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Saturday, June 14, 2008

अध्ययन में तुलन पूर्वक सीधा साक्षात्कार ही होता है.

अध्ययन में तुलन पूर्वक सीधा साक्षात्कार ही होता है। चित्रण नहीं होता। चित्त में चिंतन क्षेत्र में ही साक्षात्कार होता है। चित्रण क्षेत्र में स्मृतियाँ है। पठन कार्य में चित्रण होता है - स्मृति के रूप में। अध्ययन में प्रस्ताव के स्मरण की आवश्यकता है।

साक्षात्कार क्रमिक रूप से होता है, जो सह-अस्तित्व में पूर्ण होता है। सह-अस्तित्व में साक्षात्कार पूर्ण होने पर बुद्धि में बोध होता है। बुद्धि में बोध होने पर प्रमाणित करने का संकल्प होता है। प्रमाणित करने के संकल्प के साथ ही आत्मा अस्तित्व में अनुभव करती है। साक्षात्कार पूर्ण होने के बाद अनुभव होने तक में कोई देर नहीं लगती।

सारी देर साक्षात्कार पूरा होने तक ही लगती है। देर लगने का कारण है - अध्ययन के लिए हमारी प्राथमिकता नहीं होना। भ्रमित स्थिति में जीते हुए हम कुछ पक्षों को सही माने रहते हैं। जबकि जीव-चेतना में एक भी पक्ष सही नहीं होता। जिन पक्षों को हम सही माने रहते हैं, उनके प्रति हमारा वैचारिक चिपकाव बना रहता है। इस चिपकाव के कारण अध्ययन में ध्यान नहीं लग पाता। अध्ययन में ध्यान देने की आवश्यकता है। अनुभव पूर्वक ध्यान बना ही रहता है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६ में)
स्त्रोत: मध्यस्थ-दर्शन

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