This blog is for Study of Madhyasth Darshan (Jeevan Vidya) propounded by Shree A. Nagraj, Amarkantak. (श्री ए. नागराज द्वारा प्रतिपादित मध्यस्थ-दर्शन सह-अस्तित्व-वाद के अध्ययन के लिए)
Sunday 30 November 2008
विगत की मान्यताओं का विकल्प
सह-अस्तित्व को न पहचानने से, जीवन को न पहचानने से, मानवीयता पूर्ण आचरण को न पहचानने से - इसके विपरीत कुछ मान्यताएं रहती हैं। इन मान्यताओं में परस्पर कोई तालमेल न बैठने से मनुष्य-जाति को कोई निश्चित समझदारी हाथ लगा नहीं - जिससे न्याय प्रदायी क्षमता स्थापित की जा सके, सही कार्य-व्यवहार किया जा सके, सत्य-बोध कराया जा सके। विगत की मान्यताओं से इनको लेकर मानव जाति - ज्ञानी, अज्ञानी, और विज्ञानी - सर्वथा असफल रहे। यह फ़ैसला हम अपने में नहीं कर पाते हैं, तो इस प्रस्ताव के अध्ययन में हम आगे बढ़ नहीं सकते। विगत की किसी मान्यता के साथ इस प्रस्ताव का गुड-गोबर ही करेंगे। गुड-गोबर करेंगे तो न गुड हाथ लगना है, न गोबर!
- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक)
Saturday 29 November 2008
चेतना विकास
चेतना-विकास से मध्यस्थ-दर्शन का क्या आशय है?
चेतना विकास से आशय है - जीव-चेतना से मानव-चेतना में संक्रमित होना। जीव-चेतना का अर्थ है :- प्रिय-हित-लाभ दृष्टियों से विचार करते हुए चार विषयों (आहार, निद्रा, भय, और मैथुन) और पाँच संवेदनाओं (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध) के लिए जीना। मानव-चेतना का अर्थ है - ज्ञान (सह-अस्तित्व दर्शन ज्ञान, जीवन-ज्ञान, मानवीयता पूर्ण आचरण ज्ञान) और उससे अनुबंधित विवेक और विज्ञान के अनुसार जीना। ज्ञान-विवेक-विज्ञान कुल मिला कर मानव-चेतना का विस्तार है। मध्यस्थ-दर्शन मानव-चेतना में संक्रमित होने के लिए अध्ययन विधि (शिक्षा) को प्रस्तावित करता है।
- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक)
सह-अस्तित्व में प्रगटन-शीलता स्वाभाविक है.

पदार्थ-अवस्था ही प्राण-अवस्था को यौगिक विधि से प्रगट करता है। यह स्वयं-स्फूर्त विधि से होता है। इसको कोई बाहरी ताकत नहीं करता। विगत (आदर्श-वाद) में बताया था - "यह परमात्मा की करनी है।" मध्यस्थ-दर्शन ने परमात्मा को व्यापक स्वरूप में पहचाना। परमात्मा (व्यापक) का प्रगटन में "करने वाले" के रूप में कोई रोल नहीं है। परमात्मा (व्यापक) जड़-चैतन्य प्रकृति में प्रेरणा के स्वरूप में है ही! जड़ प्रकृति परमात्मा (व्यापक) में भीगे होने से प्रेरित है, जिससे क्रियाशील है। यह प्रेरणा नित्य है। यह प्रेरणा घटता बढ़ता नहीं है। वस्तु की क्रिया से व्यापक में कोई क्षति होता ही नहीं है। व्यापक में प्रेरणा अभी मिला, बाद में नहीं मिला, अभी ज्यादा मिला, बाद में कम मिला - ऐसा कुछ नहीं होता।
परमाणु अंश भी इस तरह ऊर्जा-संपन्न है, और घूर्णन गति के रूप में क्रियाशील है। सभी परमाणु-अंश एक जैसे हैं। परमाणु की प्रजातियों में भेद उनके गठन में समाहित होने वाले परमाणु-अंशों के अनुसार है। सभी तरह के परमाणु-प्रजातियों के प्रकट होने के बाद भौतिक-संसार तृप्त हो जाता है। उसके बाद ही वह यौगिक-क्रिया में प्रवृत्त होता है। भौतिक-क्रिया में तृप्ति के बाद ही यौगिक क्रिया में प्रवृत्ति बन जाती है। फ़िर स्वयं स्फूर्त विधि से यौगिक प्रगटन होता है। यौगिक प्रगटन के लिए समस्त प्रकार के भौतिक-परमाणु सहायक (पूरक) हो जाते हैं। यौगिक प्रगटन के लिए "भूखे" परमाणु भी सहायक हैं, "अजीर्ण" परमाणु भी सहायक हैं। यौगिक विधि से सर्वप्रथम जल ही प्रगट हुआ।
सह-अस्तित्व में प्रगटन-शीलता स्वाभाविक है। इसी प्रगटन-शीलता के आधार पर प्राण-अवस्था स्थापित हो गयी। प्राण-कोष में निहित प्राण-सूत्रों में उत्तरोत्तर गुणात्मक विकास से नयी रचना विधि का प्रगटन होता है। इसी क्रम में प्राण-अवस्था के सभी झाड़, वनस्पति, औषधि प्रगट होने के बाद प्राणावस्था तृप्त हो गयी। प्राण-अवस्था तृप्त होने के बाद जीव-अवस्था की रचनाएँ शुरू हुई। जीव-अवस्था भुनागी-कीडे (स्वेदज संसार) से शुरू हो कर अंडज और पिंडज दो प्रकार की प्रजातियाँ स्थापित हुई। उनमें से जलचर, भूचर, और नभ-चर तीनो प्रकार के जीव हुए। शाकाहारी जीवों में प्रजनन क्रिया द्वारा multiplication ज्यादा होता है। मांसाहारी जीवों में अपेक्षाकृत कम multiplication होता है। शाकाहारी संसार की संख्या में संतुलन करने के लिए मांसाहारी संसार का प्रगटन हुआ - यह मुझको समझ में आया। जीवावस्था के सभी वंश-परम्पराएं स्थापित होने के बाद मानव-शरीर रचना का प्रगटन हुआ।
मानव-शरीर रचना सर्व-प्रथम किसी जीव से ही प्रारंभ हुआ, उसके बाद मानव-परम्परा शुरू हुई। जल, सघन-वन, सभी प्रकार के जीव-जानवर प्रगट होने के बाद ही मनुष्य का प्रगटन हुआ। इन्ही के बीच मनुष्य पला। मनुष्य-शरीर के प्रगटन के साथ ही जीवन अपनी कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता प्रगट करने की जगह में आ गया। सह-अस्तित्व सहज प्रगटन विधि से इतने सब श्रम के बाद मनुष्य का प्रगटन इस धरती पर हुआ।
मनुष्य ने अपनी कल्पनाशीलता के चलते पहले वनों का संहार करना शुरू किया। विज्ञान युग आने के बाद खनिज-संसार का संहार करना शुरू कर दिया। जबकि - वन और खनिज के संतुलन से ही ऋतु-संतुलन होता है। बिना ऋतु-संतुलन के मनुष्य-जाती का धरती पर बने रहना सम्भव नहीं है। इस बात को आज के संसार के सामने highlite करने की ज़रूरत है। यह जो मैं समझा रहा हूँ - यह waste नहीं जाना चाहिए।
मनुष्य ने अपनी कल्पनाशीलता के प्रयोग से अपनी परिभाषा के अनुरूप मनाकार को साकार करने का काम बहुत अच्छे से कर लिया। मनः-स्वस्थता का खाका वीरान पड़ा रहा। मनुष्य के प्रगट होने से पहले जीव-चेतना जीव-अवस्था द्वारा प्रगट हो चुकी थी। मनुष्य ने पहले जीवों जैसे ही जीने का प्रयत्न किया, फ़िर जीवों से अच्छा जीने का प्रयत्न किया। जीवों से अच्छा जीने के लिए मनुष्य ने जीव-चेतना का ही प्रयोग किया। इससे "अच्छा लगने" तक हम पहुँच गए। "अच्छा होना" इससे बना नहीं। "अच्छा लगने" की दौड़ में सुविधा-संग्रह लक्ष्य बना कर धरती का शोषण किया, और मनुष्य-परस्परता में अपराध किया। इसके चलते चलते धरती ही बीमार हो गयी। अब विकल्प की आवश्यकता आ गयी। उसी अर्थ में मध्यस्थ-दर्शन अध्ययन के लिए प्रस्तुत है। मध्यस्थ-दर्शन (जीवन विद्या) मनुष्य-जाति के लिए जीव-चेतना से मानव-चेतना में संक्रमित होने लिए प्रस्ताव है। मानव चेतना पूर्वक ही मानव-परम्परा धरती पर बनी रह सकती है। और किसी विधि से नहीं।
- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक)
Friday 28 November 2008
प्रबोधन
मंगल-मैत्री के बिना प्रबोधन सफल हो ही नहीं सकता। मंगल-मैत्री पूर्वक हम एक दूसरे पर विश्वास कर सकते हैं। सुनने वाले और सुनाने वाले दोनों। वही है संगीत। संगीत विधि से ही सम्प्रेष्णा होता है। सुनाने वाले को यह विश्वास हो कि सुनने वाला ईमानदारी से सुन रहा है - और उसको बोध होगा। सुनने वाले को यह विश्वास हो कि सुनाने वाला ईमानदारी से सुना रहा है - वह स्वयं बोली जा रही बात में पारंगत है, प्रमाण है।
अभी की स्थिति में १२ वी कक्षा के ८०% से अधिक बच्चे पढाने वाले को नालायक मानते हैं। उनसे अपने को श्रेष्ठ मानते हैं। पैसे के आधार पर। "हमने पैसा दिया है - यह पढाएगा!" - ऐसी इनकी सोच है। पढाने वाला स्वयम आत्म-विश्वास से संपन्न नहीं है। इस स्थिति में प्रबोधन की कोई बात ही नहीं है।
बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)
सह-अस्तित्व दर्शन ज्ञान
साधना समाधि संयम पूर्वक जो मैंने अध्ययन किया - उसमें सर्वप्रथम सह-अस्तित्व को देखा। देखने का मतलब है समझा। इससे "पैदा होता है और मरता है" - इस विपदा से छूट गए। परिवर्तन होता है, परिणाम होता है - यह पता लगा। रचना की विरचना हो सकती है। मरता कुछ नहीं है। जैसे - शरीर की रचना गर्भाशय में होती है। शरीर की विरचना भी होती है। सत्ता में संपृक्त जड़-चैतन्य प्रकृति को सह-अस्तित्व स्वरूप में देखा - यही परम सत्य है। नित्य-वर्तमान यही है। मैंने जो साधना की थी, उसके मूल में जिज्ञासा थी - "सत्य से मिथ्या कैसे पैदा होता है?" उसका उत्तर मिला - अस्तित्व में कुछ भी असत्य नहीं है। अस्तित्व सह-अस्तित्व स्वरूपी है। सह-अस्तित्व में असत्य की कोई जगह ही नहीं है। "ब्रह्म सत्य - जगत मिथ्या" - जो शास्त्रों में लिखा है, वह ग़लत सिद्ध हो गया। उसकी जगह होना चाहिए - "ब्रह्म सत्य - जगत शाश्वत"।- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक )
Tuesday 25 November 2008
स्वभाव गति में ही अध्ययन होता है.
