं बन पाता।  मान्यताएं और आस्थाएं कल्पनाएँ ही हैं।  तर्क और भाषा भी कल्पना के ही अंग हैं।  कल्पना कल्पना का आधार बन नहीं पाता, इसलिए जीने में विश्वास नहीं आ पाता।  कल्पना का आधार कल्पना से विकसित या सूक्ष्म होना होगा।  सच्चाई का साक्षात्कार कोरी कल्पना नहीं है।  साक्षात्कार पूर्वक जो बोध होता है, वह सच्चाई के प्रति अडिग संकल्प है - वह कल्पना नहीं है, कल्पना से सूक्ष्म है।  अनुभव कल्पना नहीं है, कल्पनाशीलता का तृप्ति बिंदु है।  अनुभव जीने में प्रमाण का आधार है।  अनुभव से पहले प्रमाण नहीं है।

प्रमाण और जिज्ञासा के संयोग में अध्ययन होता है।  अध्यापक प्रमाण प्रस्तुत करता है। विद्यार्थी  जिज्ञासा को व्यक्त करता है।  केवल जिज्ञासा हो, प्रमाण न हो - तो अध्ययन नहीं है, अनुसंधान है।  प्रमाणित व्यक्ति अन्य में जिज्ञासा रूपी पात्रता को स्थापित कर देता है।  अध्ययन में ध्यान देना आवश्यक है।  अध्ययन में मन लगने पर ही  अध्ययन होगा।  मैंने इस बात को आजमाया है, यदि किसी बात का आवेश मन में होता है तो अध्ययन में मन नहीं लगता।  इसलिए अध्ययन के लिए अपने वातावरण को अपने अनुकूल बनाना बहुत आवश्यक है।  इस "अनुकूलता" का स्वरूप हर व्यक्ति के लिए एक नहीं होगा।  सबसे महत्त्वपूर्ण है - परिवार के लोगों की इसके प्रति सहमति।  यदि जिन लोगों के बीच हम दिन-रात रहते हैं, जिनके प्रति हम जिम्मेदार हैं, जिनका जीना हमसे जुड़ा है - यदि वे इस लक्ष्य के प्रति सहमत नहीं हैं, सहयोगी नहीं हैं, पूरक नहीं हैं तो अध्ययन में हमारा मन लग नहीं सकता।  इनसे भाग कर, इनको आहत करके भी अध्ययन नहीं हो सकता।  इनको साथ लेकर ही चलना होगा।  उसके लिए जो आवश्यक है, उसको करना अध्ययन के लिए सहायक है।  दूसरे, आर्थिक या स्वास्थ्य को लेकर यदि कोई परेशानी हो, तो भी अध्ययन में ध्यान नहीं लग सकता।  इस अनुकूलता को भी बनाने की आवश्यकता है।  यह भी बात सही है, यदि हमारा लक्ष्य अस्तित्व सहज है तो उसको प्राप्त करने के लिए अनुकूलता संजोने में दृश्य-अदृश्य सहयोग मिलने लगता है, संयोग बनने लगते हैं। यह सब उत्साह वर्धक होता ही है।

लक्ष्य की स्थिरता, अपनी स्थिति के प्रति ईमानदारी, वातावरण की अनुकूलता - इन तीन बातों को लेकर हम अध्ययन  में मजबूती से चल सकते हैं।  

Saturday, April 13, 2013

अध्ययन और कार्यक्रम

प्रश्न: हम जो इस दर्शन के लोकव्यापीकरण कार्यक्रम में लगे हैं, क्या वह हमारे अध्ययन के लिए सहायक है या बाधक है?

उत्तर: सहायक है।

प्रश्न: अध्ययन और लोकव्यापीकरण कार्यक्रम में अपनी भागीदारी के संतुलन को कैसे पहचाने?

उत्तर:  कार्यक्रम में भागीदारी आपके अध्ययन के लिए सहायक हो, वही संतुलन  है।

- अनुभव शिविर २०१३ में श्री ए नागराज के साथ संवाद पर आधारित

Wednesday, March 13, 2013

जिज्ञासा समझने के लिए तैयारी है


प्रश्न: अनुभव की स्थिति के बारे में तो आपने तीन प्रमाण (अनुभव प्रमाण, व्यवहार प्रमाण और प्रयोग प्रमाण) बताया।  अनुभव के पहले की क्या स्थितियां होती हैं?

