ANNOUNCEMENTS



Tuesday, July 22, 2014

अवलोकन

अवलोकन = अवधारणा के स्वरूप में वस्तु को देखने की विधि

सत्ता में सम्पृक्त प्रकृति के स्वरूप में अस्तित्व का अवलोकन है.  जीवन और शरीर के समुच्चय स्वरूप में मानव का अवलोकन है.

वर्तमान स्थिति को देखने पर अवगत होता है कि यह धरती रोग-ग्रस्त हो गयी है और मानव लक्ष्य-विहीन और दिशा-विहीन है.  यही इस पूरे अभियान का उद्देश्य है: - धरती का रोग दूर होने का उपाय मिल जाए और मानव जाति को लक्ष्य और दिशा मिल जाए.  इसी आशय से इस कार्यक्रम को शुरू किया गया है. 

- श्री ए नागराज के साथ संवाद पर आधारित (सितम्बर १९९९, आंवरी आश्रम)

अस्तित्व मूलक मानव केंद्रित चिंतन

अस्तित्व नित्य वर्तमान है - चाहे आप उसे मानें या न मानें, जानें या न जानें।  वर्तमान में जो प्रमाणित होता है, वह पहले से था ही!  जो था नहीं, वह होता नहीं! 

प्रश्न: तो आपके "अस्तित्व मूलक मानव केंद्रित चिंतन" को प्रस्तुत करने से क्या हुआ?

उत्तर: अस्तित्व तो था ही, मानव भी था ही - सीधे-सीधे अस्तित्व से मानव के जीने के सूत्रों को, सुख को अनुभव करने के सूत्रों को, समाधानित होने के सूत्रों को, समृद्ध होने के सूत्रों को, वर्तमान में विश्वास करने के सूत्रों को, सहअस्तित्व में जीने को प्रमाणित करने के सूत्रों को मानव द्वारा प्रकाशित किया गया है.   यह प्रकाशन मानव द्वारा ही संभव है.  जीव-संसार, वनस्पति-संसार, खनिज-संसार इस प्रकाशन को करेगा नहीं।  वर्तमान में प्रमाणित होने के धरातल से इस बात का प्रकाशन किया गया है.  यह केवल बातें नहीं हैं! 

अस्तित्व में मानव एक इकाई है.  मानव का अध्ययन मैंने किया है. 

 अस्तित्व मूलक मानव केंद्रित चिंतन से "मध्यस्थ दर्शन - सहअस्तित्ववाद" निष्पन्न हुआ.  हर मानव इसके अध्ययन पूर्वक समाधानित होगा और अनुभव मूलक विधि से समाधान, समृद्धि, अभय और सहअस्तित्व को प्रमाणित करेगा।  समाधान, समृद्धि, अभय और सह-अस्तित्व मानव जाति की अपेक्षा है.  इस अपेक्षा को सार्थक बनाना अस्तित्व मूलक मानव केंद्रित चिंतन द्वारा ही संभव है.  मानव इस समझदारी को उपार्जित करने के फलस्वरूप ईमानदार, जिम्मेदार और भागीदार हो पाता है.  भागीदारी का फलन ही है - समाधान, समृद्धि, अभय और सह-अस्तित्व। 

एक ध्रुव अस्तित्व है, दूसरा ध्रुव जागृति है.  जागृति का स्वरूप है - समाधान, समृद्धि, अभय, सह-अस्तित्व।

- श्री ए नागराज के साथ संवाद पर आधारित (सितम्बर १९९९, आंवरी आश्रम)

 

Sunday, July 6, 2014

जिज्ञासा और मेधावियों का वर्चस्व

मेरे बंधुओं, मेधावियों और जिज्ञासुओं,

मैं विश्वास करता हूँ, आप लोग बहुत सारे सवालों के दर्द से भर कर जिज्ञासा कऱ रहे हैं.  जब कभी मानव तीव्रता से जिज्ञासु होता है तब किसी दर्द भरे ढंग से ही मुक्ति पाने का आशय उसमें बनता है.  दर्द से मुक्ति पाने के आशय से ही मानव उस जिज्ञासा का समाधान चाहना शुरु कर देता है.  इस चाहत की वरीयता और सब चाहतों की तुलना में अधिक हो जाती है तो उसका समाधान समीचीन हो जाता है.  समाधान मिलने का कोई एक प्रकार नहीं है.  जैसे - अभी मैं आपको उपलब्ध हूँ.  कल मैं उपलब्ध नहीं भी रहूंगा तो भी अस्तित्व में सवालों का उत्तर रहता ही है.  इसमें आश्चर्यजनक कुछ भी नहीं है.  सवाल है तो उसका समाधान भी है.  सवाल जिसका जवाब न हो, वह दर्द भरा होता नहीं है.  यही इसकी कसौटी है.  मेरा स्वयं का अनुभव भी यही है.  दर्द अति तीव्र होने पर ही मेरा जिज्ञासा अति तीव्र हुआ.  दर्द तीव्र होने पर उसके निवारण की जिम्मदारी स्वीकारने और उसके समाधान को प्रमाणित करने की आवश्यकता अपने आप से बन जाती है.

प्रमाण ही मानव का मूल वर्चस्व है.  मानव समाधान से ही धनी है, न कि सवालों से!  सवालों को पैदा करने से हम विद्वान हो गए - ऐसा अभी तक सोचते रहे.  सवालों को पैदा करने से हम धनी नहीं हैं, विद्वान नहीं हैं, न मेधावी हैं.  सवाल का समाधान चाहना मेधावियों का पहला वर्चस्व है.  सवाल का समाधान समीचीन होने पर उसको अपनाना मेधावियों का दूसरा वर्चस्व है.  समाधान को प्रमाणित करना मेधावियों का तीसरा वर्चस्व है.  इन वर्चस्वों के साथ ही मेधावीजन संसार के लिये उपकारी हो पाते हैं.  केवल जिज्ञासा किया, जिसको जीना नहीं है - ऐसी जिज्ञासा से संसार का कोई फायदा होने वाला नहीं है.

आपकी पहली जिज्ञासा है - मध्यस्थ दर्शन जो मैंने प्रस्तुत किया है, उसका मतलब क्या है?

विज्ञान और आदर्शवाद के हाथ जो चीज नहीं लगी थी, वह चीज़ मेरे हाथ लग गयी.  उसका नाम 'मध्यस्थ दर्शन' है.  आदर्शवाद जो प्रतिपादित नहीं कर पाया, प्रमाणित नहीं कर पाया, दूसरों को समझाने की ताकत और तरीका पैदा नहीं कर पाया, उसी तरह विज्ञान जो पहचान नहीं पाया, प्रमाणित नहीं कर पाया, बता नहीं पाया, सोच नहीं पाया - उसका नाम मध्यस्थ दर्शन है.  अभी तक मानव इतिहास में यही दो चिंतन आये हैं - विज्ञान और आदर्शवाद। 

प्रश्न:  आपकी नज़र में आदर्शवादी चिंतन क्या है? 

आदर्शवाद "रहस्य मूलक ईश्वर केंद्रित चिंतन" की अभिव्यक्ति है.  इसके नजरिये में "ईश्वर से सब कुछ होता है."  मध्यस्थ दर्शन को अपनी स्वीकृति के रूप में प्राप्त करने के लिए इस बात को याद रखने की आवश्यकता है.  आदर्शवाद में हर बात को ईश्वर से जोड़ना चाहते हैं - ईश्वर की इच्छा से ही  पैदा हुआ, ईश्वर की इच्छा से ही रहेगा, ईश्वर की इच्छा से ही मरेगा।  पैसा मिल गया तो ईश्वर कृपा से मिल गया, यश मिल गया तो ईश्वर कृपा से, अच्छा कपड़ा मिल गया तो ईश्वर कृपा  से,   अच्छा मकान तो ईश्वर कृपा से.  दूसरे, यदि कुछ काम बिगड़ गया तो ईश्वर रूठ गए, नाराज हो गए.  इसमें शुरू में किसी को कोई आपत्ति भी नहीं थी, बाद में चर्चाएं हुईं - "ईश्वर को पहचाने बिना सब कुछ ईश्वर कृपा से होता है, ऐसा कैसे कहा जाए?"  उसका कोई उत्तर निकला नहीं।  मध्यस्थ दर्शन के निष्पन्न होने के कारण में एक यह भी रहा. 

 ईश्वर प्राप्ति के लिए पहले "ज्ञान" को ही एक मात्र मार्ग बताया था, बाद में "भक्ति" को भी मान्यता मिली.  भक्ति से भी भय-मुक्ति होती है, ऐसी परिकल्पनाएँ दी गयी.  भक्ति-मार्ग में भय से मुक्ति के लिए ईश्वर के स्थान पर देवी-देवताओं की परिकल्पना दी गयी.  देवी-देवताओं को प्रमाणित करने वाला कोई नहीं है, फिर भी बताया गया कि  उनसे भय-मुक्ति हो जाती है.  आदर्शवाद में भय को मानव की स्वाभाविक गति बताया गया है.   कोई भयभीत व्यक्ति देवताओं या ईश्वर की भक्ति से भय मुक्त हो गया हो, इसका कोई प्रमाण नहीं मिला।  कोई आदर्शवादी व्यक्ति भी नहीं मिला जो यह घोषणा करे कि मैं भय से मुक्त हो गया हूँ और भय-मुक्त विधि से जी रहा हूँ.  जिन सिद्ध लोगों को भय मुक्त माने भी थे, वे भी ईश्वर से भय मुक्ति और दरिद्रता से मुक्ति के लिए प्रार्थना करते हुए देखे गए.  ये तो करना ही है!  यदि सिद्ध लोगों को भी वही प्रार्थना करना है जो आप-हम लोगों को करना है जो सिद्ध नहीं हैं, तो उनमें और हममें फर्क क्या हुआ? 

आदर्शवाद में "जीव" और "जगत" की अवधारणा दी गयी. जिसमें भौतिक-रासायनिक संसार को जगत और मानव सहित सारे जीव-जानवरों को जीव श्रेणी में होना कहा गया है. जबकि वास्तविकता इससे भिन्न है. मानव एक अलग ही अवस्था है पशु-पक्षी से. ऐसा सामान्य देखने से दिखता भी है, इसको समझने का प्रयास करें तो यह समझ भी आता है.

इस तरह आदर्शवादी मानव को पहचानने से रह गए, उसके साथ जीवन को पहचानने से रह गए. मानव को 'जीव' बताते गए. जीव में "भय" की स्वाभाविक प्रवृत्ति होना बताये। भय के लिए "आश्रय" की आवश्यकता को बताया। वह आश्रय मूलतः ईश्वर को बताया गया। ईश्वर ही सब के भय को दूर करने वाला है, जिसकी कृपा की आवश्यकता है. ईश्वर की कृपा जीवों पर बरसती है, वह मानव पर भी बरसती है - ऐसा बताये हैं.
 उसी के आधार पर वैदिक विचार में कहना पड़ा - घोड़ा, बकरी, गाय, मेढक ये सब वेद को बोले!  इस ढंग से आदर्शवादी विचार भाषा के रूप में बहुत फैला, पर प्रमाण के रूप में कहीं नहीं पहुंचा। 

आदर्शवाद में हर बात को ईश्वर से जोड़ना चाहते हैं.  ईश्वर कैसे देता है?  कैसे छुड़ा के ले जाता है?  यदि छुड़ा कर ले जाने वाला ईश्वर नहीं है तो क्या वस्तु है?  इसको खोजने की इच्छा हुआ.  ईश्वर है तो वह वस्तु के रूप में क्या है?  ईश्वर वस्तु स्वरूप में है या केवल भाषा स्वरूप में ही है?  आदर्शवादियों ने यह भी कहा कि "नाम" प्रधान है, "वस्तु" गौण है.  जबकि यहाँ कह रहे हैं - वस्तु प्रधान है, नाम वस्तु को इंगित करने के लिये है. 

प्रश्न: आपकी नज़र में विज्ञान सार रूप में क्या कहता है?

उत्तर:  विज्ञान के अनुसार भौतिक-रासायनिक वस्तु से सब-कुछ होता है.  विज्ञान के सारे कथन का सार-भूत भाग इतना ही है.  भौतिक-रासायनिकता की सीमा में मानव आता नहीं है.  जीवन की पहचान विज्ञान द्वारा नहीं हो पायी।  विज्ञान द्वारा मानव का अध्ययन नहीं हुआ. 

- श्री ए नागराज के साथ संवाद पर आधारित (१९९९, आंवरी)

Wednesday, July 2, 2014

आकर्षण, प्रत्याकर्षण तथा कम्पनात्मक गति

परमाणु में मध्यांश और आश्रित अंशों (परिवेशीय अंशों) के बारे में आपको मैंने बताया है.  मध्यांश का आश्रित अंशों के साथ आकर्षण बना ही रहता है.  जब कभी आश्रित अंश (परमाणु की परस्परता के प्रभाव वश) मध्यांश से दूर भागने लगते हैं, उस स्थिति में मध्यस्थ बल प्रत्याकर्षण के रूप में अपने बल को नियोजित करता है, फलस्वरूप वे अच्छी निश्चित दूरी में पुनः स्थापित हो जाते हैं.  यदि आश्रित अंश बहुत पास में आ जाते हैं तो मध्यांश (मध्यस्थ बल) विकर्षण के रूप में अपने बल को नियोजित करता है, और पुनः उनको अच्छी निश्चित दूरी में अवस्थित करता है.  इसको नियंत्रण कहा. 

इस प्रकार आकर्षण-प्रत्याकर्षण पूर्वक परमाणु में कम्पनात्मक गति होती है, जिससे वह स्वभाव गति में पाया जाता है.  कम्पनात्मक गति नियंत्रण है - जो एक नृत्य है, जो खुशहाली का द्योतक है, उत्सव का द्योतक है, स्वभाव गति का द्योतक है, और मानव भाषा में हंसी-खुशी का द्योतक है.

सत्ता मूल ताकत है.  सत्ता में सम्पृक्त होने के कारण हर वस्तु बल संपन्न है और कार्यशील होने के लिये प्रवृत्त है.  कार्यशील होने के लिए उसमें आकर्षण और प्रत्याकर्षण का योग होना आवश्यक है.  आकर्षण और प्रत्याकर्षण के योगफल में कार्य-गति है.  इस सूत्र की व्याख्या परमाणु करता है, अणु करता है, अणु रचित पिंड करता है, धरती करता है, मानव करता है.  व्याख्यायित किया ही रहता है.

प्रश्न: क्रिया के स्वरूप को समझाइये?

उत्तर: जड़ संसार में श्रम, गति और परिणाम क्रिया को व्याख्यायित करते हैं.  क्रिया का मतलब ही श्रम, गति, परिणाम है.  श्रम, गति, परिणाम पूर्वक प्रत्येक परमाणु में आकर्षण-प्रत्याकर्षण के योगफल में उत्सव होता ही रहता है.  हर इकाई के अंग-अवयवों के बीच ऐसा आकर्षण-प्रत्याकर्षण होता ही रहता है.  जैसे - आपके शरीर में आँख के साथ हाथ, हाथ के साथ पाँव - इनके बीच आकर्षण-प्रत्याकर्षण पूर्वक ही उनकी कार्य गति है.  जबकि आपका शरीर एक ही है.  उसी तरह परमाणु एक ही है, पर उसके अंग-अवयव श्रम-गति-परिणाम पूर्वक उसकी क्रिया की व्याख़्या करते हैं.  क्रिया नित्य अभिव्यक्ति है, नित्य प्रकाशमान है - यह कहीं रुकता ही नहीं है.  इसकी रुकी हुई जगह को कहीं/कभी पहचाना नहीं जा सकता।  यह कहीं/कभी रुका था या रुकेगा - ऐसी परिकल्पना भ्रम है.

चैतन्य संसार में भ्रम और जागृति स्वरूप में क्रिया है.  श्रम, गति, परिणाम स्वरूप में जड़-क्रिया और भ्रम-जागृति स्वरूप में चैतन्य क्रिया है.  और कुछ होता नहीं।  इस अनंत संसार की सम्पूर्ण क्रिया मूलतः इतना ही है.

क्रिया ऊर्जा-सम्पन्नता वश है.  सत्ता ऊर्जा है.  सत्ता पारगामी है.  सत्ता को अवरोध करने वाली एक भी वस्तु नहीं है.  क्रिया एक-एक इकाइयों के रूप में है.  एक-एक होने से आशय है, उसके सभी ओर सत्ता है.  प्रत्येक एक के सभी ओर सत्ता का होना ही 'सीमा' है.  हरेक एक सीमित रूप में रचित है.  इकाई के सभी ओर  सत्ता का होना ही उस इकाई की नियंत्रण रेखा है.  सीमित इकाई गतिशील है.  परस्परता में ही गति की बात है.  परस्परता नहीं तो गति की कोई बात ही नहीं हो सकती।  शून्य में कोई गति नहीं है, जबकि क्रिया (इकाई) के अंग-प्रत्यंगों के बीच गति की बात है.  अंग-अवयवों के बीच गतिशीलता की प्रेरणा इकाई में स्वयं-स्फूर्त प्राप्त है.

प्रश्न: क्रिया और मात्रा (quantum of matter) का क्या अन्तर्सम्बन्ध है?

उत्तर: मात्रा की पहचान क्रिया सहित ही है.  क्रिया के बिना मात्रा की पहचान नहीं है.


प्रश्न: आकर्षण और प्रत्याकर्षण तथा कम्पनात्मक गति को कहाँ देखा जाए, कैसे देखा जाए, और कैसे समझा जाए?

उत्तर: आकर्षण और प्रत्याकर्षण को मानव द्वारा रोजमर्रा की जिंदगी में कई जगह पर पहचाना जा सकता है.  मानव किसी वस्तु को समझने जाता है, तो उस वस्तु को समझने पर वस्तु और मानव की परस्परता में एक सुखद उत्सव होता है.  समझने वाली वस्तु (मानव) और समझने की वस्तु (जैसे - परमाणु) के बीच की दूरी घट कर जो संगीतमय स्थिति में आते हैं - उसका नाम है समझदारी!  मानव में समझने पर तृप्ति है.  वह तृप्ति बिंदु स्वयं में एक कम्पन की स्थिति है, जो एक खुशहाली की स्थिति है.  इसको हर व्यक्ति स्वयं में देख सकता है.  यदि यह साक्षात्कार नहीं होगा, बोध नहीं होगा, अनुभव नहीं होगा तो हमारे में यह खुशहाली होगी नहीं! 

प्रश्न: इस खुशहाली को पाने की विधि क्या है?

उत्तर: अध्ययन, बोध, और अनुभव - उसके बाद प्रामाणिकता की हालत आती है.  अध्ययन की आरंभिक स्थिति है - शब्द, उसके बाद है शब्द से इंगित वस्तु।  इंगित वस्तु स्मरण से चल कर हमारे साक्षात्कार में उदय होना।  दूसरी स्थिति है - जो साक्षात्कार हुआ, वह पूरा स्वीकृत हो जाना, सदा-सदा के लिए जीवन में.  इसी का नाम है - संस्कार या वस्तु-बोध.   वस्तु बोध होने के पश्चात् होता है - अनुभव।  बोध होने और प्रमाणित होने के बीच तृप्ति-बिंदु का नाम है - अनुभव। 

हम किसी वस्तु को समझने जाते हैं, तो वस्तु को समझने पर जब हम तृप्त होने लगते हैं तो वस्तु का स्वभाव, धर्म, प्रयोजन हमारी बुद्धि में निहित हो जाता है - यही समझ है.  यह जब तक नहीं होता है, तब तक हम समझे कहाँ हैं?  शब्दों की सीमा में समझ का प्रमाण होता नहीं है.  शब्दों की सीमा में वार्तालाप हो सकता है, चर्चा हो सकती है.  घटनाओं की चर्चा करके सांत्वना लगाने की बात रहती है, प्रमाण तो होता नहीं है.  मानव में समझने पर तृप्ति है. वह तृप्ति बिंदु स्वयं में एक कम्पन की स्थिति है, जो एक खुशहाली है.  बोध और प्रमाण के बीच कम्पन की यह स्थिति आत्मा में होती है.  एक बार जो वह तृप्ति-बिंदु मिलता है तो फिर वह निरंतर आवंटित होने के लिए बना रहता है.  यही आकर्षण और प्रत्याकर्षण का तृप्ति-बिंदु है. 

- श्री ए नागराज के साथ संवाद पर आधारित (आंवरी आश्रम, सितम्बर १९९९)