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Sunday, February 21, 2016

कृतज्ञता - राष्ट्रीय चरित्र का आधार

"विकास व उन्नति के प्रति प्राप्त सहायता जिससे भी मिली हो, उसकी स्वीकृति ही कृतज्ञता है.  उपकारान्वित एवं सहयातान्वित होना स्वयं की गरिमा न होते हुए भी गरिमा संपन्न होने की संभावना होती है, यदि कृतज्ञता हो तो. गरिमा सम्पन्नता का तात्पर्य उपकार व सहायता करने की क्षमता से है.  प्रत्येक व्यक्ति गरिमा संपन्न होना चाहता है.  कृतज्ञता का प्रयोजन गरिमा संपन्न होने के अर्थ में ही है, और गरिमा संपन्न होना ही सामाजिकता की पुष्टि है.  इस प्रकार कृतज्ञतावादी, कारी चरित्र ही मानवीय चरित्र है और मानवीय चरित्र ही राष्ट्रीय चरित्र है.  अतः कृतज्ञता राष्ट्रीय चरित्र का आधार हुआ."  - श्री ए नागराज


"Gratitude is acceptance of Help obtained for Development and Progress, whoever it may be from. Graceful reception of Benefaction and Help is a possibility of Glorification, even when the Glory is not of one's own, provided one has Gratitude (towards the benefactor).  Each person wants to become Glorified.  The purpose of Gratitude is to become Glorified, and Glorification (in other's Glory) affirms Social Ethic.  In this way, the Character that believes and demonstrates Gratitude itself is Humane Character, and Humane Character itself is National Character.  In this way, Gratitude is the foundation of National Character." - Shree A. Nagraj.

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