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Tuesday, July 8, 2008

धर्म और स्व-भाव

अस्तित्व-धर्म चारों अवस्थाओं में साम्य रूप से है। पदार्थ-अवस्था में अस्तित्व-धर्म है। प्राण-अवस्था में अस्तित्व सहित पुष्टि धर्म है। जीव-अवस्था में अस्तित्व, पुष्टि सहित आशा-धर्म है। ज्ञान-अवस्था (मानव) में अस्तित्व, पुष्टि, आशा सहित सुख धर्म है। धर्म "स्व" है - किसी भी ईकाई को उसके धर्म (स्व) से अलग नहीं किया जा सकता। स्व-भाव "त्व" है - या मौलिकता है। किसी भी ईकाई का स्व-भाव उसके "स्व" का सह-अस्तित्व में प्रकाशन है। स्व-भाव ईकाई का सह-अस्तित्व में प्रयोजन है। जैसे - प्राण-अवस्था 'अस्तित्व सहित पुष्टि' धर्म का सह-अस्तित्व में अपनी पूरकता और उपयोगिता का जिस प्रकार प्रकाशन करती है, वही प्राण-अवस्था का स्व-भाव है।

स्व-भाव अवस्थाओं में बदलता गया है। नियति क्रम में मानव का प्रकटन हुआ। मानव जीवों के जैसे जीने गया - तो मानव का स्व-भाव प्रमाणित नहीं हुआ। इतना ही slip हुआ है।

बाकी अवस्थाएं नियति-क्रम में अपने प्रकटन होने मात्र से अपने आप अपने स्व-भाव को प्रमाणित करती गयी। मनुष्य के साथ ऐसा नहीं हुआ - क्योंकि मनुष्य अस्तित्व को सही-सही समझने पर ही अपने स्व-भाव को प्रमाणित कर सकता है। मनुष्य के धरती पर प्रकट होने से ही उसका 'स्व' तो सुख ही रहा - जिसकी वजह से वह अनेक तरीकों से सुख को खोजने की निरंतर कोशिश करता रहा। ये कोशिशें दो categories में रही - पहली, भक्ति-विरक्ति (आदर्शवाद), दूसरी - सुविधा-संग्रह (भौतिकवाद)। लेकिन ये दोनों कोशिशें सफल नहीं हो पायीं - क्योंकि इन दोनों विधियों से अस्तित्व का अध्ययन नहीं हो पाया। इसी लिए मध्यस्थ-दर्शन का अनुसंधान भावी हो गया - जिससे अस्तित्व का सही-सही अध्ययन मानव को सुलभ हो गया। इसका अध्ययन करके मानव अपने स्व-भाव को प्रमाणित कर सकता है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (जून २००८, बंगलोर)

4 comments:

Anonymous said...

would this be right to say - that it is the dharm of any entity that needs to be 'pramanit' and it can happen only when the entity partipates fully and completely in 'sah-astitva'.

If i say it another way - that it is the 'dharm' of the entity that is projected as 'svabhava' in sah-astitva?

Rakesh Gupta said...

i agree with what you have written later... it is the 'dharm' of the entity that is projected as 'svabhava' in sah-astitva.

Anonymous said...

It is said in JV that - 'sakshatkar' happens when the meaning (arth) of word(shabd) is understood in the form of a (vastu)! It is also said that 'svabhava' and 'dharm' are values (mulya) and that it is necessary to 'understand' both to understand an entity(vastu)..

I am a little unsure if that translates to that values (mulya) are also being referred to as 'vastu'. Is it?

Rakesh Gupta said...

Vastu is fully characterized by its structure (roop), qualities (gun), swa-bhav, and dharm.

Value of any entity is its swa-bhav and dharma. In this sense, Value of an entity is inseparable from it. An entity is with its value.

A human-being needs to valuate entities to live right with them. Sakshatkar means - a human-being's aquiring the ability of valuate swabhav and dharm. The process of acquiring this ability is called adhyayan. When a human-being acquires this ability - he is able to realize its own value.

A human-being is also an entity in existence - therefore it has to have value. Human-being's value is its swa-bhav and dharm. Human-being's swa-bhav is dheerta (strength), veerta (courage), and udaarta (generosity). Human-being's dharm is happiness. This swa-bhav and dharm gets manifested in behaviour as human-values of trust (vishwas), respect (samman), reverence (shradhha), love (prem), motherliness (mamta), guidance (vatsalya), gratitude (kritagyata), glory (gaurav), and affection (sneha).