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Thursday, August 5, 2010

जांचना

न्याय, धर्म, और सत्य का प्रयोजन आपको तर्क से समझ में आता है। यह अध्ययन विधि से पूरा हो जाता है। इसको 'पुरुषार्थ' नाम दिया। पुरुषार्थ तर्क के साथ है। उसके बाद साक्षात्कार, बोध, संकल्प, और अनुभव कोई पुरुषार्थ या तर्क नहीं है। वह जीवन की स्वयं-स्फूर्त प्यास से हो जाता है।

प्रश्न: जो आप हमको अस्तित्व के बारे में सूचना दिए हैं, उसको हम कैसे जांचे?

उत्तर: अनुभव के बाद ही जांचना होता है। अनुभव से पहले जांचना होता ही नहीं है। किसी से भी नहीं हुआ है, न किसी से होगा। न्याय, धर्म, सत्य की जीवन में स्वयं स्फूर्त प्यास है। इसके साथ जड़-प्रकृति में नियम, नियंत्रण, संतुलन है। इनको जांचना अनुभव के बाद ही होता है। अध्ययन पूर्वक साक्षात्कार, बोध किये बिना अनुभव होता नहीं है।

प्रश्न: जैसे आपने हमे सूचना दी - "सत्ता ही ज्ञान है"। इसको हम कैसे जांचें?

उत्तर: इसको पहले "मानना" होता है। फिर "स्वीकारना" होता है। फिर "अनुभव" करना होता है। स्वीकारने के फलस्वरूप में अनुभव होता है। अनुभव के फलस्वरूप "जांचना" होता है।

प्रश्न: "स्वीकारने" का क्या अर्थ है?

उत्तर: स्वीकारने का मतलब है - यह ठीक बात है, यह मुझको चाहिए! चाहत के अर्थ में ही स्वीकृत होता है। न्याय हमको चाहिए - इसीलिये न्याय स्वीकार होता है। समाधान (सुख) हमको चाहिए - इसीलिये समाधान (सुख) हमको स्वीकार होता है। सुख नहीं चाहिए, न्याय नहीं चाहिए - ऐसा कहना मनुष्य से संभव ही नहीं है।

प्रश्न: भ्रमित स्थिति में "चाहत" तो मनोरंजन-व्यसन आदि की भी रहती है। यहाँ तक उसको "आवश्यकता" भी माना जाता है...

उत्तर: उसके मूल में भी चाहना सुख की ही है। मनोरंजन-व्यसन आदि से सुख की मूल-चाहना निरंतर पूरी होती हो - तो वही किया जाए! पर उस तरह सुख की चाहना पूरी नहीं होती। यह निर्णय तर्क से आ जाता है।

सारा मनोरंजन-व्यसन आदि सुख की अपेक्षा में ही है। इन कृत्यों में सुख भासता है, पर सुख मिलता नहीं है। सुख जैसा लगता है, पर सुख होता नहीं है।

प्रश्न: तो अपनी मूल-चाहत को पहचानना, उस मूल-चाहत के अर्थ में इस प्रस्ताव को स्वीकारना, फिर उसको अनुभव करना, फिर उसको जांचना। अनुभव करने के लिए क्या किया जाए?

उत्तर: शब्द से सूचना होती है। अर्थ समझ में आता है। अर्थ में तदाकार होना समझने के लिए निष्ठा है। उसके बाद अनुभव होता ही है। अनुभव हर जीवन की प्यास है - इसीलिये अनुभव होता है। अनुभव से प्रमाण होता है। अनुभव होने के बाद, जीने के बाद, प्रमाणित होने के बाद - जांचने की बारी आती है। अनुभव के पहले जांचना न आज तक किसी से हुआ, न आगे किसी से होगा।

आपको इस बात की "आवश्यकता" है या नहीं - पहले इसका निर्णय कीजिये। यदि आवश्यकता स्वीकार होती है, तो इस आवश्यकता को अनुभव से पूरा करो! तर्क-विधि से इसकी आवश्यकता है या नहीं - यह निष्कर्ष आप निकाल सकते हैं। चर्चा का उद्देश्य केवल आवश्यकता का निष्कर्ष निकालना ही है। उसके बाद पारंगत होने के लिए अध्ययन है। अध्ययन के फलस्वरूप अनुभव है। उसके बाद जाँचिये - यह पूरा पड़ता है या नहीं? फिर जाँचिये - संसार के लिए यह पूरा पड़ता है या नहीं? मैंने भी वैसे ही किया। अनुभव होने के बाद मैंने जांचा और पाया - यह मेरे लिए पूरा पड़ता है। फिर मैंने जांचा और पाया - यह संसार के लिए पूरा पड़ता है। जो भी लोग जीवन-विद्या का प्रबोधन करते हैं, वे मानते हैं - संसार को इसकी आवश्यकता है।

तर्क-विधि से "यह ठीक बात है" - ऐसा लगता है। "मैं प्रमाणित हूँ" - ऐसा नहीं लगता है। क्योंकि प्रमाणित होने का ज्ञान नहीं हुआ रहता है। "मैं प्रमाणित हूँ" - इस स्थिति तक पहुँचने के लिए अनुभव है। पहले - "यह बात ठीक लगती है", फिर दूसरे - "यह बात ठीक है", फिर तीसरे - "यह ठीक हो गया"। दूसरे स्थिति तक तर्क है। तर्क प्रमाण नहीं होता। तर्क-विधि से "अच्छा लगने" की स्थिति बन सकती है, "अच्छा होने" की स्थिति नहीं बनती। अनुभव पूर्वक "अच्छा होने" की स्थिति बनती है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (जुलाई २०१०, अमरकंटक)

आभार - प्रवीण, आतिशी (भोपाल)

Tuesday, August 3, 2010

ज्ञान और प्रक्रिया

मनुष्य को जो समझ में आता है - वही ज्ञान है। ज्ञान के चार स्तर हैं - जीव-चेतना, मानव-चेतना, देव-चेतना, और दिव्य-चेतना। ज्ञान जीवन-संतुष्टि की वस्तु है। चार विषयों का ज्ञान और पांच संवेदनाओं का ज्ञान शरीर से सम्बंधित है, प्रक्रिया से सम्बंधित है। ज्ञान रूप में हम संतुष्ट होते हैं, प्रक्रिया पूर्वक उसको हम प्रमाणित करते हैं।

मनुष्य ने सर्व-प्रथम चार विषयों के ज्ञान से शुरू किया, फिर पांच संवेदनाओं के ज्ञान को अपनाया। आज तक उसी में जूझ रहा है। चार विषयों और पांच संवेदनाओं का ज्ञान जीव-चेतना के स्तर का है। जीव-चेतना का यह ज्ञान मानव के लिए भ्रमात्मक है। प्रमाणात्मक ज्ञान मानव-चेतना, देव-चेतना, और दिव्य-चेतना में होता है।

ज्ञान का स्त्रोत सत्ता है। ज्ञान सत्ता स्वरूप में है। ज्ञान अमूर्त या अरूपात्मक है। अस्तित्व में अमूर्त वस्तु केवल सत्ता ही है। मानव में ज्ञान अमूर्त स्वरूप में है। इसको हर व्यक्ति अनुभव कर सकता है।

यह तर्क जो मैंने प्रस्तुत किया, वह "अमूर्त ज्ञान" के लिए आप में ध्यानाकर्षण करने के लिए किया, आशा पैदा करने के लिए किया। आप में सुख की आशा है ही।

तर्क ज्ञान नहीं है। प्रक्रिया तर्क-संगत है। ज्ञान को कैसे पाया जाए, क्यों पाया जाए - इसके लिए तर्क हो सकता है। मनुष्य व्यवहार में न्याय की अपेक्षा रखता है। विचार में समाधान की अपेक्षा रखता है। जीने में व्यवस्था की अपेक्षा रखता है। इस सब अपेक्षा को ज्ञान से ही पूरा किया जा सकता है।

मानव जीवन और शरीर का संयुक्त स्वरूप है। ज्ञान जीवन तृप्ति के लिए है। प्रक्रिया शरीर के साथ है। जीवन मूल्य और मानव-लक्ष्य साथ-साथ पूरे होते हैं। समाधान ही ज्ञान और प्रक्रिया को जोड़ता है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ (जुलाई २०१०, अमरकंटक)

आभार - प्रवीण, आतिशी (भोपाल)