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Sunday, July 6, 2008

सुख की चाहत

शरीर को जीवन मानने पर जीवन की ४.५ क्रियाएं प्रकट हो ज़ाती हैं। मनुष्य में ४.५ क्रियाएं क्रियाशील हैं - इसके प्रमाण में सुख की चाहत प्रकट हो गयी। यह चाहत बाकी ५.५ क्रियाओं के चालित हुए बिना पूरा होता नहीं है।

प्रश्न: "मैं सुख चाहता हूँ।" - क्या इस तथ्य का मेरी बुद्धि में मुझे "बोध" पहले से ही रहता है?

उत्तर: नहीं। इसमें बोध की कोई बात नहीं है। यह "चाहत" है - जो मन में जीने की आशा का ही स्वरुप है। मन में यह आशा ही वृत्ति में विचार, और चित्त में इच्छा तक पहुँचता है। आशा, विचार, और इच्छा में सबसे ज्यादा potential इच्छा में है। इच्छा के आधार पर ही आगे अध्ययन की व्यवस्था रखी है।

प्रश्न: "सुख की चाहत" मनुष्य में कैसे आया?

उत्तर: मनुष्य ने चार विषयों (आहार, निद्रा, भय, और मैथुन) और पाँच संवेदनाओं (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध) में सुख को खोजने का अजस्र प्रयास किया - जिसमें वह असफल रहा। यहाँ असफल होने पर ही "सुख की चाहत" बनी।

मध्यस्थ-दर्शन के अनुसंधान द्वारा इस चाहत के पूरा होने का रास्ता मिल गया। यह रास्ता अनुभव-गामी विधि या अध्ययन विधि है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (जून २००८, बंगलोर)

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