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Wednesday, June 16, 2010

ज्ञान

ज्ञान होना आवश्यक है - यह सबको पता है। ज्ञान क्या है? - यह पता नहीं है। मध्यस्थ-दर्शन के अनुसन्धान से निकला - ज्ञान मूलतः तीन स्वरूप में है। सह-अस्तित्व दर्शन ज्ञान, जीवन ज्ञान, और मानवीयता पूर्ण आचरण ज्ञान। इस ज्ञान के अनुरूप सोच-विचार, सोच-विचार के अनुरूप योजना और कार्य-योजना, कार्य-योजना के अनुरूप फल-परिणाम, फल-परिणाम यदि ज्ञान-अनुरूप होता है तो समाधान है - नहीं तो समस्या है। इस तरह संज्ञानीयता पूर्वक जीने की विधि आ गयी।

ज्ञान को समझाने के लिए "शिक्षा विधि" के अलावा और कोई रास्ता नहीं है। उपदेश विधि से ज्ञान को समझाया नहीं जा सकता। शिक्षा और व्यवस्था की आवश्यकता की पूर्ती होने के आशय में व्यापक की चर्चा है, पारगामीयता की चर्चा है, पारगामीयता के प्रयोजन की चर्चा है।

पारगामीयता का प्रयोजन है - जड़ प्रकृति में ऊर्जा-सम्पन्नता, और चैतन्य-प्रकृति में ज्ञान-सम्पन्नता। जड़ प्रकृति में ऊर्जा-सम्पन्नता प्रमाणित है - कार्य-ऊर्जा के रूप में। मानव में ज्ञान-सम्पन्नता प्रमाणित होना अभी शेष है। जड़-परमाणु स्वयं-स्फूर्त क्रियाशील है - बिना किसी बाहरी हस्तक्षेप के! उसी तरह चैतन्य-परमाणु (जीवन) को भी स्वयं-स्फूर्त क्रियाशील होना है। जीवन परमाणु के स्वयं-स्फूर्त काम करने के लिए मानव ही जिम्मेदार है, और कोई जिम्मेदार नहीं है। मानव से अधिक और प्रगटन नहीं है, अभी तक तो इतना ही देखा गया है। मानव समाधान पूर्वक जीना चाहता है - और संज्ञानीयता पूर्वक ही समाधान पूर्वक जीना बनता है। मानव न्याय पूर्वक जीना चाहता है - और संज्ञानीयता पूर्वक ही न्याय पूर्वक जीना बनता है। मानव सत्य पूर्वक जीना चाहता है - और संज्ञानीयता पूर्वक ही सत्य पूर्वक जीना बनता है। संज्ञानीयता पूर्वक ही हर मनुष्य न्याय, समाधान (धर्म), और सत्य को फलवती बनाता है।

न्याय, धर्म, और सत्य मनुष्य की कल्पनाशीलता के तृप्ति-बिंदु का प्रगटन है। कल्पनाशीलता चैतन्य-इकाई के व्यापक में भीगे रहने का फलन है।

व्यापक-वस्तु ही ज्ञान स्वरूप में मनुष्य को प्राप्त है। ज्ञान अलग से कोई चीज नहीं है। ज्ञान को जलाया नहीं जा सकता, न तोडा जा सकता है, न बर्बाद किया जा सकता है। ज्ञान अपने में अछूता रहता है। ज्ञान को परिवर्तित नहीं किया जा सकता। ज्ञान-संपन्न हुआ जा सकता है।

क्रिया रूप में ज्ञान व्यक्त होता है। जीवों में जीव-शरीरों के अनुसार जीव-चेतना स्वरूप में ज्ञान व्यक्त होता है। जीव-शरीरों को जीवंत बनाता जीवन जीव-चेतना को ही व्यक्त कर सकता है। जीव-चेतना में शरीर को जीवन मान करके वंश-अनुशंगीय विधि से जीना होता है। मानव-शरीर ज्ञान के अनुरूप बना है। सारी पंचायत वही है! वंश-अनुशंगीय विधि से मानव जी कर सुखी हो नहीं सकता। जीवन को पहचान कर संस्कार-अनुशंगीय विधि से जी कर ही मानव सुखी हो सकता है। शरीर-संरचना समान है - चाहे काले हों, भूरे हों, गोरे हों। अब हमको तय करना है - शरीर स्वरूप में जीना है, या जीवन स्वरूप में जीना है।

इस धरती पर पहली बार जीवन का अध्ययन सामने आया है। यही मौलिक अनुसन्धान है। इससे मनुष्य-जाति के जागृत होने की सम्भावना उदय हो गयी है। परिस्थितियां भी मनुष्य को जागृत होने के लिए बाध्य कर रही हैं। सम्भावना उदय होना और परिस्थितियां बाध्य करना - ये दोनों होने से घटना होता है। संभावना यदि उदय नहीं होता तो परिस्थितियों के आगे मनुष्य हताश हो सकता है, निराश हो सकता है। मैंने जब शुरू किया था तो धरती की यह परिस्थिति हो गयी है, यह अज्ञात था। साथ ही सम्भावना भी शून्य था। आज परिस्थिति ज्ञात है - धरती बीमार हो गयी है। अध्ययन पूर्वक जागृत होने की सम्भावना भी उदय हो गयी है।

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २०१०, अमरकंटक)

Monday, June 14, 2010

संपृक्तता, क्रियाशीलता, प्रगटनशीलता

हर परस्परता के बीच जो रिक्त-स्थली है, वही व्यापक-वस्तु है। इकाइयों के बीच अच्छी दूरी होने का प्रयोजन है - एक दूसरे की पहचान होना। पहचानने का प्रयोजन है - व्यवस्था के स्वरूप में कार्य कर पाना। इकाइयों के कार्य कर पाने का आधार है - व्यापक वस्तु में पारगामियता। व्यापक वस्तु पारगामी है, और परस्परता में पारदर्शी है।

कपड़ा पानी में भीग जाता है, पर पत्थर पानी में नहीं भीगता। पानी कपड़े में पारगामी है, पत्थर में पारगामी नहीं है। जबकि व्यापक पत्थर में, लोहे में, मिट्टी में, झाड में, अणु में, परमाणु में, परमाणु अंश में - हर वस्तु में पारगामी है। हर जड़-चैतन्य परमाणु में व्यापक पारगामी है। साम्य-ऊर्जा व्यापक रहने से पारगामियता स्वाभाविक है। पारगामियता का ज्ञान होना आवश्यक है। इस ज्ञान को अध्ययन-विधि से पूरा किया जा सकता है।

क्रिया के रूप में ही सब कुछ समझ आता है। क्रिया के बिना हम कुछ निश्चित कर ही नहीं सकते। क्रिया एक दूसरे को दिखता है, जिसके आधार पर पहचान है। जैसे - मनुष्य की क्रिया जानवरों से भिन्न है, तभी वह मनुष्य स्वरूप में पहचाना जाता है।

मनुष्य ने अब तक प्रकृति की क्रियाशीलता को पहचाना है, ऊर्जा-सम्पन्नता को पहचाना नहीं है।

प्रश्न: परस्परता में पहचान होने में व्यापक वस्तु की क्या महिमा है?

उत्तर: ऊर्जा-सम्पन्नता वश पहचान है। व्यापक वस्तु न हो तो इकाइयों में न ऊर्जा-सम्पन्नता हो, न क्रियाशीलता हो, न परस्पर पहचान हो!

प्रश्न: चैतन्य-प्रकृति (जीवन) के व्यापक में संपृक्तता से क्या होता है?

उत्तर: चैतन्य-प्रकृति के व्यापक में भीगे रहने से कल्पनाशीलता है। मानव में ज्ञान का मूल तत्व है - कल्पना। मानव में ही ज्ञान की परिकल्पना है। कल्पना स्पष्ट होने पर ज्ञान है। कल्पना आशा, विचार, और इच्छा का संयुक्त रूप है। आशा, विचार, और इच्छा के सुनिश्चित स्वरूप में काम करना ही ज्ञान है। उसके पहले कल्पना रूप में रहता है। कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता चैतन्य प्रकृति में समाई हुई प्रक्रिया है।

कल्पनाशीलता जीवन सहज अभिव्यक्ति है। कल्पनाशीलता को हम बना नहीं सकते।

प्रश्न: जीवों में भी तो जीवन है...

