ANNOUNCEMENTS



Thursday, June 3, 2010

समाधान का अनुकरण

प्रश्न: "समाधान का अनुकरण" से क्या आशय है?

उत्तर: शब्द या लेख के आधार पर अनुकरण - पठन के रूप में। उसके बाद अर्थ के आधार पर अनुकरण - अध्ययन के रूप में। अध्ययन के फलन में अनुभव के आधार पर स्वत्व हो जाता है। अनुकरण का विधि और प्रयोजन यही है।

वेदज्ञों के परिवार में जन्मने के बाद मैंने उनका अनुकरण किया, उनका भाषा प्रयोग किया, उसके बाद उसके अर्थ में गया। अर्थ में गया तो सारा वितंडावाद हो गया। अनुभव तो दूर रह गया! इस कष्ट को मिटाने के लिए अनुसन्धान किया, जिससे मध्यस्थ-दर्शन उपलब्ध हुआ।

अब मध्यस्थ-दर्शन में पठन, अध्ययन, और अनुभव का क्रम सध गया। अनुभव-मूलक विधि से जीने वाले का अनुकरण करने से शब्द के अर्थ में जाना बन जाता है। शब्द के अर्थ में जाने के बाद अनुभव में जीना बन जाता है। अनुभव में जीना बनता है तो प्रमाण होता ही है।

अध्ययन को छोड़ कर केवल अनुकरण करने से कुछ समय तक तृप्ति है, पर तृप्ति की निरंतरता नहीं बनती। यही अध्ययन और अनुभव की आवश्यकता है।

सूचना को दोहराने से अर्थ की ओर ध्यान जाता ही है। अर्थ को जब शोध करते हैं तो अपना स्वत्व होने की जगह में पहुँच ही जाते हैं। अध्ययन को आत्मसात करने की विधि है - अनुकरण।

प्रश्न: "सूचना को दोहराना" अकेले में या परस्परता में?

उत्तर: किसी के साथ हम बोलते ही हैं। किसी के साथ हम शब्दों को बोले नहीं, ऐसा कोई आदमी होता नहीं है। एक गूंगा भी दूसरों के साथ अपने को अभिव्यक्त करने का प्रयास करता है। अभिव्यक्ति अध्ययन-क्रम में सबसे सशक्त भाग है। पहले पढ़ कर विचारों का आदान-प्रदान करके अच्छा लगता है। फिर उससे यह निकलता ही है - इसको समझ के जीना कितना अच्छा लगेगा? हर मनुष्य में कल्पनाशीलता-कर्म-स्वतंत्रता है, इसलिए यह स्वयं-स्फूर्त होता है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २०१०, अमरकंटक)

आभार - प्रवीण, आतिशी, अशोक

No comments: