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Thursday, July 18, 2019

परिवर्तन के लिए हम जहाँ हैं वहाँ से विकासोनुम्खता को पहचानना होगा

परिवर्तन के लिए हम जहाँ हैं वहाँ से विकासोनुम्खता को पहचानना होगा.  हम बर्बाद करते रहे और विकास की बात करते रहे तो वह श्वेत पत्र (सफ़ेद झूठ) हो गया कि नहीं?  अभी सर्वोपरि विद्वान ऐसा ही कर रहे हैं.  यह एक दुखदायी स्थिति है.

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ सम्वाद पर आधारित (अप्रैल २००८, अमरकंटक)

Wednesday, July 17, 2019

साक्षात्कार के लिए गति


प्रश्न: साक्षात्कार के लिए अपनी गति कैसे बनाई जाए?

उत्तर: संबंधों का प्रयोजनों को पहचानने के बाद गति बनेगी.  संबंधों का प्रयोजन यदि समझ नहीं आया तो हमारा गति कैसे होगा?  उसके लिए अध्ययन ही एक मात्र रास्ता है.  इसमें मनमानी लगता नहीं है.  प्रयोजन के साथ जुड़ने पर गति होता ही है.

निष्ठा पूर्वक परिवार में निर्वाह होने से अग्रिम गति होता है.  समझदार परिवार में संबंधों का निर्वाह होता है.  फिर शेष संसार के साथ हम संबंधों का निर्वाह करते हैं, जबकि वहाँ से वो नहीं करते हैं -  ऐसे में हमारा संबंधों के निर्वाह में विचलित नहीं होना ही हमारी समझदारी का प्रमाण है.  सामने वाला समझता नहीं है - इसलिए हम उनका तिरस्कार कर दें, उपेक्षा कर दें - यह हमारी समझ का प्रदर्शन नहीं है.  उसकी जगह इसको ऐसे देखना - हम समझा नहीं पा रहे हैं, समझाने का नया तरीका हमको शोध करना है.  कोई समझता नहीं है तो उसको condemn नहीं करना है.  अस्तित्व में condemn करने वाली कोई वस्तु नहीं है.  सभी वस्तुएं एक दूसरे से जुड़ी हैं.  हमारे ज्ञान में कमी रहती है, इसलिए हम दूसरे को condemn करते हैं.  ज्ञान में कमी दुरुस्त हो गया तो अपने सम्प्रेष्णा के तरीकों को बदलना, तो हम समझाने में सफल हो जाते हैं.  यह मैं स्वयं करता  हूँ.  मेरे पास तो सभी प्रकार के लोग आते ही हैं.
 
समझने के बाद संसार से कोई शिकायत नहीं रहता.

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २००८, अमरकंटक)

Wednesday, July 3, 2019

हर समझ अनुभव के साक्षी में ही स्वीकृत होता है



प्रश्न: "हर समझ अनुभव के साक्षी में ही स्वीकृत होता है" - आपके इस कथन का क्या आशय है?

उत्तर: मानव में जो कुछ भी समझ के रूप में स्वीकृत होता है - वह अनुभव के साक्षी में ही होता है.  अनुभव के साक्षी का अर्थ है - अनुभव होने वाला है या अनुभव हो गया है.  एक व्यक्ति को अनुभव हो गया है, एक को अनुभव होगा - इस विधि से परंपरा होती है.  जब कोई अनुभव मूलक विधि से व्यक्त होता है तो वह दूसरे में अनुभव की रोशनी में ही स्वीकार होता है.

प्रश्न: दूसरे में "अनुभव की रोशनी" का क्या अर्थ है?

उत्तर: पहले में अनुभव रहता है, दूसरे में अनुमान रहता है.  अनुमान अपने में रोशनी है.  अनुभव रोशनी है ही.  अनुमान और अनुभव में coherence अध्ययन विधि से आता है.  आपको मेरा जीना देख के अनुमान होता है कि मैं अनुभव मूलक विधि से व्यक्त हो रहा हूँ.  जब आप स्वयं उसके योग्य हो जाते हैं तो आप स्वयं प्रमाण हो जाते हो.  इस ढंग से न्याय-धर्म-सत्य सम्मत परम्परा की सम्भावना उदय हुई.

