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Thursday, June 3, 2010

जड़ और चैतन्य

जैसे हम घर का उपयोग करते हैं, वैसे अपने शरीर का उपयोग भी करते हैं। जीते हैं, जीवन में ही। शरीर को छोड़ कर भी जीते हैं, शरीर के साथ भी जीते हैं। शरीर के साथ जीते हुए जागृति-विधि से ही जीना है। जागृति सह-अस्तित्व विधि से ही होता है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २०१०, अमरकंटक)

आभार - प्रवीण, आतिशी, अशोक

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