हर इकाई अपने प्रभाव-क्षेत्र को बना कर रखती है. दो पदार्थों के प्रभाव-क्षेत्र जब पास में आते हैं तो उनमे संघर्ष/घर्षण से ध्वनि होता है. उससे उनके बीच वायु के कण अनुप्राणित हो जाते हैं, जिससे ध्वनि-तरंग होती है.
अणु, परमाणु सभी वस्तुएं सक्रिय हैं. क्रिया के फलस्वरूप ताप होता है. तापविहीन इकाई नहीं है. अवस्था के अनुसार इकाई के स्वस्थता में रहने की एक ताप अवधि है, उस ताप को वह इकाई बनाए रखता है. ताप स्वस्थता के अर्थ में है.
जड़ प्रकृति में एक सीमा तक ताप को सहने की बात रहती है, उसके बाद उसमे विकार पैदा होता है. चैतन्य प्रकृति (जीव और मानव) में ताप की अनुकूलता के लिए प्रयास होता है.
जड़ वस्तु में अणुओं में संकोचन और प्रसारण होना पाया जाता है. उसी के आधार पर उनमे विद्युत ग्राहिता होती है. विद्युत प्रवाहित होने की स्थिति में यह संकोचन और प्रसारण बढ़ जाता है. हर प्राण-कोशा में संकोचन-प्रसारण पाया जाता है, इसलिए हर प्राण-अवस्था की रचना विद्युतग्राही है. चुम्बकीयता वश विद्युत का प्रसव है. चुम्बकीयता के मूल में साम्यऊर्जा में संपृक्तता है.
- श्री ए. नागराज के साथ प्रवीण और अतिशी के संवाद के
आधार पर
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