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Wednesday, August 6, 2008

समझने के लिए जब प्राथमिकता बन जाती है - तभी समझ में आता है।

प्रश्न: आपकी बात तर्क-संगत है, और मेरी कल्पना में भी आती है। कब मैं यह निश्चित रूप से कह सकता हूँ - मैं इस बात को समझ गया हूँ?

उत्तर: आपकी कल्पनाशीलता शब्द से वस्तु तक पहुँचती है। सह-अस्तित्व ही समझने की वस्तु है। वस्तु को जीवन द्वारा पहचान लेना ही समझ है। कल्पनाशीलता समझ नहीं है। कल्पनाशीलता हर व्यक्ति का अधिकार है। जीवन में कल्पनाशीलता वस्तु को पहचानने के लिए catalytic agency है। कल्पनाशीलता का प्रयोग करते हुए हमको वस्तु को पहचानना है। वस्तु को समझे तो उसका साक्षात्कार हुआ। समझ में आने का प्रमाण है - साक्षात्कार होना। हमको साक्षात्कार नहीं हुआ - मतलब हम अध्ययन नहीं किए हैं। सीधा-सीधा बात करें तो ऐसा ही बनता है।

समझने के लिए जब प्राथमिकता बन जाती है - तभी समझ में आता है। प्रस्ताव को सुनने के बाद आपकी कल्पना में ऐसा लग सकता है की आप समझ गए! कल्पना में वस्तु झलकता होगा - तभी आप मान लेते हो कि आप समझ गए! जबकि वस्तु को समझने के बाद उसके साक्षात्कार होने का खाका अभी बचा ही है।

आपके जीवन में शब्द द्वारा कल्पनाशीलता जो स्वरुप बनता है, उसके मूल में अस्तित्व में जो वस्तु है - वह जीवन जब स्वीकार लेता है, तब आपको वह साक्षात्कार होता है। जैसे - "पानी" एक शब्द है। पानी वह है - जो प्यास बुझाता है, धरती की, वृक्षों की, जीवों की, और मनुष्य की प्यास। यह सुनने के बाद आपके मन में पानी वस्तु के बारे में कल्पना आती है। उस कल्पना के सहारे आप धरती पर पानी वस्तु को पहचान लेते हो। पानी को पहचान लिया - तो पानी आपको साक्षात्कार हुआ। उसी तरह "न्याय","धर्म",और "सत्य " तीन शब्द हैं। ये शब्द निश्चित वस्तुओं को इंगित करते हैं - जो अस्तित्व में वास्तविकता हैं। आप जब उनको सटीक पहचान लेते हो - तो आपको वे समझ में आ जाते हैं। सत्य से सह-अस्तित्व ही इंगित है। सत्य समझ में आ गया - मतलब साक्षात्कार पूरा हुआ। साक्षात्कार पूरा होने के बाद बोध और अनुभव में देरी नहीं है। वह तत्काल ही होता है।

प्रश्न: पानी को जो अभी हम जो जीव-चेतना में पहचानते हैं, क्या इसका मतलब है - हमको पानी का साक्षात्कार हुआ है?

उत्तर: नहीं। जीव-चेतना में पानी को मनुष्य उसके अपने लिए उपयोग के अर्थ में ही पहचानता है। जीव-चेतना में मनुष्य पानी के साथ अपने सम्बन्ध, पानी के स्वभाव और धर्म को नहीं पहचानता। यही कारण है - मनुष्य जीव-चेतना में जीते हुए पानी के साथ अपने कर्तव्य को नहीं निभा पाता। समझदारी के बाद मनुष्य को पानी के साथ अपने कर्तव्य का बोध होता है। पानी को संरक्षित करने का दायित्व निर्वाह समझदारी के बाद ही होता है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक)

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