ANNOUNCEMENTS



Friday, February 9, 2018

शिक्षा में प्रवेश

इस प्रस्ताव में सहमत होने के बाद हम तर्क विधि से, विवेक विधि से यहीं पहुँचते हैं कि इसको प्रमाणित होने में देरी नहीं करनी चाहिए.  उसके लिए हम जो योजना रखे हैं उसमे कहा तत्काल एक शिक्षण संस्था को स्थापित किया जाए, जिसमे पहली कक्षा से १२वीं कक्षा तक, १२वीं से स्नातक और स्नातकोत्तर तक इस दर्शन को समझाने की व्यवस्था दिया जाए.  इस संस्था को चाहे "आश्रम" कहो, "शाला" कहो, "विद्यालय" कहो, या "विश्वविद्यालय" कहो!  कुछ भी उसको नाम दो, पर उसमे होनी पूरी बात ही चाहिए.

मेरे अनुसार अभी वर्तमान में १५ (१२ + ३) वर्ष का स्नातक शिक्षा का क्रम बनाया गया है,  उसको disturb न किया जाए.  उसी फ्रेम में वस्तु को भरा जाए.  अभी की शिक्षा वस्तु विहीन है, बल्कि उसमे अपराध सूत्र भरे हुए हैं. अभी १५ वर्ष की शिक्षा में न्याय प्रदायी क्षमता विकसित करने का, सही कार्य-व्यवहार करने की सूत्र व्याख्या का, और सत्य बोध करवाने का कोई व्यवस्था नहीं है.  अभी जो धरती पर हजारों विश्वविद्यालय हैं क्या किसी के पास यह व्यवस्था है?

इसको इन्टरनेट पर पूछ के देखो!  मेरा नाम लेना (मैं जिम्मेदारी लेता हूँ इसकी).  अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन प्रस्तुत हो गया है.  वहाँ कहना, हमने सर्वेक्षण किया है.   इस सर्वेक्षण में पाया गया - "जन्म से ही हर मानव न्याय का याचक है, सही कार्य-व्यवहार करने का इच्छुक है, और सत्य-वक्ता है."  इनके लिए सत्य बोध कराने, सही कार्य-व्यवहार का अभ्यास कराने, और न्याय प्रदायी क्षमता को स्थापित करने के लिए आपके पास क्या सूत्र है, क्या व्याख्या है?

जितने भी universities हैं, उनसे यह पूछना क्या आपसे बन पायेगा?  यह पूछ के देखिये, क्या होता है.

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक)

No comments: