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Tuesday, April 19, 2011

विश्वास

स्वयं में विश्वास न होने का प्रमाण है, हमारा अपने ही संतान पर विश्वास न हो पाना। अपनी संतान पर विश्वास होने के बाद ही गाँव-मोहल्ले में अन्य लोगों के साथ विश्वास करना बनेगा, फिर सम्पूर्ण धरती के साथ विश्वास करना बनेगा। विश्वास होना चाहिए या नहीं होना चाहिए? विश्वास फैलना चाहिए या नहीं फैलना चाहिए? भौतिकवाद के अनुसार “विश्वास” कोई वास्तविकता नहीं है, केवल काल्पनिक बात है। जबकि यहाँ कहा गया है – कल्पनाशीलता हर मानव के पास एक ऐसी पूंजी है, जिसके आधार पर सच्चाई के साथ तदाकार होने की बात होती है। कल्पनाशीलता ही तदाकार होता है। हमारी कल्पनाशीलता सच्चाई के साथ तदाकार होने पर हम विश्वास करेंगे या नहीं करेंगे? मानव ने पत्थर, मिट्टी, मणि, धातु, वनस्पतियों, और जीवों पर विश्वास किया है। मानव का मानव के साथ विश्वास करना लेकिन बन नहीं पाया है। पति पत्नी के साथ और पत्नी पति के साथ विश्वास नहीं करे, तो वे जियेंगे कैसे? माता-पिता अपने बच्चों के साथ और बच्चे अपने माता-पिता के साथ विश्वास नहीं करें, तो वे जियेंगे कैसे? मानव का अध्ययन ही नहीं हुआ – तो मानव पर विश्वास कैसे करना होगा? मानव का अध्ययन न भौतिकवाद से हुआ न आदर्शवाद से हुआ। दोनों ने आदमी को जीव ही कहा। इन दोनों वादों के चलते यह धरती ही बीमार हो गयी। तब यह मध्यस्थ-दर्शन सह-अस्तित्व-वाद का विकल्पात्मक प्रस्ताव आया है – जिससे स्पष्ट हुआ, मानव चेतना में जीने से स्वयं में विश्वास होता है, सम्पूर्ण अस्तित्व में विश्वास होता है, स्वयं के आचरण में विश्वास होता है, शिक्षा में विश्वास होता है। शिक्षा में मानव-चेतना आने पर शिक्षा में विश्वास होता है।

- अनुभव-शिविर जनवरी २०११ – अमरकंटक में बाबा श्री ए नागराज के उदबोधन पर आधारित

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