स्वभाव-गति में ही अध्ययन होता है।
मन सुनते समय भटकता है, इधर-उधर भागता है - तब स्वभाव-गति नहीं होती। मन को एक ही समय में तीन जगह रहने का अधिकार है - इसीलिये अध्ययन के लिए मन को एक जगह स्थिर करने की आवश्यकता है। इसी का नाम है - ध्यान। यदि आपने ध्यान दिया तो अस्तित्व में कोई ऐसी चीज नहीं है, जो आपको बोध न हो। अस्तित्व में किसी वस्तु पर बुरका नहीं लगा है। अस्तित्व की सभी वास्तविकताएं सह-अस्तित्व स्वरूप में प्रकट ही हैं। इसीलिये अस्तित्व को समझे हुए आदमी द्वारा दूसरे को बोध कराना सहज है। इसी का नाम "प्रबोधन" है। प्रबोधन को सुनने वाला "स्वभाव-गति" में ही receive करता है। receive करने के बाद यदि कोई बात संतुष्टि नहीं दे पाता है, उस स्थिति में सुनने वाला "जिज्ञासा" करता है - संतुष्ट होने के लिए। इस प्रकार सुनाने वाले और सुनने वाले के बीच मंगल मैत्री पूर्वक सारे बात स्पष्ट हो सकता है। सुनने वाले और सुनाने वाले को वस्तु समान रूप से स्पष्ट हो गयी - तो दोनों के बीच कोई अन्तर नहीं रह गया। इसी को "अनन्यता" या "प्रेम" कहा है।
प्रेम या अनन्यता के बारे में परम्परा में नवधा-भक्ति (नारद भक्ति सूत्र) की बात किया गया है। इसमें ९ सीढियों से गुजरने की बात कहा गया है। कब उन नौ सीढियों को कोई पूरा करेगा, किसी को पता नहीं चला!
- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)
Monday 24 November 2008
समझदारी की घोषणा का मतलब
प्रश्न: आपने अनुसंधान पूर्वक समझा, उसमें पूरा समझने के बाद ही दूसरों को समझाने की बात रही। लेकिन हम जो अध्ययन विधि से चल रहे हैं, उसमें आप कहते हैं - जितना समझे हो, उतना समझाते भी चलो। इसको समझाइये।
उत्तर: समझाने से अपनी समझ को पूरा करने का उत्साह बनता है। जैसे आपने थोड़ा सा समझा, उसको दूसरे को समझाया - उससे आप में और आगे समझने का उत्साह बनता है। यह खाका ग़लत नहीं है। यह समझने की गति बढाता है। हमें उत्सवित भी रहना है, सच्चाई को समझना भी है, और सच्चाई को प्रमाणित भी करना है। कुछ लोग पूरा समझ के ही समझाना चाहते हैं - वह भी ठीक है। कुछ लोग समझते-समझते समझाना भी चाहते हैं - वह भी ठीक है। लक्ष्य है - समझदारी हो जाए। समझदारी के बिना प्रमाण होता नहीं है। समझदारी के पूरा हुए बिना "जीना" तो बनेगा नहीं। यही कसौटी है। "जीना" बन गया तो समझदारी पूरा हुआ, समझाना बन गया। उसके बाद उत्साहित रहने के अलावा और क्या है - आप बताओ?
इसमें व्यक्तिवाद जोड़ा तो अकड़-बाजी होने लगती है। अकड़-बाजी होती है, तो हम पीछे हो जाते हैं। व्यक्तिवाद जोड़ने से पिछड़ना ही है।
प्रश्न: व्यक्तिवाद के चक्कर से बचने का क्या उपाय है?
उत्तर: स्व-मूल्यांकन को हमेशा ध्यान में रखा जाए। दूसरों को जांचने जाते हैं - तो दिक्कत है। जो स्वयं को पारंगत घोषित किया है, उसे ही जाँचिये। जैसे मैंने अपने को ज्ञान में पारंगत घोषित किया है, आप मुझको जांच ही सकते हैं। मुझको जांचने में किसीको झिझक नहीं होनी चाहिए। मुझको उससे कोई दिक्कत नहीं है।
प्रश्न: समझदारी की घोषणा का क्या मतलब है?
जो स्वयं को समझदार घोषित किया है, उसके परीक्षण से ही अध्ययन करने वाले को अपनी समझ की पुष्टि मिलती है। घोषित किए बिना आपको कोई जांचने जायेगा नहीं।
मैं पहला व्यक्ति हूँ - जिसने स्वयं को समझदारी का प्रमाण घोषित किया। एक आदमी के ऐसे घोषणा किए बिना इस कार्यक्रम में कोई गति हो ही नहीं सकती थी। कितना बड़ा भारी ख़तरा ओढ़ लिया है - आप सोचो!! इसके बावजूद मैं निर्भय हूँ, मुझे कोई आतंक नहीं, कोई शंका नहीं, किसी तरह का प्रतिक्रिया नहीं - क्या बात है यह? क्या चीज है यह? यह एक सोचने का मुद्दा है आप के लिए। मैंने जो समझदारी के प्रमाण होने का जो पहला मील का पत्थर रख कर जो रास्ता शुरू किया - वह ठीक हुआ, ऐसा मैं मानता हूँ।
- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २००८, अमरकंटक)
Sunday 23 November 2008
समाधान ही सुख है.
