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Wednesday, May 13, 2009

समझदारी का लोकव्यापीकरण

समझदारी प्राप्त होना, और समझदारी को प्रमाणित करना दो अलग-अलग संसार ही हैं। लोकव्यापीकरण में जीने के मॉडल की आवश्यकता है। समझदारी का लोकव्यापीकरण भाषण-बाजी से नहीं होता। प्रमाणों के साथ ही लोकव्यापीकरण होता है। स्वयं प्रमाण स्वरूप में रहते हुए, उसको multiply करने की बात है।

जीने के मॉडल के लिए हर बात के उत्तर की आवश्यकता है। आदमी कैसे रहेगा? परिवार कैसे रहेगा? समाज कैसे रहेगा? व्यवस्था कैसे रहेगा? संविधान कैसे रहेगा? - हर बात के उत्तर की आवश्यकता है। यह न कम है, न ज्यादा है।

समाधान सम्पन्नता में पर-मुखापेक्षा (दूसरे से दान की उम्मीद) नहीं रहता। समस्या-ग्रस्त मनुष्य ही पर-मुखापेक्षा करता है। समझदारी का लोकव्यापीकरण दान पर आधारित नहीं होगा। समृद्धि के साथ ही समाधान की गति है। बोलना आना कोई "जीना" नहीं है। जीने में समाधान ही होगा, समृद्धि ही होगा। उससे कम में मनुष्य के स्वरूप में "जीना" नहीं बनेगा। "बोलना" सूचना है। समाधान समृद्धि पूर्वक "जीना" ही प्रमाण है।

मध्यस्थ-दर्शन से पहले जो कुछ भी प्रतिपादित हुआ उसमें "परिवार" की कोई बात नहीं है। व्यक्ति की बात है, और फ़िर व्यक्ति से सीधे समाज की बात है। परिवार की कड़ी ही छूट गयी। "परिवार" शब्द मानव-परम्परा में ज़रूर है, लेकिन शास्त्रों में नहीं है। मानव-परिवार का क्या डिजाईन होगा - यह बात आज तक आए शास्त्रों में नहीं है। व्यक्ति और समाज के बीच की कड़ी परिवार ही है। सह-अस्तित्व-वाद को छोड़ कर के इस कड़ी को कोई जोड़ नहीं सकता।

मानव-जाति में शुभ स्वरूप में जीने की अपेक्षा तो है। यही समझदारी का लोकव्यापीकरण होने का आधार है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)

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