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Saturday, May 23, 2009

आज्ञापालन और कृतज्ञता

अध्ययन कराना स्वेच्छा से स्वयं-स्फूर्त होता है। अध्ययन करना भी स्वेच्छा से होता है। इसमें कोई भय-प्रलोभन शामिल नहीं है। इसमें कोई "आज्ञापालन" भी शामिल नहीं है। आज के समय में आज्ञापालन तो कोई नहीं करेगा। आज्ञा का पालन होना ही नहीं है - तो आज्ञा देने का क्या फायदा? हमारे समय तक आज्ञापालन जो होना था, हो गया। समझने के लिए प्रस्ताव है - उससे आप संतुष्ट होते हैं, तो उसको समझने के लिए आपकी झकमारी है, नहीं तो मजामारी करते रहो! जिसकी झकमारी है वह समझेगा ही, जियेगा ही, करेगा ही।

आज के समय में कृतज्ञता तो मूल्यों के रूप में होगा। लेकिन आज्ञापालन होना अब बहुत मुश्किल है। यदि उपकृत होते हैं, तो कृतज्ञता सर्वाधिक लोगों में है। प्रचलित-विज्ञान विधि से चलने पर कृतज्ञता की बात ही नहीं आती। इसके विपरीत कृतघ्नता होती है। जो सिखाता है, उसी के प्रति विरोध और शत्रुता की बात आती है। अभी आप स्कूल-कॉलेज में अध्यापकों पर विद्यार्थियों द्वारा हमला करने, गोली से मारने तक की बात सुनते ही हैं।

आज हमारे देश में लाभोंमादी, भोगोंमादी, कामोंमादी शिक्षा के लिए सभी तत्पर हैं। उसको चाहते हैं, तभी ऐसा है। ऐसे में हम यह सह-अस्तित्व-वादी प्रस्ताव को रख रहे हैं। इसमें से कुछ पुण्यशीलों को यह अपील हो रहा है। प्रस्ताव आने पर लोगों का ध्यान धीरे-धीरे इसकी तरफ़ जा रहा है। आदमी में सहीपन की अपेक्षा है - तभी ऐसा है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (दिसम्बर २००८, अमरकंटक)

आंशिक-ध्यान और केंद्रीय-ध्यान

अध्ययन के लिए ध्यान देने की आवश्यकता है।

अध्ययन के पहले पठन है। पठन के लिए भी ध्यान देने की ज़रूरत है। मनुष्य का मन एक ही साथ तीन आयामों में काम कर सकता है। जैसे - बोलना, सुनना, और देखना, ये तीनो काम मन एक साथ कर सकता है। यदि तीनो आयाम (देखना, सुनना, बोलना) जब सह-अस्तित्व प्रस्ताव के अर्थ में हो जाते हैं - तो मन स्थिर हो जाता है। यह "आंशिक ध्यान" है। आंशिक-ध्यान पूर्वक पठन करना होता है। यह मन की चंचलता को हटाने का उपाय है। इसको आप आज करना चाहें तो आज कर सकते हैं, कल करना चाहें तो कल, अगले जन्म में करना चाहें तो अगले जन्म में कर सकते हैं।

मनुष्य-जीवन की विचार-शक्ति भी तीन आयामों में काम करता रहता है। विचार का स्वरूप है - मुझे कुछ चाहिए, मुझे कुछ करना है, और मेरे पास कुछ है। इस धरती के सारे ७०० करोड़ आदमियों की विचार-प्रक्रिया इन तीन आयामों में ही है। इन तीन आयामों के अलावा आदमी के पास विचारने को और कुछ भी नहीं है। आप अपने में इसको जांच सकते हैं।

अपने विचार के इन तीनो आयामों पर निषेध लगाने से "केंद्रीय ध्यान" होता है। निषेध लगाने का मतलब - न मुझे कुछ चाहिए, न मुझे कुछ करना है, न मेरे पास कुछ है। यही समाधि या "केंद्रीय-ध्यान" है। समाधि में मेरे साथ यही हुआ था। केंद्रीय-ध्यान की स्थिति में काफी समय तक रहा जा सकता है।

केंद्रीय-ध्यान का अभ्यास करने से पूर्व-स्मृतियाँ शिथिल हो जाती हैं। पूर्व-परिकल्पनाएं बंद हो जाती हैं। शरीर-संवेदनाएं और सारी आशा-विचार-इच्छाएं चुप हो जाती हैं। इस ध्यान का अभ्यास करने से अनुभव सुलभ हो जाता है, या नज़दीक हो जाता है। अनुभव-पूर्वक क्या विचार होना है - यह अभ्यास उसके लिए जगह बनाता है। यह कोई उपदेश नहीं है। आपके ऊपर लादने वाली बात नहीं है। आपकी इच्छा पर इसे छोड़ा है। केंद्रीय-ध्यान करने में यदि हम पारंगत हो जाते हैं, तो हम जो अध्ययन करना चाहते हैं - वह तुंरत समझ में आ जाता है। "केंद्रीय-ध्यान में अध्ययन पूर्ण होता है।" इसको परीक्षण किया जा सकता है। आप यदि स्वयं के प्रति ईमानदार हैं तो इसे अभी हासिल किया जा सकता है। इसमें कुछ असाध्य नहीं है।

प्रश्न: अध्ययन-विधि में आपने बताया था, समाधि bypass हो जाती है - फ़िर यह अभ्यास किस लिए?

उत्तर: यदि यह अभ्यास करते हैं, तो अध्ययन के लिए अर्हता जल्दी बन जाती है। यह करना कोई मुश्किल भी नहीं है। ऐसा नहीं है - कोई १०, २०, ५० वर्ष साधना करने की ज़रूरत हो। निषेधनी के साथ ईमानदार होते हैं, तो उसी समय समाधि है। उसी को मैंने "केंद्रीय-ध्यान" नाम दिया है। समाधि के बाद ही मैंने संयम-काल में अध्ययन किया, फलतः अस्तित्व में अनुभव किया। जल्दी यदि समझना है तो आप समाधि को देख लीजिये।

प्रश्न: यह तो आप कुछ नयी बात कह रहे हैं, जो पहले आपने नहीं कही?

उत्तर: आज यह आपके साथ चर्चा में आ गयी, तो मैंने कहा। मेरा यह विश्वास है, हर व्यक्ति समझने योग्य है। यदि पठन में अड़चन लगती है - तो "आंशिक ध्यान" का अभ्यास कर लिया जाए। यदि समझने में अड़चन लगती है - तो "केंद्रीय-ध्यान" या विचार-शून्यता का अभ्यास कर लिया जाए। अध्ययन के लिए यह ध्यान करने का अभ्यास करने की "आवश्यकता" है - यह मैं नहीं कह रहा हूँ। यह करना या नहीं करना तो आपका स्वयं का निर्णय है।

सह-अस्तित्व में अध्ययन मनुष्य की "मूल आवश्यकता" है। उसको छोड़ कर इधर-उधर भागने से थकने के अलावा क्या होगा? कुंठा के अलावा क्या होगा? निराशा के अलावा क्या होगा?

सह-अस्तित्व में अध्ययन के फलस्वरूप अनुभव होता है। फ़िर अनुभव-मूलक विधि से मानव-चेतना को प्रमाणित करने की बात होती है। अनुभव-मूलक विधि के अलावा मानवीयता को प्रमाणित करने की और कोई विधि नहीं है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (दिसम्बर २००८, अमरकंटक)

Wednesday, May 13, 2009

समझदारी का लोकव्यापीकरण

समझदारी प्राप्त होना, और समझदारी को प्रमाणित करना दो अलग-अलग संसार ही हैं। लोकव्यापीकरण में जीने के मॉडल की आवश्यकता है। समझदारी का लोकव्यापीकरण भाषण-बाजी से नहीं होता। प्रमाणों के साथ ही लोकव्यापीकरण होता है। स्वयं प्रमाण स्वरूप में रहते हुए, उसको multiply करने की बात है।

जीने के मॉडल के लिए हर बात के उत्तर की आवश्यकता है। आदमी कैसे रहेगा? परिवार कैसे रहेगा? समाज कैसे रहेगा? व्यवस्था कैसे रहेगा? संविधान कैसे रहेगा? - हर बात के उत्तर की आवश्यकता है। यह न कम है, न ज्यादा है।