(2) बोध पूर्ण होने पर आत्मा सह-अस्तित्व में अनुभव करता है। सह-अस्तित्व को छोड़ कर अनुभव करने की कोई जगह ही नहीं है।
(3) सह-अस्तित्व में अनुभव ही जीवन में सुख का स्वरूप है - जिसकी निरंतरता होती है।
(4) जीवन में होने वाला सुख मानव के जीने में कार्य और व्यवहार से जुड़ता है।
(5) अनुभव मूलक कार्य और व्यवहार ही जीने में समाधान है।
(6) समाधान ही सुख है।
(7) अनुभव की व्याख्या जीने में ही होती है।
- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २००८, अमरकंटक)
अध्ययन सुगम है
जीवन क्रिया के विस्तार में जाने पर उसके १२२ आचरणों को पहचाना। (जैसे) मन की क्रियाओं को मैंने देखा है। जीवन के मन परिवेश (चौथा परिवेश) में शरीर संवेदना पूर्वक होने वाले अलग-अलग आस्वादनो की पहचान करने वाली क्रियाओं को मैंने पहचाना। इस तरह - जीवन के अध्ययन के साथ मनुष्य का भी अध्ययन हुआ। जीवन और शरीर के संयुक्त रूप में मैंने मानव का अध्ययन किया है। जीवंत शरीर सहित मैंने जीवन का अध्ययन किया। सभी में वैसे ही जीवन है, यह स्वीकारा। इसको "सिन्धु-बिन्दु न्याय" कहा। अकेले जीवन का ही अध्ययन होता, मनुष्य (जीवन और शरीर का संयुक्त स्वरूप) का अध्ययन नहीं होता - तो मनुष्य जाति के लिए इस बात का प्रयोजन नहीं निकलता। जीवन का अध्ययन मानव के जीने के अर्थ में ही है।
मैंने जो अध्ययन पूर्वक अनुभव किया वह मेरे अकेले के परिश्रम का फल नहीं है, यह समग्र मानव जाति के पुण्य का फल है - यह मैंने स्वीकार लिया। इसी लिए इसको मानव जाति को पकडाने का दायित्व मैंने स्वीकारा। मैंने जैसा अध्ययन किया वैसा ही उसको शब्दों में रखने का कोशिश किया। शब्द परम्परा के हैं - परिभाषा मैंने दी है।
अभी तक मनुष्य परम्परा में जो कुछ भी अध्ययन के आधार हैं - वे मनुष्य द्वारा ही प्रस्तुत किए गए। उन आधारों से तथ्य तक पहुँचने का कोई रास्ता नहीं मिला। प्रचलित सभी आधारों को छोड़ कर के यह बात है। परम्परा-गत आधारों पर चलने से मानव-जाति न्याय-धर्म-सत्य तक नहीं पहुँचा था, इसीलिये भ्रम-मुक्त और अपराध-मुक्त नहीं हुआ था। इसी लिए यह नया आधार अनुसंधानित हुआ। मैं इस नए आधार का प्रणेता हूँ। आप इसको जांच करके देखिये - पूरा पड़ता है या नहीं? जांचने का अधिकार हर व्यक्ति के पास रखा है।
अध्ययन विधि से पहले यह आपके साक्षात्कार में लाना है। साक्षात्कार हो सकता है, यहाँ तक आप पहुंचे। साक्षात्कार हो गया है - वहां आप को पहुंचना है। उसके बाद अनुभव हो गया है - वहां पहुंचना है। उसके बाद प्रमाण हो गया - वहां पहुंचना है। अध्ययन प्राथमिकता में आता है, तो हम जल्दी पहुँच सकते हैं। अध्ययन यदि द्वितीय-तृतीय प्राथमिकता में रहता है तो हम धीरे-धीरे पहुँचते हैं - इसमें क्या तकलीफ है? प्राथमिकता में जब तक यह नहीं आता है तब तक दूर ही दीखता है। इस बात के अध्ययन में कहीं अहमता बनता नहीं, कहीं कोई विरोध होता नहीं - इससे ज्यादा क्या सुगमता खोजा जाए?
- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २००८, अमरकंटक)
Tuesday 18 November 2008
कल्पनाशीलता की महिमा वश ही मनुष्य अस्तित्व में अध्ययन का साहस जुटा पाता है.
कल्पनाशीलता का भ्रूण रूप जीवावस्था में जीने की आशा के स्वरुप में है। जीने की आशा के प्रकाशन के रूप में जीव जानवर चयन क्रिया संपादित करते हैं. चयन क्रिया का भ्रूण रूप प्राणावस्था (पेड़ पौधों) में है। अपने लिए आवश्यक रस द्रव्यों को जड़ें चयन कर लेती हैं।
प्राणावस्था की शरीर रचनाएँ मूलतः प्राण-कोशिकाओं से बनी हैं। प्राण-कोशों में प्राण सूत्र हैं। उन प्राण-सूत्रों में रचना-विधि है, जिसके अनुरूप प्राण-कोशाएं रचना कार्य में संलग्न होती हैं। रचना-विधि में गुणात्मक परिवर्तन होने से प्राण-सूत्रों में नयी तथा और समृद्ध रचना-विधि स्वयं-स्फूर्त निकल आती है। जिससे नयी तरह की रचना तैयार होती है। इस तरीके से उत्तरोत्तर विकसित प्राण-अवस्था की रचनाएँ तैयार हो गयी।
प्राणावस्था की शरीर-रचनाओं में से कुछ में चलायमानता होते हुए भी जीवन उनको नहीं चलाता। जैसे - कीडे मकौडे, जौंक, आदि। उन जीवों में जीवन है, जिनमें - (१) सप्त धातुओं से रचित शरीर हो, (२) समृद्ध मेधस हो, (३) जो मनुष्य के संकेतों को पहचानते हों।
शरीर-रचना में विकास क्रम मनुष्य शरीर रचना तक पहुँचा। मनुष्य-शरीर रचना में मेधस पूर्ण समृद्ध हो गया। समृद्धि पूर्ण मेधस द्वारा जीवन मनुष्य शरीर द्वारा कल्पनाशीलता और कर्म स्वतंत्रता को प्रकाशित करने में समर्थ हुआ। इसी कल्पनाशीलता और कर्म स्वतंत्रता के चलते मनुष्य जंगल-युग, शिला-युग, धातु-युग, ग्राम-कबीला युग, राज-युग से चलते चलते आज तक पहुँच गया। इससे मनुष्य अपनी परिभाषा के अनुरूप मनाकार को साकार करने में सफल हो गया। लेकिन मनः स्वस्थता का पक्ष अभी तक वीरान पड़ा रहा।
मनः स्वस्थता के पक्ष को भरने के लिए मनुष्य अनुसंधान करता रहा। इसी अनुसंधान क्रम में आदर्शवाद और भौतिकवाद आए। मध्यस्थ-दर्शन का अनुसंधान भी इसी क्रम में ही हुआ। यह अनुसंधान सफल हो गया। इस अनुसंधान ने मनः स्वस्थता के स्वरूप को पहचान लिया, और जीने में प्रमाणित कर दिया। अनुसंधान को अध्ययन गम्य बनाने के लिए इसको शब्दों में प्रस्तुत किया गया। शब्द कल्पनाशीलता के लिए सहारा हैं - अर्थ तक पहुँचने के लिए। शिक्षा विधि से इस अनुसंधान के लोकव्यापीकरण के लिए प्रयास जारी हैं।
- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २००८, अमरकंटक)
मानव की परिभाषा
मानव जीवन और शरीर का संयुक्त स्वरूप है।
मनाकार से अर्थ है - रूप और गुण के अनुसार चित्रण करना। यह कल्पनाशीलता की महिमा है। जीवन में आशा, विचार, और इच्छा का संयुक्त रूप है - कल्पना। कल्पना से ही मनुष्य अपनी योजना, कार्य-योजना बनता है, उनको क्रियान्वित करता है।
मनः स्वस्थता की मनुष्य में सहज-अपेक्षा रहती है। हर मनुष्य सुख चाहता है। सुख की आशा हर मनुष्य में है। सुख की निरंतरता ही मनः स्वस्थता का स्वरूप है। समाधान ही सुख है। हर मनुष्य अध्ययन पूर्वक समाधानित हो सकता है, और सुख की निरंतरता को अपने जीने में प्रमाणित कर सकता है।
सुख की निरंतरता को जीने में प्रमाणित करना ही मनः स्वस्थता का प्रमाण है।
मनाकार को साकार करने में मनुष्य सफल हो चुका है। सामान्य-आकांक्षा (आहार, आवास, अलंकार) और महत्त्वाकांक्षा सम्बंधित वस्तुओं का उपार्जन इसी तरह हुआ।
मध्यस्थ-दर्शन मनः स्वस्थता को प्रमाणित करने के लिए एक प्रस्ताव है।
- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित।
Monday 17 November 2008
तत्-सान्निध्य, तदाकार, और तद्रूप
प्रस्ताव शब्दों में है। शब्द का अर्थ होता है। अर्थ के मूल में अस्तित्व में वस्तु होता है। अध्ययन पूर्वक वस्तु का अर्थ व्यक्ति को बोध हो जाता है।
तत्-सान्निध्य - कोई भी वस्तु सान्निध्य (पास में होना) में ही दिखता है। शब्द से इंगित वस्तु का सान्निध्य हो जाना = तत्-सान्निध्य। जैसे - "यह खाली स्थली ही व्यापक वस्तु है", इस तरह अंगुली-न्यास हो जाना व्यापक का तत्-सान्निध्य है। "यह वस्तु पदार्थावस्था है", इस तरह अंगुली-न्यास हो जाना ही पदार्थावस्था से तत्-सान्निध्य है।
तदाकार - वस्तु पर ध्यान देने से वस्तु के आकार में जब हमारा ज्ञान होता है, तब हम वस्तु को समझे। यही तदाकार का मतलब है। तदाकार विधि से हम एक एक वस्तु को पहचानते हैं। अध्ययन विधि से जीवन एक-एक वस्तु में तदाकार होता है। प्रकृति की इकाइयों के साथ तदाकार होने का मतलब उनके रूप, गुण, स्व-भाव, और धर्म को समझना। रूप और गुण के साथ मनाकार होता है। स्व-भाव और धर्म का बोध और अनुभव होता है। व्यापक वस्तु का केवल अनुभव होता है।
तद्रूप - व्यापक और ज्ञान में भेद समाप्त हो जाना ही तद्रूप है। "व्यापक वस्तु ही जीवन में ज्ञान है" - यही अनुभव में आता है।
तदाकार विधि से अध्ययन के पूर्ण होने पर जीवन तद्रूपता में स्वयं को पाता है। तद्रूपता में ही प्रमाण है।
- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २००८, अमरकंटक)
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अनुभव को बताया जा सकता है।
Thursday 13 November 2008
अज्ञात और ज्ञात
जैसे -
(१) सुख हम चाहते हैं - यह ज्ञात है। संवेदनाओं में सुख की निरंतरता नहीं है - यह भी ज्ञात है। सुख की निरंतरता का बिन्दु अज्ञात है।
(२) शरीर नश्वर है, यह हमेशा बना नहीं रहेगा - यह हमको ज्ञात है। शरीर कैसे जीवंत रहता है, जीवन वस्तु के रूप में क्या है? यह अज्ञात है।
(३) मनुष्य व्यवहार करता है - यह ज्ञात है। व्यवहार की सीमा क्या है, व्यवहार के नियम क्या हैं - यह अज्ञात है।
(४) धरती बीमार हो चुकी है - यह ज्ञात है। धरती कैसे बीमार हुई, और इसकी निरंतर स्वस्थता कैसे होगी - यह अज्ञात है।
(५) तृप्ति की मुझ में अपेक्षा है - यह ज्ञात है। तृप्ति-बिन्दु क्या है - यह अज्ञात है।
(६) मैं कल्पना करता हूँ - यह ज्ञात है। मेरी कल्पनाशीलता का तृप्ति-बिन्दु क्या है - यह अज्ञात है।
अध्ययन के लिए अपने में ये दो आधार बिन्दुओं को सटीक पहचानना बहुत ज़रूरी है। हम कहाँ खड़े हैं, और कहाँ हमको जाना है - जब तक यह स्पष्ट नहीं होगा, तो हमारा आगे चलने का कार्यक्रम कैसे बनेगा?
अध्ययन कराने वाले व्यक्ति को पहचानना जरूरी है। प्रमाणित व्यक्ति ही अध्ययन करा सकता है। प्रमाणित व्यक्ति के अनुभव के प्रकाश में ही विद्यार्थी अध्ययन कर सकता है। यदि आप भी नहीं जानते, मैं भी नहीं जानता - तो हम दोनों एक दूसरे के साथ सहानुभूति तो कर सकते हैं, मदद भी कर सकते हैं, पर अध्ययन के स्त्रोत नहीं बन सकते।
अध्ययन की विधि को ठीक समझना भी ज़रूरी है। अध्ययन शब्द से अर्थ तक पहुँचने की विधि है। शब्द कल्पनाशीलता का सहारा है। शब्द अर्थ को इंगित करता है। साक्षात्कार तक शब्द है, उसके बाद अर्थ है. अर्थ का बोध व्यक्ति को ही होता है। बोध पूर्ण होने तक अध्ययन है।
- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)
Wednesday 12 November 2008
समृद्धि पूर्वक जीने का तरीका समझदारी से ही आता है.
विरक्ति विधि से मैं साधना में रहा। उससे जो अभाव हुए - उनसे मैं पीड़ित नहीं हुआ। शास्त्रों में लिखा भी है - पीड़ित न होना ही पात्रता है। अभाव से मैं पीड़ित नहीं हुआ - मतलब अभाव पर विजय हो गया। साधना के सम्बन्ध में जो शास्त्रों में लिखा है, वह अपूर्व है, कल्पनातीत विधि से लिखा है! साधना के फल में जो मुझे मिला - वह पता लगा कि यह अकेले की सम्पदा नहीं है। यह तो मानव-जाती की सम्पदा है। इसको मानव-जाती को अर्पित करना चाहिए। यह स्वीकारने के बाद मैंने यह पाया - अभी तक जो मैं विरक्ति मॉडल में जो चला, वह तो कोई मॉडल नहीं है। सही मॉडल समाधान-समृद्धि ही है। समाधान अनुभव पूर्वक मेरे पास हो गया था, समृद्धि का कृषि-गोपालन और आयुर्वेद से जुगाड़ कर लिया।
वस्तु (अनुभव) प्राप्त हो जाना एक बात है, उसको प्रमाणित कर देना अलग बात है। अनुभव प्राप्त होने के बाद उसको प्रमाणित करने के लिए उसको लोकव्यापीकरण करने के लिए मॉडल चाहिए। मानव कैसे रहेगा, परिवार कैसे रहेगा, सम्पूर्ण मानव कैसे रहेगा, शिक्षा कैसे रहेगा, संविधान कैसे रहेगा, आचरण कैसा रहेगा - हर बात के जवाब की आवश्यकता है। यह न कम है, न ज्यादा है।
उसके बाद यह आया - जहाँ पाये, वहाँ के लोगों को इसे समझाओगे, या कहीं दूर जा कर समझाओगे। न्याय तो यही है - जहाँ पाये, वहीं के लोगों को समझा दो। इसमें मेरा सहमती बन गया। इसलिए समृद्धि को प्रमाणित करने की निष्ठां बनी। जनता के पैसे की मेरी कोई अपेक्षा नहीं रही। समाधान-अधिकार में परमुखापेक्षा (दूसरे के दान की उम्मीद) स्वीकृत नहीं होता। समस्या से ग्रसित मनुष्य ही परमुखापेक्षा करता है।
मनुष्य जाती में आज तक शुभ से जीने की अपेक्षा तो रही, पर शुभ का मॉडल नहीं रहा। अब वह मॉडल आ गया है। स्वयं तृप्त होने के बाद उसको प्रमाणित करने करने की बात रहती है। multiply करने में बहुत से लोग शुभ का स्वागत करने के लिए बैठे हैं। बहुत से लोग शुभ को लेकर शंका करने के लिए भी बैठे हैं। इन दो चैनल में आपको आदमी मिलेगा ही। जो जिस चैनल में जाना चाहता है, जाए। इसमें कोई जबरदस्ती नहीं है। जिसकी पहले ज़रूरत है, वह पहले आएगा - जिसकी ज़रूरत उसके बाद बनती है, वह उसके बाद आएगा। यह एक प्रस्ताव है, आवश्यकता के अनुसार ही यह स्वीकार होगा।
हर व्यक्ति समझदार होने योग्य है।
हर व्यक्ति सुखी होना चाहता है।
समझे बिना कोई सुखी होता नहीं है।
सुखी होने की चाहना जिसकी प्राथमिकता में पहले आता है, वह जल्दी समझेगा। जिसकी प्राथमिकता में बाद में आता है, वह बाद में समझेगा।
- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)
निश्चयता से ही स्वतंत्रता है।
जागृत व्यक्ति कर्म करने में भी स्वतन्त्र है, और फल भोगने में भी स्वतन्त्र है।
भ्रमित व्यक्ति कर्म-फल के प्रति निश्चित नहीं होता है, इसलिए वह फल भोगने में परतंत्र है। जागृति के बाद हर कर्म निश्चित है और उसका फल भी निश्चित है। जागृत व्यक्ति कर्म-फल के प्रति निश्चित है - इसलिए स्वतन्त्र है।
निश्चयता से ही स्वतंत्रता है।
- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)
सही और ग़लत
गलती की ओर हमारा प्रवृत्ति जब तक है तब तक हम अपनी गलतियों का फल भोगते ही हैं।
जिस क्षण से सही की ओर प्रवृत्ति हो जाती है, उसी क्षण से गलतियों का प्रभाव हम पर ख़त्म हो जाता है।
- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)
प्रमाण के बिना परम्परा नहीं है।
अब आपके सामने स्वयं की जागृति को पहचानने के लिए एक प्रस्ताव आ गया है। इसके पहले अभी तक कोई प्रस्ताव नहीं है जो शिक्षा विधि से आया हो। इससे पहले विगत में कहा था - "साधना विधि से कल्याण होता है।" - वह व्यक्ति के साथ ही चला गया। साधना विधि से जो भी उपलब्धि हुआ - वह मानव परम्परा को नहीं पहुँचा। कोई व्यक्ति भी पहुँचा था या नहीं - इसका भी कोई प्रमाण नहीं हुआ। हम मानते रहे - वह बात अलग है।
जागृति के लिए पुरुषार्थ ( पुरुषार्थ = जागृति के लिए हम जो भी प्रयास करते हैं। )
जागृति के बाद परमार्थ (परमार्थ = जीने में प्रमाण प्रस्तुत करना। )
प्रमाण के बिना परम्परा नहीं है। मूल्यांकन का आधार प्रमाणित होना ही है।
जागृति मनुष्य को प्राप्त करना अभी शेष है - इस कमी को मानव हर शरीर यात्रा पर्यंत महसूस किया रहता है कि असफल रहे। उसका कारण है - मनुष्य परम्परा में जागृति का न रहना। इसलिए मानव-परम्परा में जागृति के स्त्रोत को जोड़ने की आवश्यकता है। इसका मतलब जागृति को - आचरण में, व्यवस्था में, संविधान में, और शिक्षा में विधि को स्थापित किया जाए। इन चारों जगह पर परम्परा बनने के स्वरूप में बना दिया जाए। उसी के अर्थ में मध्यस्थ-दर्शन सह-अस्तित्व-वाद का प्रस्ताव है।
- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)
सार्थकता के प्रति समर्पण
भौतिकवाद ने मनुष्य को एक भौतिक-रासायनिक रचना बताते हुए मानव का निर्मुल्यन किया। मनुष्य को संवेदनाओं की कठपुतली के रूप में पहचाना। संवेदनाओं को राजी रखने के लिए सुविधा-संग्रह को मनुष्य का लक्ष्य बताया। सुविधा-संग्रह सभी को नहीं मिल सकता - इसलिए संघर्ष और शोषण अनिवार्य हो गया। जिसके चलते धरती बीमार हो गयी।
ये दोनों बात सार रूप में समझ आने के बाद आदमी को पूछने की ज़रूरत है - सार्थकता क्या है? सार्थकता के प्रति स्वयं में समर्पण होने की आवश्यकता है।
- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)
नियम, नियंत्रण, संतुलन
पदार्थावस्था में उनके गठन के अनुसार आचरण ही नियम है।
परिणाम-अनुशंगियता ही नियंत्रण है।
पूरकता-उपयोगिता ही संतुलन है।
प्राणावस्था में उनका सारक-मारक आचरण ही नियम है।
बीजानुशंगियता ही नियंत्रण है।
पूरकता-उपयोगिता ही संतुलन है।
जीवावस्था में उनका क्रूर-अक्रूर आचरण ही नियम है।
वंशानुशंगियता ही नियंत्रण है।
