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Saturday, February 27, 2010

जीवन के शक्ति और बल - भाग १



मानव जीवन और शरीर का संयुक्त स्वरूप है.  यद्यपि अनेक जीव भी जीवन और शरीर के संयुक्त स्वरूप हैं, किन्तु मानव ही समझने योग्य और प्रमाणित करने योग्य है.  मनुष्य की शरीर रचना में सप्त धातुओं का संतुलन है और समृद्धि पूर्ण मेधस है जिससे जीवन अपनी जागृति को व्यक्त कर सकता है.  इससे कम समृद्ध मेधस और सप्त धातुओं का संतुलन जीव संसार में है.  उससे पहले भौतिक-रासायनिक संसार में मेधस-तंत्र का कोई लक्षण, प्रकाशन व प्रमाण नहीं है.  यह चिंतन मानव से ज्यादा सम्बंधित है.  मानव ही जागृति को प्रमाणित करने योग्य है.  बाकी रासायनिक-भौतिक संसार यांत्रिक रूप में कार्य कर रहा है.  इसके बावजूद ये त्व सहित व्यवस्था को प्रमाणित करते हैं, यह आपको यकीन दिलाया है.  मनुष्य ही एक मात्र ऐसी इकाई है जो अपनी त्व सहित व्यवस्था को अभी तक आये दो चिन्तनो - आदर्शवाद और भौतिकवाद द्वारा - पहचान नहीं पाया है.  अब इस नए चिंतन द्वारा हम मानव के त्व सहित व्यवस्था स्वरूप को पहचान सकते हैं.

मानव के अस्तित्व में होने का प्रयोजन है - सहअस्तित्व सहज प्रमाणों को प्रस्तुत करना.  प्रमाणों को प्रस्तुत करना ही मानव का व्यवस्था में जीने का स्वरूप है.  व्यवस्था में भागीदारी स्वरूपी प्रमाण की ही निरंतरता होती है.

शरीर की रचना गर्भाशय में होती है, जबकि जीवन अपने स्वरूप में एक गठनपूर्ण परमाणु है जो गठनपूर्णता संक्रमण को प्राप्त है.  भौतिक परमाणु और जीवन परमाणु में अंतर है - जीवन परमाणु भार बंधन और अणु बंधन से मुक्त है.  जीवन परमाणु में गठनपूर्णता के साथ ही सम्पूर्ण समझदारी को व्यक्त करने की संभावना भ्रूण अवस्था में होता है.  उसके बाद जीव संसार में जीवन कुछ व्यक्त होता है, फिर मानव संसार में जीवन कुछ और व्यक्त होता है.  आज की स्थिति में मानव जागृति को पूर्णतया व्यक्त करने योग्य हो गए हैं.  यह कहने का आधार है - जैसे मैं समझ गया, प्रमाणित हुआ, वैसे आप भी समझ सकते हैं, प्रमाणित कर सकते हैं.  उसी प्रकार सम्पूर्ण मानव जाति समझ कर प्रमाणित कर सकती है, इस बात का आश्वासन इसमें मिलता है.

गठनपूर्ण परमाणु की विशेषता उसमे परिणाम का अमरत्व है.  गठनपूर्ण परमाणु की दूसरी महिमा अक्षय बल और शक्ति सम्पन्नता है.  अक्षयता को हम इस प्रकार अपने में जांच सकते हैं - जीवन में कल्पनाशीलता है, हम कितना भी कल्पना करें - और कल्पना करने की पूंजी बना ही रहता है.  हम कितना भी आशा करें - और आशा करने की पूंजी बना ही रहता है.  हम कितना भी विचार करें - और विचार करने की पूंजी बना ही रहता है.  हम कितना भी संकल्प  करें - और करने की पूंजी बना ही रहता है.  हम कितना भी निष्ठा करें - और निष्ठान्वित होने की पूंजी बना ही रहता है.  जितना हम इन शक्तियों को प्रमाणित करते हैं ये उतने ही ज्यादा और प्रखर और सटीक होते जाते हैं.

हर मनुष्य जीवन रूप में समान है.  हर जीवन की गठनपूर्णता समान है.  हर जीवन की अक्षय बल और शक्ति सम्पन्नता समान है.  हर जीवन का लक्ष्य समान है.

जीवन लक्ष्य सुख-शान्ति-संतोष-आनंद है.  मानव लक्ष्य समाधान-समृद्धि-अभय-सहअस्तित्व है.  मानव जीवन का अध्ययन शरीर के साथ रह कर ही करेगा और जीवन जागृति को प्रमाणित करेगा.  जागृति मानव परंपरा में ही प्रमाणित हो सकती है.  यह मानव कुल का मौलिक वरदान है.  मानव कुल अपने इस मौलिक वरदान तक पहुँच नहीं पाए थे, उस तक पहुँचने का रास्ता इस दर्शन से मिल गया.

बल को हम स्थिति में देखते हैं, और शक्ति को गति में देखते हैं.  जैसे - 'आस्वादन' स्थिति है.  'चयन' गति है.  आस्वादन हमारी/आपकी स्थिति में ही हो पाता है.  आस्वादन के लिए चयन कहीं न कहीं बाहर से ही होता है, इसलिए यह गति में होता है.

संवेदनाओं के आस्वादन के आधार पर चयन होना एक विधि है - जिसको 'भ्रम' कहा.
मूल्यों के आस्वादन के आधार पर चयन होना दूसरी विधि है - जिसको 'जागृति' कहा.

उसके बाद विचारों में विश्लेषण हमारे नज़रिए (दृष्टि) पर आधारित रहती है.  मानव के पास दो नज़रिए (दृष्टियाँ) हैं तुलन करने के लिए (१) प्रिय-हित-लाभ, (२) न्याय-धर्म-सत्य.  तुलन का नजरिया हमारी/आपकी स्थिति है.  विश्लेषण बाहर की ओर या गति है.  

प्रिय-हित-लाभ दृष्टियों से तुलन करके विश्लेषण करना इन्द्रिय-सापेक्ष है - जिसको 'भ्रम' कहा.
न्याय-धर्म-सत्य दृष्टियों से तुलन करके विश्लेषण करना अनुभव के आधार पर है - जिसको 'जागृति' कहा

- श्री ए नागराज के साथ संवाद पर आधारित (आन्वरी आश्रम, १९९९)

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