अभी तक की परंपरा में कहा गया था - ज्ञान अव्यक्त है, अनिर्वचनीय है.  उसके विकल्प में यहाँ हम कह रहे हैं - ज्ञान व्यक्त है, वचनीय है, अनुभवगम्य है.  ज्ञान वचन पूर्वक व्यक्त होता है, जो दूसरे में अनुमान पूर्वक स्वीकार होता है, अनुभव में आता है, फिर पुनः प्रमाणित होता है.

अनुभव में शब्द पहुँचता नहीं है.  साक्षात्कार तक ही शब्द है.  अनुभव जब होता है - उसमे शब्द नहीं है.  अनुभव को लेकिन शब्द से समझाया जा सकता है.  अनुभव के अर्थ में हम शब्दों का प्रयोग कर सकते हैं.  अनुभव मध्यस्थ क्रिया है.  मध्यस्थ क्रिया सबको संतुलित बना कर रखने वाली क्रिया है, इसी प्रकार शब्द को भी संतुलित बना दिया.  शब्द/भाषा संतुलित बनाने पर हम संसार में समझदारी के अर्थ में सम्प्रेष्णा करते हैं.  ऐसे अनुभव सकारात्मक सम्प्रेष्णा के लिए आधार बन गया.  यह अक्षय स्त्रोत है, जो कभी समाप्त नहीं होता - इसलिए ज्ञान व्यापार, धर्म व्यापार होता नहीं है.

-श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (मई २००७, अमरकंटक)

Monday, June 17, 2019

यहाँ जीने को प्रमाण माना है, बाकी को प्रमाण माना नहीं है.

विगत के किसी भी प्रस्ताव में मध्यस्थ दर्शन का मिलावट करने से किसी का फायदा होने वाला नहीं है.  विगत का इतना समीक्षा हो सकता है - "शुभ चाहते रहे, शुभ प्रमाणित नहीं हुआ."  प्रमाणित होने के लिए मध्यस्थ दर्शन का प्रस्ताव है.  इतना ही बात है.  प्रमाणित होने में जो तकलीफ है उसको ठीक किया जाए. 

हमारे उपनिषदों में सर्व्शुभ को चाहते रहे, पर प्रमाणित नहीं हो पाए, स्पष्ट नहीं कर पाए.  उसी को हम स्पष्ट कर रहे हैं, प्रमाणित कर रहे हैं.  विज्ञान ने शुभ चाहा, शुभ को प्रमाणित नहीं कर पाया - हम उसको प्रमाणित कर रहे हैं.  इसमें किसको क्या तकलीफ है?

वेद-उपनिषदों में जो कहा वह किस प्रयोजन के लिए है - उसको वे स्पष्ट नहीं कर पाए.  उसकी जगह भक्ति-विरक्ति, स्वर्ग-नर्क, मोक्ष की तरफ ले गए.  इसके लिए उन्होंने भय और प्रलोभन का विधि अपनाया.   

मध्यस्थ दर्शन में हमने भय और प्रलोभन दोनों को त्याग दिया.  भक्ति को यहाँ भी बताया गया है - भय मुक्ति के रूप में, भ्रम मुक्ति के रूप में.  भय और प्रलोभन से मुक्ति = भक्ति.  १२२ आचरणों में से भक्ति भी एक आचरण है.  पहला आचरण वही लिखा है.  जहां विगत में ईष्ट देवता के साथ तदाकार-तद्रूप होने की बात की गयी थी, यहाँ सच्चाई के साथ तदाकार-तद्रूप होने की बात कही गयी है.  इस बात के लिए हरेक मनुष्य इच्छुक है.  इसीलिए मानव-मानव में अनन्यता और व्यक्ति में भय-मुक्ति होती है.

विगत में शब्दों को जिन अर्थों में प्रयुक्त किया गया है, उस सबको भिन्न अर्थों में यहाँ परिभाषित किया गया है.  विगत की परिभाषाओं में हम जाते नहीं हैं.  उसमे हम पार भी नहीं पायेंगे.  मनपसंद परिभाषाओं को हम त्याग दिए, वस्तु की परिभाषा में हम टिक गए.  रहस्य मूलक चिंतन में मनमानी करने की जगह बन गयी, उसी में सारा अपराध जमा है.  कहना कुछ, करना कुछ, जीना कोसों दूर!  यहाँ जीने को प्रमाण माना है, बाकी को प्रमाण माना नहीं है.  जीने का डिजाईन है - समाधान समृद्धि.  लोहार की सुटाई इतना ही है!