उनमें (जीने की) आशा से उनकी पूरकता-उपयोगिता ही संतुलन है।
ज्ञानावस्था (मानव) में न्याय ही नियम है।
धर्म ही नियंत्रण है। मानव समाधान (सुख) पूर्वक ही नियंत्रित रहना देखा जाता है। समाधान = सुख = मानव धर्म।
सह-अस्तित्व स्वरूपी सत्य ही संतुलन है। संतुलन ही प्रमाण (self realization) है।
गणित न्याय, धर्म, सत्य, नियम, नियंत्रण, और संतुलन को छूता भी नहीं है। अभी विज्ञानी गणित की मदद से यंत्र के लिए जो डिजाईन बनाता है, जिससे यंत्र बार बार वही करता रहता है - उसको नियम कह देता है। जबकि वह नियम नहीं है। सभी नियम प्राकृतिक हैं।
- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)
विकल्प को समझना
एक बात को तो हमको निर्मम रूप में स्वीकार करना पड़ेगा कि हमको जागृति पूर्वक ही जीना है।
समझदारी होने तक सभी स्वतन्त्र हैं अपने मन की करने के लिए। समझदारी के लिए व्यक्ति का चाहत जब प्रबल होता है - तभी अध्ययन की तरफ़ आते हैं। समझदार होने पर, समझदारी के साथ जीने के लिए ईमानदारी स्वयं-स्फूर्त होती है। जिम्मेदारी स्वीकार होती है। भागीदारी के रूप में प्रमाणित होती है। ऐसा होना सभी की अपेक्षा है।
- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)
Tuesday 11 November 2008
अनुभव को बताया जा सकता है.
अनुभव सम्पन्नता के बाद आत्मा में जो बीज रूप में अनुभव है - वह मनुष्य की परस्परता में संप्रेषित होता है। "यह अनुभव का मुद्दा है" - यह अंगुली-न्यास होता है। जैसे - व्यापक वस्तु आपको बोध कराने के लिए मुझको संप्रेषित होना ही पड़ेगा। व्यापक वस्तु का अपने चित्त में चित्रण करने के लिए मेरे पास अनुभव है। व्यापक वस्तु की महिमा करने जाता हूँ - तो उसको अपने चित्त में चिंतन करने का माद्दा मेरे पास है। जैसे - पारगामियता और पारदर्शिता का चिंतन करने का माद्दा मेरे पास है। व्यापक अनुभव का मुद्दा है।
मैं व्यापक वस्तु के बारे में बोलता हूँ, आप सुनते हैं। सुनने से व्यापक वस्तु के बारे में आप जाते हैं। व्यापक वस्तु की पारगामियता और पारदर्शिता को जब मैं स्पष्ट करता हूँ तो वह आपके मन में पहुँचता है, विचार में पहुँचता है, चित्रण में पहुँचता है। इस का साक्षात्कार आपमें तुलन पूर्वक होता है, जिसके स्वीकृत होने पर आप में बोध और अनुभव हो ही जाता है। इस तरह व्यापक आपके अनुभव में आ गया।
अनुभव को बताया जा सकता है। अनुभव को बताने का प्रयोजन है - मानव-परम्परा को जागृत करना।
- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक)
अच्छा लगना, अच्छा होना नहीं है.
मनुष्य जैसे बौखला गया है। क्या बोलने से अच्छा लगेगा, इस जगह में आ गया है। ज्यादा लोगों को जो बोलने से अच्छा लगता है, वह बोल देता है। "अच्छा होना" तो हवा में है।
समझदारी पूर्वक समाधान संपन्न होने से ही अच्छे होने की शुरुआत है। उसका प्रस्ताव आपके सामने अध्ययन के लिए आ चुका है।
- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक)
शुभकामना का कार्य रूप
उत्तर: हमारी शुभ-कामना सामने व्यक्ति के पुण्य से ही फलित होती है। पुण्य का मतलब है - कायिक, वाचिक, मानसिक रूप से मानव जो न्याय करता है, समाधान को प्रस्तुत करता है, उससे है। शुभ-कामना सामने व्यक्ति को शुभ करने के लिए उत्साहित करने के अर्थ में है। उससे ज्यादा कुछ नहीं। शुभ-कामना इस तरह से शुभ के लिए प्रेरणा देने के रूप में है। इसका स्वाभाविक रूप इतना ही है। यदि इसमें थोड़ा भी कुछ और होता तो - अस्तित्व की स्वयं-स्फूर्तता के नियम का हनन होता! प्रकृति में इसके अलावा और कोई व्यवस्था ही नहीं है। श्राप और अनुग्रह के चक्कर में संसार कितना परेशान हुआ - यह अपने आप में एक इतिहास है!
शुभ-कामना होता है - यह सही है।
शुभ घटित होता है - यह भी सही है।
शुभ के लिए मानव प्यासे हैं - यह भी सही है।
अब यहाँ कह रहे हैं - समझदारी के आधार पर कार्य-व्यवहार करने से ही शुभ घटित होता है।
इस ढंग से यह बात सामान्य हो गयी। समझदारी को अध्याव्सायिक (अध्ययन या शिक्षा) विधि से प्रमाणित करने की आवश्यकता थी - उसमें मैं सफल हो गया! इस बात का लोकव्यापीकरण भले ही धीरे-धीरे हो - लेकिन इतने में तो मैं सफल हो गया। अध्ययन विधि से आदमी समझदार हो सकता है - इस जगह में तो मैं आ गया हूँ।
- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक)
पिछली पीढी के प्रति कृतज्ञता और सम्मान का आधार क्या हो?
उत्तर: हमारे माता-पिता ने हमको यह शरीर दिया (जन्म दिया) - इस अर्थ में हम उनके प्रति कृतज्ञ हो सकते हैं। दूसरे - वे जैसे भी रहे हों, हमारे अच्छे होने के लिए वे सदा आशा बनाए रखे - इसके लिए हम उनके प्रति कृतज्ञ हो सकते हैं। ये दोनों मौलिक बातें हैं। ये टलने वाली बातें नहीं हैं। तीसरे - बचपन में वे हमारी सेवा किए हैं, उसके लिए हम उनके प्रति कृतज्ञ हैं।
इन तीन बिन्दुओं को क्या मिटाया जा सकता है? इनके लिए केवल कृतज्ञ ही हुआ जा सकता है। इस तरह हमको पिछली पीढी के प्रति कृतज्ञ होने का स्त्रोत मिल गया।
सम्मान करने के बारे में - हमारे अभिभावक हमारा शुभ ही चाहते रहे हैं, उन्होंने मेरा अशुभ नहीं चाहा है, इस आधार पर हम उनका सम्मान कर सकते हैं। इसमें किसको क्या तकलीफ है?
बुजुर्गों को हम सिखाने-समझाने की बात स्वप्न में भी न सोचा जाए! हमसे कोई बुजुर्ग सीखेगा नहीं। हमारे पिताजी हमसे तो सीखने वाले नहीं हैं। पिताजी का हम सम्मान कर सकते हैं, वे हमारा शुभ चाहते रहे - इस आधार पर।
अभी आज की शिक्षा प्राप्त बच्चों का सोच ऐसा जाता है - हमारे बुजुर्गों ने अपने व्यसन के अर्थ में संतान को पैदा किया! यहाँ ले गए। "आधुनिक" विज्ञान संसार ने हमको यहाँ ला कर खड़ा कर दिया है। इसमें क्या न्याय होगा - आप बताओ? बहुत कष्ट-दायक बात है न यह? ऐसे कष्ट-दायक कसौटी पर जाने के बाद हमारा जगह कहाँ है? क्या करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए? इस मानसिकता से सोचने पर बुजुर्गों की सेवा करने के स्थान पर उनसे घृणा करना बनता है। जबकि सह-अस्तित्व वादी विधि से कैसे आसानी से कृतज्ञता और सम्मान मूल्यों के अर्थ में अपने बुजुर्गों की सेवा करने का रास्ता निकल जाता है।
- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक)
Sunday 9 November 2008
जीवन ज्ञान
दूसरा भाग है - जीवन ही दृष्टा, कर्ता, और भोक्ता है। मानव जीवन और शरीर का संयुक्त रूप है। अनुभव पूर्वक जीवन दृष्टा पद में होता है। कर्ता और भोक्ता मानव है। अनुभव का प्रमाण मानव-पद में होता है। शरीर गर्भाशय में रचित होता है। जीवन अस्तित्व में रहता ही है।
क्रमशः
Friday 7 November 2008
कल्पनाशीलता के प्रयोग से ज्ञान तक पहुँचने का का रास्ता है.
