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Tuesday, March 7, 2017

साम्य सत्ता, कार्य ऊर्जा, प्रकटन और प्रवृत्ति

साम्य सत्ता एक दूसरे के बीच खाली स्थली के रूप में सब जगह दिखता है.  दो व्यक्तियों के बीच में तो यह है ही - इससे इस बात का अनुमान कर सकते हैं यही वस्तु दो धरती के बीच में भी है, दो जानवरों के बीच में, दो अणुओं, दो परमाणुओं, दो परमाणु अंशों के बीच में भी है.  दो इकाइयों के बीच में सत्ता होने का प्रयोजन है - उनके एक दूसरे को पहचानने की व्यवस्था हो जाना।  एक दूसरे के बीच खाली स्थली नहीं होती तो वे एक दूसरे को पहचान ही नहीं सकते थे.  सत्ता की "पारदर्शीयता" के फलस्वरूप ही एक दूसरे को पहचानना बनता है.

सत्ता एक "प्राप्त" वस्तु है.  प्रत्येक एक में यह "पारगामी" है.  एक परमाणु अंश, परमाणु, अणु, पत्थर, धरती, मनुष्य - सबमें यह पारगामी है.  पारगामीयता के प्रमाण में ऊर्जा सम्पन्नता है.  ऊर्जा सम्पन्नता वश क्रियाशीलता है.  क्रिया करने के पहले से ही जो प्राप्त रहता है, उसका नाम है - साम्य ऊर्जा।  साम्य ऊर्जा सबको प्राप्त है.  साम्य ऊर्जा प्राप्त होने से सभी  क्रियाशील हैं.   सत्ता ही साम्य ऊर्जा है - जिसमें संपृक्त होने से जड़ चैतन्य संसार क्रियाशील है.  क्रियाशीलता के फलस्वरूप "कार्य ऊर्जा" बनती है.  उपयोगिता-पूरकता स्वरूप में कार्य-ऊर्जा है.  कार्य ऊर्जा का प्रयोजन है - एक दूसरे का विकास।  जिससे अग्रिम प्रकटन होता है.  पिछली अवस्था में अगली अवस्था का भ्रूण रूप रहता है, फलस्वरूप अग्रिम अवस्था प्रकट होता है.  सहअस्तित्व इस तरह नित्य और निरंतर प्रकटनशील है.  सहअस्तित्व के नित्य और निरंतर प्रकटनशील होने के आधार पर मानव भी प्रकट हो गया.  मानव के प्रकट होने का प्रयोजन है - वह सहअस्तित्व के प्रतिरूप स्वरूप में काम करे.  सहअस्तित्व दर्शन ज्ञान के अनुरूप जीवन को सार्थक बनाये।  इससे बच के निकलने का कोई रास्ता नहीं है.

सत्ता जड़ प्रकृति को 'ऊर्जा' स्वरूप में प्राप्त है तथा चैतन्य प्रकृति को 'ज्ञान' स्वरूप में प्राप्त है.

प्रश्न: तो क्या प्रकृति में प्रकटन (पहले जड़ फिर चैतन्य) के साथ साथ सत्ता में भी प्रकटन (पहले ऊर्जा फिर ज्ञान) हो गया?  क्या सत्ता दो स्वरूप में पैदा हो गया?

उत्तर: नहीं! सत्ता एक ही वस्तु है, उसके दो नाम हैं.  जड़ के साथ उसे "ऊर्जा" कहते हैं, चैतन्य के साथ उसे "ज्ञान" कहते हैं.

जड़-चैतन्य प्रकृति सत्ता में संपृक्त है.  जड़ प्रकृति के सत्ता में भीगे रहने से प्रभाव को हम ऊर्जा कह रहे हैं.  चैतन्य प्रकृति (जीवन) के सत्ता में भीगे रहने से प्रभाव को हम ज्ञान कह रहे हैं.  ऊर्जा है, इसीलिये जड़ प्रकृति कार्यरत है.  ज्ञान है, इसीलिये चैतन्य प्रकृति कार्यरत है.  कार्यरत न हो ऐसा कोई जड़ या चैतन्य वस्तु नहीं है.


प्रश्न: चेतना क्या है?

उत्तर:  चेतना ज्ञान का ही (चैतन्य प्रकृति द्वारा) प्रकाशन है.  ज्ञान के प्रकाशन की चार स्थितियाँ हैं - जीव चेतना, मानव चेतना, देव चेतना और दिव्य चेतना।  "चेतना विकास" अध्ययन की वस्तु बन गयी!

चैतन्य वस्तु (जीवन) अपनी "प्रवृत्ति" के अनुसार चेतना को व्यक्त करती है.  चार विषयों में प्रवृत्ति, पाँच संवेदनाओं में प्रवृत्ति, तीन ऐषणाओं में प्रवृत्ति और उपकार में प्रवृत्ति।  प्रवृत्ति के अनुसार ये चार स्थितियाँ हैं.  चार विषयों और पाँच संवेदनाओं में प्रवृत्ति जीव चेतना की सीमा में है.  लोकेषणा में प्रवृत्ति देवचेतना की सीमा में है.  उपकार प्रवृत्ति दिव्य चेतना की सीमा में है.

प्रश्न: प्रवृत्ति और योग्यता में क्या भेद है?

उत्तर: प्रवृत्ति के अनुसार योग्यता (प्रकाशन क्रिया) प्रकट होती है.  न कि योग्यता के अनुसार प्रवृत्ति।

प्रवृत्ति ही प्रकट होता है.  प्रकटन के अनुसार ही नामकरण है.  पदार्थावस्था एक नाम है.  प्राणावस्था एक नाम है.  जीवावस्था एक नाम है.  ज्ञानावस्था एक नाम है.  ज्ञानावस्था की प्रवृत्ति का परिशीलन करने गए तो चेतना के चार स्तर पहचान में आ गए.  प्रवृत्ति के अनुसार ही मानव जीता है.  प्रवृत्ति ही स्वभाव के रूप में आता है.

सहअस्तित्व प्रकटन क्रम में प्रवृत्ति में परिवर्तन हुआ है.  जड़ प्रकृति में मात्रात्मक परिवर्तन के साथ गुणात्मक परिवर्तन हुआ है.  चैतन्य प्रकृति केवल गुणात्मक परिवर्तन होता है.  गठनपूर्णता पर्यन्त मात्रात्मक परिवर्तन के साथ गुणात्मक परिवर्तन है.  गठनपूर्णता उपरान्त केवल गुणात्मक परिवर्तन है.  गुणात्मक परिवर्तन की स्थिति के अनुसार प्रवृत्तियाँ हैं.  प्रवृत्तियों के प्रकाशन का नाम "योग्यता" है.

- बाबा श्री ए नागराज के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २०१०, अमरकंटक)




1 comment:

Sumer Singh said...

अति उत्तम!