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Thursday, October 29, 2009

प्रचार-माध्यमो की सार्थकता

आज सभी प्रचार-माध्यम अपराध-गतिविधियों को ज्यादा से ज्यादा प्रचारित किया करता है। प्रचार-माध्यम का मूल स्वरूप सही-गलती को चेताने से है, अथवा स्पष्ट करने से है। इसमें से "गलती" का प्रचार हुआ - लेकिन "क्या सही है" और "क्या होना चाहिए" इसका प्रचार नहीं हो पाया। इसी कारण-वश अपराध-प्रवृत्तियां बुलंद हुई। सही पक्ष का पता नहीं हो पाया।

किसी घटना को हम "ग़लत" मानते हैं तो उस मानने में "सही" की अपेक्षा समाहित ही रहती है। इस बात को हृदयंगम करने से पता लगता है कि प्रचार-माध्यम अपनी विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए हर "ग़लत" घटित-घटना को बढ़ा-चढा कर बताने के स्थान पर, "सही" घटनाएं कैसे होना चाहिए - इस तथ्य को उजागर करें। इस तरह मानव-परम्परा में सुधार होना स्वयं-स्फूर्त होगी। इस विधि से - शुभ को चाहने वाले सभी प्रचार-माध्यम अपनी सार्थकता, पूरकता, और उपयोगिता को प्रमाणित कर सकते हैं। अपराधों का प्रचार करने से अपराध बढे हैं। धरती का बीमार होना मनुष्य के अपराधों से हुआ है।

अपराध करने वाला व्यक्ति या समुदाय यह मान कर अपराध करता है - "सभी अपराधी हैं" अथवा "दूसरे लोग हमसे ज्यादा अपराधी हैं।" इसी मान्यता के साथ अपराध और मज़बूत होता जाता है। अपराध करने वाले को सही दिशा, सही कार्य, सही प्रयोजन बोध कराने की स्थिति में अपराध प्रवृत्ति सुधरने की ओर दिशा मिलना स्वाभाविक हो जाती है। इसलिए यह उचित है की पत्र-पत्रिका, रेडियो, टेलिविज़न, और आज की स्थिति में इन्टरनेट भी - सभी दिशाओं में "सही पक्ष क्या होना चाहिए?" - इसे प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करने की आवश्यकता है। इसके लिए प्रचार-कार्यों में कार्यरत मेधावियों को "सही-पक्ष" में पारंगत होने की आवश्यकता है। उनको सभी स्थितियों में "सही" और "ग़लत" की विभाजन-रेखा को परखने की आवश्यकता है।

"सही" और "ग़लत" की विभाजन-रेखा जीव-चेतना और मानव-चेतना के मध्य में ही होता है। जीव-चेतना विधि से कामोन्मादी, भोगोन्मादी, और लाभोन्मादी प्रेरणाएं मिल रही हैं - जो "भ्रम" का द्योतक है। मानव-चेतना अपने स्वरूप में जीवन-जागृति का द्योतक है। जागृति और भ्रम उजाले और अंधेरे जैसा ही है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २००६)

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