उत्तर: अनुभव के पहले है - अध्ययन।  अध्ययन के पहले है - पठन।  पठन के पहले है - अपेक्षा।  अपेक्षा के पहले है - जिज्ञासा।  जिज्ञासा के पहले है - शंका।  जिज्ञासा समझने के लिए तैयारी है।

प्रश्न: "जीव चेतना" से "मानव चेतना" तक के विकास में क्या कोई "क्रम" है या नहीं?

उत्तर: विकल्प का अध्ययन ही क्रम है।

प्रश्न:  अध्ययन पूर्वक हम अनुभव की ओर अग्रसर हो रहे हैं या नहीं - इसकी जाँच का क्या मापदंड है?

उत्तर: अध्ययन करते हैं तो समझ में आ रहा है।  समझ में आ रहा है तो आप मे विश्वास हो रहा है।  विश्वास हो रहा है तो और समझ में आ रहा है।  इस तरह पूरा समझ में आने के बाद प्रमाणित होता है।

प्रश्न: प्रमाण के पहले क्या व्यक्ति के "जीने" में कोई गुणात्मक परिवर्तन दिखेगा?

उत्तर: जब कभी प्रमाणित होगा, तभी दिखेगा।  उसके पहले जैसा सामान्य आदमी को दिखता है, वैसा ही दिखेगा।  अभी तक सामान्य आदमी में ऐसा है - जब तक जीता है, झगडा।  मरने के बाद, पूजा!  भ्रम होता है और जागृति होता है, और कुछ होता ही नहीं है।


प्रश्न: बहुत सारे अंतर्विरोधों में जो मैं पहले रहता था, अब वे मुझमे नहीं दिखते।  अभी मुझे अनुभव तो नहीं हुआ है, पर इसको मैं "उपलब्धि" के रूप में देखूँ या नहीं?

उत्तर: वह उपलब्धि कैसे हुआ?  इस विकल्प के अध्ययन पूर्वक हुआ या आपके पूर्व विचार के आधार पर हुआ?  विकल्प के अध्ययन पूर्वक हुआ तो उसे उपलब्धि के रूप में देखें, किन्तु वहाँ रुकें नहीं।  प्रमाणित होने तक नहीं रुकना।  प्रमाणित नहीं होता है तो आपकी उपलब्धि आप तक ही है।  वह व्यक्तिवाद है।  अनुभव पूर्वक प्रमाणित होने पर आप संसार के लिए उपकारी होंगे।


प्रश्न: इस विकल्पात्मक दर्शन द्वारा प्रस्तावित सभी बिंदुओं पर मुझे विश्वास है, इसके बावजूद "जीने" की जगह में मुझे स्वयं में कमी दिखती है।  इसका क्या कारण है?

उत्तर: इसका कारण है आपका "पूर्वाभ्यास"।  जो भी हम पहले कल्पना किये हैं या अभ्यास किये हैं, उसका स्मरण ही अवरोध है।  ऐसे में मानवीयता में विश्वास होते हुए अमानवीयता में जीते हैं।  मानवीयता की अपेक्षा जीवन के अनुसार है।  अमानवीयता में जीना अभी की परंपरा है।  ऐसे सोच के देखिये।  यह स्थिति समाधान होने तक है।  यदि समाधान होता है तो वह जीने में आता ही है।

- श्री ए नागराज के साथ संवाद पर आधारित (अनुभव शिविर, जनवरी २०१३, अमरकंटक)

Monday, March 4, 2013

सर्वमानव के लिये प्रस्ताव


मैंने इस प्रस्ताव को "सर्वमानव" के लिये प्रस्तुत किया है।  इस प्रस्ताव के बारे में "सर्वमानव" के आधार पर बात हो सकती है, न कि किसी व्यक्ति विशेष या समुदाय विशेष के आधार पर।  आपसे "सर्वमानव" के आधार पर बात करना नहीं बन रहा है, यही परेशानी है।

जब यह प्रस्ताव अनुसंधानित हुआ तो मानव जाति इसके प्रति "अज्ञात" था, इस प्रस्ताव की परंपरा नहीं था, "सर्वमानव" के लिए इसकी परंपरा हो, इसलिए प्रस्तुत कर दिया।  सर्वमानव को क्या चाहिए?  सर्वमानव को "सुख" चाहिए - यह पहचाना।  सुख समाधान के बिना होता नहीं है।  समाधान अनुभव के बिना होता नहीं है।  अनुभव सहअस्तित्व में ही होता है।

अध्ययन के लिए सहमत होना और अध्ययन होना दो अलग-अलग बातें हैं।  अध्ययन होने पर स्वत्व होता है।

इस प्रस्ताव को मानव जाति द्वारा परंपरा स्वरूप में अपनाने की पूर्वभूमि बन चुकी है।  मानव जाति सूली पर चढ़ चुका है।  इस धरती पर से विदा होने की स्थिति में आ चुका है।  मानव जाति की तैयारी है, तभी इसको प्रस्तुत किया है।  आपको समझ में आता है तो आप इसको जी कर प्रेरणा दे सकते हैं।  बिना समझे हम  भाषाई प्रेरक होंगे, अनुभव करके हम जीते जागते प्रेरक होंगे।  दोनों में फर्क है या नहीं?

- श्री ए नागराज के साथ संवाद पर आधारित (अनुभव शिविर, अमरकंटक - जनवरी, २०१३)

Saturday, March 2, 2013

जागृति का ही प्रमाण होता है


जागृतिक्रम का कोई प्रमाण नहीं होता, जागृति का ही प्रमाण होता है।

प्रश्न: "जागृति क्रम" बोध की वस्तु है या नहीं?

उत्तर: नहीं।  "जागृति" बोध की वस्तु है।  जागृति-क्रम मन, वृत्ति, चित्त तक का शरीर मूलक क्रियाकलाप है।  जागृत होने पर यह आंकलन होता है कि इससे पहले मैं "जागृति क्रम" में  था।  जागृति परंपरा स्वरूप में होती है।

मेरे अकेले के अनुभव संपन्न होने से जागृति नहीं हुई।  आप सब जागृत होते हैं, तब परंपरा होगी।  उसी के लिए तो हम बारम्बार मिलते ही हैं।  अभी मैं जागृति के लिए प्रेरक हूँ।

प्रश्न:  क्या जागृति-क्रम में न्याय नहीं होता?

उत्तर: नहीं।  जागृति में ही न्याय होता है।  जागृति क्रम में मानव में जीवों से अच्छा जीने की कल्पना होता है, उसमे मानव जी भी लिया।  लेकिन उसमे न्याय नहीं हुआ।

अध्ययन पूर्वक अर्थ का अनुमान होता है, साथ ही अनुमान के प्रमाणित होने की आवश्यकता स्वीकार होती है।  अनुभव मूलक विधि से ही जागृति होता है।  अनुभव मूलक विधि से ही बुद्धि में (सच्चाई के प्रति) "निश्चय" होता है।

अध्ययन विधि में, आशा-विचार-इच्छा में प्राथमिकता के बने बिना साक्षात्कार होता नहीं है, साक्षात्कार और बोध पूरा हुए बिना अनुभव होता नहीं है।

प्रश्न:  अध्ययन विधि में, आशा-विचार-इच्छा में सच्चाई के लिए प्राथमिकता बनेगी तो वह मानव के जीने में किस "क्रम" में परिलक्षित होगा?

उत्तर: पहले पर-पीड़ा विचार समाप्त होता है, फिर पर-धन विचार समाप्त होता है  फिर पर-नारी/पर-पुरुष विचार समाप्त होता है।  जागृत होने के पहले स्वयं में ऐसे सब विचारों का शमन होता है, उसके पश्चात हम अनुभव मूलक विचार में टिक जाते हैं।

प्रश्न: अपने आशा-विचार-इच्छा में इस प्रकार प्राथमिकता बनने  को हम अनुभव की ओर अपना "क्रमिक विकास" मान रहे हैं - क्या यह ठीक है?  

उत्तर:  आपका यह मान्यता यदि आपके जीने में आता है, तब ठीक है।  यदि आपके जीने में नहीं आता है, तब थोड़ा ज्यादा ही ठीक है!  हमारे जीने में कोई परिवर्तन न हो, और हम जागृत हो जाएँ - यह कहाँ की भाषा है?

प्रश्न: साक्षात्कार-बोध होने के क्रम में क्या आशा-विचार-इच्छा में गुणात्मक-विकास का क्या कोई "क्रम" होगा?

उत्तर: "क्रम" की बात मैंने नहीं की है।  "क्रम" आप ही लोग बना रहे हो।  जागृत होना "क्रम" है या "घटना" है - ऐसा मैंने नहीं लिखा है।  यह बात सही है कि जागृत होने के पहले पर-पीड़ा विचार, पर-धन विचार, पर-नारी/पर-पुरुष विचार शमन हो जाता है।

प्रश्न:  अध्ययन विधि में "अनुकरण"  की क्या भूमिका है?

उत्तर: अनुकरण नहीं है तो अध्ययन किसका करोगे?  कोई जागृत स्वरूप में जीता है, तो उसको देख करके अध्ययन होता है।  वही अनुकरण है।  दूसरी विधि से अध्ययन होता नहीं है।  जागृत होने के लिए दूसरी विधि अनुसंधान ही है।

प्रश्न:  आपके जागृत स्वरूप में जीने को देख कर मुझ में वैसा जीने की इच्छा बनती है।  क्या वह अध्ययन है?

उत्तर: मेरे जीने को देख कर पहले आप में वैसा जीने की "कल्पना" दौड़ती है, आपका "कार्य" नहीं दौड़ता।  आपका कार्य उसके अनुसार दौड़ने से फिर ठीक हो जाता है।  इच्छा भर होना "व्यक्तिवाद" है।  कार्य भर होना "समाजवाद" है।  अनुभव होना और उसके अनुसार इच्छा और कार्य होना "सहअस्तित्ववाद" है।

- श्री ए नागराज के साथ संवाद पर आधारित (अनुभव शिविर, २०१३ अमरकंटक)

पिछली शरीर यात्रा का अगली शरीर यात्रा पर प्रभाव


प्रश्न: पिछली शरीर यात्रा का अगली शरीर यात्रा पर क्या प्रभाव पड़ता है?

उत्तर: पिछली शरीर यात्रा में जो पराभव से त्रस्त रहे, वह पराभव नहीं चाहता है, विभव चाहता है।  जीवन सदा विभव चाहता है।  जन्म और मृत्यु जीवन के लिए एक घटना है।  जैसा अभी जिया, अगली शरीर यात्रा में उससे अच्छा जीने की स्वीकृति के साथ शरीर छोड़ता है।

प्रश्न: यह कैसे होता है?

उत्तर: कल्पनाशीलता से।  हर मानव में कल्पनाशीलता है, उसके बदौलत इस शरीर यात्रा में जिसको "अच्छा" मानता है, उससे "ज्यादा अच्छे" के लिए सोच लेता है।  कोई दारु पीने में "अच्छाई" सोचता है, कोई चोरी करने में "अच्छाई" सोचता है, कोई धोखा देने में "अच्छाई" सोचता है।  हर व्यक्ति सोचता ही है।  सोचता नहीं हो, ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है।  कोई किसी मुद्दे पर सोचता है, तो कोई किसी दूसरे मुद्दे पर।  अब यहाँ सर्वमानव के लिए, सर्वशुभ के अर्थ में सोचने की बात शुरू किये हैं।  इसीलिए इस अनुभव शिविर का आयोजन है।  अपने-अपने विचार के अनुसार सोचने वाले बहुत हो चुके, मर चुके।   हर व्यक्ति जन्मता है, तो किसी भाषा (वहां के परिवेश के अनुसार) के साथ ही जन्मता है।  उस भाषा के अनुसार वह सोचता ही है।

प्रश्न: शरीर से अलग हो जाने के बाद भी क्या जीवन प्रभाव डालता रहता है?

