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Thursday, October 29, 2009

विरोध पर विजय पाना सम्भव है.

आदिकाल से आज तक युद्ध को सर्व-जन मानस में आवश्यकता के रूप में स्वीकारा नहीं गया, एक "मजबूरी" के रूप में ही स्वीकारा गया। ऐसी मजबूरी के लिए तर्क यह दिया जाता है - पडौसी देश जब सामरिक तंत्र को तैयार करता है, तब हमको करना ही पड़ेगा। ऐसे उदगार जो पहले तैयार करता है, वह भी देता है। बाद में जो तैयार करता है, वह भी यही तर्क देता है। ऐसे में किसको सही माने? तब यही एक निष्कर्ष निकलता है - राज-गद्दी में जो बैठने को व्यक्ति तैयार होता है, उसके मन में सामरिक-तंत्र भय और प्रलोभन के आधार पर तैयार हुआ ही रहता है। राजगद्दी पर बैठे हुए आदमी को गद्दी खिसकने का भय बना ही रहता है। इसलिए राज-गद्दी में बैठ-कर पैसे को वितरित करने के "दाता" बने रहते हैं, और गद्दी बनाए रखने के लिए कितने भी भृष्टाचार, अनाचार, दुराचार समावेश करने के लिए प्रलोभित रहते हैं। एक निष्कर्ष निकलता है - "राज-गद्दी रहेगा तो युद्ध-कार्य रहेगा ही!"

इस प्रकार की स्थिति में इससे बचा कैसे जाए? इस पर सोचने के लिए विकल्पात्मक विधि की आवश्यकता हुई, जो अनुसंधान पूर्वक हमारे करतलगत हो गयी।

मानव-चेतना विधि से हम यह पाये हैं - विरोध का विरोध, और विरोध का दमन के स्थान पर "विरोध पर विजय" पाना सम्भव है। यह समझदारी सहज रूप में लोकव्यापीकरण होना ही है। इसे पाने के लिए सूत्र रूप में "चेतना-विकास मूल्य-शिक्षा" विधि से पूरे देश में "विरोध पर विजय" पाने की मानसिकता को तैयार किया जा सकता है। विरोध पर विजय पाने के लिए "सर्वतोमुखी समाधान" ही एक मात्र उपाय है। "सर्वतोमुखी समाधान" समझदारी से ही मानव-परम्परा में प्रमाणित होता है। इसके लिए सह-अस्तित्व दर्शन ज्ञान, जीवन ज्ञान, और मानवीयता पूर्ण आचरण ज्ञान - इन तीनो में अध्ययन पूर्वक पारंगत होने के उपरांत ही अनुभव-मूलक विधि से सर्वतोमुखी समाधान प्रकट करने का अधिकार हर व्यक्ति में होना पाया जाता है।

इस ओर हर शुभ चाहने वाले व्यक्ति को ध्यान देने की आवश्यकता पैदा हो गयी है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २००६, अमरकंटक)

1 comment:

Pandit Kishore Ji said...

sach manav kabhi bhi yudh ko sweekarega nahi
jyotishkishore.blogspot.com