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Monday, July 5, 2010

सम्पूर्णता और पूर्णता

पूर्ण में समाहित रहने के कारण प्रकृति में पूर्णता की तृषा है। सत्ता को पूर्ण कहा है। पूर्ण से आशय है - न घटना, न बढ़ना। पूर्ण में समाहित होने से प्रकृति में परिवर्तनहीन होने ( पूर्णता ) और व्यवस्था में होने (सम्पूर्णता) की प्रवृत्ति है। व्यवस्था (परंपरा के स्वरूप में रहना) भी निरंतरता के अर्थ में है।

सम्पूर्णता के लिए प्रवृत्ति जड़-प्रकृति में है। पूर्णता के लिए प्रवृत्ति जीवन (चैतन्य प्रकृति) में है।

पूर्णता का स्वरूप है - गठन-पूर्णता, क्रिया-पूर्णता, आचरण-पूर्णता। पूर्णता का मतलब - "ज्यादा-कम से मुक्त"।

गठन-पूर्णता = निश्चित गठन = जो परमाणु-अंशों के घटने-बढ़ने या ज्यादा-कम होने से मुक्त है।
क्रिया-पूर्णता और आचरण-पूर्णता में - समाधान न ज्यादा है, न कम है। समृद्धि न ज्यादा है, न कम है। अभय (विश्वास) न ज्यादा है, न कम है। सह-अस्तित्व (सत्य) न ज्यादा है, न कम है।

क्रिया-पूर्णता और आचरण-पूर्णता जो शेष है - उसके लिए मध्यस्थ-दर्शन के अध्ययन का प्रस्ताव है। हम सत्ता में भीगे हैं, उसके प्रति जागृत होना, उसका दृष्टा होना, उसको प्रमाणित करना अभी शेष है। जीवन ही है जो स्वयं को पहचानता है, और सर्वस्व को पहचानता है। अभी भ्रमित-स्थिति में जीवन स्वयं को शरीर स्वरूप में पहचाना हुआ है - जिसको "जीव-चेतना" कहा है। स्वयं को पहचानना, और सर्वस्व को पहचानना ही तो कुल मिला करके अध्ययन है, जिसके फलस्वरूप व्यवस्था को पहचानना और निर्वाह करना बनता है।

स्थिति-पूर्ण सत्ता में स्थिति-शील प्रकृति संपृक्त होने के कारण हरेक वस्तु स्वयं में व्यवस्था है, और समग्र व्यवस्था में भागीदारी करती है। मानव में भी यह होने के लिए अध्ययन है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २०१०, अमरकंटक)

आभार - प्रवीण, आतिशी, अशोक

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