उत्तर: जीवों में "जीने की आशा" है - कल्पना नहीं है। जीने की आशा का भ्रूण रूप स्वेदज-संसार से ही शुरू हो जाता है। जीने की आशा के अनुरूप शरीर-रचना विकसित होता गया - इससे यह बात समझ आता है। जीने की आशा जीवन में होती है, उसके अनुरूप जीव-शरीर रचना होती है। शरीर-रचना जीवन के अनुकूल न हो, तो जीवन शरीर का उपयोग कैसे करेगा?

ज्ञान के अनुरूप जीने के लिए मनुष्य-शरीर रचना का प्रगटन हुआ। ताकि ज्ञान पूर्वक जीना प्रमाणित हो। यह सब इसलिए हुआ क्योंकि - सहअस्तित्व नित्य प्रगटनशील है। सह-अस्तित्व अपने प्रतिरूप को प्रमाणित करने के लिए प्रगट किया।

प्रश्न: मनुष्य इतिहास में पहले कल्पना दी गयी थी - "यह सब सृष्टि किसी सर्वशक्तिमान ईश्वर ने बनाई है।" उसी तरह आप हमको कल्पना दे रहे हैं - "वस्तुओं की क्रियाशीलता के मूल में साम्य-ऊर्जा या व्यापक है।" इनमें फर्क क्या हुआ?

उत्तर: कल्पना होता ही है। कल्पना के बिना अनुमान कैसे होगा? इस अनुमान के अनुसार आपकी कार्य-प्रणाली हो जाए। (मध्यस्थ दर्शन के प्रस्ताव के आधार पर) सारे अनुमान संज्ञानीयता पूर्वक जीने के लिए और मानव-लक्ष्य (समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व) को प्रमाणित करने के लिए ही बनते हैं। मानव-लक्ष्य पूरा होता है तो यह अनुमान ठीक है।

मानव की मौलिकता जीवों से अलग दिखने के लिए है - मानव लक्ष्य। मानव-लक्ष्य यदि क्रियान्वित और व्यव्हारान्वित होता है तो मानव की मौलिकता प्रमाणित हो गयी। मानव-लक्ष्य यदि पूरा नहीं होता है तो मानव की मौलिकता प्रमाणित नहीं हुई।

आप किसी भी कल्पना को ले आईये - उससे मानव-लक्ष्य पूरा होता है या नहीं, यह देख लीजिये!

मानव लक्ष्य तक पहुंचाने के लिए ही कल्पनाशीलता है।

मानव लक्ष्य सफल होने के लिए ही अध्ययन है।

अध्ययन अभी तक मानव-इतिहास में प्रावधानित नहीं था, न ही मानव-लक्ष्य को पहचाना गया था। ऐसे में आदमी-जात धोखे में फंसेगा या नहीं? मानव धोखे में न फंसे, उद्धार हो जाए, जन्म से ही उसका रास्ता साफ़ रहे, शिक्षा और व्यवस्था सुलभ रहे - इस आशय से मध्यस्थ दर्शन का ताना-बना प्रस्तुत किया गया है।

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित(अप्रैल २०१०, अमरकंटक)

Sunday, June 13, 2010

साक्षात्कार

साक्षात्कार पक्का होने पर अनुभव होता ही है। अनुमान में हमको टिकना पड़ता है। तदाकार होने पर अनुमान में टिकना होता है। तदाकार होने के लिए हर मानव में कल्पनाशीलता पूंजी के रूप में है। अपनी पूंजी को ही उपयोग करना है। इसमें उधार-बाजी कुछ नहीं है! साक्षात्कार में अनुमान पक्का होता है। उससे पहले अनुमान पक्का नहीं होता, गलती होने की सम्भावना बनी रहती है।

सह-अस्तित्व साक्षात्कार होना है। उसके लिए चारों अवस्थाओं के बारे में स्पष्ट होना है - और कुछ भी नहीं है। शब्द से इंगित अर्थ स्वरूप में वस्तु को पहचानना है।

इसमें देर लगने का पहला कारण है - तर्क! कल्पनाशीलता को तर्क में न फंसा कर वस्तु से तदाकार होने में लगाने से साक्षात्कार हो जाता है।

देर लगने का दूसरा कारण है - पिछला जो पढ़ा है, उसके साथ जोड़ने का प्रयास करना।

अध्ययन पूर्वक सहअस्तित्व के लिए अनुमान बन ही जाता है। साक्षात्कार में अनुमान पक्का होता है। जिसके फलस्वरूप अनुभव होता ही है। अनुभव में विस्तार नहीं होता। अनुभव को प्रमाणित करने जाते हैं तो रेशा-रेशा स्पष्ट होता जाता है। हम पहले रेशे-रेशे के बारे में स्पष्ट होना चाहें तो उसमें अटक जाते हैं। अनुभव के बाद जैसा जिज्ञासा होता है, हम वैसे व्यक्त हो जाते हैं।

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २०१०, अमरकंटक)

उपयोगिता और आवश्यकता

उपयोगिता वस्तु के साथ है।

आवश्यकता मनुष्य के साथ है।

मनुष्य की (भौतिक) आवश्यकता कम हो जाने से उस भौतिक वस्तु की उपयोगिता कम नहीं हो जाती। जैसे एक कौर रोटी खाने के बाद, और खाने की आवश्यकता कम हो जाती है। आप के एक कौर रोटी खाने के बाद रोटी की उपयोगिता कम नहीं हो जाती। वस्तु की गलती नहीं है। मनुष्य की भौतिक आवश्यकताएं समय अनुसार कम और ज्यादा होती हैं। वस्तु की उपयोगिता का मूल्याँकन व्यवस्था के अर्थ में है, न कि मनुष्य की परिवर्तनशील भौतिक-आवश्यकता के अर्थ में।

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २०१०, अमरकंटक)

Thursday, June 10, 2010

प्रयोजन और कार्य

प्रश्न: सत्ता में सम्पृक्तता वश चुम्बकीय-बल संपन्न परमाणु-अंश एक दूसरे से आ कर जुड़ क्यों नहीं जाते? "क्यों" वे निश्चित-अच्छी दूरी के रूप में व्यवस्था बनाए रखते हैं?

उत्तर: व्यवस्था प्रयोजन के अर्थ में ही दो परमाणु-अंश जुड़ते हैं। दो परमाणु-अंश अच्छी निश्चित दूरी को बनाए रखते हुए कार्य करते हैं, क्योंकि अनेक प्रजाति के परमाणुओं को बनना है। अनेक प्रजाति के परमाणुओं के बिना रासायनिक क्रिया ही नहीं होगा। व्यवस्था प्रयोजन के अर्थ में ही परमाणु-अंश निश्चित अच्छी दूरी बनाए रखते हैं।

प्रश्न: "कैसे" निश्चित अच्छी दूरी बनाए रखते हैं?

उत्तर: परमाणु-अंश घूर्णन गति द्वारा अपना प्रभाव-क्षेत्र बनाए रखते हैं। अपने प्रभाव क्षेत्र को बनाए रखते हुए, दूसरे परमाणु-अंश के साथ जुड़ कर काम करते हैं। घूर्णन गति के प्रभाव वश वे एक सीमा से अधिक पास आ नहीं सकते। इस तरह परमाणु-अंश का वर्चस्व बना रहता है। दो परमाणु-अंशों के साथ होने पर उनका स्वतंत्रता समाप्त नहीं हो जाता।

अस्तित्व का प्रयोजन है - चारों अवस्थाओं की निरंतरता प्रमाणित होना। अस्तित्व की हर स्थिति-गति का यही प्रयोजन है।

प्रयोजन के लिए कार्य होता है।

किसी स्थिति का कार्य "कैसे" होता है, इसका उत्तर उससे आता है - अस्तित्व का प्रयोजन (उस स्थिति के) किस कार्य से सिद्ध होगा?

जैसे - परमाणु-अंश यदि अच्छी निश्चित दूरी में रह कर कार्य नहीं करेंगे तो चारों अवस्थाओं की निरंतरता प्रमाणित होने का प्रयोजन सिद्ध ही नहीं होगा।

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २०१०, अमरकंटक)

Sunday, June 6, 2010

अनुसन्धान और अध्ययन - भाग २

जब किसी को अनुभव होगा तो मुझे जैसा हुआ, वैसा ही होगा - चाहे समाधि-संयम विधि से हो, या अध्ययन-विधि से हो। इसी आधार पर "समझदारी में समानता" की बात मैंने सोचा। मैं जो समझा हूँ, और जैसे जीता हूँ - इसको समझ कर आप मुझसे कम नहीं, मुझसे ज्यादा अच्छे ही जियोगे। आगे की पीढी आगे! ऐसा आपके साथ ही होगा, दूसरे के साथ नहीं - ऐसा नहीं है। सबके साथ ऐसा ही है! एक अपंग व्यक्ति के साथ भी यही स्थिति है। इसी लिए, इस बात के लोकव्यापीकरण की तृषा में हम अभी काम कर रहे हैं।

प्रश्न: अनुभव के बाद क्या और कुछ जानने को शेष रहता है?

उत्तर: नहीं। अनुभव के बाद समझने को "नया" कुछ शेष नहीं रहता।

प्रश्न: क्या अनुभव के बाद, उदाहरण के लिए, शरीर को स्वस्थ रखने के बारे में जो मैं जानना चाहता हूँ, वह भी प्राप्त हो जाएगा?

उत्तर: नहीं। वह कला है, जो "सीखने" की वस्तु है। कला अनुभव की वस्तु नहीं है। कला कर्तव्यों और दायित्वों को पूरा करने के अर्थ में है। सीखने में प्रयोग करना पड़ेगा। रासायनिक-भौतिक संसार संबंधी सभी ज्ञान-अर्जन के लिए प्रयोग आवश्यक है। कर्म-अभ्यास उसी का नाम है, जिसके अनेक आयाम हैं। उदाहरण के लिए - गाय की सेवा करना कर्म-अभ्यास है, कृषि करना कर्म-अभ्यास है, औषधियों को पहचानना और बनाना कर्म-अभ्यास है। अनुभव के बाद हर कला को जल्दी सीखा जा सकता है।

प्रश्न: अनुभव पूर्वक जल्दी कैसे सीखा जा सकता है?

उत्तर: अनुभव की रोशनी में जल्दी सीखा जाता है, क्योंकि हमारा मन फंसा नहीं रहता। भय-प्रलोभन या सुविधा-संग्रह में मन फंसा नहीं रहता, इस कारण अनुभव पूर्वक जल्दी सीखा जाता है।

कर्म-अभ्यास को अनुभव से न जोड़ा जाए! कर्म-अभ्यास पुरुषार्थ की सीमा में है। मैंने अनुभव किया है, पर मैं सभी आयामों में कर्म-अभ्यास संपन्न हूँ - ऐसा नहीं है। मैं जिन आयामों में कर्म-अभ्यास करना चाहता हूँ, वह कर सकता हूँ - ऐसा अधिकार बना है। कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता के आधार पर यह अधिकार बना है।

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २०१०, अमरकंटक)

Friday, June 4, 2010

अनुसन्धान और अध्ययन - भाग १

प्रश्न: अनुसन्धान पूर्वक आपके समझने की प्रक्रिया और अध्ययन पूर्वक हमारे समझने की प्रक्रिया में क्या भेद है?

उत्तर: प्रक्रिया तो दोनों में अध्ययन ही है। मैंने सीधा प्रकृति में अध्ययन किया। आप प्रकृति में जिसने अध्ययन करके अनुभव किया, उसका अनुकरण करके अध्ययन कर रहे हैं।

प्रश्न: आप जो शब्दों द्वारा प्रस्तुत करते हैं, उसके साथ हम अपनी कल्पनाशीलता का प्रयोग करके "अर्थ" स्वरूप में वस्तु को पाने का प्रयास कर रहे हैं। आपके अध्ययन में शब्द तो नहीं था?

उत्तर: मुझे भी वैसे ही अध्ययन हुआ है। जो भी गति या दृश्य हम देखते हैं, वह पहले शब्द में ही परिवर्तित होता है। जो दृश्य को मैंने देखा उसका नामकरण किया। नामकरण करते हुए मैंने दृश्य के रूप में अर्थ को स्वीकार लिया। ऐसा मेरे साथ हुआ। आपके पास कल्पनाशीलता है, जिससे आप उस अर्थ तक पहुँच ही सकते हैं।

साक्षात्कार पूर्वक अर्थ बोध होना, अर्थ-बोध होने के बाद अनुभव होना, फिर अनुभव-प्रमाण बोध होना, फिर प्रमाण को संप्रेषित करना - यह परमार्थ है। पुरुषार्थ साक्षात्कार तक ही है।

प्रश्न: क्या आपने प्रकृति की एक-एक वस्तु के बारे में सोचा, फिर अध्ययन किया?

उत्तर: नहीं। प्रकृति अपने आप से जो प्रस्तुत हुई उसी का मैंने अध्ययन किया। जैसे - मैंने पत्थर को नहीं सोचा था। पत्थर स्वयं सामने आया और बिखर गया। बिखरते-बिखरते स्वायत्त विधि से काम करता हुआ दिखा। उसको मैंने "परमाणु" नाम दिया। फिर जैसे पत्ता आया। पत्ता विघटित होते-होते प्राणकोषा तक को दिखा दिया।

प्रश्न: ऐसे कैसे देखा? आपने "देखा" शब्द का प्रयोग किया। "देखने" का क्या मतलब है?

उत्तर: देखने का तरीका ऐसा पारदर्शी बन जाता है कि दिख जाता है। जीवंत शरीर के साथ मुझ में ये स्वीकृतियां हुई, इसलिए मैंने "देखा" शब्द प्रयोग किया। देखने का मतलब समझना है। समझा नहीं, तो देखा नहीं है।

इस तरह देखने के लिए मेरा "अपेक्षा" कुछ नहीं था। अपने आप से हुआ।

प्रश्न: आपमें देखने का अपेक्षा न होते हुए भी देखना कैसे बना? बिना अपेक्षा के "देखने वाले" का क्या अर्थ हुआ?

उत्तर: "देखने वाला" जीवन (मैं) ही था। इसमें रहस्य कुछ भी नहीं है। "सत्य से मिथ्या कैसे पैदा होता है?" - यह जिज्ञासा मुझ में पहले से था ही। उसके उत्तर में यह स्वयं-स्फूर्त घटित हुआ। मेरी जिज्ञासा के आधार पर यह अध्ययन हुआ।

आप जो मुझ से अध्ययन करते हैं - उसमें अपेक्षा भी है, जिज्ञासा भी है, ध्वनि भी है, भाषा भी है।

प्रश्न: आपके अध्ययन में जिज्ञासा बना रहा, पर आपने अपनी कल्पनाशीलता को दिशा नहीं दिया...

उत्तर: हाँ। मेरी कल्पनाशीलता कर्म-स्वतंत्रता मेरी जिज्ञासा के लिए समाहित हो गया। इसी का नाम है चित्त-वृत्तियाँ निरोध होना। चित्त-वृत्तियाँ निरोध होने के बाद यह अध्ययन हुआ है। समाधि में चित्त वृत्तियाँ निरोध होता है। समाधि के बिना संयम नहीं होता। आज भी यदि कोई संयम में अध्ययन करना चाहते हैं तो उसी मार्ग पर चलना होगा। दूसरा तरीका है - आप यह मानें "प्रकृति किसी को यह समझ दे दिया"। प्रकृति-प्रदत्त यह वस्तु अध्ययन-गम्य है या नहीं है, सच्चाई है या नहीं? - इसको आप शोध करें! यदि आप यह मानें "प्रकृति नहीं दिया" - तो आप पहले जिस तरीके से रह रहे हैं, वैसे ही रहिये! वह रास्ता तो आपके लिए रखा ही है।

जीवन में जिज्ञासा, जिज्ञासा के साथ जीवन द्वारा प्रयास, प्रयास के फलन में प्रकृति द्वारा उत्तर। इस तरह मैंने इस बात को पाया। "सत्य से मिथ्या कैसे पैदा होता है?" - यह तीव्र जिज्ञासा जीवन (मुझ) में था, जिसकी आपूर्ति के लिए यह सब हुआ।

प्रश्न: तो आपकी जिज्ञासा मूल में रही, साधना से आपकी पारदर्शीयता पूर्वक देखने की स्थिति बनी, और प्रकृति आपके सम्मुख प्रस्तुत हुई, जिसका आपने अध्ययन किया। क्या ऐसा है?

उत्तर: हाँ। मुझको भी पहले साक्षात्कार, फिर बोध,फिर अनुभव हुआ। अनुभव होने के बाद मैंने उसे सम्पूर्ण मानव-जाति का सम्पदा माना। ऐसा सोच कर इसको मानव के हाथ में सौंपने का कोशिश किया। जैसे-जैसे यह किया, इस काम के लिए परिस्थितयां और अनुकूल होता गया। इसको भी मैं प्रकृति का देन और मानव का पुण्य मानता हूँ।

प्रश्न: तो आपमें जो घटा उसको आपने नाम दिया। यह जो घटा यह "साक्षात्कार" है। यह जो घटा यह "बोध" है। क्या ऐसे हुआ?

उत्तर: हाँ - वही है। जो घटा - उसी का नामकरण मैंने किया।

प्रश्न: क्या यह भी आपको दिखा - "यह घटना जीवन-परमाणु के इस परिवेश में हो रही है"।

उत्तर: हाँ। जीवन-ज्ञान के बाद ही यह (साक्षात्कार, बोध, अनुभव) घटित हुआ था। जीवन-ज्ञान के बाद घटित होने से - किसमें क्या होता है, यह स्पष्ट होता गया। यही मैंने दर्शन में लिखा भी है। मैंने जो लिखा है, वह वेदों के reference से नहीं है। वेदों में जो बताया गया है, यह वह नहीं है। वेदों में जीवन (गठन पूर्ण परमाणु) की चर्चा नहीं है।

साक्षात्कार, बोध, अनुभव होने पर प्रमाण को मैं लिखा हूँ। उस प्रमाण से आपको बोध होना है, अनुभव होना है, पुनः प्रमाण होना है। ऐसे एक से दुसरे में अंतरित होने की बात होती है। यदि हम दुसरे को समझा नहीं पाते हैं, तो हमारी समझ का प्रमाण कहाँ हुआ?

प्रश्न: क्या आपकी साधना विधि और हमारी अध्ययन विधि का फल एक ही है?

उत्तर: मेरी साधना विधि वाला पुरुषार्थ कोई बिरला व्यक्ति ही कर सकता है। सभी जो कर सकते हैं - उस अध्ययन-विधि को मैंने प्रस्तुत किया है। साधना विधि और अध्ययन-विधि का फल एक ही है। साधना विधि से "ज्यादा" अनुभव होता हो, अध्ययन-विधि से "कम" अनुभव होता हो - वह भी नहीं है। अनुभव के बाद आपको भी वैसा ही दिखेगा, जैसा मुझे दिखता है। यह वैसे ही है - लोटे से भी पानी लाया जा सकता है, घड़े से भी पानी लाया जा सकता है। साधना-विधि से पाना है तो उसी पर चल के देखो। अध्ययन-विधि से पाना है तो उस पर चल कर देखो।

प्रकृति जैसा है, वैसा मेरे सम्मुख प्रस्तुत हुआ
अब प्रकृति जैसा है, वैसा आपको अध्ययन कराने के लिए मैंने प्रस्तुत किया है।

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २०१०, अमरकंटक)