कल्पना ही ज्ञान तक पहुँचने का रास्ता है। कल्पना नहीं है तो ज्ञान तक पहुँचने का कोई रास्ता ही नहीं है। कल्पनाशीलता के प्रयोग से सह-अस्तित्व स्वरूपी सत्य को समझना ही ज्ञान के लिए रास्ता है। इसके लिए ध्यान देना होता है। ध्यान देना मतलब मन को लगाना। हम जो चयन और आस्वादन करते हैं - उस वस्तु का नाम है मन। ये दो क्रिया करने वाले मन को अनुभव के पक्ष में लगाने को ध्यान देना कहा। मन जब लगता है, तब विचार और इच्छा भी उसके साथ रहते ही हैं। मन किस बात में लगाना है - इसकी प्राथमिकता इच्छा में ही तय होती है। जिस इच्छा को हम प्राथमिक स्वीकारते हैं - उसी के लिए काम करते हैं। अनुभव की आवश्यकता जब तीर्वतम इच्छा के स्तर पर पहुँच जाती है - तब मन लगता ही है। मन लगता है तो अध्ययन होता ही है।
मानव जीवन और शरीर का संयुक्त स्वरूप है। मानव में कल्पनाशीलता जीवन से है, शरीर से नहीं है। कल्पनाशीलता ही जीवन में ज्ञान-सम्पन्नता का भ्रूण स्वरूप है। कल्पनाशीलता जीवन की ताकत है। यही कल्पनाशीलता गुणात्मक विकास विधि से ज्ञान-सम्पन्नता तक पहुँचता है। सह-अस्तित्व स्वरूपी सत्य की समझ ही ज्ञान है। तात्विक रूप में ज्ञान व्यापक ही है।
- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अक्टूबर २००८, भोपाल )
अध्ययन विधि से बुद्धि में बोध होता है.
शब्द का स्मरण अध्ययन नहीं है।
शब्द के अर्थ को समझना अध्ययन है।
शब्द का अर्थ हमारा स्वीकृति होता है - यह स्मरण नहीं है। स्वीकृति बुद्धि में बोध रूप में होता है। शब्द का अर्थ जब बुद्धि में आता है - तब हम समझे हैं। शब्द का अर्थ बुद्धि में ही स्वीकृत होता है - उसके पहले भी नहीं, उसके बाद भी नहीं।
अर्थ को समझने के बाद बुद्धि में ही उसको प्रमाणित करने की प्रवृत्ति होती है। बुद्धि में जब सह-अस्तित्व बोध होता है - तब आत्मा में स्वयं की प्रव्रत्ति रहती है - अस्तित्व में अनुभव करने की। बुद्धि में बोध होने पर आत्मा का अस्तित्व में अनुभव करना भावी है। उसके लिए कोई training की ज़रूरत नहीं है। जीवन का मध्यांश अनुभव के योग्य रहता ही है - इसलिए बुद्धि में बोध के बाद आत्मा अनुभव करता ही है।
बुद्धि में बोध होने के लिए सर्वसुलभ विधि अध्ययन-विधि ही है। अध्ययन के लिए मन को लगा देना ही अभ्यास है।
अनुभव के फलस्वरूप प्रमाण बोध बुद्धि में होता है। इस अनुभव-मूलक प्रमाण बोध को प्रमाणित करने के क्रम में चित्त में चित्रण, वृत्ति में न्याय-धर्म-सत्य के अर्थ में तुलन/विश्लेषण, और मन उसी के अनुरूप आस्वादन-चयन के रूप में प्रमाणित हो जाता है। इस ढंग से जीवन अनुभव के बाद जीवन अनुभव के साथ तदाकार हो जाता है।
- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)
विरक्ति-वाद और आसक्तिवाद का विकल्प
विरक्ति से क्या मिल गया? - यह मानव परम्परा को आज तक पता नहीं चला।
आसक्तिवाद से भोग-अतिभोग में गए, और धरती बीमार हो गयी।
मध्यस्थ-दर्शन विरक्ति-वाद और आसक्तिवाद दोनों का विकल्प है।
- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)
प्रामाणिकता के आधार पर ही न्याय, धर्म, और सत्य है.
मानव चेतना विधि से हम तीन ईश्नाओं के साथ जीते हैं - तब हम न्याय प्रधान विधि से जीते हैं। साथ ही धर्म और सत्य को प्रकाशित करते रहते हैं। उपकार करते रहते हैं। प्रधान रूप में तीन ईश्नायें ही रहती हैं। तीनो ईश्नाओं को लेकर के उपकार करते हैं।
उसके बाद देव-मानव पद में वित्तेष्णा और पुत्तेष्णा को गौण करके लोकेश्ना को लेकर चलते हैं। इस प्रकार देव-मानव धर्म-प्रधान विधि से न्याय और सत्य को प्रमाणित करता है। सत्य प्रमाणित करने का मतलब है - उपकार करना।
दिव्य-मानव उपकार प्रधान विधि से धर्म और न्याय को प्रमाणित करता है।
मानव-जाती का उद्धार (तरन-तारण) इसी विधि से है। इससे किसको क्या तकलीफ है?
- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)
Thursday 6 November 2008
तर्क का प्रयोजन
उत्तर: तर्क का मतलब है - क्यों और कैसे का उत्तर दे पाना। ऐसा तर्क एक प्रेरणा है। तर्क-सम्मत अभिव्यक्ति वस्तु तक पहुंचाने का एक bridge है। तर्क स्वयं में कोई वस्तु नहीं है।
अभी आदमी-जात तर्क के लिए तर्क करता है। क्यों-कैसे पूछने को तर्क मान लिया है - पर ऐसा होता नहीं है। इस चंगुल से छूटने की आवश्यकता है।
तर्क-संगति चित्रण तक जाता है। चिंतन में जाता नहीं है। चिंतन में कोई तर्क नहीं है। बोध में कोई तर्क नहीं है। अनुभव में कोई तर्क नहीं है। अनुभव प्रमाण में कोई तर्क नहीं है।
- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (भोपाल, अक्टूबर २००८)
सत्ता ही ज्ञान है.
उत्तर: ऊर्जा-सम्पन्नता प्राकृतिक है। ऊर्जा-सम्पन्नता वश सभी जड़ (भौतिक-रासायनिक) और चैतन्य (जीवन) इकाइयाँ क्रियाशील हैं।
कल्पना जीवन-क्रिया है। जीवन क्रियाशील है, मतलब जीवन ऊर्जा संपन्न है। जीवन भी सत्ता में डूबा, भीगा, घिरा है। सत्ता ही ज्ञान है - जिसकी सम्पन्नता वश जीवन (गठन-पूर्ण परमाणु) कल्पना करता है।
आप कल्पना करते हो या नहीं? कैसे करते हो? - यह इसका उत्तर है। इसको समझने के लिए आप अपने स्वयं की गवाही को मानो। यह मूल बात है। यह समझ में नहीं आता है, तो आगे कुछ भी समझ में नहीं आएगा।
प्रश्न: इसको फ़िर से समझाइये!
उत्तर: ऊर्जा-सम्पन्नता के बिना कुछ काम नहीं करता। ऊर्जा-सम्पन्नता है ही सब में। मनुष्येत्तर प्रकृति में यह ऊर्जा क्रियाशीलता के रूप में है। मनुष्य प्रकृति में यह ज्ञान-शीलता के रूप में है। ज्ञान-शीलता का प्राथमिक रूप कल्पनाशीलता है। उसी से ही मनुष्य काम करता है। अब आप काम करने को देख पाते हो, काम के मूल में जो ऊर्जा (ज्ञान) है, उसको नहीं देख पा रहे हो! वह दर्शन आप में तैयार हो, ऐसी मैं कामना करता हूँ।
प्रश्न: कैसे तैयार होगा? क्या करें जिससे मुझ में वह दर्शन तैयार होगा?
उत्तर: क्रियाशीलता के मूल में ऊर्जा-सम्पन्नता है, इस विधि से परामर्श करते जाते हैं, तो वह जो जाता है। अनुभव में यही समझ में आता है। अनुभव का जो नारा लगा रहे हैं - उसमें यही समझ में आता है। अनुभव के लिए ध्यान दें। (इस प्रस्ताव के) हरेक शब्द से सूचना (information) है। शब्द का अर्थ होता है। अर्थ के मूल में जो वस्तु होता है, वह समझ में आना अनुभव है। अनुभव के आधार पर प्रमाण है। प्रमाण के आधार पर सारे संसार को समझाना बनता है। प्रमाण के बिना समझाना नहीं बनता। हमें स्वयं प्रमाण स्वरूप होना होगा, तभी हमको दूसरे को अध्ययन कराने का अधिकार है।
- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (भोपाल, अक्टूबर २००८)
Wednesday 5 November 2008
सत्य से मिथ्या कैसे पैदा होता है?
"सत्य से मिथ्या कैसे पैदा होता है?" - यह मेरा प्रश्न था।
तत्कालीन रमन मह्रिषी ने मुझे बताया, इसका उत्तर समाधि में ही मिल सकता है। उसके आधार पर हम अमरकंटक चले आए, साधना किया, और समाधि होने पर यह पाया - उसमें ज्ञान नहीं हुआ! उसके बाद संयम करने पर सह-अस्तित्व स्वरूप में अस्तित्व को देखा। उसको हम लोगों के सम्मुख रखना चाहते हैं - उसमें विरोध का विजय होता है। हर व्यक्ति को समझदार बनाने से विरोध का विजय होता है। यह शिक्षा-संस्कार पूर्वक होता है।
- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (भोपाल, अक्टूबर २००८)
ईश्नाएं और उपकार
(१) पुत्तेष्णा
(२) वित्तेष्णा
(३) लोकेषणा
पुत्तेष्णा = जन बल कामना ( मानव परम्परा के धरती पर बने रहने के लिए वंश-वृद्धि के लिए कामना पुत्तेष्णा है।)
वित्तेष्णा = धन बल कामना ( परिवार के समृद्धि पूर्वक जीने के लिए प्राकृतिक सम्पदा पर श्रम नियोजन से धन की कामना वित्तेष्णा है।)
लोकेषणा = यश बल कामना ( अपने अच्छे कार्यों के लिए लोगों में अपनी पहचान के लिए कामना लोकेषणा है। )
मानव परम्परा को ज्ञान-संपन्न बनाना ही उपकार है। दूसरे शब्दों में समझे हुए को समझाना, सीखे हुए को सिखाना, और किए हुए को कराना ही उपकार है।
मानव चेतना में तीन ईश्नाओं के साथ मनुष्य उपकार करता है। देव-चेतना में लोकेषणा के साथ उपकार करता है। दिव्य-चेतना में केवल उपकार करता है।
ईश्नाओं के बिना मानव-परम्परा कैसे होगा? मानव-परम्परा के बने रहने के लिए पुत्तेष्णा, वित्तेष्णा, और लोकेषणा आवश्यक हैं।
- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (भोपाल, अक्टूबर २००८)
मनुष्य चारों अवस्थाओं को उनके आचरण के आधार पर पहचानता है।
उत्तर: मनुष्य चारों अवस्थाओं को उनके आचरण के आधार पर पहचानता है।
हर इकाई क्रियाशील है, सत्ता में सम्पृक्त्ता के कारण। क्रियाशीलता के मूल में परमाणु हैं, जो परमाणु-अंशों के निश्चित गठन हैं। अस्तित्व सह-अस्तित्व होने के कारण उसमें अनुक्रम विधि से प्रकटन है। इसलिए पदार्थावस्था, फ़िर प्राणावस्था, फ़िर जीव-अवस्था, फ़िर ज्ञान अवस्था है।
ये अवस्थाएं उनके "आचरण" से पहचानी जाती हैं। आचरण क्रिया के definite pattern को कहते हैं। आचरण के अनुसार ही मनुष्य विभिन्न अवस्थाओं की इकाइयों को पहचानता है। क्योंकि यह मानव-केंद्रित चिंतन है, इसलिए मनुष्य की पहचान के लिए ही ये classifications किए गए हैं।
पदार्थ-अवस्था में आचरण उसके रूप (structure) से मनुष्य को स्पष्ट हो जाता है ।
प्राण-अवस्था में आचरण उसके केवल रूप से स्पष्ट नहीं होता। मनुष्य को प्राण-अवस्था का आचरण उसके गुण (attributes) से स्पष्ट हो जाता है।
जीव-अवस्था में आचरण उसके स्वभाव से स्पष्ट होता है। जीव-अवस्था में शरीर-रचना के अनुसार जीवन स्व-भाव को प्रकट करता है। जीव का आचरण उसके रूप और गुण (क्या करता है) से स्पष्ट पूरा नहीं होता। जब तक मनुष्य को जीव के "गुणों की उपयोगिता" अपने लिए समझ नहीं आती, तब तक वह उसके आचरण की पहचान नहीं कर सकता। यहाँ उपयोगिता मानव के लिए है। मानव ही जीव की पहचान कर रहा है ।
मनुष्य की निश्चित पहचान उसके धर्म से होती है। मनुष्य की पहचान उसके रूप, उसके गुण (skills), उसके स्व-भाव (अ-मानवीय, मानवीय, देव-मानवीय, दिव्य-मानवीय) से नहीं हो पाती। चाहे मनुष्य भ्रमित हो या जागृत - उसका धर्म सुख है। हर मनुष्य सुख ही चाहता है। यही मनुष्य को पहचानने का तरीका है। मनुष्य का आचरण सुख के अर्थ में ही होता है। इसलिए मनुष्य धर्म-प्रधान है।
स्त्रोत: मध्यस्थ दर्शन
मानव धर्म एक, समाधान अनेक
उत्तर: समाधान सर्वतोमुखी होता है - क्योंकि मनुष्य एक बहुमुखी अभिव्यक्ति है। सभी दिशाओं में समाधान चाहिए। इसलिए समाधान अनेक है। सभी समाधान जीवन में सुख से जुड़े हैं । जीवन में सुख एक ही है,
जो मानव धर्म है। इसलिए मानव धर्म एक, समाधान अनेक ।
सुख का अनुभव करने वाले जीवन द्वारा समाधान जीने में प्रमाणित होता है।
- स्त्रोत: मध्यस्थ-दर्शन।
Tuesday 4 November 2008
सत्ता में सम्पृक्त्ता वश प्रकृति क्रियाशील है।
सत्ता में सम्पृक्त्ता वश ही जड़ और चैतन्य प्रकृति क्रियाशील है। सभी क्रियाओं का आधार सत्ता ही है।
जैसे -नियम कोई क्रिया नहीं है। पदार्थ-अवस्था नियम-सम्पन्नता से क्रियाशील (आचरण-शील) है। "नियम" शब्द व्यापक को ही इंगित करता है।
ज्ञान कोई क्रिया नहीं है। जागृत-मनुष्य ज्ञान-सम्पन्नता से क्रियाशील (आचरण-शील) है। "ज्ञान" शब्द व्यापक को ही इंगित करता है।
मैं क्रियाशील हूँ, सब कुछ क्रियाशील है - यह प्राकृतिक है। मैं कैसे क्रियाशील हूँ? सब कुछ कैसे क्रियाशील है? - यह मनुष्य को समझने की आवश्यकता है। यह समझ में आना = सत्ता में प्रकृति की सम्पृक्त्ता समझ में आना = अस्तित्व में व्यवस्था का सूत्र समझ में आना = स्वयम का व्यवस्था में होने, और समग्र व्यवस्था में भागीदारी करने का स्वरूप समझ में आना।
प्रश्न: हमको तो व्यापक एक खाली स्थान दीखता है, इससे ज्यादा नहीं! यह खाली स्थान "ऊर्जा" है, इस बात को कैसे समझें?
उत्तर: व्यापक में हम भीगे हैं, डूबे हैं, घिरे हैं - इस तरफ़ आदमी ने सोचा ही नहीं है! हम चारों तरफ़ से व्यापक से घिरे हैं, इस बात से प्रमाण आता है - हम इसमें डूबे हैं। इसके बाद मनुष्य में कल्पनाशीलता है। कल्पनाशीलता केवल मनुष्य में ही है। कल्पनाशीलता के आधार पर ही हम "ज्ञान" तक पहुँचते हैं। व्यापक ही ज्ञान है।
इस प्रस्ताव को जब जीने में परीक्षण करने जाते हैं, तब यह स्वीकार हो जाता है।
प्रश्न: परीक्षण कैसे करें?