समाधान सम्पन्नता में पर-मुखापेक्षा (दूसरे से दान की उम्मीद) नहीं रहता। समस्या-ग्रस्त मनुष्य ही पर-मुखापेक्षा करता है। समझदारी का लोकव्यापीकरण दान पर आधारित नहीं होगा। समृद्धि के साथ ही समाधान की गति है। बोलना आना कोई "जीना" नहीं है। जीने में समाधान ही होगा, समृद्धि ही होगा। उससे कम में मनुष्य के स्वरूप में "जीना" नहीं बनेगा। "बोलना" सूचना है। समाधान समृद्धि पूर्वक "जीना" ही प्रमाण है।

मध्यस्थ-दर्शन से पहले जो कुछ भी प्रतिपादित हुआ उसमें "परिवार" की कोई बात नहीं है। व्यक्ति की बात है, और फ़िर व्यक्ति से सीधे समाज की बात है। परिवार की कड़ी ही छूट गयी। "परिवार" शब्द मानव-परम्परा में ज़रूर है, लेकिन शास्त्रों में नहीं है। मानव-परिवार का क्या डिजाईन होगा - यह बात आज तक आए शास्त्रों में नहीं है। व्यक्ति और समाज के बीच की कड़ी परिवार ही है। सह-अस्तित्व-वाद को छोड़ कर के इस कड़ी को कोई जोड़ नहीं सकता।

मानव-जाति में शुभ स्वरूप में जीने की अपेक्षा तो है। यही समझदारी का लोकव्यापीकरण होने का आधार है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)

Sunday, May 10, 2009

कर्म-फल सिद्धांत

हर क्रिया का फल होता है। कोई क्रिया ऐसी नहीं है, जिसका फल नहीं होता हो। मनुष्य भी एक क्रिया है। मनुष्य की हर क्रिया का भी फल होता है। मनुष्य के हर कर्म (कायिक, वाचिक, मानसिक, कृत, कारित, अनुमोदित) का फल होता है। मनुष्य के हर व्यवहार का फल होता है।

पहला सिद्धांत है - "हर कर्म फलवती है।"

हम कुछ भी करेंगे, सोचेंगे, बोलेंगे - उसके फल के रूप में समाधान होगा या समस्या होगा। समाधान भी न हो, न समस्या हो - ऐसा कोई कर्म-फल नहीं है।

आदर्शवाद ने विगत में प्रतिपादित किया संसार के साथ असंग या निर्लिप्त विधि से रहने से कर्म का फल नहीं होता है। वह ग़लत है। ऐसी 'असंगता' या 'निर्लिप्तता' का मनमानी में ही अंत होता है।

दूसरा सिद्धांत है -
भ्रमित मनुष्य कर्म करने में स्वतन्त्र है, पर उसका फल भोगने में परतंत्र है।
जागृत मनुष्य कर्म करने में भी स्वतन्त्र है, और उसका फल भोगने में भी स्वतन्त्र है।

जागृति के बाद मनुष्य के कर्म, और उससे होने वाले फल-परिणाम दोनों निश्चित हो जाते हैं। इसीलिये जागृति-पूर्वक मनुष्य कर्म करने और फल भोगने दोनों में स्वतन्त्र हो जाता है। निश्चित होने के बाद स्वतंत्रता नहीं होगी तो क्या होगा?

भ्रमित-मनुष्य अपने कर्म-फल के प्रति अनिश्चयता-वश कुकर्म कर जाता है। भ्रमित मनुष्य अपने कर्म-फल के प्रति निश्चित नहीं है, इसलिए वह फल भोगने में परतंत्र है।

जागृति की ओर दिशा पकड़ लेने पर जीवन श्राप, ताप, और पाप तीनो से मुक्त हो जाता है। गलतियों की तरफ़ हमारी प्रवृत्ति जब तक है, हम गलतियों का फल भोगने के लिए बाध्य रहते हैं। जिस क्षण से हम सही की तरफ़ प्रवृत्त होते हैं, गलतियों का प्रभाव हम पर से हट जाता है। दूसरी तरह से देखें तो - अपनी गलतियों का फल भोगने के बाद ही सही की ओर प्रवृत्ति बनती है।

तीसरा सिद्धांत - सुकर्मो का फल ही वितरित होता है।

कुकर्मो का फल वितरित नहीं होता। सुकर्म वे हैं - जो नियति-सहज कर्म हैं। कुकर्म वे हैं - जो नियति-विरोधी हैं। सुकर्मो के फल को हर व्यक्ति स्वीकारना चाहता है। कुकर्मो के फल किसी को स्वीकार नहीं होते। नियति उनको छोटा बना कर ही छोड़ती है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)

Saturday, May 9, 2009

दरिद्रता से मुक्ति

समझदारी से समाधान प्रमाणित करने के बाद अपने परिवार में श्रम से समृद्धि प्रमाणित करना भावी हो जाता है। मानवीय व्यवस्था का स्वरूप निकलता है - "परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था" , जिसमें विश्व-परिवार तक के दस सोपान हैं। अपने परिवार में समृद्धि को प्रमाणित किए बिना कोई व्यक्ति विश्व-परिवार में भागीदारी नहीं कर सकेगा। चोरी, खींचा-तानी ही करेगा! समृद्धि के आधार पर ही व्यक्ति विश्व-परिवार तक अपनी भागीदारी कर सकता है। इस ढंग से मानवीय-व्यवस्था का पूरा ढांचा-खांचा दरिद्रता से मुक्त होगा।

समाधान-समृद्धि प्रमाणित किए बिना एक भी आदमी व्यवस्था में नहीं जी सकता। समझदारी के साथ व्यवस्था की स्वीकृति हो जाती है। अस्तित्व में प्रत्येक एक स्वयं में व्यवस्था और समग्र व्यवस्था में भागीदारी करता है - यह स्पष्ट हो जाता है। मानव में इस व्यवस्था का स्वरूप है - परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था।

शरीर-पोषण, शरीर-संरक्षण, और समाज-गति के लिए समृद्धि चाहिए। जितनी दूर तक समाज-गति में भागीदारी करना है, उतनी समृद्धि चाहिए। समृद्धि के साथ ही समाधान का प्रमाण दूर-दूर तक पहुँचता है। साधनों के साथ ही हम समझदारी को प्रमाणित करते हैं। साधनों को छोड़ कर हम समझदारी को प्रमाणित नहीं करते। शरीर भी जीवन के लिए एक साधन है। शरीर और जीवन के संयुक्त रूप में ही मानव है। मानव ही समझदारी को प्रमाणित करता है। शरीर-पोषण मनुष्य की एक आवश्यकता है। शरीर-संरक्षण मनुष्य की एक आवश्यकता है। ये दोनों होने पर समाज-गति की बात है। एक व्यक्ति ग्राम-परिवार व्यवस्था में भागीदारी करने का अभिलाषी है। दूसरा व्यक्ति विश्व-परिवार व्यवस्था में भागीदारी करने का अभिलाषी है। जितनी सीमा तक जो व्यवस्था में भागीदारी करने की अभिलाषा रखता है, उतना उसका साधन संपन्न होना - उसकी आवश्यकता है। इस तरह हर व्यक्ति अपनी आवश्यकता का निश्चयन कर सकता है।

आवश्यकताओं का निश्चयन आवश्यक है। "सभी की आवश्यकताएं समान होनी चाहिए" - यह जबरदस्ती है। जैसे एक व्यक्ति का पेट २ रोटी से भरता है, दूसरे का ४ रोटी से ही भरता है। एक को ३६ इंच की बनियान आती है, दूसरे को ४० इंच की बनियान ही आती है। इसको कैसे समान बनाया जाए? जितने में जो तृप्त हो, वही उसकी आवश्यकता है। आवश्यकताओं में "मात्रा" के अर्थ में समानता नहीं लाई जा सकती। मनुष्य की आवश्यकताएं "प्रयोजन" के साथ सीमित होती हैं। कार्ल मार्क्स ने नारा दिया था - "मनुष्य अपनी आवश्यकता के अनुसार उपभोग करे, सामर्थ्य के अनुसार काम करे।" यह इसलिए असफल हुआ - क्योंकि आवश्यकता का ध्रुवीकरण करने का कोई आधार नहीं दिया। समझदारी पूर्वक ही आवश्यकता का ध्रुवीकरण सम्भव है। आवश्यकता का ध्रुवीकरण "प्रयोजन" की समझ में ही होता है।

इसके अलावा - यह भी सोचा गया था, धर्म के काम करने वालों की ज़रूरतों के लिए समाज उपलब्ध कराएगा। वह सोच भी असफल हो गयी। समाज जो ऐसे लोगों को संरक्षण दिया, लेकिन उनसे समाज-कल्याण का कोई सूत्र निकला नहीं। ऐसे धर्म-कर्म करने वालों से व्यक्तिवाद और समुदायवाद के अलावा और कुछ निकला नहीं। अब समाज इनको कब तक अघोरे?

भौतिकवादी और आदर्शवादी दोनों विचारधाराओं पर चलने से मनुष्य श्रम से कट जाता है। जो जितना पढ़ा, वह उतना ही श्रम से कट गया। श्रम के बिना समृद्धि होती नहीं है।

कर्म-दासत्व से मुक्ति स्वावलंबन से ही है। नौकरी करना भी एक कर्म-दासत्व है। स्वावलंबन समाधान से आता है। उससे पहले स्वावलंबन आता नहीं है। अभी कुछ भी सेंधमारी, जानमारी, लूटमारी करके "स्वावलंबन" की बात की जाती है। स्वावलंबन वास्तविकता में है - सामान्याकान्क्षा (आहार, आवास, अलंकार) या महत्त्वाकांक्षा (दूर-गमन, दूर-दर्शन, दूर-श्रवण) संबन्धी कोई भी वस्तु का अपने परिवार के पोषण, संरक्षण, और समाज-गति की आवश्यकताओं के लिए श्रम पूर्वक उत्पादन कर लेना। समाधान के बिना स्वावलंबन का प्रवृत्ति ही नहीं आता।

दासता किसी को स्वीकृत नहीं है। मजबूरी में दासता करता है मनुष्य। यह अभ्यास में आने पर ऐसे होता है - जो करने को कहा है, वैसा नहीं करना। कम काम में ज्यादा पैसा माँगना। दासता के साथ व्यवस्था नहीं हो सकती।

प्रश्न: अभी मैं अध्ययन-क्रम में हूँ, साथ में कहीं नौकरी भी कर रहा हूँ। वह दासता मुझे स्वीकृत नहीं है। अब क्या किया जाए?

उत्तर: आपके सामने कुछ जिम्मेवारियां हैं। मानव-परम्परा अभी जीव-चेतना में ही है। ऐसे में - दाम्पत्य, अभिभावकों, और बच्चों की अपेक्षा रहता है - कमाऊ पूत बाकी लोगों का भरण-पोषण करेगा। इस मान्यता को हमें ध्यान में रख कर चलना है। इनको घायल करके नहीं चलना है। इससे पहले आदर्शवादियों ने कहा - परिवार को छोड़ दो, बच्चों को छोड़ दो, सन्यासी हो जाओ... उससे कोई प्रयोजन निकला नहीं। परिवार-जनों की अपेक्षाएं पुरुषार्थियों से ही होती हैं। जो पुरुषार्थी नहीं हैं, उनसे परिवारजन अपेक्षा भी नहीं करते। अब हमें पुरुषार्थी के साथ परमार्थी भी होना है। उसके लिए समझदारी से संपन्न होना आवश्यक है। समझदारी से संपन्न होते तक जो आप नौकरी के लिए दासता करते हो -वह कोई अड़चन नहीं है।

समझदारी से संपन्न होने के बाद स्वयं में यह विश्वास होता है कि मैं समृद्धि पूर्वक अपने सभी दायित्वों को पूरा कर सकता हूँ। जीव-चेतना में बने हुए अपने इन दायित्वों को पूरा करने के बाद ही हम समग्र व्यवस्था में भागीदारी करने योग्य हो पाते हैं। इनको काट कर, घायल कर के आगे बढ़ने का कोई रास्ता नहीं है।


- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)

संगीत का सार्थक स्वरूप

भारतीय संगीत परम्परा का अपना एक इतिहास है।

काल-खंड को 'ताल' कहा। काल-खंडो की श्रृंखला को 'लय' कहा। ताल के अनुसार राग होगा, और राग के अनुसार लय होगा - ऐसा सोचा गया। स्वर-सहित राग, और स्वर-विहीन राग - इन दोनों के बारे में सोचा गया। सप्त स्वरों को पहचाना गया। स्वरों के मूल-स्त्रोत के बारे में सोचा गया। जैसे - कोई स्वर का मूल-स्त्रोत वृषभ (सांड), तो दूसरे स्वर का मूल-स्त्रोत मयूर (मोर)... हर स्वर में तीन स्थायियों को पहचाना गया - उच्च, मध्यम, और मंद। तीनो स्थायियों पर सातों स्वरों के साथ उच्चारण/गायन कर पाने वाले व्यक्ति को संगीत में "पूर्ण विद्वान" माना।

