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Sunday, June 13, 2010

साक्षात्कार

साक्षात्कार पक्का होने पर अनुभव होता ही है। अनुमान में हमको टिकना पड़ता है। तदाकार होने पर अनुमान में टिकना होता है। तदाकार होने के लिए हर मानव में कल्पनाशीलता पूंजी के रूप में है। अपनी पूंजी को ही उपयोग करना है। इसमें उधार-बाजी कुछ नहीं है! साक्षात्कार में अनुमान पक्का होता है। उससे पहले अनुमान पक्का नहीं होता, गलती होने की सम्भावना बनी रहती है।

सह-अस्तित्व साक्षात्कार होना है। उसके लिए चारों अवस्थाओं के बारे में स्पष्ट होना है - और कुछ भी नहीं है। शब्द से इंगित अर्थ स्वरूप में वस्तु को पहचानना है।

इसमें देर लगने का पहला कारण है - तर्क! कल्पनाशीलता को तर्क में न फंसा कर वस्तु से तदाकार होने में लगाने से साक्षात्कार हो जाता है।

देर लगने का दूसरा कारण है - पिछला जो पढ़ा है, उसके साथ जोड़ने का प्रयास करना।

अध्ययन पूर्वक सह-अस्तित्व के लिए अनुमान बन ही जाता है। साक्षात्कार में अनुमान पक्का होता है। जिसके फलस्वरूप अनुभव होता ही है। अनुभव में विस्तार नहीं होता। अनुभव को प्रमाणित करने जाते हैं तो रेशा-रेशा स्पष्ट होता जाता है। हम पहले रेशे-रेशे के बारे में स्पष्ट होना चाहें तो उसमें अटक जाते हैं। अनुभव के बाद जैसा जिज्ञासा होता है, हम वैसे व्यक्त हो जाते हैं।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २०१०, अमरकंटक)

आभार - प्रवीण, आतिशी, अशोक।

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