उत्तर: इस समझ से जीना ही इसका परीक्षण है। आपके जीवन में ज्ञान (व्यापक) कल्पनाशीलता के रूप में है ही। आपके शरीर में व्यापक ऊर्जा-सम्पन्नता के रूप में है ही। इसी को अनुभव करने की बात है। स्वयं का निरीक्षण-परीक्षण करने से ही अनुभव होगा।
कल्पनाशीलता के आधार पर ही हम ज्ञान तक पहुँचते हैं। हर मनुष्य में कल्पनाशीलता प्राकृतिक विधि से एक अधिकार है। उस अधिकार को अध्ययन के लिए प्रयोग करने की बात है।
समझदारी से समाधान, और श्रम से समृद्धि प्रमाणित होती है।
- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (भोपाल, अक्टूबर २००८)
Sunday 2 November 2008
सत्ता में संपृक्त प्रकृति
इकाइयों का वैभव ही मध्यस्थता है। वैभव की ही परम्परा बनती है। जैसे - दो अंश का परमाणु का एक निश्चित आचरण है। सभी दो अंश के परमाणुओं का वैसा ही निश्चित आचरण है। यही दो अंश के परमाणु का वैभव है। वैसे ही नीम के, आम के झाड़ का आचरण निश्चित है। भालू, बाघ, और गाय का आचरण निश्चित है। मनुष्य का आचरण निश्चित होना अभी बाकी है। यही मुख्य मुद्दा है। मनुष्य का निश्चित आचरण समझदारी के बिना आएगा नहीं।
इकाइयां क्रियाशील हैं - यह समझ में आता ही है। साम्य ऊर्जा अपने में कोई क्रिया करता नहीं है। जैसे ज्ञान, विवेक, विज्ञान हैं - ये अपने आप में कोई क्रिया नहीं हैं। ज्ञान को execute करना क्रिया है। ज्ञान को पूरा execute ज्ञान-अवस्था का मानव ही कर सकता है। ज्ञान जो है - वह तेरह digits में समाया है। चार विषयों (आहार, निद्रा, भय, मैथुन) का ज्ञान, पाँच संवेदनाओं (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध) का ज्ञान, तीन ईश्नाओं का ज्ञान (पुत्तेष्णा, वित्तेष्णा, लोकेश्ना) और उपकार का ज्ञान।
इसमें से चार विषयों का ज्ञान जीव-जानवर भी प्रकाशित करते हैं। उनमें विषयों का ज्ञान है - तभी तो उसको प्रकाशित करते हैं। जीव जानवर पाँच संवेदनाओं का उपयोग करते हैं, इन चार विषयों में जीने के लिए। मनुष्य जब धरती पर प्रकट हुआ - तो उसमें सुख की चाहत जन्म-जात रही। संवेदनाओं में मनुष्य को सुख भासा। मनुष्य ने कल्पनाशीलता और कर्म स्वतंत्रता वश पाँच संवेदनाओं को राजी रखने के लिए सारा करतूत शुरू किया। इसी क्रम में आहार, आवास, अलंकार को लेकर जीव जानवरों से बिल्कुल भिन्न जीना शुरू कर दिया। साथ में दूर-श्रवण, दूर-दर्शन, और दूर-गमन के तमाम साधनों को प्राप्त कर लिया। इसी क्रम में मनुष्य ने अपने को जीव-जानवरों से ज्यादा अच्छा मान लिया! पर ऐसा मानने से मनुष्य का अच्छा-पन कोई प्रमाणित नही हुआ। ज्ञान के बाकी चार भाग अज्ञात रहने के कारण मनुष्य ने धरती के साथ अपराध किया, बाकी तीनो अवस्थाओं के साथ असंतुलन किया, और मनुष्य जाती के साथ भी अन्याय किया। यह सब के चलते ऐसी स्थिति में पहुँच गए की आज धरती ही बीमार हो गयी।
इसलिए मनुष्य को ज्ञान के बाकी चार पक्षों को पहचानने की आवश्यकता है। यदि धरती पर बने रहना है तो! इसी के लिए मध्यस्थ-दर्शन का विकल्प प्रस्तुत है। जरूरत है, तो अपनाएगा आदमी जात!
- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)
क्रियाशीलता और आचरण-शीलता
- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (भोपाल, अक्टूबर २००८)
समाधान और समस्या
- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (भोपाल, अक्टूबर २००८)
अस्तित्व में प्रकटन है, उत्पत्ति नहीं
यह इस धरती की ही बात नहीं है, अनंत धरतियों पर ऐसा ही है।
पदार्थ-अवस्था में ही एक जलने वाला वस्तु (hydrogen), और एक जलाने वाला वस्तु (oxygen) - ये दोनों मिल कर यौगिक विधि से प्यास बुझाने वाली वस्तु (पानी) को प्रोजेक्ट कर दिए। कैसे इस सह-अस्तित्व सहज प्राकृतिक गवाही (natural evidence) को छुपाया जाए, कैसे इसको प्रकट करने में शरमाया जाए?
मध्यस्थ-दर्शन प्राकृतिक गवाहियों का ही अध्ययन है।
- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (भोपाल, अक्टूबर २००८)
भार-बंधन और अणु-बंधन
उत्तर: परमाणुओं, अणुओं, और उनसे रचित रचनाओं में जो संगठित होने की बात जो है - वही भार-बंधन है। साम्य-सत्ता (व्यापक) में संपृक्त रहने से परमाणु-अंशों में चुम्बकीय बल सम्पन्नता रहती है। इसी के कारण उनमें एक दूसरे के साथ जुड़ने वाला गुण है, जिसको "भार-बंधन" कहा है। अनेक परमाणुओं के भार-बंधन पूर्वक एक अणु के रूप में संगठित होने से "अणु बंधन" है। अणु-बंधन से सारी प्राकृतिक रचनाएँ हैं - जैसे मिट्टी, पत्थर, मणि, और धातु। ये सभी रचनाएँ व्यवस्था के अर्थ में हैं।
जड़ जगत में भार-बंधन और अणु-बंधन की उपयोगिता है। जीवन गठन-पूर्ण परमाणु है, इसलिए वह इस बंधन को नकारता है। जीवन सामयिक रूप में (शरीर यात्रा के दौरान) जड़ जगत की उपयोगिता को स्वीकारता है, और स्वयं भी उसके लिए पूरक होता है।
- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (भोपाल, अक्टूबर २००८)
Saturday 1 November 2008
भ्रमित मनुष्य में जीवन की स्थिति
उत्तर: भ्रमित अवस्था में शरीर को ही "मैं" माने रहते हैं। जागृत होने पर जीवन को "मैं" के रूप में जानते और मानते हैं। जीवन एक गठन-पूर्ण परमाणु है। जिसका मध्यांश आत्मा है।
प्रश्न: भ्रमित-मनुष्य में इस मध्यांश का क्या कार्य रूप होता है?
उत्तर: भ्रमित मनुष्य में मध्यांश का कोई रोल ही नहीं है। भ्रमित मनुष्य में मध्यांश "होने" के रूप में है, "रहने" के रूप में नहीं! "होना" प्राकृतिक-विधि से हो गया। "रहना" - जागृति-विधि से होता है। बुद्धि के साथ भी वैसे ही है। चित्त में न्याय-धर्म-सत्य तुलन दृष्टियों के साथ भी वैसे ही है। जीवन में कल्पनाशीलता- कर्म-स्वतंत्रता वश भ्रमित स्थिति में भी ज्ञान का अपेक्षा बना रहता है।
प्रश्न: कोई आदमी गलती करता है, उसको फ़िर बुरा लगता है - यह कैसे होता है?
उत्तर: हम अच्छा होना चाह रहे हैं, पर अच्छा हो नहीं पा रहे हैं - इसलिए होता है ऐसा।
प्रश्न: "अच्छा होना चाहने" की बात कहाँ से आ गयी?
उत्तर: अच्छा होना चाहने की बात हर मनुष्य में है। अच्छे होने की कल्पना जीवन की ४.५ क्रिया में ही हो जाती है। हम अपने घर-परिवार, गाँव, देश के लोगों से अच्छा होना चाहते ही हैं। यह ४.५ क्रिया में हुई कल्पना ही है। यह अच्छा होना चाहना ही आगे अध्ययन का आधार है।
प्रश्न: अध्ययन-रत मनुष्य के साथ बुद्धि और आत्मा की क्या स्थिति है?
उत्तर: अध्ययन-काल में साक्षात्कार पूर्वक बुद्धि सही पन को स्वीकारता है। अनुभव में पहुँच के, आत्मा और बुद्धि ही प्रमाण रूप में प्रकट होती है।
- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (भोपाल, अक्टूबर २००८)
मध्यस्थ क्रिया का मतलब
इन तीन stages में "बने रहने" के stage में वस्तु की उपयोगिता (purpose) है। "बने रहने" का स्वरुप ही वस्तु का "आचरण" है। वस्तु के बने रहने में ही उसका वैभव है, जिसकी "परम्परा" होती है। वही मध्यस्थ है। वस्तु की उपयोगिता सिद्ध होना ही उसकी "मध्यस्थता" है। पैदा होना (उद्भव) stage उपयोगिता "के लिए" हैं। विलय हो जाने के बाद वह उपयोगिता नहीं रहा।
मध्यस्थ-दर्शन का मतलब है - अस्तित्व में वस्तुओं की उपयोगिता (purpose) को समझना। मनुष्य ही यह समझता है। समझने पर ही मनुष्य अस्तित्व में स्वयं की उपयोगिता को सिद्ध कर पाता है। मनुष्य की उपयोगिता या वैभव सिद्ध होती है - मानव परम्परा में। मानव परम्परा के आधार-स्तम्भ हैं - आचरण, शिक्षा, विधि (संविधान), और व्यवस्था।
- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (भोपाल, अक्टूबर २००८)