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Tuesday, April 19, 2011

मानव-चेतना

“मानव-चेतना” एक शब्द है। इस शब्द का अर्थ है – ज्ञान। ज्ञान रासायनिक-भौतिक वस्तु नहीं है। जड़-चैतन्य वस्तु सत्ता में संपृक्त है. सत्ता व्यापक वस्तु है, जिसमे भीगे रहने से जड़-प्रकृति ऊर्जा-संपन्न है, और चैतन्य-प्रकृति ज्ञान-सम्पन्न है। जड़-प्रकृति की चुम्बकीय-बल सम्पन्नता और क्रियाशीलता (पहचानने-निर्वाह करने के रूप में) उसकी ऊर्जा-सम्पन्नता वश है। चैतन्य-प्रकृति की क्रियाशीलता (जानने-मानने-पहचानने-निर्वाह करने के रूप में) उसकी ज्ञान-सम्पन्नता वश है। जानने-मानने और पहचानने-निर्वाह करने की बात सभी मानवों में है। एक ही बात का उपदेश दिया है – “जो मानते हो, उसको जान लो और जो जानते हो, उसको मान लो”।

चेतना के चार स्तर हैं – जीव-चेतना, मानव-चेतना, देव-चेतना, और दिव्य-चेतना। इसमें से जीव-चेतना मानव के लिए अविकसित चेतना है। मानव-चेतना, देव-चेतना, और दिव्य-चेतना विकसित चेतना है। मानव-चेतना में जीने से मानव उपकारी होता है। उपकारी होने का मतलब – स्वयं में विश्वास, सर्व-मानव में विश्वास, और मनुष्येत्तर प्रकृति में विश्वास। इस प्रकार मानव-चेतना में मानव मनुष्येत्तर प्रकृति के साथ नियम-नियंत्रण-संतुलन पूर्वक और मानव के साथ न्याय-धर्म-सत्य पूर्वक जी पाता है। यही जीने देना, जीना है। अब मानव को सोचना होगा – मानव-चेतना में जीना है, या जीव-चेतना में जीना है? पहले स्वयं मानव-चेतना में जीने का अभ्यास करना, फिर शिक्षा के लिए प्रयत्न करना, फिर अखंड-समाज के लिए प्रयत्न करना, फिर सार्वभौम व्यवस्था के लिए प्रयत्न करना। ऐसा एक से जुडी दूसरी श्रंखला है। स्वयं जिए बिना पहले हम सार्वभौम-व्यवस्था को स्थापित नहीं कर सकते। पहले हमको स्वयं जीना पड़ेगा। हम स्वयं कुछ भी करते रहें और सार्वभौम-व्यवस्था बन जाए – यह हो नहीं सकता।

- अनुभव-शिविर जनवरी २०११ – अमरकंटक में बाबा श्री ए नागराज के उदबोधन पर आधारित

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