पंडित ओमकार नाथ ठाकुर - जो राष्ट्रीय संगीतकार के रूप में पहचाने जाते थे - यहाँ अमरकंटक आए थे। यह १९६० दशक के अन्तिम भाग की बात होगी। उस समय मैं साधना-काल में ही था। मैं उस सामने मन्दिर के पीछे कुटी में रहता था। किसी से मेरे बारे में सुन कर वे मुझ से मिलने पहुंचे। उन्होंने मेरे सामने सातों स्वरों को तीनो स्थाइयों पर तीन-तीन स्थितियों पर गा कर सुनाया। जैसे - "सा" स्वर को मंद-स्थायी पर तीन स्थितियों पर गाना। और उनमें distinction मुझको समझ में आया। वह पहला व्यक्ति था, जिसको मैंने ऐसा सुना है। यह अधिकार घोर-अभ्यास के बिना आ नहीं सकता। उनको सुनने से पहले मेरा मानना था - संगीत केवल मजमा जमाने की चीज है। ओमकारनाथ ठाकुर को सुनने के बाद मैंने पाया - संगीत इतना हल्का चीज भी नहीं है!

भारतीय संगीत में सातों स्वरों प्रयुक्त होने वाले राग को 'जनक-राग' कहा, और उससे कम को 'जन्य राग' कहा। जैसे - "तोडी" एक जनक-राग है। हर 'जनक-राग' के साथ एक देवी-देवता को जोड़ा गया। तोडी राग के देवी-देवता का ओमकारनाथ ठाकुर को साक्षात्कार हुआ है, यह किंवदंती थी। मैंने उनसे पूछा - आपके बारे में ऐसा सुनते हैं, आपका क्या कहना है इस बारे में? उन्होंने बताया - "हर किंवदंती के साथ अतिशयोक्ति जुडी रहती है। तोडी गाते हुए मैं तल्लीन हो जाता हूँ - यह सही है।"

तल्लीन या तन्मय हो जाने को संगीत में "आनंद" या "पूर्णता" माना गया। संगीत का मतलब है - पूर्णता के अर्थ में गीत। पूर्णता को यहाँ अद्वैत-मोक्ष ही माना था। इसी अर्थ में गीतों को गाना ही भारतीय परम्परा में संगीत माना गया था। स्वर, ताल, लय, राग जो पहचाने - उनमें कोई परेशानी नहीं है। लेकिन संगीत के बारे में सिद्धि-चमत्कार जो जोड़ दिए - जैसे दीपक-राग से दीपक जल जाना, मल्हार-राग से वर्षा हो जाना - वह सब ग़लत है।

मध्यस्थ-दर्शन के इस प्रस्ताव के आने के बाद संगीत की परिभाषा हुई - क्रिया-पूर्णता और आचरण-पूर्णता के अर्थ में गीत-गायन। पूर्णता को यहाँ क्रिया-पूर्णता और आचरण-पूर्णता के रूप में पहचाना गया है। यही संगीत का सार्थक स्वरूप है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)
- रसोवयी ईशा का अंत

प्रमाण के बिना परम्परा नहीं है.

सह-अस्तित्व समझ में आए बिना, जीवन समझ में आए बिना - मनुष्य का जीना तो बनेगा नहीं! समझदार होना है, फ़िर समझदारी को जीने में प्रमाणित करना है - इतनी सी बात है। जीवन-जागृति मनुष्य-परम्परा में ही प्रमाणित होती है। मनुष्य-परम्परा में यह चार जगह पहुँचता है - आचरण, शिक्षा, संविधान, व्यवस्था। इन चार जगह में यदि जीवन-जागृति पहुँचा, तो मनुष्य-परम्परा प्रमाणित हुआ।

अभी इस प्रस्ताव पर आधारित व्यवस्था बनी नहीं है, इसलिए प्रवर्तन-शील होने की आवश्यकता है। प्रवर्तन-शील होना = दूसरों तक इस बात को पहुंचाने के लिए प्रयासरत होना। व्यवस्था हो जाने के बाद स्वभावशील होना बनेगा। स्वाभाविक रूप में एक पीढी अपनी समझदारी को आगे पीढी को अर्पित करेगा।

प्रश्न: क्या स्वयं अनुभव होने से पहले दूसरों को समझाने निकल पड़ने में कोई परेशानी नहीं है? क्या ऐसा करने से स्वयं के अध्ययन से ध्यान बंटने की सम्भावना नहीं है?

उत्तर: "सम्भावना" के अर्थ में आपकी बात सुनने योग्य है, सोचने योग्य है। उसके साथ यह भी देखने की जरूरत है - मनुष्य व्यक्त होता ही है। छुप कर रहने में कोई मनुष्य राजी नहीं है। मनुष्य जैसा और जितना समझता है, उतना व्यक्त होता ही है। जिसकी जितनी और जैसे व्यक्त होने की प्रवृत्ति है, वह उतना और वैसे व्यक्त होता ही है। उसके साथ ईमानदारी जुडी ही रहती है। समझ के इस प्रस्ताव को लेकर ईमानदारी के साथ ही चला जाता है, या चलना पड़ता है। बेईमानी इसमें टिकता नहीं है। टिकता भी है, तो क्षणिक रूप में।

हमारा लक्ष्य है - अनुभव का जीने में प्रमाणित होना। अभी हम जहाँ हैं - वह हमारी आज की यथा-स्थिति है। लक्ष्य और यथा-स्थिति - इन दोनों के प्रति स्पष्ट हुए बिना आगे बढ़ने का कोई स्पष्ट कार्यक्रम बनता नहीं है।

अधूरे में कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता।

फ़िर भी जो इस रास्ते पर जो जितना प्रवर्तन-शील है, वह धन्यवाद का पात्र है। प्रवर्तन-शील होने की चार stages बनी। इन चार stages में (इस बात से जुड़े) सभी हैं।
(१) प्रस्ताव की सूचना देने में प्रयासरत होना।
(२) पढाने के लिए प्रयासरत होना।
(३) समझाने के लिए प्रयासरत होना।
(४) प्रमाणित करने के लिए प्रयासरत होना।

सूचना दिया, उससे भी व्यवस्था बनने के लिए गति में कुछ योगदान हुआ। जो आज सूचना ही देता है, कल उसकी पढने में प्रवृत्ति बनती है। जो आज पढाता है, उसकी कल समझने में प्रवृत्ति बनती है। जो आज समझाता है, कल उसकी प्रमाणित करने की प्रवृत्ति बनती है। इस तरह एक से एक कडियाँ जुडी हैं।

प्रमाण परम है। प्रमाण के बाद परम्परा बनती ही है। यह बात सही है - प्रमाण के बिना परम्परा नहीं है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)

Monday, May 4, 2009

अनुभव अपने में पूर्ण होता है, उसका प्रकटन क्रम से होता है.

सह-अस्तित्व में अध्ययन के फलस्वरूप जीवन जो अनुभव करता है, वह अपने में पूर्ण ही होता है - लेकिन उस अनुभव का प्रकटन क्रमिक रूप से होता है। जब कभी न्याय समझ में आता है, साथ में धर्म और सत्य भी समझ में आता है। सत्य की रोशनी में ही न्याय और धर्म प्रकाशित है। सत्य अपने में प्रकाशित है ही। न्याय समझ में आ जाए, धर्म और सत्य समझ में नहीं आए - ऐसा कुछ होता नहीं है। इस तरह अनुभव पूर्वक दृष्टा पद में हो जाते हैं।

इस अनुभव का प्रकटन पहले मानव-चेतना के रूप में है, फ़िर देव-चेतना के रूप में, फ़िर दिव्य-चेतना के रूप में है। मानव-चेतना में हम न्याय प्रधान विधि से तीनो ईश्नाओं के साथ धर्म और सत्य को प्रमाणित करने की बात होती है। देव-चेतना में पुत्तेष्णा और वित्तेष्णा गौण रहती हैं, और लोकेष्णा के साथ - धर्म प्रधान विधि से न्याय और सत्य को प्रमाणित करने की बात होती है। दिव्य-चेतना में सत्य प्रधान विधि से न्याय और धर्म को प्रमाणित करने की बात होती है। दिव्य-चेतना में लोकेष्णा भी गौण हो जाती है।

"प्रमाणित होना" और "प्रमाणित करना" दो भाग हैं। "प्रमाणित होना" अनुसन्धान या अध्ययन रुपी साधना का फल है। "प्रमाणित करना" - अनुभव की जीने में अभियक्ति है, सम्प्रेष्णा है, प्रकाशन है।

प्रश्न: लोकेष्णा से क्या आशय है? दिव्य-चेतना में लोकेष्णा गौण होने का क्या मतलब है?

उत्तर: लोकेष्णा से आशय है - व्यक्ति के रूप में स्वयं की पहचान दूर दूर तक फैलना।

दिव्य-चेतना में व्यक्ति के रूप में पहचान की बात गौण रहती है। वस्तु (चिंतन, दर्शन, विचार, शास्त्र) प्रधान हो जाती है। दिव्य-चेतना में व्यक्ति नहीं रहेगा - ऐसा नहीं है। व्यक्ति के साथ ही वस्तु है। व्यक्ति ही दिव्य-मानवीयता का प्रमाण होता है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)

Friday, May 1, 2009

आगे की पीढी आगे!

आगे पीढी इस बात को मुझ से तो अच्छा ही प्रस्तुत करेगा। ऐसा मेरा विश्वास है। यदि यह हो पाता है, तो मानो - परम्परा बदलेगा। यह प्रस्ताव मनुष्य-परम्परा की आवश्यकता है। आज इस प्रस्ताव की जितनी आवश्यकता महसूस की जा रही है, २५ वर्ष पहले ऐसा नहीं था। परिस्थितियां मनुष्य को इस प्रस्ताव को अपनाने के लिए मजबूर कर रहा है।

मैं मनुष्य-परम्परा में विश्वास करता हूँ। मनुष्य-परम्परा पर यदि मैं विश्वास नहीं करता, तो इसको लेकर क्यों आप लोगों से जूझता? मैंने मनुष्य के जीने का minimum beautiful मॉडल प्रस्तुत कर दिया है। maximum beautiful के लिए आगे परम्परा के लिए जगह रखा है! आगे की पीढी आगे ही होगी।

बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)

ज्ञान व्यक्त होने वाली चीज है.

ज्ञान की अपेक्षा मानव के पास सदा से रहा है। सर्वप्रथम चार विषयों के ज्ञान को ही मनुष्य ने सम्पूर्ण ज्ञान मान कर जिया। उसके बाद पाँच संवेदनाओं को ज्ञान माना। इसलिए आज तक मनुष्य संवेदनशीलता के आधार पर संवदेनाओं को संतुलित बना कर रखने के अर्थ में जीता रहा। अभी तक मनुष्य ऐसे ही जीता आया है - इससे आगे जीना नहीं बना है।

इसके अलावा भी कुछ ज्ञान होता है - यह ईश्वरवाद ने लाया। किंतु ज्ञान को अव्यक्त और अनिर्वचनीय बता कर रास्ता बंद कर दिया। ज्ञान क्या है ? - यह ईश्वरवाद से परम्परा में पहुँचा नहीं।

४ विषयों में जीने से ज्यादा अच्छा ५ संवेदनाओं के अर्थ में जीना है - यह श्रेष्ठता की एक गति रही। इस तरह, जीवों से भिन्न तरीके से जीना बना। लेकिन पाँच संवेदनाओं के अर्थ में जीना भी जीव-चेतना की सीमा में ही है। जीव-चेतना विधि से मनुष्य जैसा भी जिया, जो भी कर पाया - उससे धरती बीमार हो गयी।

अब अस्तित्व-मूलक मानव केंद्रित चिंतन से यह प्रस्ताव आया - मनुष्य जाति की मानव-चेतना की ओर गति आवश्यक है। "ज्ञान व्यक्त होने वाली चीज है" - यहाँ से शुरुआत किए। यह ईश्वरवाद/आदर्शवाद के प्रस्ताव से भिन्न है। जैसे - चार विषयों का ज्ञान व्यक्त हुआ, फ़िर पाँच संवेदनाओं का ज्ञान व्यक्त हुआ, वैसे ही मानव-चेतना का ज्ञान भी व्यक्त होगा।

जीव-चेतना विधि से जीने से मनुष्य ने स्वयं तो अपराध किया ही, अपनी आगे पीढी के लिए भी खतरा पैदा किया। आगे पीढी - जिसने कोई अपराध नहीं किया, उसके लिए सुविधा करने की जगह खतरा पैदा कर दिया।

मनुष्य जाति से गलती हो गयी है - यह पता चलता है। गलती स्वीकार होता नहीं है। गलती से मुक्ति पाने की आवश्यकता महसूस होती है। उस स्थिति में जीव-चेतना से मानव-चेतना में संक्रमित होने के लिए मध्यस्थ-दर्शन का प्रस्ताव रखा है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक)