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Thursday, April 18, 2013

स्वभाव गति

सहअस्तित्व में अनुभव पूर्वक मानव अपने स्वभाव (धीरता, वीरता, उदारता) में स्थित होता है और व्यवस्था में भागीदारी कर पाता है।  अनुभव से पहले "स्व-भाव" जीव-चेतना का ही होता है - क्रूर या अक्रूर।  अक्रूर को अहिंसा मान लेते हैं, क्रूर को हिंसा मान लेते हैं।  अक्रूर या अहिंसावादी को मध्यस्थ दर्शन में "पशु-मानव" कहा गया है, क्रूर या हिंसावादी को "राक्षस-मानव" कहा गया है।  राक्षस-मानव चलाता है, पशु-मानव चलता है।  अभी संसार में वैसा ही दिखता है - घर में, बाजार में, देश में, विदेश में। यही शोषण है।  धीरता-वीरता-उदारता मध्यस्थ स्वभाव है।  इस स्वभाव में स्थित होकर व्यक्ति दूसरे को "चलाता" नहीं है, न ही विवश होकर दूसरे के अनुसार "चलता" है - बल्कि सुख पूर्वक समग्र-व्यवस्था में भागीदारी करता है।

अध्ययन जीव-चेतना से मानव-चेतना में संक्रमण के लिए है।  जीव-चेतना में जीते हुए भी हर मानव में "सुख" की कामना है।  हर मानव सुख चाहता है।  सुख क्या है, यह जानता नहीं है - फिर भी सुख को चाहता है।  जीव-चेतना में शरीर को "स्व" मानता है, इसलिए शरीर संवेदनाओं में ही सुख को खोजता है।  इस तरह या तो संवेदनाओं को नकारता है या सकारता है।  इन दोनों विधियों से सुख हासिल नहीं होता।  अध्ययन सुख को हासिल करने के लिए ही है।  सुख के लिए ज्ञान चाहिए।

सुख ज्ञान पूर्वक अनुभव में आता है और मानव के जीने में समाधान स्वरूप में प्रमाणित होता है।  ज्ञान निर्णय  पूर्वक होता है।  मानव ज्ञान-अवस्था की इकाई है।  इसलिए मानव ज्ञान को स्वेच्छा पूर्वक ही अपना सकता है या अनुभव कर सकता है।  मेरी इच्छा न हो, और ज्ञान मेरे अनुभव में आ जाए - ऐसा होगा नहीं।  ज्ञान प्राप्त करने की तीव्र इच्छा तभी होगी, जब जीव-चेतना समीक्षित हो जाए और मानव-चेतना स्पष्ट हो जाये।  अध्ययन में जीव-चेतना और मानव-चेतना का विश्लेषण होता है, और मानव-चेतना की श्रेष्ठता स्वीकार होती है।  "मुझे मानव-चेतना में ही जीना है" - यह निर्णय होता है।  मानव चेतना में जीने की अर्हता आये बिना उसमे जीना बनेगा नहीं।  जीव चेतना की समीक्षा हुए बिना उससे छूटना बनेगा नहीं।  मानव चेतना में जीने की अर्हता है - हमको जीवन का स्वरूप समझ में आ जाए, सब कुछ कैसे प्रयोजनशील है और व्यवस्था में है - यह समझ में आ जाए, मानव का व्यवस्था में जीने का क्या स्वरूप है - यह स्पष्ट हो जाए।

हर मानव में कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता प्रकृति-प्रदत्त विधि से है।  कल्पनाशीलता में अर्थ निकालने का गुण है।  जो भी सुना, उसका मतलब क्या है? - यह पूछना हर मानव में स्वाभाविक रूप से बना हुआ है।  बच्चों में यह बहुत स्पष्ट देखने को मिलता है।  इसी कल्पनाशीलता में तृप्ति या सुख की "सहज अपेक्षा" है।  अध्ययन कल्पनाशीलता के आधार पर होता है।  दूसरे, मानव कर्म करने में स्वतन्त्र है।  इसका मतलब है - मानव अपनी कल्पना के अनुसार क्या करना है, उसको चुन सकता है।  यह बात जीवों से भिन्न है।  जीव-जानवर वही करते हैं, जो उनके वंश के बाकी जीव करते हैं।  जीवों के कर्म का आधार वंश है।  मानव के कर्म का आधार कल्पना है।  कल्पना का आधार समझ है।  बिना समझ के कल्पना का कोई आधार नहीं बन पाता।  मान्यताएं और आस्थाएं कल्पनाएँ ही हैं।  तर्क और भाषा भी कल्पना के ही अंग हैं।  कल्पना कल्पना का आधार बन नहीं पाता, इसलिए जीने में विश्वास नहीं आ पाता।  कल्पना का आधार कल्पना से विकसित या सूक्ष्म होना होगा।  सच्चाई का साक्षात्कार कोरी कल्पना नहीं है।  साक्षात्कार पूर्वक जो बोध होता है, वह सच्चाई के प्रति अडिग संकल्प है - वह कल्पना नहीं है, कल्पना से सूक्ष्म है।  अनुभव कल्पना नहीं है, कल्पनाशीलता का तृप्ति बिंदु है।  अनुभव जीने में प्रमाण का आधार है।  अनुभव से पहले प्रमाण नहीं है।

प्रमाण और जिज्ञासा के संयोग में अध्ययन होता है।  अध्यापक प्रमाण प्रस्तुत करता है। विद्यार्थी  जिज्ञासा को व्यक्त करता है।  केवल जिज्ञासा हो, प्रमाण न हो - तो अध्ययन नहीं है, अनुसंधान है।  प्रमाणित व्यक्ति अन्य में जिज्ञासा रूपी पात्रता को स्थापित कर देता है।  अध्ययन में ध्यान देना आवश्यक है।  अध्ययन में मन लगने पर ही  अध्ययन होगा।  मैंने इस बात को आजमाया है, यदि किसी बात का आवेश मन में होता है तो अध्ययन में मन नहीं लगता।  इसलिए अध्ययन के लिए अपने वातावरण को अपने अनुकूल बनाना बहुत आवश्यक है।  इस "अनुकूलता" का स्वरूप हर व्यक्ति के लिए एक नहीं होगा।  सबसे महत्त्वपूर्ण है - परिवार के लोगों की इसके प्रति सहमति।  यदि जिन लोगों के बीच हम दिन-रात रहते हैं, जिनके प्रति हम जिम्मेदार हैं, जिनका जीना हमसे जुड़ा है - यदि वे इस लक्ष्य के प्रति सहमत नहीं हैं, सहयोगी नहीं हैं, पूरक नहीं हैं तो अध्ययन में हमारा मन लग नहीं सकता।  इनसे भाग कर, इनको आहत करके भी अध्ययन नहीं हो सकता।  इनको साथ लेकर ही चलना होगा।  उसके लिए जो आवश्यक है, उसको करना अध्ययन के लिए सहायक है।  दूसरे, आर्थिक या स्वास्थ्य को लेकर यदि कोई परेशानी हो, तो भी अध्ययन में ध्यान नहीं लग सकता।  इस अनुकूलता को भी बनाने की आवश्यकता है।  यह भी बात सही है, यदि हमारा लक्ष्य अस्तित्व सहज है तो उसको प्राप्त करने के लिए अनुकूलता संजोने में दृश्य-अदृश्य सहयोग मिलने लगता है, संयोग बनने लगते हैं। यह सब उत्साह वर्धक होता ही है।

लक्ष्य की स्थिरता, अपनी स्थिति के प्रति ईमानदारी, वातावरण की अनुकूलता - इन तीन बातों को लेकर हम अध्ययन  में मजबूती से चल सकते हैं।  

Saturday, April 13, 2013

अध्ययन और कार्यक्रम

प्रश्न: हम जो इस दर्शन के लोकव्यापीकरण कार्यक्रम में लगे हैं, क्या वह हमारे अध्ययन के लिए सहायक है या बाधक है?

उत्तर: सहायक है।

प्रश्न: अध्ययन और लोकव्यापीकरण कार्यक्रम में अपनी भागीदारी के संतुलन को कैसे पहचाने?

उत्तर:  कार्यक्रम में भागीदारी आपके अध्ययन के लिए सहायक हो, वही संतुलन  है।

- अनुभव शिविर २०१३ में श्री ए नागराज के साथ संवाद पर आधारित