उत्तर: भ्रमित जीवन जीते समय भी भ्रम का प्रभाव डालता है, मरने के बाद भी भ्रम का प्रभाव डालता है।  जागृत जीवन जीते समय भी जागृति का प्रभाव डालता है, मरने के बाद भी जागृति का प्रभाव डालता है।



प्रश्न:  शरीर छोड़ने के बाद जीवन के पास पिछली शरीर यात्रा की सकारात्मकता साथ बनी रहती है या मिट जाती है?

उत्तर: जितना सकारात्मकता को लेकर किये रहते हैं, उससे आगे करने का अधिकार बना रहता है।  चित्रण तक शरीर से सम्बद्ध रहता है।  जितने पक्ष का (जागृति के अर्थ में) साक्षात्कार किया रहता है, वह अगली शरीर यात्रा में उसको सुलभ हो जाता है।

प्रश्न: सुलभ हो जाने से क्या आशय है?

उत्तर: सुलभ होने से आशय है - अगली शरीर यात्रा वहीं शुरू करते हैं, जहाँ जीने वालों में पिछली शरीर यात्रा की सकारात्मकता उपलब्ध रहे।  यह जागृति के अर्थ में ही साम्य हो पाता है।  जागृति से पहले अपना-अपना विचार, अपनी-अपनी सकारात्मकता होती है।

- श्री ए नागराज के साथ संवाद पर आधारित (अनुभव शिविर, २०१३ अमरकंटक)

Monday, February 25, 2013

अनुभव शिविर 2013


हर मानव के जीने में चार भाग रहता है - अनुभव, विचार, व्यवहार और कार्य (व्यवसाय).  इसमें से अनुभव के बारे में मैं आप सबसे यहाँ इस "अनुभव शिविर" में सुनना चाहता हूँ।  अनुभव के बिना कोई प्रमाण होता नहीं है।  अनुभव के बिना कोई व्यक्ति प्रमाणित होगा नहीं।  कोई व्यक्ति यदि कहता है कि वह "प्रमाणित" है, तो उसके अनुभव को सुनो।

प्रश्न:  अनुभव कैसे सुना जाता है?

उत्तर:  अनुभव प्रमाणों के रूप में सुना जाता है।  पहला प्रमाण है - "अनुभव प्रमाण"।  सहअस्तित्व में अनुभव  होता है।  सहअस्तित्व (सत्ता में संपृक्त जड़ चैतन्य प्रकृति) अनुभव में आये बिना प्रमाण होता भी नहीं है।  इसको मैंने देखा है - इस आधार पर इतने मजबूती से मैं कह रहा हूँ।  जीवन ज्ञान, सहअस्तित्व दर्शन ज्ञान, मानवीयता पूर्ण आचरण ज्ञान का प्रमाण मानव के रूप में हम देख पायेंगे। अनुभव को हम (इन्द्रियों से) देख नहीं पायेंगे।  अनुभव मूलक प्रमाण को देख पायेंगे। अनुभव को समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व स्वरूप में प्रमाणित करते हुए मानव को हम देख पायेंगे।  मानव के बोलने, सोचने और जीने में संगीत (तालमेल) होने से सहअस्तित्व में अनुभव के प्रमाण का पता चलता है।  सहअस्तित्व में अनुभव का प्रमाण चारों अवस्थाओं के साथ जीने में ही पता चलता है।  जीने में ही समस्या और समाधान का पता चलता है।


अभी तक मानव "विचार" करने तक पहुंचा है।  विचार में ही "सुख"-"दुःख" को मान लेता है।  "सुख"-"दुःख" (अच्छा लगना, बुरा लगना) के विचार को अनुभव मान लेता है - पर वह बोध-अनुभव नहीं है।  वह समाधान नहीं हो पाता है।  सहअस्तित्व में अनुभव पूर्वक ही समाधान हो पाता है।  समाधान होने के बाद, श्रम के आधार पर समृद्धि होता है।  समाधान के बाद ही समृद्धि का अनुभव होता है, उसके पहले होने वाला नहीं है।  सर्वमानव के लिए समाधान, सभी परिवारों के लिए समृद्धि और उसके अर्थ में सार्वभौम व्यवस्था और संस्कृति को प्रस्तावित करना  "उचित" है  या "अनुचित" है - आप सोच करके बताइये।  अनुभव को देखना है या नहीं?  और किसी विधि से सर्वशुभ हो सकता है या नहीं?  जिनको केवल बात करनी है, जीना नहीं है - उनको इस बात से तकलीफ ही तकलीफ है।


प्रश्न:  आपके हिसाब से, हम लोग आगे बढ़ रहे हैं या वहीं के वहीं अटके हैं?

उत्तर: - आगे बढ़ रहे हैं, तभी तो मैं पीछे पड़ा हूँ!  इस ९४ वर्ष की आयु में भी!!

१५ वर्ष पहले जब अनुभव शिविर लगाते थे तो लोग अपना ऐसा उदगार व्यक्त करते थे - "आपके संपर्क में हम कैसे आ पाए?"  कुछ वर्षों से यह सुनने में आने लगा - "हम समझ चुके हैं, प्रमाणित होना शेष है।" अनुभव के बिना प्रमाण नहीं होता।  अनुभव के बिना कोई प्रमाण होता हो तो आप कर लेना!  "हम समझ चुके हैं, प्रमाणित होना शेष है।" - ऐसा सुनने के बाद, अब अनुभव कितने लोगों को हुआ है, उसको देखना है।  आप बताइये - अनुभव को जांचना शुरू करना चाहिए कि नहीं?

मैं बचपन में जब किसी लायक नहीं था, कुछ समझा नहीं था, तब से ही उपदेश देता था।  उपदेश के अनुसार मेरा जीना नहीं बना।  इसी कष्ट को मिटाने के लिए तो मैंने साधना ही किया।  साधना विधि से जो प्राप्त हुआ उसको बता रहे हैं।  अनुभव मूलक विधि से सब ठीक होता है, अन्यथा कुछ ठीक होता नहीं।  अनुभव का अनुकरण करो या स्वयं अनुभव करो!  (सब समय दूसरे व्यक्ति का) अनुकरण करना बनता नहीं है।  स्वयं अनुभव करना आवश्यक है।  इसीलिये अनुभव शिविर को लगाते हैं।

- अनुभव शिविर, अमरकंटक - जनवरी २०१३ 

Wednesday, February 20, 2013

आत्मा की संतुष्टि


प्रश्न:  आत्मा क्या पहले से ही क्रियाशील रहती है या अध्ययन पूर्ण होने के बाद क्रियाशील होगी?

उत्तर: आत्मा क्रियाशील रहती ही है, अधिकार संपन्न रहता है - किन्तु प्रमाणित होने की योग्यता और पात्रता नहीं रहता। अभी मानव परंपरा में भ्रम और अपराध ही प्रचलित है या मानव कल्पना में मान्य है।  आत्मा और बुद्धि  भ्रम या अपराध को स्वीकारता नहीं है।  इसलिए संतुष्ट होता नहीं है।  भ्रमित रहते तक तदाकार-तद्रूप प्रक्रिया होता नहीं है।  भ्रमित रहते तक मानव अपराध को ही सही मानता है।  उससे आत्मा का संतुष्टि होता नहीं है।

आत्मा की संतुष्टि के लिए अध्ययन है।  अध्ययन में पहले सही बात को "विकल्प स्वरूप में" सुनना होता है।   अभी तक के जिए हुए से जोड़ कर सुनते हैं तो नहीं बनता।  अध्ययन = संस्कार संपन्न होना।  संस्कार है - पूर्णता के अर्थ में स्वीकृति।  पूर्णता है - गठन पूर्णता, क्रिया पूर्णता, आचरण पूर्णता।  गठनपूर्णता नियति विधि से हो चुकी है।  क्रियापूर्णता और आचरणपूर्णता ज्ञान के अर्थ में हैं।

हर मानव संतान जन्म से ही न्याय का याचक, सही कार्य-व्यव्हार करने का इच्छुक और सत्य वक्ता होता है। बच्चा जो पैदा होता है, उसका कामना आत्मा  के अनुसार रहता है।  हर मानव संतान में यह बात समान है।  उसमें कोई परेशानी नहीं है।  उसके बाद बच्चा परंपरा के अनुसार ढलता है।  अपराधिक परंपरा के अनुसार ढलता है तो अपराध करता है।  मानवीय परंपरा में यदि जन्म लेता है तो अध्ययन और अभ्यास पूर्वक संस्कार को ग्रहण करता है।  बच्चों में पायी जाने वाली कामना के अनुसार यह प्रस्ताव प्रस्तुत किया है।

प्रश्न:  "बच्चा जो पैदा होता है, उसका कामना आत्मा  के अनुसार रहता है।"  क्या सभी बच्चों की क्षमता जन्म के समय एक जैसी होती है?