विगत की बातों में अंतर्विरोध है.  उसी बात को एक जगह "हाँ" कहा है, दूसरी जगह पर "ना" कहा है.  उसी सोच पर बने संविधान में एक ही बात को एक जगह सकारा है, दूसरी जगह नकारा है.  छोटी से छोटी बात में, बड़ी से बड़ी बात में अंतर्विरोध है.

- - श्रद्धेय श्री ए नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (दिसम्बर २००८, अमरकंटक) 

Friday, June 14, 2019

मध्यस्थ का प्रकाश होना या नहीं होना - इतना ही अंतर है.

प्रश्न:  आत्मा अनुभव से पूर्व भी सम विषम से अप्रभावित है, अनुभव पूर्वक भी सम विषम से अप्रभावित है - तो दोनों स्थितियों में अंतर क्या है?

उत्तर: मध्यस्थ का प्रकाश होना या नहीं होना - इतना ही अंतर है.  सत्य बोध बुद्धि में नहीं हुआ था इसीलिये मध्यस्थ (अनुभव) का प्रकाश नहीं हुआ था.  अध्यापक के अनुभव की रोशनी में विद्यार्थी अध्ययन करता है, जिससे उसको सत्य बोध होता है.  अनुभव होगा इस बात के लिए अध्ययन ही करते हैं.  इस मार्ग में सिलसिले से समाधान निकलता ही जाता है.


- श्रद्धेय श्री ए नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (दिसम्बर २००८, अमरकंटक)

Tuesday, April 30, 2019

न्याय दृष्टि जीवन में रहता ही है, पर जागृत नहीं हुआ रहता है


न्याय चाहिए, पर प्रिय-हित-लाभ के चंगुल से छुटे नहीं हैं.  अभी हम न्याय को भी संवेदनाओं के साथ जोड़ते हैं, क्योंकि दूसरा कोई रास्ता मिला नहीं है.  अब इस अनुसंधान पूर्वक दूसरा रास्ता खोज लिया गया है.  यहाँ संबंधों के साथ न्याय होने की बात की शुरुआत किये हैं.  संवेदनाओं में प्रिय-हित-लाभ के साथ न्याय कुछ होना नहीं है.  जैसे - फैक्ट्री में यूनियन और मैनेजमेंट के बीच आज जिसको लेकर compromise हुआ, वह दूसरे क्षण टूटा ही रहता है.

अध्ययन विधि में शब्द से न्याय एक शाश्वत वस्तु के रूप में इंगित होता है.  शब्द का प्रयोजन इतने तक ही है.  इंगित होने के बाद यह मन में, विचार में, साक्षात्कार में आना है.  पहले कल्पना में आना, फिर विचार में तुलन होना, फिर चित्त में साक्षात्कार होना - ये तीनो लगातार हो गया तो बोध और अनुभव होता ही है.

इसमें अड़ने वाली चीज़ है - प्रिय हित लाभ के प्रति सम्मोहन, जो भय और प्रलोभन के रूप में रहता है.  इससे हम "न्याय-प्रिय" तो हो जाते हैं पर न्याय प्रमाणित नहीं होता.

संवेदनाओं के स्थान पर संबंधों में शिफ्ट होने पर ये प्रमाणित होने की स्थिति बनती है. 

प्रश्न:  अभी प्रिय-हित-लाभ दृष्टि हममे प्रभावी है.  न्याय-धर्म-सत्य के बारे में हमे सूचना मिला है - जिससे न्याय-धर्म-सत्य के आधार पर तुलन करने की हममे अपेक्षा है.  आपने बताया कि अध्ययन की शुरुआत वहीं से है.  अब हमारे पास न्याय-दृष्टि है ही नहीं तो हम इसका अभ्यास कैसे करें?

उत्तर: न्याय दृष्टि जीवन में रहता ही है, पर जागृत नहीं हुआ रहता.  न्याय-दृष्टि का पहले कल्पना आ जाए.  अध्ययन विधि से ही न्याय-दृष्टि का कल्पना बनता है, और किसी विधि से बनता नहीं है.  अध्ययन विधि न्याय की पहचान के लिए संबंधों के पास पहुंचा देता है.  "संबंधों की निर्वाह निरंतरता में ही न्याय होता है."  अभी हम प्रिय-हित-लाभ विधि से भय व प्रलोभन पूर्वक थोड़े समय तक सम्बन्ध को पहचानते हैं फिर उसको जूता मार देते हैं - उसमे कौनसा न्याय होने वाला है?  भय और प्रलोभन के अर्थ में संबंधों की पहचान विखंडित होता ही है.  संबंधों का नाम लेना हमारे अभ्यास में है, किन्तु संबंधों के प्रयोजन (अर्थ) को पहचानना शेष रहा है.  संबंधों का प्रयोजन (अर्थ) है - व्यवस्था में जीना.  व्यवस्था बोध करा देने पर संबंधों की निर्वाह निरंतरता स्वाभाविक हो जाता है.

संबंधों की निर्वाह निरंतरता शब्द नहीं है - यह जीवन में होने वाली प्रक्रिया है.  संबंधों की निर्वाह निरंतरता में न्याय अपने आप से आता है.  उदाहरण के लिए जिस क्षण अभिभावक ने संतान के साथ अपने सम्बन्ध को पहचाना, उसी क्षण से उनमे ममता-वात्सल्य अपने आप से उमड़ता है.  उसके लिए उनको कोई कॉलेज का प्रशिक्षण नहीं रहता है, कोई उपदेश दिया नहीं रहता है.  यह अपने आप से आता है, क्योंकि यह सारा चीज़ जीवन में निहित है.  सम्बन्ध पहचान लेने पर यह उभर जाता है.

न्याय-शब्द से न्याय-अर्थ इंगित होने के लिए न्याय में प्रमाणित व्यक्ति का होना बहुत महत्त्वपूर्ण है, अन्यथा शब्द से प्रिय-हित-लाभ के आधार पर ही अर्थ निकाल लेते हैं, उससे न्याय प्रमाणित होता नहीं है.  प्रमाणित व्यक्ति का होना इस तरह अध्ययन की सफलता की पूंजी भी है और कुंजी भी है.

अध्ययन विधि से व्यवस्था स्पष्ट होना और व्यवस्था में हम जी सकते हैं - यह विश्वास दिलाने की ज़रुरत है.  समाधान-समृद्धि पूर्वक हम व्यवस्था में जी सकते हैं, समग्र व्यवस्था में भागीदारी कर सकते हैं, और उपकार कर सकते हैं.

- श्रद्देय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक)

Monday, April 29, 2019

परमाणु में बल सम्पन्नता



परमाणु में चुम्बकीयता बल सम्पन्नता स्वरूप में है.  व्यापक वस्तु में भीगे रहने से चुम्बकीय बल अपने आप से आता है.  चुम्बकीय बल संपन्न होने से ही दो परमाणु अंश मिल कर एक व्यवस्था को प्रमाणित करते हैं.  एक दूसरे के साथ अच्छे निश्चित दूरी में होना और व्यवस्था को प्रमाणित करना.

साम्य ऊर्जा में भीगे रहने से प्रत्येक चुम्बकीय बल संपन्न है.  वो कभी घटता-बढ़ता नहीं है.  चुम्बकीय बल हर अवस्था में रहता है.  वस्तु में परमाणुओं का संख्या बढ़ सकता है या कम हो सकता है - किन्तु वस्तु का चुम्बकीय बल घटता-बढ़ता नहीं है. 

चुम्बकीय बल होने के आधार पर ही संगठित होना होता है.  चुम्बकीयता के आधार पर ही सभी पदार्थ किसी न किसी अंश में विद्युत्-ग्राही होते हैं. 

परमाणु में जो वर्तुलात्मक और घूर्णन गति है - उसके आधार पर शब्द (ध्वनि) भी प्रकट होता है, ताप भी प्रकट होता है, विद्युत् भी प्रकट होता है.  गतिशीलता के आधार पर ये तीनो शक्तियां प्रकट हो जाती हैं. 

गति हो पर ताप-ध्वनि-विद्युत् न हो - ऐसा हो नहीं सकता.  गति न हो - ऐसा कोई वस्तु नहीं है.  पत्थर जो रखा है, वह भी गतिशील है.  उसके परमाण्विक स्वरूप में वह गतिशील है ही.  अगली स्थिति को प्रकट करने के लिए जो ताप-ध्वनि-विद्युत् चाहिए - उस सब से संपन्न रहते ही हैं, तभी आगे की स्थिति प्रकट होती है.  परमाणुओं के संगठित स्वरूप में यह धरती है, जो शून्याकर्षण में गतिशील बना रहता है. 

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक)