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Saturday, July 5, 2008

भ्रमित-मानव की परिभाषा

भ्रमित मानव की परिभाषा है -

न्याय का याचक बने रहना, और गलती करने के अधिकार का प्रयोग करते रहना।


भ्रमित मनुष्य को गलती करने का अधिकार है। इसकी गवाही है - भ्रमित मनुष्य गलती करता है। यह जो धरती बीमार हुई है, इसके मूल में भ्रमित मनुष्य ही है। भ्रमित मनुष्य की गलतियों से ही यह धरती बीमार हुई है।

भ्रमित मनुष्य को न्याय करने का अधिकार नहीं रहता है। इसकी गवाही है - भ्रमित-मनुष्य अपने संबंधों में मूल्यों (जैसे विश्वास, सम्मान, स्नेह आदि ) को प्रमाणित नहीं कर पाता है। भ्रमित मनुष्य को भी मूल्यों की आवश्यकता है - इसी लिए भ्रमित-मनुष्य न्याय का याचक बना रहता है।

पूरी मानव परम्परा ही भ्रमित होने के कारण गलतियाँ बढ़ती गईं। अपराध बढ़ता गया। अब जब धरती ही बीमार हो गयी - तो उसकी दवाई खोजने के लिए भ्रमित-मनुष्य का ध्यान गया है। यह दवाई आदर्श-वाद और भौतिकवाद दोनों विचारधाराओं से नहीं निकल के आ सकती। इन दोनों विचार-धाराओं पर चले हुए लोगों ने मिल कर इस धरती को बीमार किया है। इन दोनों विचार-धाराओं का विकल्प चाहिए। वह विकल्प मध्यस्थ-दर्शन है। मध्यस्थ-दर्शन सह-अस्तित्व-वादी विचारधारा को लेकर आया है। इस विचार में प्रसक्त होने पर, इसको अपना स्वत्व बनाने का निश्चयन होता है। ऐसा निश्चयन होने पर उसके लिए अध्ययन करने पर यह अपना स्वत्व बन जाता है। समझदारी स्वत्व बनने पर जागृति ही प्रमाणित होती है, न्याय ही प्रमाणित होता है, धर्म ही प्रमाणित होता है, सत्य ही प्रमाणित होता है।

श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक)

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