This blog is for Study of Madhyasth Darshan (Jeevan Vidya) propounded by Shree A. Nagraj, Amarkantak. (श्री ए. नागराज द्वारा प्रतिपादित मध्यस्थ-दर्शन सह-अस्तित्व-वाद के अध्ययन के लिए)
मानव ने अपने विगत से अब तक के प्रयासों में "भाषा" और "नाप-तौल की विधियों" को पाया है। भाषा (शब्द) जो मिली - उसको "ज्ञान" मान लिया. दूसरी ओर, नापतौल की विधियाँ जो मिली - उसको "विज्ञान" मान लिया। शब्द से संतुष्टि मिल नहीं पाय़ा, नापतौल से भी संतुष्टि मिला नहीं। इस तरह संतुष्टि को पाने के लिए, विकल्प को सोचने के लिए आधार बिंदु को पहचाना गया।
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त 2006, अमरकंटक)
"मानव सुखी होना चाहता है। सुख के स्वरूप ज्ञान के लिए मैंने प्रयत्न किया। मानव का अध्ययन न हो और सुख पहचान में आ जाए - ऐसा हो नहीं सकता। दूसरे, मानव का अध्ययन करने का आधार सुखी होने के अर्थ में है, और कोई अर्थ में नहीं है।"
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त 2006, अमरकंटक)
"कार्य की पहचान भी ज्ञान ही है, जिसे कार्य-ज्ञान कहते हैं। कार्य-ज्ञान होता है - यह मानव जाति के पकड़ में आ गया है। कार्य-ज्ञान के मूल में जो प्रवृत्ति है, उसे हम (मूल) ज्ञान कह रहे हैं। वही साम्य ऊर्जा है, वही मूल ऊर्जा है। होने के रूप में मूल ऊर्जा या ज्ञान है, रहने के रूप में कार्य-ऊर्जा या कार्य-ज्ञान है। होना स्व है, रहना त्व है।"
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त 2006, अमरकंटक)
"ज्ञान वह है जो व्यक्त भी हो और वचनीय भी हो। जिसको हम समझ भी सकें और समझा भी सकें। ज्ञान का मतलब यही है। धरती बीमार हो गयी है, हम कुछ गलती कर गए, उसको समझने के लिए और उसको ठीक करने के लिए ज्ञान चाहिए।"
- श्री ए नागराज के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त 2006, अमरकंटक)
"मानव ने आदि काल से अभी तक संवेदनाओं की पहचान को ही भाव या मूल्य माना है। संवेदना की पहचान के साथ ही भाषा, भंगिमा, मुद्रा, अंगहार को देखा गया। संवेदनाओं की पहचान पूर्वक जो सम्प्रेष्णा होती है, (जीव चेतना में हम) उसी के साथ उत्तर देने लग जाते हैं। शरीर संवेदनाओं के आधार पर मानव का तृप्ति पाना संभव नहीं हुआ - आदिकाल से अब तक।
यहाँ (मध्यस्थ दर्शन में) संवेदनाओं की पहचान को मूल्य (भाव) नहीं माना गया। मूल्य को अलग से (जीवन में) पहचाना। सह-अस्तित्व में अनुभव पूर्वक तृप्ति पाने के बाद यह सत्यापित करना बना कि मानव के साथ स्थापित मूल्य हैं - कृतज्ञता, गौरव, श्रद्धा, विश्वास, वात्सल्य, ममता, सम्मान, प्रेम, और स्नेह।"
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी 2007, अमरकंटक)
सम्मान किसका करना है, यह अभी तक मानव जाति में तय नहीं हो पाया। लफंगाई का सम्मान हुआ है। तलवार का सम्मान हुआ है। जो चुपचाप बैठ गए - उनका पूजा हुआ ही है। जो नंगे हो गए -उनका पूजा हुआ है। जो बहुत बढ़िया वस्त्र पहन लिए - उनका भी पूजा हुआ है। इस तरह बहुरूपियों का सम्मान हुआ है। हम अभी तक यह तय नहीं कर पाए कि पूजा योग्य क्या है? यहाँ आ कर हम यह समीक्षा कर सकते हैं - रूप से, पद से, धन से और बल से जो हम सम्मान पाना चाहते हैं, उससे व्यवस्था नहीं है। समझदारी के आधार पर समाधान और श्रम के आधार पर समृद्धि पूर्वक जीने से सम्मान-जनक स्थिति बनती है, इसके पहले नहीं। समाधान-समृद्धि पूर्वक जी सकते हैं, इस बात का प्रमाण एक व्यक्ति से शुरू होना था - वह एक व्यक्ति मैं हूँ। अब कई व्यक्तियों के इस प्रकार जी कर प्रमाणित होने की हम बात कर रहे हैं। अभी तक हम अपने को समझदार माने थे, पर उससे प्रमाण नहीं हुआ। उससे व्यापार ही प्रमाणित हुआ, नौकरी ही प्रमाणित हुआ। व्यापार और नौकरी में अतिव्याप्ति, अनाव्याप्ति और अव्याप्ति दोष होता ही है। इस तरह हम कई गलतियों को सही मान कर के चल रहे हैं। इसका आधार रहा - भय और प्रलोभन। अब भय और प्रलोभन चाहिए या समाधान-समृद्धि चाहिए - ऐसा पूछते हैं, तो समाधान-समृद्धि स्वतः स्वीकार होता है। समाधान के लिए कोई भौतिक वस्तु नहीं चाहिए। हर अवस्था में, हर व्यक्ति समझदार हो सकता है। चाहे वह एक पैसा कमाता हो, एक लाख कमाता हो, या ख़ाक कमाता हो। समझदार होने का अधिकार सबमे समान है, उसको प्रयोग करने की आवश्यकता है। पहला घाट है - हमको समझदार होना है। फिर दूसरा घाट है - हमको ईमानदार होना है। समझदारी के अनुसार हमको जीना है, यह ईमानदारी है। तीसरा घाट है - हमको जिम्मेदार होना है। हर सम्बन्ध में जिम्मेदार होना है। चौथा घाट है - हमको अखंड-समाज सार्वभौम-व्यवस्था में भागीदारी करना है। मानव के जीने का कुल मिला कर योजना और कार्यक्रम इतना ही है।
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी 2007, अमरकंटक)