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Tuesday, April 5, 2016

नैसर्गिकता का नित्य वैभव

"भाव ही धर्म है.  भाव मौलिकता है.  धर्म का व्यवहार रूप ही न्याय है.  धर्म स्वयं परस्पर पूरकता के अर्थ में स्पष्ट है.  परस्परता सम्पूर्ण अस्तित्व में स्पष्ट है.  परस्परता का निर्वाह ही न्याय का तात्पर्य है.  परस्परता ही पूरकता की बाध्यता है और सम्पूर्ण बाध्यता विकास रूपी लक्ष्य के अर्थ में है.  इस प्रकार जड़ चैतन्य प्रकृति में परस्परता बाध्यता और विकास नित्य प्रभावी है, यही नैसर्गिकता का नित्य वैभव है."  - श्री ए नागराज

"Sentiment (acceptance of mutuality) itself is religion (innateness), which manifests as originality (fundamental nature).  (In human beings) Justice is but religion in practice.  Religion is manifest in the form of mutual complementariness in Nature.  Mutuality is there in entire Existence.  The meaning of Justice is fulfilling (expectations in) mutualities (in humans).  Mutuality itself is compulsion for complementariness in units of Nature, and all compulsions (in existence) are for the purpose of Perfection.  In this way, entire insentient and sentient nature has eternally effective compulsions for perfection in their mutuality, which alone is the eternal magnificence of togetherness in Nature." - Shree A. Nagraj.

6 comments:

Roshani said...

भैया जी,
सादर प्रणाम|
"भाव ही धर्म है. भाव मौलिकता है." इस पर ठीक से पकड़ नहीं बन पा रही| जब भी आपके पास समय हो समझाएँ|
धन्यवाद
रोशनी

Roshani Sahu said...

भैया जी और एक जिज्ञासा जो बाबूलाल भैया जी का है इसी पोस्ट पर|

"परस्परता ही पूरकता की बाध्यता है"

Rakesh Gupta said...

सहअस्तित्व "परम भाव" है. इसका मतलब अस्तित्व में हर इकाई - मिट्टी-पत्थर, पेड़ पौधे, जीव जानवर और मानव - इन सबमें पूर्ण सत्ता में सम्पृक्तता होने से पूर्णता को पाने का "भाव" बना हुआ है. इस परम भाव के चलते सभी इकाइयों में दूसरी इकाइयों के प्रति भी कुछ "भाव" बना है. यह भाव उनमे धर्म और मौलिकता के रूप में है. उनके अस्तित्व में होने भर उनमें यह भाव है. भाव परस्परता में लक्षणों के रूप में व्यक्त हो जाता है, और उसकी अभिव्यक्ति इकाइयों के बीच आदान-प्रदान के रूप में होती है. यह हम अपने में देख ही सकते हैं. हम में जैसा भाव बन होता है, हम वैसा अपनी परस्परता में व्यक्त हो जाते हैं, उस अर्थ में हमारा लेन देन भी होता है. ऐसा बाकी प्रकृति में भी है. इस तरह हर परस्परता भाव के निर्वाह के लिए बाध्यता है. शेष प्रकृति में परस्परता में भाव का निर्वाह स्वयं स्फूर्त होता है. मानव में परस्परता भी पूर्णता के लिए परस्पर पूरकता की अपेक्षा में ही होती है. मानव परस्परता में भाव नहीं बह पाने का कारण है, उसका अज्ञान।

मानव में भाव मूलतः जीवन से सोच विचार के रूप में निर्गमित होता है, और कार्य व्यवहार स्वरूप में आ जाता है. भाव कोई सोच-विचार नहीं है. मानव सोच विचार द्वारा अपने भाव को व्यक्त करता है. मिट्टी पत्थर, पेड़ पौधों में सोच विचार नहीं है - वहाँ भाव नैसर्गिक या संयुक्त रूप में प्रभावित होता है. जीव-जानवरों में भाव मूलतः जीवन से निर्गमित होता है, पर वहां जीवन शरीर के अनुसार काम करने के लिए समर्पित है - इसलिए वहाँ शरीर वंश के अनुसार भाव व्यक्त होता है.

भाषा से भाव को बताया जा सकता है, और सुनने वाला भाषा से इंगित भाव को पहचान सकता है - यही अध्ययन विधि का आधार है.

Rakesh Gupta said...

भाव इकाई की परस्परता में, से, के लिए स्वीकृति है

Roshani said...

बहुत सुंदर भैया जी,
कितने सुंदर तरीके से बगैर किसी बाध्यता के भाव तीनों अवस्थाओं से व्यक्त होता है|मानव इस ओर प्रयासरत है और जब चारों अवस्थाओं से भाव निर्विरोध व्यक्त होगा तो निश्चित ही ये धरती स्वर्ग हो जाएगी|
बहुत ही सुंदर
धन्यवाद|
रोशनी

Rakesh Gupta said...

परस्परता ही पूरकता की बाध्यता है

अस्तित्व में अगली स्थिति का प्रकटन अन्य के साथ परस्परता में होने वाली पूरकता के आधार पर ही होता है.

बाध्यता शब्द से लगता है, चाहत के विपरीत मजबूरी है. लेकिन यहाँ बाध्यता मूल आशय या नियति के अर्थ में है. बाध्यता यहाँ धर्म या धारणा को इंगित करता है. दो लोग आपस में मिलते हैं तो उनमें चाहत तो यही रहती है कि उनके इस मिलन से दोनों का विकास हो जाए. चाहत के विपरीत घटना होने पर भी यह चाहत बदलती नहीं है. इसलिए पूरकता के लिए बाध्यता है.