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Saturday, January 22, 2011

पदार्थावस्था से प्राण-अवस्था तक प्रकटन


सबसे पहले यह समझना बहुत ज़रूरी है कि संसार का क्रियाकलाप स्वयं-स्फूर्त है. प्रकृति को अपना क्रियाकलाप सीखने के लिए मनुष्य की आवश्यकता नहीं है. किसी विज्ञानी के सिखाने से मिट्टी उर्वरक नहीं होता. प्राण-अवस्था की प्राण-कोशिकाएं जब सूख कर मिट्टी में मिलते हैं, तो वे सब उर्वरक होते हैं. मनुष्य और जीव-जानवरों का मल-मूत्र भी उसी तरह मिट्टी में मिल कर उर्वरक बनता है.

पदार्थ-अवस्था के सभी परमाणुओं में क्रियाशीलता सत्ता में संपृक्तता वश है. पदार्थावस्था से प्राण-अवस्था उसकी क्रियाशीलता के आधार पर ही प्रगट हुई. प्राण-अवस्था अपनी कार्य-ऊर्जा के आधार पर ही कार्य कर रहा है.

जितने भी प्रजाति के परमाणु धरती पर होने हैं, उनके प्रकटन के बाद ही यौगिक-क्रिया का प्रकटन है. पानी सबसे पहला यौगिक है. पानी एक जलने वाले वस्तु और एक जलाने वाले वस्तु के संयोग से बना. इन दोनों वस्तुओं में प्यास बुझाने वाला गुण नहीं है. ये दोनों किसी निश्चित अनुपात में अनुकूल परिस्थितियों के साथ मिलने से दोनों में सकारात्मक परिवर्तन होने, और दोनों के संतुष्ट होने की बात आती है – जिससे पानी घटित होता है. दोनों का परस्पर-विरोध समाप्त होने पर संतुष्टि-बिंदु आया कि नहीं?

प्रश्न: धरती पर पानी के प्रकट होने की घटना एक बार घटित हुई, या अभी भी पानी का प्रकटन जारी है?

उत्तर: एक बार धरती पर चारों अवस्थाओं के संतुलन पूर्वक रहने के लिए जितना पाने की आवश्यकता है, वह एक बार तैयार हो गया. जीव और मनुष्य का प्रकटन नहीं हुआ था, तब यह हुआ. पानी अब आवर्तनशील है.

पानी प्रकट होने पर उसमें धरती से अम्ल और क्षार दोनों आ गए. उससे योग-संयोग पूर्वक रचना-तत्व तैयार हो गया. रचना-तत्व तैयार होने से प्राण-सूत्र तैयार हो गए. प्राण-सूत्र जब रसायन-जल में सांस लेने लगे तो उसी के साथ उनमें रचना-विधि आ गयी. रचना-विधि के अनुसार प्राण-सूत्र उस प्रकार की रचना शुरू कर दिए. बीज-वृक्ष विधि से उनकी आवर्तन-शीलता बनने से प्राण-सूत्रों में जो खुशहाली होती है, उससे उनमें दूसरे प्रकार की रचना-विधि स्वयं-स्फूर्त उभर आती है. इस तरह अनेक तरह की रचना-विधियाँ और उनके अनुरूप रचनाएं, और उनकी आवर्तनशील परम्पराएं स्थापित हो गयी.

प्रश्न: पुष्टि-तत्व कैसा दिखता है?

पुष्टि-तत्व अम्ल और क्षार के योग-संयोग से बनता है, जो तरल और क्रिस्टल जैसा दिखता है. वहीं से रस-तंत्र की शुरुआत है. पुष्टि-तत्व का प्रचलित-नाम प्रोटीन है. रचना-तत्व का प्रचलित नाम हार्मोन है.

प्रश्न: प्राण-कोशाओं के बनने की क्या प्रक्रिया है?

हर जीव, हर मनुष्य के हड्डियों के पोल में प्राण-कोशिकाएं बनते रहते हैं. हड्डी के पोल में पुष्टि-तत्व, रचना-तत्व और अनुकूल ताप और दाब की परिस्थितियों में प्राण-कोशायें बन जाते हैं. पेड़-पौधों में उनके तने और छाल के बीच में ये बनते हैं.

प्रश्न: मनुष्य-शरीरों, जीव-शरीरों, और वनस्पतियों की प्राण-कोशिकाओं में क्या अंतर है?

प्राण-कोशिकाएं सभी एक ही प्रजाति के होते हैं. पेड़-पौधों से लेकर, जीव-शरीरों से चलकर मनुष्य-शरीर तक प्राण-कोशा ही हैं. किन्तु उनमें मात्रात्मक और गुणात्मक परिवर्तन रहता है. प्राण-कोशाओं की बनावट, लम्बाई-मोटाई और उनमें निहित रचना-विधि में गुणात्मक-परिवर्तन होता है. इस तरह प्राण-कोशायें एक प्रजाति की होते हुए उनका स्वरूप वनस्पति-संसार में एक है, जीव-संसार में दूसरा है, और मनुष्य-शरीर में तीसरा है. सभी मनुष्य-शरीरों की प्राण-कोशिकाएं एक ही प्रकार की हैं. मनुष्य-शरीर में भी सभी अंग-अवयवों (जैसे आँख और हाथ) में प्राण-कोशिकाएं एक ही प्रकार की हैं. स्थान के अनुसार वे काम करते रहते हैं.

प्रश्न: प्राण-कोशिकाएं जब मृत हो जाते हैं तब क्या होता है?

उनमें श्वसन-प्रश्वसन समाप्त हो जाता है. साथ ही उनका गीलापन समाप्त हो जाता है.

प्रश्न: प्राण-सूत्र कैसा दिखता है?

प्राण-सूत्रों की लम्बाई उनकी मोटाई से ज्यादा रहती है. छोटे-छोटे पेट के बल रेंगने वाले कीड़ों जैसे दीखते हैं.


प्रश्न: प्राण-सूत्रों में रचना-विधि किस स्वरूप में रहती है?

उसके आकार के बारे में यदि आप पूछ रहे हो – तो वह गड्ढा और फिर उभरा हुआ की श्रंखला के रूप में दिखती है. उभरे हुए और गड्ढे के चारों ओर एक वृत्त जैसा रहता है. रचना-विधि का अभिलेख वही है. प्राण-सूत्रों को यदि देखोगे तो वह आँखों में ऐसा दिखेगा. रचना-विधि बदलता है तो उसके अनुरूप में यह गड्ढा और उभार की संख्या भी बदलता है. किसी में ४, किसी में ८, किसी में १००... इसको मात्रात्मक और गुणात्मक परिवर्तन का लक्षण हम माने. मात्रात्मक परिवर्तन के अनुसार गुणात्मक परिवर्तन होने से पूरा जड़-संसार सज गया. इस तरह पदार्थ-अवस्था और प्राण-अवस्था दोनों पूरा हो गया.


- बाबा श्री ए नागराज के साथ संवाद पर आधारित (दिसम्बर २०१०, अमरकंटक)

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