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Tuesday, July 8, 2008

अध्ययन काल

प्रश्न: अध्ययन काल में मुझ में उत्साह और उत्सव का क्या आधार हो?

उत्तर: अध्ययन-काल में जब मैं इस बात में पक्का हो जाऊं कि "मैं समझ सकता हूँ!" - तो वही मेरे उत्साह और उत्सव का ठोस आधार बन जाता है। जब मैं यह मान लेता हूँ कि "मैं नहीं समझ सकता!" - तो वह मेरे निरुत्साह और निराशा का स्वरुप बन जाता है। यह स्थिति जब तक अध्ययन पूरा नहीं हुआ - तब तक है।

अध्ययन पूरा होने के बाद स्वयं में अनुभव-प्रमाण ही उत्साह और उत्सव का नित्य आधार होता है।

प्रश्न: अध्ययन कराने के लिए स्त्रोत व्यक्ति को कैसे पहचाना जाए?

उत्तर: अध्ययन का स्त्रोत अस्तित्व है - जो सबके लिए समान है। उसके बाद "स्त्रोत व्यक्ति" की बात है। समाधान-समृद्धि-अभय-सहअस्तित्व को जो प्रमाणित किया है, वही अध्ययन कराने के लिए स्त्रोत व्यक्ति है। इसके पहले स्त्रोत व्यक्ति होता नहीं - चाहे कुछ भी कर लो! सह-अस्तित्व के ढाँचे में ही कुछ ऐसा है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (जून २००८, बंगलोर)

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