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Wednesday, January 7, 2009

समाधान और समृद्धि

कल्पनाशीलता के आधार पर ही मनुष्य ने कर्म-स्वतंत्रता का प्रयोग किया। कर्म-स्वतंत्रता को आजीविका का आधार बनाया। आजीविका के दो तरीके बने - श्रम-जीवी और बुद्धि-जीवी। श्रम-जीवी में हाथ-पैर चला कर पैसा पैदा करने की बात रही। बुद्धि-जीवी में बिना हाथ-पैर चलाये (भाषा के आधार पर) पैसा पैदा करने की बात रही। "बुद्धि-जीवी" के पास कोई बोध रहा नहीं! "श्रम-जीवी" के पास भी बोध नहीं रहा। समाधान के अभाव में दोनों तरह से आजीविका अर्जित करने के तरीके समृद्धि तक नहीं पहुंचे।

समाधान सभी के लिए समान है। सह-अस्तित्व में अनुभव-संपन्नता ही समाधान है। समृद्धि का आकार सभी के लिए समान नहीं है। समृद्धि का मतलब सभी के लिए एक ही है। जैसे एक आदमी रोटी खा कर तृप्त हो जाता है, दूसरे को रोटी से ही तृप्ति है। समृद्धि का मतलब है - परिवार में निश्चित आवश्यकता से अधिक उत्पादन करके वस्तु से तृप्त हो जाना। समृद्धि का आकार परिवार में ही तय होता है।

मनुष्य ने अपनी कल्पना-शीलता और कर्म-स्वतंत्रता का तृप्ति सुविधा-संग्रह में खोजा - वह सफल नहीं हुआ। सुविधा-संग्रह का तृप्ति-बिन्दु किसी भी आदमी को नहीं मिला। दूसरे कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता का तृप्ति-बिन्दु खोजा भक्ति-विरक्ति में - वह भी सफल नहीं हुआ। भक्ति-विरक्ति रहस्य में फंस गया, व्यवहारिक नहीं हुआ, परम्परा में प्रमाणित नहीं हुआ।

मनुष्य के पास ५ विभूतियाँ हैं - जिनके आधार पर मनुष्य ने जीने का प्रयास किया। वे हैं - रूप, बल, धन, पद, और बुद्धि। पहले आदमी "रूप" (रंग और नस्ल) के आधार पर जिया। उसके बाद "बल" के आधार पर जिया - जैसे जंगल में जानवर जीते हैं। उसके बाद "धन" और "पद" के आधार पर जिया। इन चारों के आधार पर जीने से तृप्ति-बिन्दु मानव को हाथ नहीं लगा। अब केवल "बुद्धि" बची। बुद्धि के आधार पर जीने के लिए बोध-संपन्न होना आवश्यक है। यह शिक्षा-संस्कार (अध्ययन) पूर्वक ही होता है। गुणात्मक परिवर्तन विधि से ही संस्कार की स्वीकृति होती है। बुद्धि के आधार पर जीने जाते हैं तो पहले न्याय ही प्रमाणित होता है। फ़िर धर्म प्रमाणित होता है। फ़िर सत्य प्रमाणित होता है। न्याय-धर्म-सत्य मानव-परम्परा में ही प्रमाणित होता है।

मध्यस्थ-दर्शन मनुष्य के बुद्धि के आधार पर जीने के लिए अध्ययन का प्रस्ताव है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (दिसम्बर २००८, अमरकंटक)

1 comment:

Gopal said...

Rakesh,
Thank you so much for putting these discussion with Baba. Although many of these discussions appear similar but I always encounter some missing piece here and there while going through these.
Plz. keep up this great work.
Best Regards,
Gopal.