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Saturday, March 13, 2010

मानव जाति एक है, मानव धर्म एक है.



भौतिकवादी ऐसा बताते हैं - मानव की शरीर रचना के आधार पर उसके गुणों का प्रकाशन होता है.  रचना (रूप) के आधार पर गुण होता है - ऐसा वे मानते हैं.  यह सर्वथा गलत सिद्ध हो गया.  ऐसा कोई कार्य नहीं है जो एक नस्ल वाला आदमी कर सकता हो पर दूसरे नस्ल वाला आदमी न कर सकता हो.  ऐसा कोई उपलब्धि नहीं है जो एक नस्ल वाला आदमी पा सकता हो पर दूसरे नस्ल वाला आदमी न पा सकता हो.  ऐसा कोई समझ नहीं है जो एक नस्ल वाला आदमी समझ सकता हो पर दूसरे नस्ल वाला आदमी न समझ सकता हो.  मानव में रंग और नस्ल की भिन्नता मिलती है, यह बात तो सही है लेकिन जो कुछ भी एक आदमी कर सकता है, पा सकता है, समझ सकता है - उसको सभी नस्ल वाले, रंग वाले, सम्प्रदाय वाले पा सकते हैं.  कोई सम्प्रदाय, रंग या नस्ल "विशेष" नहीं है.  अतः सभी रंग, नस्ल, संप्रदाय वाले समझदार हो सकते हैं, ईमानदार हो सकते हैं, जिम्मेदार हो सकते हैं, भागीदार हो सकते हैं.  किसी भी तरह का पुरोहितवाद या आरक्षणवाद मानव जाति की छाती का पीपल ही होगा.  

इन सभी नजीरों के आधार पर हम निर्णय पर पहुँच सकते हैं कि "मानव जाति एक है".

मानव जाति एक है - इसी आधार पर मानव धर्म के एक होने को भी हम पहचान सकते हैं.  मानव धर्म सुख है.  सभी रंग, नस्ल, सम्प्रदाय वालों में सुखी होने का आशय (चाहना) समान रूप से निहित है.   गर्भाशय में रंग और नस्ल के आधार पर शरीर बनता है.  सुखी होने का आशय जीवन में निहित है.  रंग-नस्ल शरीर के साथ है, जीवन के साथ नहीं.

अतः सभी मानवों के सुखी होने की विधि को हम पहचान सकते हैं और उसका लोकव्यापीकरण कर सकते हैं.

- श्री ए नागराज के साथ संवाद पर आधारित (आन्वरी आश्रम, १९९९)

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