उत्तर: हाँ।  सारी मानव जाति के साथ ऐसा "अधिकार" है।

प्रश्न: यदि जन्म के समय सबकी क्षमता एक जैसी होती है तो आपमें जो जिज्ञासा उदय हुई, दूसरों में क्यों नहीं होती दिखती?

उत्तर: उसका कारण है, मैं जहाँ जन्मा था - वहाँ की परम्परा में तीन बात लेकर चले थे - घोर परिश्रम, घोर सेवा और घोर विद्वता।  उस विद्वता को लेकर मैं राजी नहीं हुआ, बाकी दो बातों में राजी हो गया।


मैं उस "विद्वता" से इसलिए राजी नहीं हो पाया क्योंकि मैंने देखा कि जैसा मेरे परिवार में "कहते" हैं, वैसा वे "जीते" नहीं हैं।  यही  मेरी जिज्ञासा का आधार हुआ।  "कहने" और "करने" में साम्यता कैसे हो? - यह जिज्ञासा हुई।  यही "पात्रता" है।    पात्रता के आधार पर ही समझ हासिल होता है।


प्रश्न:  जन्म के समय सबकी क्षमता एक जैसी होती है तो - आपके भाई-बंधु तो उस विद्वता से राजी हो गए, फिर आप क्यों राजी नहीं हो पाए?

उत्तर: "राजी हो पाने" या "राजी नहीं हो पाने" की बात जन्म के बाद, शरीर यात्रा के साथ शुरू होती है।  यह हर शरीर यात्रा (हर व्यक्ति) के साथ भिन्न-भिन्न होता है - क्योंकि हर शरीर भिन्न है।  जन्म के समय सबकी क्षमता समान होने का कारण है - (जन्म के समय) जीवन की समान क्षमता व्यक्त होती है।  उसके अनुकूल वातावरण मिलता नहीं है, क्योंकि अभी तक मानव शरीर के आधार पर जिया है, जीवन के आधार पर जिया नहीं है।  जीवन शरीर के साथ तदाकार होकर स्वयं को शरीर ही मान लेता है।  इस कारण जन्म के समय क्षमता एक जैसी होते हुए भी अलग-अलग व्यक्तियों की अलग-अलग स्वीकृतियाँ हो जाती हैं।  प्रधान रूप में जिस परिवार में जन्म लेते हैं, उसके अनुसार स्वीकृतियाँ होती हैं।  बच्चा परिवार को मानने, परिवार के कार्यक्रम को मानने और परिवार के फल-परिणाम को मानने से शुरू करता है।

प्रश्न:  क्या आप अपने बचपन में जैसा "कहते" थे, वैसा "जीते" थे? 

उत्तर: नहीं।  मैं भी जैसा कहता था, वैसा जीता नहीं था।  "जीना" अभी आया - यह समझ हासिल होने के बाद।   जैसा "कहते" हैं वैसा "जीते" नहीं हैं - यह गलत है, ऐसा मुझे स्वीकार हुआ।  सही क्या है - यह तब पता नहीं था।  साधना के बाद "सही" का पता चला।  अब अध्ययन विधि से सबको "सही" का पता चलेगा, ऐसा स्वीकार के इस प्रस्ताव को मानव जाति के सम्मुख प्रस्तुत कर दिया।

- अनुभव शिविर, जनवरी २०१३, अमरकंटक (श्री ए नागराज के साथ संवाद पर आधारित)

"कहने" और "जीने" में सामंजस्य बैठाना

प्रश्न:  अध्ययन के मार्ग पर चलते हुए, "न्याय" को जीने में भय लगता है।  इसका कारण क्या है?  इस भय का निवारण क्या है?

उत्तर: भय का कारण है, आपकी पूर्व स्मृतियाँ।  पूर्व स्मृतियाँ सभी भ्रम हैं, अपराधिक हैं।  यह प्रस्ताव भ्रम और अपराध के समर्थन में नहीं है।  पहले का स्मरण आपको आगे बढ़ने नहीं देगा।  अपराधिक कर्मों का स्मरण हमको पीड़ा देता है।  भ्रमवश हम ही अपराध किये रहते हैं, हम ही फंसे रहते हैं।  हमारा ही करतूत हमको फंसाता है।

इसका निवारण है - अपने "कहने" और "जीने" में सामंजस्य बैठाना। मैं तो इसी विधि से पार पाया हूँ।  "जैसा कहते हैं, वैसा जीना चाहिए" - ऐसा मैंने शुरू किया।

"कहने" और "जीने" में सामंजस्य के लिए प्रतिपादित किया है - "समझदारी से समाधान, श्रम से समृद्धि"।  समझदारी के प्रस्ताव को विकल्प स्वरूप में प्रस्तुत किया है।  श्रम से समृद्ध होने के ६ आयाम हैं - आहार, आवास, अलंकार, दूरश्रवण, दूरदर्शन, दूरगमन।

प्रश्न: "श्रम से समृद्धि" को क्यों अपनाएं?

उत्तर:  सच्चाई की प्रेरणा देने के लिए, सच्चाई को प्रमाणित करने के लिये।  प्रेरणा पाना और प्रमाणित करना  हर मानव का अधिकार है।  कोई ऐसा मानव नहीं है, जो शरीर के साथ न हो।  शरीर के साथ ही मानव प्रेरणा पाता है, शरीर के साथ ही मानव जीता है।  शरीर पोषण, शरीर संरक्षण और समाज गति के लिए "श्रम से समृद्धि" को अपनाएँ।

- अनुभव शिविर, जनवरी २०१३, अमरकंटक (श्री ए नागराज के साथ संवाद पर आधारित)

Thursday, January 17, 2013

Sweet Little Success

It was about 2 years back that we decided to take a break from our jobs in Bangalore to study Madhyasth Darshan.  We also decided to buy a piece of land for ourselves - for we didn't want our study to be merely an intellectual exercise. We began with the goal of living with resolution and prosperity.

We got 10 acres patch of land at Amora village in Bemetara (Chhatisgarh). Our field is on the bank of river Shivnath.  It was in Feb last year that we started working on this project.  It wasn't easy for us to bring up this place with our daughter Gunjan still going to school at Bangalore.  But we were determined to make it happen.  The first thing which we decided was to develop this field on the lines of natural farming.  Both of us attended Subhash Palekar ji's workshop on natural farming.  We also started working on building a house in the field.  Before our taking over the field, it had a sugarcane crop.  We decided to continue with the sugarcane for another year, but stopped using pesticides and other harmful chemicals. Instead we started with Jeevamrit schedule as prescribed by Subhash Palekar Ji.  There were many things to be set up, and we worked on them assiduously one by one.  Electricity connection, borewell digging, house design and construction, drawing water from the river....  In Jan 2013, we could finally have the house ready for living and the sugarcane crop ready for harvesting.  We decided to make jaggery (gur) of all the yield.  The gur is really tasty and pure!  We have made sure that no chemicals are used in the entire process of jaggery making.  We haven't gone for any certification for its purity.  We believe, dependency on certification means lack of confidence in our selves.

It was a milestone for us, when Baba ji (Shree A Nagraj, Amarkantak) visited our field on December 28th, and had a fresh glass of sugarcane juice.  He has promised me to come again (on Jan 26th) to taste the freshly made gur.

 Please write to us or call us (at 9611509219) to taste this "sweet little success"!  We will be happy to share our journey if you too are harboring a dream like this!  We are at present here at Amora, living in the little house we made, till Jan 26th.  If you are in Raipur or nearby towns, do take time to visit us.  If you have the need for organic gur, let us know - we will try to make arrangements for delivering it to you.

 Yours,

 Rakesh and Priyanka

 "Shanti Van", Amora,
Bemetara, CG, INDIA.