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Thursday 18 December 2008

अध्ययन का महत्त्व और अध्ययन की वस्तु - भाग-१


अध्ययन के मुद्दे पर जो मैंने अनुभव किया है - अक्षर, शब्दों, वाक्यों को पढ़ना अध्ययन नहीं है। यह पूरा का पूरा "पठन" ही कहलाया। मैंने ऐसे परिवार में शरीर यात्रा शुरू की, जिसमें लाखों वैदिक ऋचाओं को मुखस्थ कर, वापस बोल कर दिखाए हैं। लाखों ऋचाओं को! इससे ज्यादा कुछ कहा नहीं जा सकता। ये सब करने के बावजूद इससे हम सर्व-मानव के शुभ के लिए एक सूत्र भी प्रस्तुत नहीं कर पाये। इसी कष्ट को मिटाने के लिए मैंने ५० वर्ष अपना सारा प्रयत्न किया। थोड़ा समय इसमें जरूर लगाए - ५० वर्ष मैंने इसमें लगाया! इन ५० वर्ष का जो अनुभव है, वह मैं आप के सामने रखने जा रहा हूँ।

हर शब्द का अर्थ होता है - किसी भी भाषा में हो! संसार में अनेक भाषाएँ तैयार हुआ है। संसार की सभी भाषाओँ के मूल में अर्थ निकालने जाएँ तो यही है कि - "सत्य भासना चाहिए"। सच्चाई दूसरों तक पहुंचना चाहिए। दूसरों के अन्तःकरण में सच्चाई प्रवेश होना चाहिए। यह बात "भाषा" के अर्थ में हमको इंगित होता है। यह अपेक्षा सब में है। कोई भाषा मैं आपसे सुनूंगा तो कोई सच्चाई मुझे मालूम होगा - ऐसा मेरी अपेक्षा है। मुझसे कोई दूसरा भाषा सुनेगा तो उसकी भी यही अपेक्षा होगी कि कोई सच्चाई मुझसे उसको सुनने को मिलेगा। यह बात सबमें समान है। इसी आधार पर सारे वेदों की रचना हुई। तीनो वेद सच्चाई को बताने के लिए प्रतिज्ञा लिया। सच्चाई के बारे में अंत में बताया कि सच्चाई अव्यक्त है, अनिर्वचनीय है। अनिर्वचनीय मतलब - शब्दों से जिसको बताया नहीं जा सकता। यह मेरे कष्ट का कारण हुआ। और सबके लिए यह कष्ट का कारण हुआ या नहीं - यह मैं नहीं कह सकता। मेरे लिए यह तकलीफ का कारण हुआ। सत्य भी हो, सच्चाई भी हो - पर अव्यक्त भी हो, अनिर्वचनीय भी हो - तो बाकी वचनीय क्या हुआ? इस तरह - वचनीय सब मिथ्या हो गया? इसी तकलीफ को दूर करने के लिए मैंने प्रयत्न किया।

उस प्रयत्न में मैं अपने को सफल मानता हूँ।

मेरे सफल हो जाने मात्र से यह सबके लिए सफल होगा या नहीं होगा - इस बात को मैं आज नहीं कह सकता। मैं जो अनुभव किया हूँ उसको मैं विनय ही कर सकता हूँ। उसको समझना हर व्यक्ति की जिम्मेवारी है। और उस जिम्मेवारी के साथ रखी है - स्वतंत्रता। चाहे समझें, या न समझें। किंतु इस बात की मुझ में स्वीकृति है - मैंने जो पता लगाया है उसमें सच्चाई को बांस पे चढ़ कर, चिल्ला कर बोला जा सकता है - अच्छे से! और सच्चाई एक से दूसरे को समझ में आयेगी! ऐसा मेरा विश्वास है। यहाँ से मैं शुरू किया हूँ।

इसी आधार पर अध्ययन के मुद्दे पर आपको इंगित करना चाहा - "हर शब्द का अर्थ होता है।" वह अर्थ शब्द नहीं है। अर्थ मनुष्य को समझ में आता है। दूसरे किसी को समझ में आएगा नहीं। पत्थर को हम बोलेंगे - वह समझेगा नहीं। शब्द का प्रभाव पत्थर पर भी होता है। वनस्पतियों पर भी होता है। जानवरों पर भी होता है। मनुष्य पर भी होता है। मनुष्य पर होने के बाद उसका अर्थ खोजने की इच्छा मनुष्य में बनी हुई है। हर मनुष्य में कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता प्रभावशील है। आज पैदा हुए बच्चे में भी, और कल मर जाने वाले बुड्ढे में भी यह प्रभावशील है। कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता - इसी के आधार पर हर मनुष्य में कहे गए शब्द के अर्थ तक पहुँचने की इच्छा बनी हुई है। यही एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को अध्ययन कराने का स्त्रोत है। सर्वप्रथम मनुष्य में अध्ययन करने का स्त्रोत बना है कि नहीं यह सोचना मेरा दायित्व था। उसमें पता लगा - हर व्यक्ति में यह पूंजी रखी हुई है। क्या पूंजी? कुछ भी सुनेगा तो पूछेगा - इसका मतलब क्या है? इस ओर जाने का अधिकार सबमें रखा है। सर्व-मानव में रखी हुई इस कल्पनाशीलता कर्म-स्वतंत्रता की पूंजी को समझ करके ही मैंने अध्ययन होने पर विश्वास किया।

- जीवन विद्या राष्ट्रीय सम्मलेन में बाबा श्री नागराज शर्मा के उदबोधन से (२२ अक्टूबर २००५, मसूरी)

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